कांग्रेस और वाममोर्चा के संभावित गठजोड़ में गले की फांस बनी हुई हैं, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी)। अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख भी हैं । वाममोर्चा का तो स्टैंड क्लियर है कि आगामी लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को पछाड़ना है । लेकिन कांग्रेस द्विविधा में है कि तृणमूल कांग्रेस से गठजोड़ किया जाय या नहीं । कांग्रेस का यही असमंजस वाममोर्चा को लेकर भी है। दीदी से तो पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की उसी समय से दुश्मनी है, जब दीदी कांग्रेस में थी । कांग्रेस से अलग होकर अपनी अलग पार्टी तृणमूल कांग्रेस बनाने के बाद से पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार का सफाया करने में दीदी जुट गयी । इस अभियान में कांग्रेस और भाजपा दोनों ही गठजोड़ों में शामिल होने तथा अलग होने के दौरान दीदी का एकमात्र लक्ष्य था, वाममोर्चा को सत्ता से हटाना ।
2011 विधान सभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में 37 वर्षों से जमी वाममोर्चा सरकार का किला उखाड़ दिया । उस समय से वाममोर्चा और तृणमूल कांग्रेस तो बंगाल में एक-दूसरे के सीधे दुश्मन हैं । लेकिन कांग्रेस न तो वाममोर्चा से सीधा बिगाड़ मोल ले पाती है न तृणमूल कांग्रेस से । वाममोर्चा का मतलब मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी(सीपीएम) जो सभी मोर्चा घटकों का स्वयंभू ‘बिग ब्रदर’ है और कांग्रेस के साथ हर चुनावी गठजोड़ का खाका तय करती है । घटक सीपीआई(भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी) का असंतोष उभरता-दबता रहता है ।
भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच अचानक मची सीधी रार से कांग्रेस की सांसों में वाम मोर्चा से ज्यादा तृणमूल कांग्रेस फड़फड़ा रही है । कांग्रेस आलाकमान को तृणमूल कांग्रेस के साथ गठजोड़ करके लोकसभा चुनाव लड़ने में ज्यादा फायदा नजर आ रहा है, लेकिन कांग्रेस वाममोर्चा को छोड़ना नहीं चाहती । गैर-भाजपा महागठजोड़ की सबसे महत्वपूर्ण नेता के रूप में ममता बनर्जी उभरी हैं । क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को ‘निर्मूल’ करने में जुटे हैं । इससे कांग्रेस का उत्साहित होना स्वाभाविक है । 19 जनवरी को कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो दीदी की ओर से आयोजित महागठबंधन रैली में 20 गैर-भाजपा दलों के 25 नेताओं का जुटान हुआ । तृणमूल कांग्रेस के साथ वामदल तो मंच साझा कर नहीं सकते थे । कांग्रेस के लोकसभा नेता मल्लिकार्जुन खड़गे की वहां मौजूदगी उचित थी या नहीं, इस पर भ्रम की स्थिति बनी हुई है । उतना ही नहीं महागठजोड़ रैली में इवीएम छेड़छाड़ के खिलाफ चुनाव आयोग को ज्ञापन देने के लिए जो चार सदस्यीय कमिटी बनी, उसमें एक सदस्य कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी को बनाया गया । तीन फरवरी को पश्चिम बंगाल मुख्यमंत्री के सीबीआई के खिलाफ धरना पर बैठने के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने संदेश भेजा । वाममोर्चा ने उससे अपने को अलग रखा ।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी सभी प्रदेश पार्टी प्रमुखों से इस हफ्ते दिल्ली में मिले और लोकसभा चुनाव तैयारियों की समीक्षा की । उनमें सबसे ज्यादा उलझन में डालनेवाली मुलाकात पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सोमेन मित्रा की रही । क्योंकि उसी समय सीपीएम पोलित ब्यूरो की भी दिल्ली में बैठक चल रही थी और सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी कांग्रेस से गठजोड़ के विषय में कुछ भी स्पष्ट बोलने की स्थिति में नहीं थे । उसी तरह सोमेन मित्र का भी कोलकाता लौटने तक गला फंसा रहा । बंगाल प्रदेश कांग्रेस प्रमुख ने कोलकाता आकर दावा किया कि पार्टी सुप्रीमो राहुल गांधी ने उन्हें तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन छेड़ने का निर्देश दिया है, इस दावे को उनके पार्टीजन निगल नहीं पाए । क्योंकि राहुल गांधी के साथ बैठक के बाद दिल्ली में सोमेन मित्रा ने कहा कि वाममोर्चा के साथ गठजोड़ करने को तैयार है, मगर अपनी ‘गरिमा का परित्याग’ नहीं करेगी । यही भ्रामक असमंजस घमर्थन वाममोर्चा का भी पीछा कर रहा था । कांग्रेस आलाकमान तृणमूल कांग्रेस से गठजोड़ की उम्मीद लगाए बैठा है लेकिन साथ में वाममोर्चा से बिगाड़ मोल लेना नहीं चाहता । प्रदेश कांग्रेस के कुछ नेता इस व्याघातक नीति से सहमत नहीं हैं । लेकिन राहुल गांधी और दीदी के अंदर-अंदर मिले होने के कारण वे चुप हैं । राहुल गांधी किसी महागठजोड़ जुटान में खुद नहीं आते, लेकिन उनकी ओर से कोई-न-कोई नेता मौजूद रहते हैं । राहुल गांधी महागठबंधन का हिस्सा बने रहकर पश्चिम बंगाल में भाजपा को शिकस्त देना चाहते हैं । इसलिए दिल्ली के मुख्यमंत्री आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल ने 13 जनवरी को दिल्ली में जंतर-मंतर पर रैली आयोजित की तो उसमें शामिल होने पहुंची ममता बनर्जी के साथ कांग्रेस नेता आनंद शर्मा भी थे । रैली के बाद केजरीवाल, चन्द्रबाबू नायडू, और ममता बनर्जी तीनों एनसीपी नेता शरद पवार के घर पहुंचे । वहां कांग्रेस और कम्यूनिस्ट पार्टी के कोई नेता नहीं गए ।
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री तेलुगू देसम पार्टी नेता चन्द्रबाबू नायडू पिछले वर्ष जुलाई में भाजपा गठजोड़ से अलग होने के बाद से कांग्रेस के साथ हैं । लेकिन वे अभी ममता बनर्जी से ज्यादा करीबी बनाए हुए हैं । क्योंकि दीदी महागठजोड़ के जरिए दिल्ली छलांग लगाकर नरेंद्र मोदी को उखाड़ने के जुगाड़ में जुटी हैं । 19 जनवरी की कोलकाता रैली में चन्द्रबाबू नायडू मौजूद थे । नायडू आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा देने की मांग को लेकर आंध्र भवन में अनशन पर बैठे तो उनके समर्थन में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पहुंचे ।
इसमें सबसे ज्यादा अधोगति वाममोर्चा की हो रही है, जिसे पश्चिम बंगाल में अपना अस्तित्व बचाने की फिक्र है । वाममोर्चा सिर्फ इसलिए कांग्रेस से सीटों का तालमेल चाहता है, ताकि वोट बंटने का फायदा भाजपा या तृणमूल कांग्रेस को न मिले । त्रिपुरा में वाममोर्चा की जमी जमायी सरकार हाथ से निकल गयी, भाजपा ने कब्जा जमाया । कांग्रेस भी फेंकी गयी । पश्चिम बंगाल में धराशायी होने के बाद त्रिपुरा पर वाममोर्चा का दावा था । केरल में सीपीएम नेतृत्ववाली वाममोर्चा की सरकार है और कांग्रेस के नेतृत्ववाली मोर्चा विपक्ष में है । सीपीएम पोलित ब्यूरो की बैठक के बाद नौ फरवरी को पार्टी की केरल यूनिट प्रमुख और पोलित ब्यूरो सदस्य कोडियेरी बालाकृष्णन ने लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस से गठजोड़ का विरोध किया । महासचिव सीताराम येचुरी ने स्वीकारा कि बंगाल में उनकी पार्टी और वाममोर्चा चुनाव समर में अपने बलबूते कूदने की हालत में नहीं है । पीछा छुड़ानेवाला गोलमटोल बयान देना येचुरी की विवशता है । 2016 विधान सभा चुनाव में भी सीपीएम के नेतृत्व में वाममोर्चा ने कांग्रेस के साथ तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए गठजोड़ किया । अंत-अंत तक सीटों के बंटवारे पर वाममोर्चा और कांग्रेस के अंदर भी ठनी रही । क्योंकि सीपीएम समेत वाममोर्चा के नेता और कांग्रेस की भी बंगाल यूनिट इसके खिलाफ थी । उस वक्त बंगाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधुरी इस गठजोड़ के पक्ष में नहीं थे और आज भी नहीं हैं । केरल की पूरी वाममोर्चा यूनिट इसके खिलाफ थी । सीताराम येचुरी की जो द्विविधा 2016 में थी, वही आज है ।
2011 विधान सभा चुनाव में कांग्रेस का गठजोड़ तृणमूल कांग्रेस के साथ था । क्योंकि 2008 का जख्म भरा नहीं था, जब सीपीएम ने अमेरिका से परमाणु समझौता वाले मुद्दे पर कांग्रेस गठजोड़ सरकार से समर्थन वापस लेकर गिराने की असफल कोशिश की । वाममोर्चा सिर्फ अपनी झेंप मिटाने के लिए कांग्रेस के साथ ऐसे गठजोड़ की बात कर रही है ताकि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस विरोधी वोट बंटे नहीं । वाममोर्चा के पास वोट है ही नहीं, तो बंटेगा क्या । जनाधार को छोड़कर सब कुछ है कम्यूनिस्ट पार्टियों के पास । 2011 से अभी तक के दीदी राज में उपजे जनअसंतोष का कितना लाभ वाममोर्चा को मिलेगा, यह इस पर निर्भर है कि दोनों तृणमूल कांग्रेस और भाजपा को नुकसान पहुंचाने के अभियान में खुद का नुकसान कितना बचा पाते हैं ।
2016 की हार के लिए दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया । कांग्रेस फायदे में रही, वाममोर्चा बिल्कुल हाशिए पर चली गयी । कांग्रेस 44 सीटें जीतकर दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के रूप में उभरी । दोनों गुटों ने जैसी विचित्र ‘अंडरस्टैंडिंग’ 2016 में की थी, उस पर भी भ्रम बरकरार है । 2014 लोकसभा चुनाव में भी गठजोड़ था और वाम मोर्चा को मात्र दो सीटें मिली थी । सूत्रों के अनुसार वाम मोर्चा उन चार लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार शायद न खड़े करे, जो 2014 आम चुनाव में कांग्रेस ने जीती । कांग्रेस भी संभवतः वहां उम्मीदवार न उतारे, जहां वाममोर्चा जीत सकती है । कांग्रेस के पालेवाली बंगाल की चार सीटें हैं - जांगीपुर, माल्दा दक्षिण और उत्तर तथा बहरामपुर । माल्दा(उत्तर) से कांग्रेस सांसद मौसम बेनजीर नूर हाल ही में तृणमूल के साथ चली गयी । कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि दीदी ने नूर को फोड़ा । मगर वाममोर्चा और कांग्रेस न तो मंच साझा करेंगे, न साथ चुनाव प्रचार करेंगे, न चुनावी सभा करेंगे । ऐसा ही गठजोड़ पहले हो चुका है। इससे दोनों ही पार्टी के कार्यकर्ता भ्रम में पड़ जाते हैं । वोटकटवा का नुकसान दोनों दल उठा चुके हैं । लेकिन भाजपा और तृणमूल ने इस बेमेल गठजोड़ की नौबत ला दी है, जो न संभालते बनता है, न झिड़कते ।