दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने पहले स्वतंत्रता दिवस संबोधन में एक साथ चुनाव पर राजनीतिक चर्चा का आह्वान फिर से दुहराया । लाल किले से इस बार का प्रधानमंत्री का 15 अगस्त संबोधन उनके पिछले भाषणों से अलग था । स्वतंत्रता दिवस से मात्र दस दिन पहले संसद से पास जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट के जरिए जम्मू व कश्मीर को विशेष दर्जा देनेवाले संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने पर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में सबसे ज्यादा जोर दिया । उसके बाद नरेंद्र मोदी एक साथ चुनाव पर चर्चा की बात बोले, जो वे अपने पहले कार्यकाल के पूरे पांच साल तक कहते रहे ।

लेकिन मई में लोकसभा चुनाव के साथ सिर्फ उन्हीं राज्यों - आंध्रप्रदेश, ओडिशा, सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश में चुनाव हुए, जिनकी विधान सभाओं का कार्यकाल लोकसभा के साथ खत्म हो रहा था । अभी संसद ने कई संविधान संशोधन बिल पास किए, जिनमें सूचना अधिकार संशोधन, 2019 समेत कुछ ऐसे भी बिल थे, जिसकी कोई अनिवार्यता नहीं थी । उससे जुड़े हुए मुद्दों की चर्चा प्रधानमंत्री ने कभी किसी समारोह में नहीं की ।

प्रधानमंत्री का ‘एक देश एक चुनाव’ नारा सही है, लेकिन वे सिर्फ राजनीतिक चर्चा से एक साथ चुनाव कराना चाहते हैं । चुनाव आयोग ने बार-बार कहा है कि संविधान संशोधनों के बगैर एक साथ चुनाव नहीं कराए जा सकते । चुनाव सुधार के लिए आवश्यक नियम बनाने, बदलने के चुनाव आयोग के सारे सुझावों की फाइलें सरकार के गतालखाते में पड़ी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सिर्फ एक ही चुनाव सुधार के पक्ष में हैं, और वो है एक साथ चुनाव । प्रधानमंत्री सिर्फ सार्वजनिक समारोहों में चर्चा से ही एक साथ चुनाव कराना चाहते हैं । इसके लिए जरूरी संविधान संशोधनों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है ।

जम्मू व कश्मीर से धारा-370 खत्म करने की भाजपा की पुरानी चर्चा पर बात तब बनी, जब उसके लिए संसद में बिल लाकर 1949 के उस प्रावधान को हटाया गया । जम्मू व कश्मीर का राज्य का दर्जा समाप्त करके उसे दो केंद्र शासित क्षेत्रों में विभाजित करने का फैसला आते ही वहां की चुनाव प्रक्रिया थम गयी । अभी चुनाव आयोग के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी, जम्मू व कश्मीर में विधान सभा चुनाव कराना । जम्मू व कश्मीर में भाजपा-पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी गठजोड़ सरकार गिर जाने के बाद 19 जून, 2018 को पहले राज्यपाल शासन लगा । उसके छह महीने बीत जाने के बाद जनवरी, 2019 में राष्ट्रपति शासन लगा । अभी राष्ट्रपति शासन की भी अवधि छह महीने के लिए बढ़ा दी गयी है । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन बिल और राष्ट्रपति शासन की अवधि छह महीने के लिए बढ़ाने का प्रस्ताव एक साथ संसद में पेश किया ।

31 जुलाई तक की रिपोर्ट है कि चुनाव आयोग जम्मू व कश्मीर में विधान सभा चुनाव की तैयारी में जुटा था । अप्रैल में भी चुनाव आयोग लोकसभा के साथ ही जम्मू व कश्मीर विधान सभा का भी चुनाव कराने के पक्ष में था, केंद्र सरकार से हरी झंडी नहीं मिली । लोकसभा चुनाव प्रक्रिया समाप्त होने के समय मई में भी मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा कि अमरनाथ यात्रा समाप्त होने के बाद अगस्त में विधान सभा चुनाव कराया जा सकता है । जम्मू व कश्मीर विधान सभा राज्यपाल सत्यपाल मल्लिक ने 21 नवंबर, 2018 को भंग कर दी ।

अगस्त आते-आते स्थितियां ऐसी बदली कि जम्मू व कश्मीर का स्वरूप ही बदल गया । अमरनाथ यात्रा भी बीच में ही स्थगित हो गयी । अब उसके बाद से चुनाव आयोग चुप है । दिल्ली से जम्मू तक कोई भी चुनाव अधिकारी मुंह खोलने को तैयार नहीं है । सूत्रों के अनुसार जम्मू व कश्मीर विधान सभा का चुनाव इस वर्ष के अंत में दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड के साथ कराए जा सकते हैं । इन राज्यों की विधान सभाओं का कार्यकाल कायदे से उस समय तक पूरा हो रहा है । 2020 के अंत में बिहार विधान सभा का चुनाव होना है । 2021 में फिर पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु का नंबर आ जाएगा । जम्मू व कश्मीर का भी 2021 में ही होता, अगर अचानक उसका कायापलट नहीं होता । एक साथ चुनाव की जोरदार वकालत सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करते रहे हैं । जम्मू व कश्मीर वाले ‘ऐतिहासिक कदम’ से एक बात तो स्पष्ट है कि सरकार लोकसभा चुनाव के साथ इस राज्य में चुनाव क्यों नहीं कराना चाहती थी ।

2018 के अंत में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के साथ भी जम्मू व कश्मीर का चुनाव हो सकता था । लेकिन केंद्र सरकार के इरादे कुछ और थे, जिसकी चुनाव आयोग समेत किसी को भी गंध नहीं लगी । चुनाव आयोग जम्मू व कश्मीर में चुनाव तैयारी में जुटा रहा । अप्रैल, 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ जम्मू व कश्मीर में चुनाव प्रक्रिया शुरू करके वापस ले ली गयी । चुनाव आयोग के सामने कानूनी सलाह लेने की नौबत थी । मई भी इसी तरह बीता । 28 जून को संसद में अपनी सफाई में गृहमंत्री अमित शाह ने चुनाव आयोग को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराकर इन आरोपों को खारिज किया कि सरकार टालना चाहती है । 31 जुलाई तक किसी को कानोंकान भनक नहीं लगी कि सरकार जम्मू व कश्मीर का स्वरूप बदले बिना वहां चुनाव नहीं कराना चाहती । जम्मू व कश्मीर के मुख्य निर्वाचन अधिकारी शैलेंद्र कुमार ने 2 अगस्त को मीडिया कान्फ्रेंसिंग के जरिए 22 जिला निर्वाचन अधिकारियों से चुनाव तैयारी की चर्चा करते हैं और मात्र तीन बाद 5 अगस्त को एक ही झटके में सारी तैयारियों पर विराम लग जाता है । जम्मू व कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त होने के बाद से हालात पहले से ज्यादा बिगड़े हुए हैं । जम्मू व कश्मीर के मतदाताओं ने इस कदम का स्वागत किया कि नहीं, यह तो चुनाव के बाद ही पता चलेगा । जम्मू व कश्मीर के सभी नेता जेल में बंद हैं । कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद को दूसरी बार कश्मीर हवाई अड्डे से वापस दिल्ली भेज दिया गया । कश्मीर से पहले आईएएस टॉपर शाह फैसल ने नौकरी से इस्तीफा देकर चुनाव लड़ने के लिए नयी पार्टी बनायी । उन्होंने अपने हिरासत को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी ।

दो अगस्त को ही मुख्य चुनाव आयुक्त(सीईसी) सुनील अरोड़ा ने केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को चुनाव सुधार के उपायों के लिये पत्र लिखा । उसके पहले जुलाई में 14 राजनीतिक दलों ने राज्यसभा में नोटिस देकर चुनाव सुधार पर चर्चा चाही, मगर सरकार की उसमें दिलचस्पी नहीं थी ।

सीईसी सुनील अरोड़ा कह चुके हैं कि निकट भविष्य में एक साथ चुनाव की कोई संभावना नहीं है । इसके लिए कई संविधान संशोधन जरूरी है । सबसे पहले तो संविधान की धारा 83(2) और 172(1) बदलने पड़ेंगे, ताकि लोकसभा तथा विधान सभाओं का कार्यकाल एक साथ चुनाव के अनुकूल लाने के लिए संशोधन किया जा सके । उसके अलावे लोकसभा भंग के बारे में अनुच्छेद 85, विधान सभाओं के विघटन से संबंधित 174 और 356 में भी संशोधन आवश्यक है । चुनाव आयोग ने सरकार को बता दिया है कि इसके बगैर एक साथ चुनाव नहीं कराया जा सकता ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक साथ चुनाव पर राजनीतिक चर्चा चाहते हैं, संवैधानिक नहीं । कोई राजनीतिक दल इसके पक्ष में नहीं है । अपने पहले पांच साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसे संविधान संशोधन की जरूरत नहीं समझी । प्रधानमंत्री की सुविधा से अलग-अलग चुनाव होते रहे और वे एक साथ चुनाव पर जोर देते रहे । 2017 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश का चुनाव तथा वोटों की गिनती अलग-अलग करानेवाले सीईसी ए. के. जोती प्रधानमंत्री की सुविधा से एक साथ चुनाव कराने को तैयार थे । 2018 में तो तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव ने अचानक विधान सभा भंग करके चुनाव आयोग से चुनाव कराने का आग्रह किया । जबकि विधान सभा का कार्यकाल पूरा होने में आठ महीने बाकी थे । राव दोबारा सत्ता में आ गये । नरेंद्र मोदी शायद ऐसा ही पूरे देश में चाहते हैं ।

हाल में समाप्त हुए संसद सत्र के चलने या उसके पहले भी ऐसे संशोधनों का प्रधानमंत्री ने कोई संकेत नहीं दिया । लेकिन 15 अगस्त के संबोधन में वही पुराना राग अलापा । इससे मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है । लग रहा है मानो प्रधानमंत्री ऐसा एक साथ चुनाव चाहते हैं, जिसमें हर जगह सरकार भाजपा की बने । स्वतंत्रता दिवस के लिये दिल्ली से कश्मीर तक सुरक्षा चाक-चौबंद लगभग बरकरार है । जम्मू व कश्मीर के बारे में लोकसभा चुनाव के समय से जो अफवाह थी, वो सही साबित हुई । चुनाव आयोग सरकार के अप्रत्यक्ष दबाव में काम कर रहा है, इस पर गृहमंत्री अमित शाह की सफाई से मतदाता आश्वस्त नहीं हैं। ऐसे में एक साथ चुनाव की चर्चा फिर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूरे कार्यकाल तक सुनना बेतुका लगता है ।

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