गुजरात में दो राज्य सभा सीटों के लिए अलग-अलग चुनाव कराने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की नोटिस के जवाब में चुनाव आयोग ने दलील दी कि कानून में ऐसा कुछ भी नहीं है, जो कहता हो कि इन दोनों सीटों का चुनाव अलग-अलग नहीं कराया जाना चाहिए ।

गुजरात में कांग्रेस विधायक और विधान सभा में विपक्ष के नेता परेशभाई धनानी की ओर से इस संबंध में दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की नोटिस के जवाब में चुनाव आयोग ने गुजरात की दो रिक्त राज्यसभा सीटों के लिए एक साथ चुनाव नहीं कराने के अपने फैसले को सही ठहराया ।

कांग्रेस नेता ने चुनाव आयोग की 15 जून की अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और शीर्ष कोर्ट से अर्ज किया कि चुनाव आयोग को सभी राज्यों में सभी रिक्त सीटों के लिए एक साथ चुनाव कराने का निर्देश दिया जाए और इस अधिसूचना को रद्द किया जाए ।

यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में ऐसे समय में दायर की गयी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘एक देश एक चुनाव’ नारे के तहत एक साथ चुनाव कराने पर संसद के अंदर और बाहर चर्चा कर रहे थे ।

उसी क्रम में बिहार की एकमात्र राज्य सभा सीट के लिए चुनाव अलग हुआ । गुजरात के लिए अलग तारीख तय की गयी । उत्तर प्रदेश की 12 रिक्त विधान सभा सीटों के लिए अलग से चुनाव होना है । प्रधानमंत्री के ही ‘एक देश एक चुनाव’ चर्चा के दौरान गुजरात के कांग्रेस नेता ने विभिन्न राज्यों की सभी राज्य सभा, विधान सभा सीटों के लिए एक साथ चुनाव कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी । ‘एक देश एक चुनाव’ चर्चा और अलग-अलग चुनाव भी जारी है । चुनाव आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दी गयी दलीलों में से दो गौर करने और आम मतदाताओं की समझ में आने लायक है । एक तो यह कि चुनाव अधिसूचना जारी होने के बाद चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता । चुनाव आयोग की दूसरी दलील ये है कि ऐसा कोई कानून नहीं है, जो कहता हो कि गुजरात में इन दो सीटों के लिए अलग-अलग चुनाव नहीं होने चाहिए । चुनाव आयोग ने इन दोनों सीटों को ‘आकस्मिक रिक्तियां’ इसका कारण बताया ।

चुनाव आयोग की इस दलील के पीछे राजनीतिक कानून काम कर रहा है । गुजरात विधान सभा का अंकगणित कहता है कि राज्यसभा की दोनों सीटों के लिए अगर एक साथ चुनाव होते तो भाजपा एक ही सीट जीत पाती । अलग-अलग चुनाव होने पर दोनों सीटों पर भाजपा की जीत तय मानी जा रही थी । ये दोनों सीटें भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी के लोकसभा के लिए निर्वाचित होने से रिक्त हुई । भाजपा राज्य सभा की दोनों सीटों पर कब्जा बरकरार रखना चाहती है। नए विदेशमंत्री एस. जयशंकर ने एक सीट के लिए और दूसरी सीट के लिए जुगलजी ठाकोर ने पर्चा भरा । 25 जून को जिस दिन ये दोनों अहमदाबाद में पर्चा भर रहे थे, उस दिन चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट में दोनों राज्यसभा सीटों की ‘रिक्तियों’ का हवाला देकर अलग-अलग चुनाव कराने के अपने फैसले को सही ठहरा रहा था । और उसी दिन संसद में एक साथ चुनाव पर बहस हो रही थी । राज्य सभा में कांग्रेस के उपनेता आनंद शर्मा समेत सभी विपक्षी नेताओं ने एक साथ चुनाव को अव्यावहारिक बताया । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदस्यों से कहा कि ‘एक देश एक चुनाव’ के विचार को चर्चा किए बगैर खारित न करें और इस प्रस्ताव को चुनाव सुधार का हिस्सा करार दिया ।

लेकिन घटनाक्रम बताते हैं कि यह ऐसा चुनाव सुधार है, जिसमें ‘एक देश एक चुनाव’ की चर्चा जारी रखते हुए भाजपा की राजनीतिक सुविधा के अनुसार अलग-अलग चुनाव कराने का फांस समझना कठिन हो रहा है । क्योंकि प्रधानमंत्री की राजनीतिक सुविधा के हिसाब से अलग-अलग चुनाव कराने में चुनाव आयोग मोहरा बना हुआ है । प्रधानमंत्री के ही गृह राज्य गुजरात से दूसरी बार चुनाव आयोग ऐसी सुविधाजनक ‘व्यवस्था’ के लिए मतदाताओं के कटघरे में है । अक्टूबर 2017 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधान सभाओं का चुनाव एक साथ कराना आसान था । उसमें कोई खास संवैधानिक बाधा नहीं थी । क्योंकि दोनों विधान सभाओं का कार्यकाल थोड़े ही अंतर से समाप्त हो रहा था । उसके बावजूद चुनाव आयोग ने अलग-अलग तारीखें तय की । यह बात छिपी नहीं रह सकी कि दोनों ही राज्यों में प्रधानमंत्री के चुनावी दौरे की ‘सुविधा’ का ख्याल करके चुनाव आयोग ने अलग-अलग चुनाव कराए ।

अभी ऐसे समय में गुजरात से ही दो राज्य सभा सीटों के लिए अलग-अलग चुनाव कराने की सुप्रीम कोर्ट पहुंची चर्चा के दौरान देश के प्रबुद्ध मतदाता जान गए कि ऐसी व्यवस्था भाजपा को दोनों सीटें जिताने के लिए की गयी । सुप्रीम कोर्ट जज संजीव खन्ना और बी. आर. गवई की पीठ ने सुनवाई के दौरान गुजरात के कांग्रेस नेता की अर्जी तो यह कहकर ठुकरा दी कि चुनाव प्रक्रिया चल रही है जिसमें कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगी । लेकिन जजों ने गुजरात कांग्रेस को यह छूट दी कि मतदान संपन्न होने के बाद ‘चुनाव प्रक्रिया’ दायर की जा सकती है ।

इस प्रकरण में गौर करने लायक प्रधानमंत्री की ‘एक देश एक चुनाव’ चर्चा और चुनाव आयोग के वकील की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दी गयी दलील है । चुनाव आयोग के तर्क से प्रथम दृष्टया यह झलकता है कि अलग-अलग चुनाव न्यायोचित है, क्योंकि ऐसा न कराने का कोई कानून नहीं है । दूसरी तरफ प्रधानमंत्री लगातार ‘एक देश एक चुनाव’ पर जोर दे रहे हैं । प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में शामिल होनेवाले किसी भी मतदाता के मन में यह सवाल उठ सकता है कि दो राज्यों में और एक ही राज्य की दो राज्यसभा सीटों के लिए एक साथ चुनाव नहीं हो पाया, जबकि इसमें कोई संवैधानिक बाधा नहीं थी । ऐसी स्थिति में एक साथ सभी चुनाव कैसे संभव है, जिसके लिए कई संविधान संशोधन करने पड़ेंगे । यही चुनाव आयोग है, जिसने कहा है कि मौजूदा संवैधानिक ढांचे के अन्तर्गत एक साथ चुनाव नहीं हो सकते । इसके लिए जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 समेत संविधान की कई धाराओं में संशोधन करने पड़ेंगे । 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी ने सबसे ज्यादा ‘एक देश एक चुनाव’ पर जोर दिया और पूरे पांच साल इस पर नीति आयोग, विधि आयोग, चुनाव आयोग के जरिए चर्चा कराते रहे । किसी भी राजनीतिक दल ने इसमें रुचि नहीं ली, न ही प्रधानमंत्री ने उनके साथ बैठक की । अभी दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने नयी लोकसभा के पहले ही सत्र में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अभिभाषण में सबसे प्रमुखता से ‘एक देश एक चुनाव’ प्रस्ताव डाला । 2018 में भी राष्ट्रपति के संसद सत्र आहूत अभिभाषण में इसका जिक्र था ।

अभी 19 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनीतिक दलों के साथ पहली बार ‘एक देश एक चुनाव’ पर बैठक कर रहे थे और उधर चुनाव आयोग गुजरात में भाजपा की सुविधा से दो राज्यसभा सीटों के अलग-अलग चुनाव की व्यवस्था में जुटा था । क्योंकि इससे गुजरात विधान सभा का अंकगणित भाजपा के पक्ष में बैठता है । 15 जून को चुनाव आयोग इसके लिए अधिसूचना जारी कर चुका था ।

संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग से मतदाता राजनीतिक हवा के अनुसार चलने की अपेक्षा नहीं करते । 2017 में ‘एक देश एक चुनाव’ चर्चा पूरे उफान पर थी और मुख्य चुनाव आयुक्त ए. के. जोती ने कहा कि वे चार महीने में एक साथ लोकसभा विधान सभा चुनाव कराने को तैयार हैं । गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधान सभा का चुनाव साथ नहीं कराने से उपजे बवाल के ‘जवाब’ में चुनाव आयोग ने यह बयान दिया ।

प्रधानमंत्री ने संविधान संशोधन का संकेत अभी तक नहीं दिया है । चुनाव आयोग के अनुसार अनुच्छेद 83, 172 और 356 में संशोधन अनिवार्य हैं । इसके बिना विधान सभाओं का कार्यकाल कम करने या बढ़ाने का काम नहीं हो सकता, जो एक साथ चुनाव के लिए जरूरी है । अगले लोकसभा चुनाव के समय सिर्फ दो राज्य -आंध्र प्रदेश और ओडिशा विधान सभाओं क कार्यकाल समाप्त होंगे, जो अभी साथ हुए हैं । अन्य राज्यों के उपाय लगाने का माहौल प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं । जम्मू व कश्मीर विधान सभा का कार्यकाल छह महीने के लिए बढ़ाना वहां की किसी पार्टी को अच्छा नहीं लगा । इस वर्ष चार विधान सभाओं के चुनाव होने हैं । एक साथ चुनाव का हवा बनाए रखना और भाजपा की सुविधा से अलग-अलग कराना क्या जारी रहेगा?