चुनाव आयोग ने कोरोना संकट के मद्देनजर बिहार विधान सभा चुनाव के लिए सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दलों और राज्यस्तरीय पार्टियों से दोबारा सुझाव मांगे हैं । चुनाव आयोग का विभिन्न दलों से सुझाव मांगने का मकसद था कि चुनाव प्रचार और रैलियां कैसे आयोजित की जाएंगी ।

चुनाव आयोग ने पहले 18 जुलाई को सुझाव मांगा और 31 जुलाई तक राजनीतिक दलों को अपने विचारों से अवगत कराने का निर्देश दिया, ताकि उसके आधार पर दिशानिर्देश जारी किया जा सके । बिहार में जद(यू)-भाजपा गठजोड़ शासन को छोड़ लगभग सभी पार्टियों ने बार-बार कहा कि अभी राज्य में कोरोना संक्रमण और बाढ़ संकट को देखते हुए चुनाव कराने की स्थिति नहीं है, इसलिए चुनाव टाला जाए । 31 जुलाई तक कुल मिलाकर यह स्पष्ट हो गया कि जद(यू) और भाजपा का छोड़ कोई पार्टी अभी बिहार में चुनाव कराने के पक्ष में नहीं हैं ।

4 अगस्त को चुनाव आयोग के सचिव एन. टो. भटिया ने दोबारा सुझाव मांगा और 11 अगस्त तक का समय दिया । चुनाव आयोग की जो द्विविधा जद(यू)+भाजपा गठजोड़ के गोलमटोल और अन्य दलों के चुनाव टालने वाले सुझाव तक सीमित थी, वो उसके बाद नए दौर में प्रवेश कर गयी । एक ओर तो उस समय तक चुनाव आयोग को कई पार्टियों की राय नहीं प्राप्त हुई थी, दूसरी आर जद(यू)+भाजपा और राष्ट्रीय जनता दल(राजद) तथा लोक जनशक्ति पार्टी के सुझाव परस्पर टकराव वाले थे । लोजपा केंद्र में भाजपा गठजोड़ सरकार में शामिल है । जद(यू) और भाजपा ने चुनाव आयोग से कहा कि आयोग का जो फैसला होगा, मानेंगे । लेकिन भाजपा+जद(यू) ने यह भी कहा कि उनकी तैयारी पूरी है । सत्तारूढ़ गठजोड़ ने डिजिटल कैंपेन और वर्चुअल रैली को चुनाव प्रचार का सही माध्यम बताया । राजद और लोजपा दोनों ने डिजिटल तथा वर्चुअल कैंपेन पर एतराज जताया । ये दोनों दल चुनाव टालने पर जोर दे रह हैं । 17 जुलाई को जब चुनाव आयोग ने पहली बार सुझाव मांगा, उसी समय नौ विपक्षी दलों ने दिल्ली में कंस्टीच्यूशन क्लब में बैठक आयोजित की । उसमें बिहार की मुख्य विपक्षी पार्टी राजद तो थी, मगर कांग्रेस शामिल नहीं हुई । कांग्रेस ने अभी तक चुनाव आयोग को अपने सुझाव दिये हैं या नहीं, यह पार्टी ने स्पष्ट नहीं किया है । दिल्ली वाली बैठक में राजद और वामदलों के अलावे भाजपा गठजोड़ से अलग हुए राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के प्रमुख पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा मौजूद थे । इन पार्टियों ने चुनाव आयोग को ज्ञापन सौंपकर बताया कि बिहार में कोरोना संक्रमण की हालत बेहद खराब हो चुकी है । इन दलों ने चुनाव होने की स्थिति में चुनाव आयोग को सुझाव दिया कि हर मतदान केंद्र पर चार उपकेंद्र हो और किसी भी बूथ पर 250 से ज्यादा लोग न जुट पाएं ।

4 अगस्त को दूसरी बार सुझाव मांगे जाने के समय तक कोरोना संक्रमण इतना ज्यादा बढ़ गया कि लॉकडाउन पाचवीं बार बढ़ाना पड़ा । हालत ये थी कि विधान सभा का चार दिनों का अंतिम मानसून सत्र एक दिन में निबटाना पड़ा । नौबत ये आ गयी कि सत्र का स्थान सदन कक्ष से बाहर तय किया गया । बिहार विधान सभा के 100 साल के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ, जब सत्र सदन कक्ष से बाहर आयोजित करनी पड़ी । विधायकों के लिए सोसल डिस्टेंसिंग का पालन करना कठिन हो गया ।

बाढ़ की स्थिति लगातार भयावह होती जा रही है । लोगों को जान माल बचाना कठिन हो रहा है । आए दिन सुरक्षा तटबंधों, बांधों के टूटने की रिपोर्ट मिल रही है । बाढ़ प्रभावित समूचे उत्तर बिहार में लोगों को आकाशवाणी से सुरक्षित स्थानों पर जाने कहा जा रहा है । लेकिन सुरक्षित स्थान मिले तो सही । बाढ़ पीड़ितों के सरकारी आकड़े को ही अगर सही मानें तो 64 लाख से ज्यादा लोग चपेट में हैं ।

बिहार में बाढ़ विपदा सरकार के लिए ज्यादा चिंता का विषय नहीं बनती । अधिकारी, इंजीनियर, ठेकेदार, राजनेता नेक्सस को बाढ़ का इंतजार रहता है । जब किसानों की फसल बाढ़ में डूबती है, तब राहत लूट की फसल लहलहाती है । जो पुल हाल में बने या शिलान्यास हुआ, लगभग सभी घंस गए । जिन बांधों, तटबंधों की बाढ़ से पहले और पिछले साल मरम्मतो हुई, सब वहीं से टूटे । यह हर साल का सिलसिला है। लेकिन अभी मुश्किल है कि इस डबल हमले की स्थिति में उम्मीदवार मतदाताओं तक पहुंचें तो कैसे । बाढ़ की स्थिति अगले एक-डेढ़ महीने तक सामान्य होने की उम्मीद नहीं की जा सकती । पानी घटने पर महामारी फलेगी । कोरोना महामारी नियंत्रित होने की संभावना नहीं है । जब बाढ़ पीड़ितों के पास कोरोना राहत देने नहीं पहुंचने दे रही है, तो वोट मांगने कैसे जाने देगी । नवंबर तक विधान सभा का कार्यकाल है । उसके लिए तैयारी सितंबर में हो जानी है । चुनाव आयोग ने तैयारी शुरू करने के बाद पार्टियों से सुझाव मांगे । सुझाव मांगने से पहले निर्वाची पदाधिकारियों को प्रशिक्षण हुआ । ईवीएम की ठोक-बजाकर जांच की गयी । चुनाव आयोग ने यह आदेश भी जारी कर दिया कि डाक मतपत्रों की सुविधा सिर्फ 80 या उससे ज्यादा उम्र के मतदताओं का दी जाएगी । यह सुविधा 65 वर्ष की आयु के मतदाताओं को नहीं होगी । कोविड-19 लॉकडाउन के सुरक्षा प्रोटोकॉल और परिवहन की समस्या के कारण डाक मतपत्रों की सुविधा सिर्फ 80 या उससे ज्यादा उम्र के लोगों को ही दी जाएगी । भाजपा और जद(यू) को छोड़ अन्य किसी पार्टी ने इसका स्वागत नहीं किया । सबसे बड़ा संकट है, कोरोना संक्रमण के चलते मतदाताओं के बीच, ऊंगली में स्याही लगानेवाले चुनावकर्मी और वोट डालने वालों के बीच दो गज की दूरी बनाए रखने का । राजनीतिक रंग ले चुकी यह समस्या सत्तारूढ़ गठजोड़ की नहीं है । भाजपा+जद(यू) को छोड़ बाकी कोई दल पूरी तरह चुनाव के लिये तैयार नहीं है । विपक्षी दल मतदान की इस समस्या से चुनाव आयोग को अवगत करा चुके हैं । कांग्रेस ने अभी तक पत्ता नहीं खोला है । 11 अगस्त तक ही पता चल पाएगा कि कांग्रेस चुनाव आयोग को क्या सुझाव देती है । पांच अगस्त तक की रिपोर्ट के अनुसार बिहार में कोरोना से 369 लोगों की मौत हो गयी और 64000 लोग संक्रमित हो चुके थे । पांच अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किए गए भूमिपूजन से भाजपा के हौसले बुलंद है । भाजपा का पुराना चुनावी वायदा ठीक बिहार चुनाव से पहले पूरा हुआ । इसका चुनावी लाभ उठाने से भाजपा नहीं चुकेगी । जद(यू) भी पहले की तरह शिरकत करेगी । यह तो हुआ चुनाव आयोग का राजनीतिक संकट । अगर बिहार चुनाव टालने की नौबत आ गयी, तो वैसी स्थिति में चुनाव आयोग के सामने संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है । उसके निदान के चुनाव आयोग के पास संवैधानिक अधिकार नहीं है । या तो विधान सभा का कार्यकाल बढ़ाया जाए अथवा राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए । विधान सभा का कार्यकाल बढ़ाने से संबंधित अनुच्छेद 172 और विघटन से सम्बोधित अनुच्छेद 174 के अलावे धारा 356 लगाकर राष्ट्रपति शासन जैसे विकल्पों के प्रावधान मौजूदा स्थिति में लागू नहीं होते । नरेंद्र मोदी अपने पहले शासनकाल में जब हर भाषण में एक साथ चुनाव कराने पर जोर देते थे, तो चुनाव आयोग ने उसके लिए इन धाराओं में संशोधन की मांग की । कानून मंत्रालय ने भी अपनी रिपोर्ट में इसका जिक्र किया । लेकिन संविधान संशोधनों की सूची में इसे शामिल नहीं किया गया । दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने एक साथ चुनाव की बात करनी ही छोड़ दी । चुनाव आयोग के सामने इससे भी बड़ी समस्या है दागियों को चुनाव लड़ने से रोकना और कोरोना संकट में भी चुनाव खर्चे पर नियंत्रण रखना । वर्तमान विधान सभा में 58% सदस्य दागी हैं और 40 गंभीर आपराधिक मुकदमे में फंसे हैं । एसोसिएसन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्मर्स की यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के पास 2018 में पहुंची । चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट की नोटिस के जवाब में हाथ खड़े कर दिए कि दागी उम्मीदवारी के पर्चे रद्द करने का अधिकार सरकार से कई वर्षों से मांगा जा रहा है । 13 फरवरी, 2020 को सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सितंबर, 2018 का फैसला फिर दुहराया कि उम्मीदवारी के चयन का जिताऊ होना आधार नहीं हो सकता और आपराधिक रिकार्ड सोसल मीडिया समेत अखबारों में प्रकाशित कराना, पर्चे में दर्ज करना सभी दलों के लिए अनिवार्य कर दिया । 25 सितंबर, 2018 के फैसले में पांच जजों की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सरकार से ऐसा कानून बनाने कहा था, ताकि दोगियों को चुनाव लड़ने से रोका जा सके ।