लोकसभा और विधान सभा चुनाव साथ-साथ कराने पर चर्चा जोर पकड़ रही है । गैर-भाजपाई पार्टियों ने ऐसा रवैया अपनाया हुआ है मानो यह सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुद्दा हो और वे बार-बार यह मसला उठाकर बहस कराने पर तुले हैं । क्योंकि प्रधानमंत्री इस विषय पर चर्चा चाहते हैं और जब भी ऐसा कोई अवसर आता है वे यह सुझाव / प्रस्ताव आम जनता के बीच रखते हैं । भाजपा विरोधी पार्टियां अगर पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर इस रूप में लें कि यह भाजपा गठजोड़ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सुझाव है, तब तो चर्चा वहीं समाप्त हो जाती है । क्योंकि वहां इन पार्टियों को यह नजर आएगा कि इससे किसी गैर-भाजपा शासित राज्य में विधान सभा भंग करने की नौबत आ सकती है । लेकिन सही नजरिए से देखा जाए तो लोकसभा और विधान सभा चुनाव कराना जनहित में है और सार्थक विमर्श हो तो थोड़े राजनीतिक हित को दरकिनार किया जा सकता है ।
पहली बात तो ये कि लोकसभा और विधान सभा चुनाव एक साथ कराने का सुझाव सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नहीं है । इनसे पहले विधि आयोग यह सुझाव दे चुका है । चुनाव आयोग अपनी सहमति के साथ यह भी स्पष्ट कर चुका है कि लोकसभा और विधान सभा चुनाव संग-संग कराने को तैयार है - अगर सरकार और सभी पार्टियां चाहें । विधि आयोग ने यह सुझाव चुनाव सुधार से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर विचार करने के क्रम में दिया । मई, 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनन तक विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी । नरेंद्र मोदी उसके बाद से इस पर बहस के लिए बार-बार मतदाताओं को और जन-प्रतिनिधियों को उकसा रहे हैं । इसका सबसे महत्वपूर्ण मकसद देश की जनता की कमाई का पैसा बचाना है और थोड़े-थोड़े अंतराल पर विधान सभा चुनावों से सामान्य जन-जीवन को होनेवाली परेशानी से बचाना है ।
प्रधानमंत्री लगातार इस प्रस्ताव को दुहरा रहे हैं और कभी-कभी यह कहना नहीं भूलते कि अगर यह प्रस्ताव उपयुक्त न लगे तो ठुकराया जा सकता है, लेकिन इस पर चर्चा तो होनी चाहिए ।
इसी प्रस्ताव को नीति आयोग ने भी अभी दुहराया है और दो चरणों में लोकसभा और विधान सभा चुनाव साथ कराने के पक्ष में है । नीति आयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गठित किया हुआ है और यह सरकारी थिंक टैंक माना जाता है । नीति आयोग ने 2024 से यह सिलसिला शुरू करने की बात कही है ताकि चुनाव प्रचार अभियान में कम-से-कम समय जाया हो और राज-काज में ज्यादा बाधा न हो ।
बहस में शामिल होने पर अगर और कोई अड़चन न हो तो 2024 तक का समय चर्चा के लिए पर्याप्त है । नीति आयोग ने इस पर विचार के लिए विशेषज्ञों का एक समूह गठित करने का भी सुझाव दिया है, जो तय करेगा कि दो चरणों में साथ-साथ चुनाव कैसे कराया जा सकता है । इससे तो लग रहा है कि सरकार यह सुझाव थोप नहीं रही है और चुनाव सुधार पर केंद्रित है ।
पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इस प्रस्ताव पर सहमति जता चुके हैं । इस वर्ष के अपने अंतिम गणतंत्र दिवस संबोधन में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा कि चुनाव सुधार पर सार्थक बहस का समय आ चुका है और वे इस पक्ष में हैं कि आजादी के बाद कुछ दशकों तक जैसे लोकसभा और विधान सभा चुनाव साथ हुए, वैसे ही कराए जाएं । प्रणव मुखर्जी ने कहा - ‘यह चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि राजनीतिक दलों से विमर्श करके इस काम को आगे बढ़ाए ।’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत वर्ष भाजपा द्वारा आयोजित दिवाली मिलन समारोह के अवसर पर कहा - ‘कुछ समय के लिए हिचकिचाहट होगी, लेकिन इस द्विविधा के बावजूद इस संबंध में जन-चर्चा जारी रहनी चाहिए ।’
नरेंद्र मोदी ने फिर फरवरी, 2017 में संसद के बजट सत्र से पहले कहा कि लोकसभा और विधान सभा चुनाव साथ होने से कुछ नुकसान भी हम सब को साथ-साथ उठाना पड़ेगा, लेकिन राजनीतिक दलों को इस प्रस्ताव को संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर देखना चाहिए । प्रधानमंत्री ने कहा - ‘एक पार्टी या सरकार यह काम नहीं कर सकती, हम सबको साथ मिलकर कोई रास्ता निकालना होगा ।’
उसके बाद बजट सत्र की शुरूआत वाले राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस का जवाब देते हुए भी प्रधानमंत्री ने कहा कि चुनाव हमेशा होते ही रहते हैं, जिस पर भारी खर्च बैठता है ।
प्रधानमंत्री ने सदन को आंकड़ा दिया कि 1,100 करोड़ से ज्यादा रूपये 2009 लोकसभा चुनाव में खर्च हुए और 2014 लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा 4,000 करोड़ पार कर गया । लगभग एक करोड़ सरकारी कर्मचारी चुनावी ड्यूटी में लगाए गए । बड़ी संख्या में शिक्षकों को भी उस काम में लगाया गया, जिससे स्कूली छात्रों की पढ़ाई बाधित हुई । आतंकवाद, सीमा सुरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण मोर्चों से सुरक्षा बलों को हटाकर चुनाव के लिए तैनात किया गया । प्रधानमंत्री ने कहा कि घात लगाए दुश्मन इस मौके की ताक में रहते हैं ।
नीति आयोग ने अपने सुझाव में नियमानुसार चुनाव आयोग को ही यह जिम्मा सौंपा है और अपनी ओर से मार्च, 2018 की ‘टाईमलाईन’ सेट कर दी है । साथ-साथ 2017-18 तथा 2018-20 तीन सालाना ‘एजेंडा’ भी तय कर दिया है । नीति आयोग ने वैसे तो सभी क्षेत्रों से चुनाव विशेषज्ञों, संविधान, विधि विशेषज्ञों और इससे संबंधित जानकारों का ग्रुप बनाने का सुझाव दिया है । परंतु विशेषज्ञ ग्रुप बनाने से पहले एक एजेंडा दे दिया है कि लोकसभा और विधान सभा चुनाव साथ कराने के दौरान विधान सभा भंग करने के लिए अधिक-से-अधिक एक बार उसकी अवधि कम की जा सकती है या विशेष परिस्थिति में अवधि बढ़ायी जा सकती है ।
प्रधानमंत्री इसे जनहित में मानते हैं । नीति आयोग ने भी साथ चुनाव कराना राष्ट्रीय हित में माना है । विधि आयोग भी कह चुका है कि बार-बार आचारसंहिता लागू होने से सरकारें चुनाव हित से परे भी कोई जनहित घोषनाएं नहीं कर पाती ।
लेकिन अभी तक किसी गैर-भाजपा दल ने इस प्रस्ताव को विचारयोग्य नहीं समझा है । इसमें समय तो लगेगा । इसके लिए उपयुक्त संवैधानिक और स्टेच्युटरी संशोधन के अलावे एक सर्वसम्मत फ्रेमवर्क तैयार करना होगा ।
कांग्रेस समेत किसी भी अन्य पार्टी ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी है । विधि और न्याय मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति के अध्यक्ष हं, कांग्रेस सांसद आनंद शर्मा । यह संसदीय समिति चुनाव सुधार पर विमर्श कर रही है, मगर एजेंडे में लोकसभा विधान सभा चुनाव साथ-साथ करानेवाला प्रस्ताव नहीं है । आनंद शर्मा ने चुनाव आयोग और विभिन्न दलों से पांच विंदुओं पर सुझाव मांगा है - चुनाव फंडिंग, चुनाव प्रणाली, मीडिया की भूमिका, पार्टियों की अंदरूनी राजनीति और ‘मिले-जुले मुद्दे’ ।
कांग्रेस नेता ने यह स्पष्ट नहीं किया कि चुनाव प्रणाली में लोकसभा विधान सभा चुनाव साथ कराना शामिल है या नहीं और ‘मिले-जुले मुद्दे’(‘मिसलेनियस’) का अर्थ क्या है ।
हाल में दो बड़े राज्यों में भाजपा विरोधी पार्टी जीती - पंजाब और पश्चिम बंगाल । पंजाब में इसी वर्ष विधान सभा चुनाव हुए और बंगाल में पिछले वर्ष । गुजरात और हिमाचल प्रदेश में इसी वर्ष चुनाव होने हैं । 2018 में कर्नाटक, त्रिपुरा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड, मेघालय में थोड़े-थोड़े अंतर से चुनाव होगा । इसी का खर्च और व्यवधान प्रधानमंत्री कम करना चाहते हैं। यह माएने नहीं रखता कि किस राज्य में किस पार्टी की सरकार बनेगी । 2019 में लोकसभा चुनाव होना है । ऐसी स्थिति में सबसे बड़ी समस्या है, समय पूर्व विधान सभा भंग करने का औचित्य ठहराना ।
1967 के बाद लोकसभा विधान सभा चुनाव साथ नहीं हुए । राजनीतिक खुंदक की भावना से विधान सभाएं भंग करने का कांग्रेसी सिलसिला 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने कायम रखा । उस सरकार में भाजपा भी शामिल थी । नरेंद्र मोदी वो नहीं चाहते, जो हो चुका है । इससे पार्टी के चुनाव फंड में आनेवाले कारपोरेट घरानों का पैसा दूसरे कामों में लगाया जा सकता है । एसोसियन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स(एडीआर) के अनुसार 2012-13 और 2015-16 में कारपोरेट घरानों ने सबसे ज्यादा फंड - 956 करोड़ रूपये भाजपा को दिए । कारपोरेट कंपनियों को भाजपा के सत्ता में आने की पूरी उम्मीद थी । चुनाव फंड का पैसा वसूलने में प्रधानमंत्री को कितनी सफलता मिलती है, यह तो तभी पता चलेगा जब बार-बार चुनाव पर रोक लगाना संभव हो । कांग्रेस को तीन वर्षों में कारपोरेट कंपनियों से मात्र 167-198.16 करोड़ रूप, मिल पाए, जैसा एडीआर का कहना है ।