26 जून, 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूरे देश में आंतरिक खतरा बताकर इमर्जेंसी लागू कर दिया और अपने खिलाफ आंदोलन करनेवाले सभी विपक्षी नेताओं को जेल में बंद कर दिया । प्रेस, मीडिया पर भी पाबंदी लगा दी । धरपकड़ अभियान तो 1974 से ही शुरू हो गया, जब लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति आंदोलन का बिगुल बजा । देश भर के छात्र जेपी के झंडे तले आ गए । इंदिरा गांधी विरोधी तकरीबन सभी छोटी/क्षेत्रीय पार्टियां जेपी के ‘पूरी व्यवस्था में बदलाव’ वाले जेपी के झंडे के नीचे आ गयी । उनमें इंदिरा गांधी से मतभेद रखनेवाले बड़े कांग्रेसी नेता भी थे । दमनात्मक कार्रवाई से बात बनी नहीं, आंदोलन तेज होता गया । आखिरकार इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू करके जेपी समेत सारे विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया ।

जेपी ने ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा दिया, वे पूरी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की बात हर जनसभा में करते थे । आपात्काल के समय मैं पटना कॉलेज में बी.ए. का छात्र था । जेपी आंदोलन की शुरूआत से लेकर आपात्काल के सारे हालातों का चश्मदीद गवाह हूं। जेपी को नजदीक से देखा, सुना । 45 साल में जो कुछ गुजरा और जो व्यवस्था अभी देश की आंखों के सामने हैं, उसमें आपात्काल के दिन याद आ जाते हैं । जो शुरू से कांग्रेस विरोधी रहे और जो बाद में सत्ता से चिपके रहने के लिए कांग्रेस से मिल गए, उनका आपात्काल नजरिये में फर्क है । लेकिन आम लोग आपात्काल के दिनों की व्यवस्था कुछ और अर्थ में याद करते हैं । जेपी व्यवस्था में जिस बदलाव की बात करते थे और सिर्फ इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाने की मुहिम चलाकर अपने लक्ष्य में कहां तक सफल हो पाए, उसकी समीक्षा करने के लिए वे ज्यादा दिन जीवित नहीं बचे । आमलोग इसे सिर्फ राजनीतिक व्यवस्था में उलटफेर से ज्यादा नहीं समझते और उसमें भी इंदिरा विरोधियों को सत्ता लाभ से ज्यादा कुछ हासिल नहीं हो पाया । जेपी के नेतृत्व में एकजुट हुए कुनब जनता पार्टी में टूटने-बिखरने का कुछ ही दिनों में ऐसा सिलसिला चला, जो 45वें साल में भी समाप्त नहीं हुआ है ।

1977 में आम चुनाव के बाद जो जनता पार्टी सरकार बनी, उसमें इंदिरा विरोधी वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मोरारजी देसाई का प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा हुआ । जनता पार्टी की एक घटक बनकर जनसंघ(आज का भाजपा) को केंद्र में पहली बार सत्ता में आने का अवसर मिला । मोरारजी के बाद फिर उसी सत्ता बदलाव आंदोलन को भुनाकर चौधरी चरण सिंह, चन्द्रशेखर जैसे नेताओं का प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा हुआ । इतना सब होने के बावजूद इंदिरा गांधी फिर भारी बहुमत से सत्ता में लौटी । 1986 में अगर इंदिरा गांधी की हत्या नहीं होती तो राजीव गांधी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते । 1991 में अगर राजीव गांधी की हत्या नहीं हुई होती तो पी. वी. नरसिंहराव प्रधानमंत्री नहीं बन पाते । उसके बाद तो इंदिरा गांधी और कांग्रेस विरोधी नेताओं के कांग्रेस के अप्रत्यक्ष समर्थन से प्रधानमंत्री बनने का तांता लग गया । विश्वनाथ प्रताप सिंह, इन्द्रकुमार गुजराल, एच. डी. देवेगौड़ा के प्रधानमंत्री बनने की कहानी लोग जानते हैं । वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जगजीवन राम सिर्फ प्रधानमंत्री बनने से वंचित रह गए । उन्होंने जे पी आंदोलन के समय ही इंदिरा गांधी का साथ छोड़ा था ।

राजनीतिक जोड़-तोड़ से सिर्फ कुर्सी हासिल करनेवाली व्यवस्था की अपनी-अपनी पारी खेलकर सब-के-सब धराशायी हो गए, जिनमें वामदल भी शामिल थे । अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा गठजोड़ की सरकार के पतन के बाद 2004 में कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी और दो कार्यकाल पूरे किए ।

2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा प्रचंड बहुमत से सत्ता में आयी और 2019 में फिर वैसा ही जनादेश लेकर लौटी । इंदिरा गांधी के समय और उसके पहले राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का विकल्प नहीं था । 1980 में जनसंघ भाजपा के रूप में नए कलेवर के साथ अयी । आपात्काल के पुलिसराज में जनसंघ के संगठन आरएसएस पर कहर बरपा, जो समाजवादी नेता जेपी का पक्का अनुयायी था । नक्सलियों पर भी शिकंजा कसा गया । जनसंघ के कारण नक्सली गुट जेपी के साथ नहीं आए । वाम दलों में सीपीएम जेपी के साथ थी और सीपीआई इंदिरा गांधी के साथ । आपात्काल के 45वें साल में आज वामदलों को अपना अस्तित्व बचाना कठिन हो रहा है ।

जेपी आंदोलन से उपजे अलग-अलग गुटों में बंटे सारे नेताओं का कांग्रेस और भाजपा के साथ सत्ता का गठजोड़ चलता रहा है । जनता पार्टी का एकमात्र घटक जनसंघ है, जिसका कांग्रेस से कभी गठजोड़ नहीं हुआ । इमर्जेंसी के बाद से अबतक के राजनीतिक घटनाक्रमों का जायजा लेने के बाद उल्लेखनीय उपलब्धि एकमात्र यही निकलती है कि भाजपा देश की सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी के रूप में उभरी । ये वही संगठन है, जिसका जनसंघ के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर कोई खास वजूद नहीं था । जो भाजपा कांग्रेस का विकल्प और देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कही जाती थी, उसने कांग्रेस को इस हालत में ला दिया कि भाजपा का तगड़ा विकल्प बनना कठिन हो रहा है ।

यह तो हुई राजनीतिक व्यवस्था की बात । अवाम के रोजमर्रे की जिंदगी के बीच चर्चा का विषय दूसरा है । आपात्काल के बारे में आमलोगों में बुजुर्ग लोग अलग तरीके से बतियात हैं । जबकि भिन्न-भिन्न विचारधाराओं वाले प्रबुद्ध और बुद्धिजीवी कुछ अन्य बातों पर मंथन करते हैं । मगर कुछ विंदुओं पर जन तथा देश की आम राय है, जो मौजूदा जनादेश की कही-अनकही है ।

लंबीदूरी की ट्रेनों के स्लीपर क्लास में चलनेवाले और बड़े प्लेटफार्मों पर प्रतीक्षा में बैठे यात्रियों के बीच से ही बात उठाते हैं । ये ऐसी जगह है, जिनमें देश भर के यात्री आपस में बातें करते हुए जाते हैं और गाड़ियों की लेटलतीफी, कुव्यवस्था से लेकर राजनीतिक-सामाजिक विषयों पर भी चर्चा करते हैं । उस टाईमपास में जनता देश, विदेश के हालातों पर भी बहस करती है । ट्रेनों में हमेशा जिस समस्या की ज्यादा चर्चा होती है, वो है स्थायी लेटलतीफी । स्लीपर क्लास में बैठे बुजुर्ग यात्रियों की बातचीत इमर्जेंसी पर आ जाती है । एक कहते हैं - ‘भई इमर्जेंसी में हालात सुधर गए थे, यह तो मानना होगा । गाड़ियां समय से खुलती थी, समय से पहुंचती थी । बेटिकट यात्रियों का चलना कम हो गया था । चारों तरफ कड़ाई थी, आम जनता को राहत थी ।’ दूसरे यात्री - ‘उतना ही नहीं, कार्यालयों में लोग समय पर आते थे, अपनी ड्यूटी करते थे । अस्पतालों में डॉक्टर मुस्तैद रहते थे । डर सा समाया रहता था, लोगों का काम होता था, दौड़ना नहीं पड़ता था ।’ तीसरे यात्री - ‘बिल्कुल सही बात है । स्कूलों, कॉलेजों में पढ़ाई होती थी । निर्धारित समय से इम्तहान होते थे । अभिभावकों को राहत थी । कितने सारे चोरबाजारियों को इंदिरा गांधी ने जेल में डाल दिया । वास्तव में देखा जाए तो अखबार, मीडिया पर सेंसरशिप और विरोधी नेताओं को जेल में डालने को छोड़ इमर्जेंसी में कुछ भी गलत नहीं हुआ ।’ जनसाधारण की इमर्जेंसी से जुड़ी अधिकांश यादें मीठी हैं । अभी सबसे ज्यादा कड़वी यादें भाजपा की हैं । नरेंद्र मोदी के नेतृत्ववाली सरकार के कामकाज के तौर-तरीकों की तुलना लोग अघोषित इमर्जेंसी से करते हैं । एकमात्र भाजपा है, जिसे इंदिरा गांधी की कोई नीति सही नहीं लगती ।

प्रेस मीडिया को लगातार चेतावनी मिल रही है । सरकार की नीतियों के खिलाफ छपने, प्रसारित होनेवाले समाचारों को अप्रत्यक्ष सेंसर से गुजरना पड़ता है । कई गिरफ्तार किए गए हैं । कोरोना से उत्पन्न अप्रत्याशित अराजकता को छोड़ दें तो एक अराजक वातावरण पहले से व्याप्त है । इमर्जेंसी के विषय में कहा जाता है कि राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने बाथटब में इमर्जेंसी प्रपत्र पर दस्तखत कर दिए थे । अभी किसी भी बिल पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की तुरंत मंजूरी से लगता है मानो वे पहले से उसके लिए तैयार हों । जम्मू व कश्मीर को विशेष दर्जा देनेवाले धारा-370 को हटाकर इस राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटनेवाले जम्मू कश्मीर (पुनर्गठन) बिल, 2019 और नागरिकता संशोधन बिल(सीएए) हालिया उदाहरण है । नया कानून कश्मीर में तुरंत लागू होने के 10 महीने बीते, हालात इमर्जेंसी जैसे हैं । थोपा गया सीएए भाजपा शासित समेत किसी राज्य सरकार ने स्वीकार नहीं किया ।

नरेंद्र मोदी की विचारधारा से सहमत न होनेवाले सामाजिक मानवाधिकार कार्यकर्ता जेल में हैं। मुझे याद है, इमर्जेंसी हटने के बाद कालेजों और विश्वविद्यालयों में प्रशासन छात्रों के हाथ में आ गया था । शिक्षा के क्षेत्र में उस समय पैदा हुई अराजकता का दौर बरकरार है । 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वित्तीय अराजकता कायम करनेवाली नोटबंदी का एलान इमर्जेंसी की तरह किया । उससे आम जनता को क्या लाभ मिला, इसका जवाब अभी तक किसी के पास नहीं है । आज ही जैसी बेरोजगारी और कमरतोड़ महंगाई के कारण 1974 का जनान्दोलन खड़ा हुआ था ।