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Politics, Parties & Democracy

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दागियों की पर्ची रद्द करनेवाला चुनाव सुधार क्यों नहीं?

यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक साथ चुनाव कराने पर दिए गए जोर की आलोचना करता है, जबकि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाए गए दागी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने वाले महत्वपूर्ण चुनाव सुधारों को नजरअंदाज किया जा रहा है। लेखक विभिन्न राजनीतिक दलों के स्वार्थी हितों पर प्रकाश डालता है और बताता है कि कैसे वे जनहित के बजाय अपने राजनीतिक लाभ के लिए चुनाव सुधारों का विरोध या समर्थन करते हैं। इसमें 2013 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को रद्द करने का भी उल्लेख है।

पचड़े ही पचड़े हैं एक साथ चुनाव कराने में

यह लेख लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने के प्रस्ताव पर केंद्रित है, जिसे विधि आयोग और चुनाव आयोग ने समर्थन दिया है, लेकिन प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। इसमें एक साथ चुनाव कराने में आने वाली राजनीतिक, संवैधानिक और कानूनी चुनौतियों का विस्तार से वर्णन किया गया है, जिसमें संविधान के कई अनुच्छेदों और जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन की आवश्यकता शामिल है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम. एन. वेंकटचलैया जैसे विशेषज्ञों ने संघीय सिद्धांतों और स्थानीय मुद्दों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की है।

चुनाव आयोग दलीय राजनीति का मोहरा न बने

यह लेख पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले चुनाव आयोग की भूमिका पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की आपत्तियों का विश्लेषण करता है। माकपा ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग तृणमूल कांग्रेस के इशारे पर काम कर रहा है और उन क्षेत्रों को निशाना बना रहा है जहां वाम मोर्चा का वोट अधिक है। लेख में चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वायत्तता और राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए उस पर सवाल उठाने की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला गया है, साथ ही चुनावी सुधारों और राजनीतिक अपराधों से संबंधित चुनौतियों पर भी चर्चा की गई है।