गुजरात में राज्यसभा सीटों के चुनाव को लेकर ‘हाई प्रोफाईल’ ड्रामेबाजी की बात दब गयी । कांग्रेस के अहमद पटेल समेत भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जीत गए । केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी भी राज्यसभा के लिए निर्वाचित घोषित हो गयी । ये सब बातें बीते दिनों की हो गयी ।

लेकिन अगस्त के पहले सप्ताह में ‘नोटा’(उपरोक्त में से कोई नहीं - ‘नन ऑफ दि एबव’) के राजनीतिक इस्तेमाल के लिए चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जो ‘हाई प्रोफाईल’ तमाशा हुआ वो अभूतपूर्व है । ये बात आई-गई नहीं हुई और होगी भी नहीं । क्योंकि चुनाव आयोग को प्रबुद्ध मतदाताओं के लिए ‘नन ऑफ दि एबव’ विकल्प प्रावधान जिस वजह से करना पड़ा, वही स्थिति बड़े शर्मनाक तरीके से उजागर हुई । राज्य सभा सीट जीतने के लिए चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को राजनीतिक मंच बनाने में कांग्रेस और भाजपा ने सारे नैतिक मूल्यों की धज्जियां उड़ा दी । सिर्फ ‘नोटा’ का औचित्य उड़ाना संभव नहीं हो पाया, जो प्रावधान चुनाव आयोग ने राज्य सभा सीटों के निर्वाचक मतदाता विधायकों के लिए किया । बल्कि यों कहें कि गुजरात में विधायकों की खरीद-फरोख्त, दल-बदल, क्रास-वोटिंग जैसी बहुचर्चित परिस्थितियों को देखते हुए चुनाव आयोग को वैसा करना पड़ा । ऐसा पहली बार हुआ, जब ऐसे मतदाताओं के लिए चुनाव आयोग को नोटा का प्रावधान करना पड़ा जो पहले से ही निर्वाचित हैं, ताकि अगर कोई उम्मीदवार वोट डालने लायक न लगें तो ‘इनमें से काई नहीं’ विकल्प का इस्तेमाल कर सकते हैं ।

गुजरात के ये विधायक वोटर उस समय के जीते हुए हैं, जब चुनाव आयोग ने ‘नोटा’ विकल्प का प्रावधान लागू नहीं किया था । कांग्रेस और भाजपा दोनों का इसमें शेयर है । 2014 में चुनाव आयोग ने जब ‘नोटा’ का प्रावधान किया, उस वक्त केंद्र में कांग्रेस गठजोड़ सरकार थी और 2015 में जब यह प्रावधान प्रभावी हुआ, उसके पहले भाजपा गठजोड़ सत्ता में आ चुकी थी । कांग्रेस को उस समय ‘नोटा’ से कोई आपत्ति नहीं थी । आज जब चुनाव आयोग ने गुजरात राज्य सभा चुनाव में ‘नोटा’ विकल्प की अधिसूचना जारी कि तो सारे गैर-भाजपा दल कांग्रेस के समर्थन में उतर आए । एक और दो अगस्त को ‘नोटा’ के कारण राज्यसभा की कार्यवाही नहीं चलने दी गयी । राज्यसभा में विपक्षी नेता गुलाम नबी आजाद समेत पूर्व केंद्रीय मंत्री सुशील कुमार शिंदे, पी. चिदंबरम, आनंद शर्मा चुनाव आयोग पर यूं चढ़ गए मानो चुनाव आयोग ने भाजपा के कहने पर गुजरात विधायकों के लिए नोटा प्रावधान की अधिसूचना जारी की हो । कांग्रेस के विरोध और चुनाव आयोग की इस कार्रवाई के समर्थन में भाजपा के भी कई केंद्रीय मंत्रियों ने निर्वाचन सदन की दौड़ लगा दी । उनमें वित्तमंत्री अरूण जेटली, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल के अलावे भी कई केंद्रीय मंत्री थे । दोनों प्रमुख राष्ट्रीय दलों ने मिलकर ‘नोटा’ को ऐसा मुद्दा बना दिया, मानो यह राजनीतिक इस्तेमाल वाला प्रावधान हो । भाजपा जिस प्रकार से चुनाव आयोग की नोटा अधिसूचना को सही ठहराने पर तुल गयी, इससे भाजपा को जो फायदा मिला हो, चुनाव आयोग की छवि तो खराब हुई । कांग्रेस और गैर-भाजपा दलों के इस आरोप की एक प्रकार से पुष्टि हुई कि भाजपा चुनाव आयोग का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है । जबकि चुनाव आयोग कांग्रेस के दवाब में झकने को तैयार नहीं हुआ और मुख्य चुनाव आयुक्त ने नोटा अधिसूचना रद्द करने से इन्कार कर दिया । उसके बाद कांग्रेस नेताओं ने अधिसूचना को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । सुप्रीम कोर्ट के सामने उजागर हो गया कि नोटा को कांग्रेस ने राजनीतिक हथकंडा बनाना चाहा, मगर कामयाबी नहीं मिली ।

गुजरात विधान सभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक शैलेश मनुभाई परमार ने यह दलील देकर सुप्रीम कोर्ट से नोटा अधिसूचना पर रोक लगाने का आग्रह किया कि इससे ‘भ्रष्टाचार को बढ़ावा’ मिलेगा, क्योंकि विधायक ‘नोटा’(छन्न) विकल्प चुन सकते हैं । उनकी ओर से वरिष्ठ कांग्रेसी और वकील कपिल सिब्बल भी खड़े हुए, मगर सुप्रीम कोर्ट को आश्वस्त नहीं कर पाए कि गुजरात में राज्यसभा की सीट जीतने के लिए चुनाव आयोग की नोटा अधिसूचना के कार्यान्वयन पर रोक लगाने का क्या औचित्य है । जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षतावाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने चुनाव आयोग की अधिसूचना पर रोक लगाने से इन्कार कर दिया, लेकिन मौजूदा हालात के मद्देनजर नोटा की संवैधानिक वैधता पर विचार करने को बेंच तैयार हो गयी । अगली सुनवाई 18 सितंबर को होनी है । उसके पहले चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखना है ।

असली मुद्दा ये है कि नोटा प्रावधान चुनाव आयोग को क्यों लागू करना पड़ा, जिसे गौण करने की नाकामयाब कोशिश की गयी । राजससभा में नोटा पर बहस के दौरान गुलाम नबी आजाद ने सवाल उठाया कि नोटा के लिए संविधान संशोधन नहीं हुआ ।

नए उपराष्ट्रपति वेंकया नायडू के आने से राज्यसभा के सभापति भी बदल गए । इसी चुनाव के समय नोटा का झमेला खड़ा हुआ, जो खतम होनेवाला नहीं है । गुजरात में इसी वर्ष विधान सभा चुनाव होने हैं और कई राज्यों में थोड़े-थोड़े अंतराल पर हाने हैं । चुनाव आयोग ने नोटा विकल्प प्रावधान वैसे पढ़े-लिखे मतदाताओं की अर्जी पर दिया, जिन्हें मतपत्र की सूची में बेदाग और साफ-सुथरी छविवाले उम्मीदवार नहीं मिलते । वैसे मतदाता धन-बल की बदौलत चुनाव लड़नेवाले अपराधी छविवाले उम्मीदवारों को वोट देकर अपने मताधिकार का दुरूपयोग नहीं करना चाहते । इसीलिए चुनाव आयोग को सबसे नीचे यह विकल्प देना पड़ा नोटा( ‘नन ऑफ दि एबव’, उपरोक्त में से कोई नहीं) ।

‘नोटा’ का इस्तेमाल करनेवाले मतदाताओं की संख्या कम देखी गयी है । मगर इससे यह संदेश तो देशभर के मतदाताओं के बीच गया कि दागी उम्मीदवारों से लोग त्रस्त हैं और इसका निदान चाहते हैं । जो राजनीतिक पार्टियां इस बात पर अड़ी हैं कि दागी उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने का अधिकार चुनाव आयोग को न दिया जाए, उन्हीं पार्टियों ने धन-बल का राजनीतिक वजूद कायम रखने के लिए राज्यसभा चुनाव में ‘नोटा’ विकल्प को बदनाम किया । चुनाव आयोग कई वर्षों से सरकार से धन-बल, बाहुबल वाले उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने का अधिकार मांग रहा है ताकि अपराधी छवि के लोग चुनाव लड़ ही न पाएं । कोई पार्टी इसके पक्ष में नहीं है । क्योंकि उन्हें दागियों को छोड़ ऐसे उम्मीदवार नहीं मिलते, जिनकी ‘जीत’ सुनिश्चित हो, चाहे वो जीतने के लिए कुछ भी क्यों न करें ।

सुप्रीम कोर्ट जज दीपक मिश्र ने जब यह सवाल कपिल सिब्बल से पूछा कि ‘क्या ‘नोटा’ लागू होने से आपको अपने उम्मीदवार के हारने का डर है?’ तो उनको जवाब नहीं सूझा । मतदाताओं ने देखा कि विधायकों के बिकने के डर से कांग्रेस ने ‘नोटा’ लागू होने का विरोध किया । कांग्रेस को अपने विधायकों को बिकने से बचाने के लिए भगाकर बंगलुरू ले जाना पड़ा । उनमें कांग्रेस समेत विभिन्न पार्टियों के वैसे विधायक भी रहे होंगे, जो पैसे लिए बिना भी किसी उम्मीदवार को वोट नहीं डालना चाहते हों । कांग्रेस ने अपनी आशंका सुप्रीम कोर्ट में रखी कि अगर पैसे लेकर कुछ विधायकों ने वोट नहीं डाला तो अहमद पटेल हार सकते हैं ।

नोटा की सुनवाई के लिए तैयार हुई सुप्रीम कोर्ट पीठ प्रमुख जस्टिस दीपक मिश्र ने यह भी कहा कि ‘नोटा प्रावधान से अभी तक कोई नुकसान नहीं हो रहा था, तो ओके था, आप अपनी सुविधा से नोटा लागू होने को चुनौती नहीं दे सकते ।’

स्पष्ट है कि जैसे उम्मीदवारों को विधायक के रूप में नोटा विकल्प चुननेवाले मतदाता नहीं देखना चाहते, वैसे ही विधायकों के लिए चुनाव आयोग को नोटा अधिसूचना जारी करनी पड़ी, जहां विधायकों को राजनीतिक ‘विवेक’ से नहीं, व्हिप से वोट डालना था । इसके लिए चुनाव आयोग को ही दोषी ठहराने का तांडव मचा ।

इधर राज्यसभा में कांग्रेस एक अगस्त को चुनाव आयोग की नोटा अधिसूचना पर यह कहकर ऊंगली उठा रही थी, कि इसका कोई संवैधानिक आधार नहीं है और केंद्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली चुनाव आयोग का बचाव कर रहे थे कि चुनाव आयोग के अधिकारों वाली संविधान की धारा-324 के अंतर्गत चुनाव आयोग को ऐसी अधिसूचना जारी करने का अधिकार प्राप्त है । उन्होंने भाजपा के सत्ता में आने से पहले का सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला दिया ।

उसी समय बिहार में सत्ता का समीकरण बदला और नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल + कांग्रेस ‘महागठजोड़’ छोड़ भाजपा के साथ मिलकर नया मंत्रिमंडल बनाया । बिहार इलेक्शन वाच की रिपोर्ट के मुताबिक नए मंत्रिमंडल में शामिल 22 मंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें नौ के खिलाफ गंभीर अपराध के मामले हैं और 21 करोड़पति हैं । पिछले मंत्रिमंडल में 19 दागियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे ।

ऐसी स्थिति में साक्षर मतदाताओं के पास ‘नोटा’ विकल्प का औचित्य समाप्त कहां होता है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसी समय अपने सांसदों से कह रहे थे कि लोकसभा और विधान सभा चुनाव साथ कराने के लिए जन-जागरण माहौल बनाएं ।