कांग्रेस की ओर से आयोजित गैर.भाजपा दलों को एकजुट करने के लिए बेंगलुरु बैठक से पहले राजनीतिक माहौल बिगड़ गया है । इससे लगता है कि विपक्षी एका पथ की ओर कदम बढ़ानेवाले नेताओं को कुछ संकरी कंक्रीट बिछी उबड़.खाबड़ गलियों से भी गुजरना पड़ सकता है । कांग्रेस शासित कर्नाटक की मेजबानी में 17.18 जुलाई को हो रही यह विपक्षी एका बैठक दूसरी है । इसके पहले 23 जून को पटना में ऐसी पहली बैठक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आयोजित की थी । नीतीश कुमार के जद( यू) गठजोड़ में राष्ट्रीय जनता दल के साथ.साथ कांग्रेस भी शामिल है । वामदल बाहर से सरकार को अपना समर्थन दे रहे हैं ।
23 जून से अभी तक कुछ ऐसे राजनीतिक उलटफेर हुए और परिस्थितियां सामने आ गयीं, जो 17.18 जुलाई की बैठक का पीछा करेंगी । इनमें दो प्रमुख घटनाएं गौर करने लायक हैं । एक है, महाराष्ट्र का राजनीतिक घटनाक्रम और दूसरा है, पश्चिम बंगाल का पंचायत चुनाव । महाराष्ट्र की शिवसेना. भाजपा सरकार में शामिल होने विपक्षी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी छोड़कर अजीत पवार उपमुख्यमंत्री बन गए । वे अपने साथ 9 विधायकों को भी ले गए, जिनमें 4 को मंत्रीपद मिला । राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) सुप्रीमो शरद पवार महाराष्ट्र के कद्दावर नेता हैं और राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्षी एका प्रयास के संयोजक के रूप में उन्हें देखा जा रहा है । अजीत पवार शरद पवार के भतीजे हैं और पारिवारिक विवाद का असर हैसियत की मजबूती पर पड़ा है । राष्ट्रीय संयोजक के रूप में नीतीश कुमार के नाम पर कई दलों के नेता चुप लगा जाते हैं । लेकिन शरद पवार के नाम पर लगभग मतभेद नहीं के बराबर है ।
महाराष्ट्र के बाद पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव ने विपक्षी एका प्रयास को झटका दिया । तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) ने अपनी दबंग हैसियत और मतदाताओं के बीच जमीनी स्तर तक पकड़ का डंका बरकरार रखा । दीदी भाजपा के खिलाफ मजबूत विपक्षी एका मंच की प्रभावशाली कड़ी है । लेकिन 08 जुलाई को हुए पंचायत चुनाव से पहले और परिणाम आने तक कांग्रेस और भाजपा दोनों एक साथ तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ खुलकर सामने आ गए । पंचायत चुनाव के दौरान अनियंत्रित हिंसा के विरोध में भाजपा और कांग्रेस नेता खुलकर बोले । वामदल भी पश्चिम बंगाल में विपक्ष में ही है, मगर मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी(सीपीएम) समेत किसी भी वामदल का स्वर कांग्रेस और भाजपा जैसा नहीं था ।
बेंगलरू बैठक में शामिल होने के लिए कर्नाटक के कांग्रेस नेता उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को विशेष रूप से आमंत्रित किया है । सोनिया गांधी और ममता बनर्जी एक साथ मंच पर बैठने से परहेज करती हैं । ऐसा प्रायः शरद पवार भी करते हैं । फिर भी महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ शरद पवार का तालमेल कभी-कभी हो जाता है, जहां दोनों के साझा प्रतिद्वंदी शिवसेना और भाजपा को कमजोर करना हो । भाजपा ने जब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को तवज्जो नहीं दिया तो उद्धव कांग्रेस और एनसीपी को साथ लेकर मुख्यमंत्री बने । फिर उसके जवाब में एकनाथ शिंदे शिवसेना के दूसरे प्रमुख के रूप में उभरे और भाजपा के देवेन्द्र फड़नवीस को साथ लेकर मुख्यमंत्री बने । अभी एनसीपी टूटकर भाजपा.शिवसेना गठजोड़ सरकार के साथ चली गयी ।
विपक्षी एका प्रयास तीन ध्रुवों के बीच चक्कर लगा रहा है. शरद पवार, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी । इनमें कई दल ऐसे हैं जो कांग्रेस के साथ खुद को सहज महसूस नहीं करते और कुछ को लगता है कि कांग्रेस को छोड़कर भाजपा के खिलाफ एका मजबूत नहीं होगी । वैसे तो शरद पवार और ममता बनर्जी दोनों कांग्रेस से ही निकले हुए हैं। लेकिन दीदी ने पश्चिम बंगाल में अपनी पकड़ से भाजपा के साथ.साथ कांग्रेस को भी दरकिनार किया हुआ है । इन दोनों के मुकाबले नीतीश कुमार की विश्वसनीयता ज्यादा संदिग्ध है । क्योंकि भाजपा का साथ छोड़कर बिहार में सबसे मजबूत भाजपा विरोधी राष्ट्रीय जनता दल के साथ नीतीश कुमार के गठजोड़ के अभी ज्यादा दिन नहीं गुजरे हैं । 23 जून को पटना बैठक में ममता बनर्जी जिस तरह कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ आजू.बाजू की कुर्सी पर बैठी थी, वैसा बेंगलुरु में शायद ही संभव हो पाए ।
केरल में सीपीएम नीत वाममोर्चा सरकार है और कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी है । कांग्रेस के नेतृत्ववाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा के एक घटक इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने समान नागरिक संहिता के भाजपा प्रस्ताव के खिलाफ सीपीएम आयोजित सेमीनार में हिस्सा लेने से इन्कार कर दिया । कांग्रेस भी उसके साथ है । दिल्ली के मुख्यमंत्री आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी 23 जून को पटना पहुंचे थे । अरविंद केजरीवाल की कांग्रेस से नाराजगी का कारण है, दिल्ली में अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले वाले केंद्र के अध्यादेश पर समर्थन न मिला । केंद्र सरकार ने 19 मई को अध्यादेश जारी करके राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में सेवाओं का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया । आम आदमी पार्टी ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । 10 जुलाई को अध्यादेश पर स्टे तो शीर्ष कोर्ट ने नहीं दिया । अगली सुनवाई 17 को है । अखिलेश यादव और कांग्रेस हाथ मिलाने को तैयार नहीं हैं ।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री भारत राष्ट्र समिति(बीआरएस) प्रमुख के. चन्द्रशेखर राव भाजपा के खिलाफ मोर्चा बनाने के लिए राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने की कोशिशा में जुटें हैं । गत वर्ष राव ने कोलकाता में दीदी से, पटना में नीतीश कुमार से और रांची में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन और मुंबई में शरद पवार से मुलाकात की । झारखंड में गठजोड़ घटक कांग्रेस भी है । चन्द्रशेखर राव कांग्रेस के साथ बैठने को तैयार नहीं हैं । तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालीन भी 23 जून को पटना पहुंचे थे । गत वर्ष स्टालीन ने अपने जन्मदिन पर आत्मकथा आधारित पुस्तक के विमोचन पर विपक्षी जुटान का आयोजन किया । विमोचन राहुल गांधी ने किया, जिसमें भाग लेने ममता बनर्जी और चन्द्रशेखर राव न्योते के बावजूद नहीं पहुंचे ।
17 जुलाई की दूसरी विपक्षी एका बैठक के लिए बेंगलुरु पहुंचने वाले नेताओं में 24 दलों के अध्यक्षधप्रतिनिधि शामिल हैं । जबकि पटना में 15 दलों के नेता जुटे थे । बेंगलुरु बैठक में जम्मू व कश्मीर के प्रमुख दल नेशनल कान्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं को भी आमंत्रित किया गया है । दक्षिण भारत के भी लगभग सभी क्षेत्रीय दलों के नाम सामने आ गए हैं, बीआरएस को छोड़कर ।
हो सकता है कांग्रेस अभी लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा को खिलाफ एकजुट विपक्षी मोर्चा तैयार करने के लिए अप्रिय प्रसंग को टालने का प्रयास करे । लेकिन 17.18 जुलाई का समागम बंगाल हिंसा के अलावे धारा.370 पर चर्चा का भी रिहर्सल हो सकता है । क्योंकि 20 जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरू है । बंगाल पंचायत चुनाव के परिणाम आने तक हिंसा में मरनेवालों की संख्या 39 हो चुकी थी । जम्मू व कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देनेवाली धारा.370 हटाने के केंद्र सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हो गयी है । कश्मीर से बाहर की किसी भी पार्टी के लिए धारा.370 कोई मुद्दा नहीं है । कांग्रेस ने भी अपना रवैया गोलमटोल रखा है, जो कश्मीर में अपना स्थान रखती है । सीपीएम की कश्मीर युनिट प्रमुख एम. वाई. तारिगामी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करनेवालों में से एक हैं ।