प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पद की शपथ लेने के समय से एक ही चुनाव सुधार पर लगातार जोर देते रहे कि एक साथ चुनाव कराया जाय । मई, 2014 से मई, 2018 तक के उनके कार्यकाल के दौरान भाजपा गठजोड़ सरकार के हर काम का प्रचार स्वयं नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार अभियान की तरह किया । अब अगले साल आम चुनाव को लेकर अटकलबाजी नए सिर से शुरू हो गयी, जब 7-8 जुलाई को विधि आयोग ने इसके लिए सभी राजनीतिक दलों से राय मांगी । सभी दलों ने अपने-अपने दलीय और सियासी हित के ख्याल से अलग-अलग विचार दिए । आम राय नहीं बनी, अधिकांश पार्टियों ने एक साथ चुनाव का प्रस्ताव का विरोध किया । समर्थन करनेवाली और विरोध करनेवाली किसी भी पार्टी के तर्क में जनहित नहीं था । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे चार साल तक एक साथ चुनाव कराने और चर्चा करवाने के लिए भरपूर जोर दिया, किसी पार्टी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी । प्रधानमंत्री ने इसके पीछे जनहित से जुड़े कई कारण गिनाए - यथा - बार-बार चुनाव होने से करदाताओं का पैसा बहुत खर्च होता है, बार-बार आचारसंहिता लागू होने से सरकारी कामकाज बाधित होता है, सुरक्षा बलों और अन्य कर्मियों को चुनाव के दौरान ड्यूटी लगाने से भी अन्य कामकाज प्रभावित होते हैं । प्रधानमंत्री का कहना बिल्कुल सही है । किसी ने भी इसे गंभीरता से नहीं लिया । उसके अलग-अलग कारण विधि आयोग से विमर्श के दौरान स्पष्ट हुए । इससे काफी कुछ यह भी उजागर हुआ कि प्रधानमंत्री के बार-बार सिर्फ एक साथ चुनाव कराने के पीछे, जो कारण उन्होंने जनता के सामने गिनाए, उसके अलावे ऐसे भी कुछ कारण हो सकते हैं, जो उन्होंने उजागर नहीं किए हैं । 7-8 जुलाई की बैठक के पहले से समय पूर्व लोकसभा चुनाव कराने की अटकल बाजी चल रही है । कायदे से अगले साल निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार लोकसभा चुनाव होना है । इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने उस चुनाव सुधार की याद दिला दी जिसमें दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने का सुझाव चुनाव आयोग ने सरकार को दिया हुआ है । 23 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर आपराधिक मामले में किसी सांसद या विधायक को दोषसिद्धि पर अपीलीय अदालत से स्टे नहीं मिला तो वे सदन की सदस्यता से अयोग्य हो जाएंगे । चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने गैर-सरकारी संगठन ‘लोक प्रहरी’ की ओर से दायर याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया, जिसमें कहा गया था कि संसद सदस्य, विधायक, विधान परिषद सदस्य सुप्रीम कोर्ट के 2013 के फैसले का उल्लंघन करके दोषसिद्धि होने के बावजूद सदस्य बने हुये हैं ।
10 जुलाई, 2013 को सुप्रीम कोर्ट जज ए. के. पटनायक और जस्टिस एस. जे. मुखोपाध्याय की पीठ ने अपने फैसले में जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को निरस्त कर दिया । इस धारा के अंतर्गत ‘लामेकर’ आपराधिक मुकदमे में फंसे होने के बावजूद सदन का सदस्य बने रहने और जेल में रहते हुए चुनाव लड़ने के ‘विशेषाधिकार’ से लैस थे । लिली थॉमस द्वारा दायर याचिका पर जजों ने इस धारा को असंवैधानिक घोषित कर दिया और कहा कि संसद को ऐसा कानून पास करने की इजाजत संविधान नहीं देता ।
अभी सुप्रीम कोर्ट को उसी फैसले की याद दिलायी गयी है कि दोष साबित होने के पहले दिन से ही अयोग्यता लागू हो जाती है । उस फैसले का उल्लंघन करके सांसद, विधायक, विधान परिषद् सदस्य निरस्त हो चुकी विशेषाधिकार वाली धारा 8(4) का लाभ उठाते हुए सदस्य बने हुए हैं ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव आयोग के बार-बार आग्रह के बावजूद इस सुझाव पर ध्यान नहीं दिया कि दागियों के पर्चे रद्द करने का अधिकार चुनाव आयोग को दिया जाए और इसके लिए कानून बनाया जाए । जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, उसी समय से चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार से अपना यह आग्रह दुहराया है और सत्तारूढ़ समेत सभी पार्टियों से यह भी कहा है कि दागी उम्मीदवारों को टिकट ही न दें । दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए उनके पर्चे रद्द करने का अधिकार देनेवाला कानून बनाने का चुनाव आयोग का आग्रह कई दशकों से चल रहा है । नरेंद्र मोदी के आने से पहले की कई सरकारों के पास चुनाव आयोग ने जो चुनाव सुधारों की फाईल सौंपी, उसमें पहले नंबर पर अपराधी बैग्राउंड वाले उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने का अधिकार मांगना है । चुनाव आयोग ने उसी ‘विशेषाधिकार’ समस्या का निदान चुनाव से पहले चाहा जो आज भी सुप्रीम कोर्ट में है । एक बार जीत जाने के बाद लंबी अदालती प्रक्रिया का फायदा उठाकर ‘लामेकर’ सदस्य बने रहते हैं ।
पूर्व सरकारों ने चुनाव आयोग के चुनाव सुधार फाईल को ‘विचारार्थ’ रखा, भले उसके दागी उम्मीदवारों वाले विंदु को नीचे कर दिया ।
लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो चुनाव आयोग के चुनाव सुधार सुझाव को डंप करने के लिए अपना चुनाव सुधार एजेंडा थोप दिया और उल्टे चुनाव आयोग से एक साथ चुनाव पर चर्चा कराने कहा । नरेंद्र मोदी ने दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने वाला कानून बनाने के चुनाव आयोग के आग्रह को पूरी तरह अनसुना कर दिया और इसे विचारयोग्य ही नहीं समझा । चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में सफाई देनी पड़ी कि ऐसा अधिकार आयोग के पास नहीं है और दागियों के पर्चे रद्द करनेवाला कानून बनाने के आग्रह वाला फाईल सरकार के पास लंबित है ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी धन-बल से चुनाव लड़नेवाले दागियों को सदन में पहुंचने से रोकना ‘जनहित’ में नहीं मानते । इस पर सभी दलों की आम राय है । इसमें पैसा बहने से प्रधानमंत्री को कोई एतराज नहीं ।
सुप्रीम कोर्ट में दागियों के सदन में पहुंचने और आपराधिक मुकदमे में फंसे होने के बावजूद सदस्य बने रहनेवाला दोबारा वैसे समय में आया है, जब लोकसभा चुनाव करीब है, लोकसभा चुनाव से पहले कुछ राज्यों में भी चुनाव होने हैं । केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा समेत किसी पार्टी ने चुनाव आयोग के इस आग्रह पर ध्यान नहीं दिया कि दागियों को टिकट न दिया जाए ताकि पर्ची रद्द करने का अधिकार न होने के कारण चुनाव आयोग के सामने वैसे उम्मीदवारों का नामांकन स्वीकार करने की मजबूरी न हो । इसमें अन्य दलों से ज्यादा जनता के प्रति जवाबदेह प्रधानमंत्री हैं । क्योंकि अपने एजेंडे का ‘एक देश, एक चुनाव’ वाला चुनाव सुधार जनता पर अकेले उन्होंने ही चर्चा के लिए थोपा है । प्रधानमंत्री के मुंह से वैसा चुनाव सुधार कभी भूलवश भी नहीं निकला कि दागियों को चुनाव लड़ने से रोकनेवाला कानून होना चाहिए और इस पर चर्चा हो ।
नरेंद्र मोदी ने अपने ‘एजेंडे’ पर विमर्श करने का जिम्मा कांग्रेस के ई. एम. सुदर्शन नचियप्पन की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति को सौंपा । नचियप्पन इस वक्त कानून, न्याय और जन शिकायत मंत्रालय से संबद्ध संसद की स्थायी समिति के अध्यक्ष हैं । ई. एम. सुदर्शन नचियप्पन की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति को ही 2008 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने का अधिकार देने के आग्रह पर विचार करने कहा था । संसदीय समति में विपक्षी सदस्य भी होते हैं । सबों की आम राय से नचियप्पन ने चुनाव आयोग के ऐसे कानून बनाने के सुझाव को ‘अव्यावहारिक’ करार दिया ।
अभी नचियप्पन को संसदीय समिति के साथ सिर्फ लोकसभा और विधान सभाओं का चुनाव साथ-साथ कराने पर विचार करना था । इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गयी । नचियप्पन कांग्रेस शासनकाल में दागियों के चुनाव लड़ने से रोकने के कानून वाले सुझाव को ठुकरा चुके हैं । अभी भाजपा शासनकाल में प्रधानमंत्री ने इस पर विचार करने की जरूरत ही नहीं समझी ।
जुलाई, 2013 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जनप्रतिनिधियों के ‘विशेषाधिकार’ वाली जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा निरस्त किए जाने पर बवाल मच गया । विपक्षी भाजपा समेत सभी विपक्षी दलों की इस पर सहमति बनी कि इसका काट प्रस्तुत करने के लिए अध्यादेश लाया जाए । मंत्रिमंडल ने अध्यादेश का मसौदा तुरंत तैयार किया, लेकिन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने अध्यादेश को मंजूरी देने के बजाए इसके औचित्य पर सवाल उठाकर सरकार से कैफियत मांग दी । चुनाव के कुछ ही महीने बचे रह गए थे । कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दागियों के चुनाव लड़ते रहने और सदस्य बने रहने का ‘विशेषाधिकार’ बरकरार रखनेवाले अध्यादेश को ‘कुड़ा’ बताकर उसकी प्रति फाड़ी ।
अभी दोबारा सुप्रीम कोर्ट में यह मामला पहुंचा है । लोकसभा चुनाव के उतने ही समय बचे रह गए हैं, जितने 2013 में बचे थे । अभी का मामला सुप्रीम कोर्ट के 2013 के फैसले का उल्लंघन करके सदस्य बने रहने का है । याचिकाकर्ता ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ को बताया है कि इस आधार पर दागी सांसदों, विधायकों, विधान परिषद्, सदस्यों ने अपनी सदस्यता बचायी हुई है कि उन्होंने दोषसिद्धि के तीन महीने के अंदर अपील दायर कर दी । चीफ जस्टिस जब भी फैसला सुनाएंगे, ऐसे दागियों की सदस्यता समाप्त करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के ही आदेश का हवाला देकर निश्चित ही चुनाव आयोग को देंगे ।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट न तो दागियों को रोकने वाला कानून बना सकता है, न ही सरकार को ऐसा आदेश दे सकता है । अभी लोकपाल गठन को लेकर सरकार से यों भी सुप्रीम कोर्ट की ठनी हुई है । भाजपा गठजोड़ सरकार को एक साथ चुनाव कराने के संविधान की धारा 83(2) और 172(1) में संशोधन की चिंता है, जो लोकसभा तथा विधान सभाओं के कार्यकाल से संबंधित है ।
विधि आयोग के साथ बैठक में सभी पार्टियों के समर्थन और विरोध में अपने सियासी हित वाले विचार खुलकर सामने आए । अभी भाजपा की प्रबल प्रतिद्वंदी तृणमूल कांग्रेस ने इसलिए विरोध किया, क्योंकि पश्चिम बंगाल विधान सभा समय पूर्व भंग हो जाएगी, ममता बनर्जी सरकार गिर जाएगी । समाजवादी पार्टी ने इसलिए समर्थन किया कि 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव कराने पर योगी आदित्यनाथ के नेतृत्ववाली भाजपा सरकार का कार्यकाल कम हो जाएगा । उड़ीसा में सत्तारूढ़ बीजू जनता दल को समर्थन से कोई नुकसान नहीं है । मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का कार्यकाल लोकसभा के साथ ही समाप्त होनेवाला है । भाजपा से नाता तोड़ चुके तेलुगू देसम पार्टी नेता आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू के प्रतिनिधि ने इसलिए चलने लायक नहीं बताया क्योंकि विधान सभा का कार्यकाल कम हो जाएगा । कर्नाटक में जून में ही बनी जद(सेक्युलर)-कांग्रेस गठजोड़ सरकार भला क्यों समर्थन करेगी । लोकसभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने विधि आयोग द्वारा आहूत बैठक में हिस्सा नहीं लिया । भाजपा काहे को शामिल हो, जब प्रधानमंत्री ही सूत्रधार हैं । दिल्ली की आम आदमी पार्टी ने आज तक दागियों के जनप्रतिनिधि बनने पर रोक जरूरी नहीं समझा । वे जिस पैसे से चुनाव लड़ते हैं वो कहां से आते हैं? कर्नाटक विधान सभा चुनाव में भाजपा के 218 उम्मीदवारों में से 91 प्रतिशत करोड़पति और अपराधी बैग्राउंड के थे । जद(एस) के 29 प्रतिशत करोड़पति और दागी थे । नेशनल इलेक्शन वाच और ऐसोसिएसन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स(एडीआर) की रिपोर्ट में इस चुनाव को अब तक का सबसे महंगा चुनाव माना गया, जिसमें 10,000 करोड़ रूपये खर्च हुए । सबसे ज्यादा सीटें जीतनेवाली अकेली पार्टी भाजपा बनी ।