प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नववर्ष के पहले ही दिन संकेत दे दिया कि अयोध्या राम मंदिर मुद्दा उनके चुनावी एजेंडे में नहीं है । ‘सबका साथ सबका विकास’ नारे का जिक्र नरेंद्र मोदी अपने सभी भाषणों में करते हैं । यह उनका इतना बहुचर्चित बहुप्रचारित जुमला है कि अगर सामान्य ज्ञान के छात्रों और ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में पूछ दिया जाए कि ‘सबका साथ सबका विकास’ किनकी पंक्ति है, तो कोई भी तुरंत बता देंगे । इसलिए बताने की जरूरत नहीं है कि यही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए दोबारा पूर्ण बहुमत से भाजपा को सत्ता में लाने के लिए मुख्य चुनावी एजेंडा है और रहेगा । लेकिन यह चर्चा का विषय है कि नरेंद्र मोदी मंदिर मुद्दा को अपने चुनावी एजेंडे में शामिल करने के पक्ष में नहीं है । वे नहीं चाहते कि पहले की तरह मंदिर मुद्दे को इतना उछाल मिले कि ‘सबका साथ सबका विकास’ पर हावी जो जाए । साथ-साथ प्रधानमंत्री अपने पार्टियों और संघ परिवार सदस्यों को भी भटकाव में नहीं रखना चाहते, जो पूरे पांच साल में मंदिर मुद्दे से अलग हटकर चुनावी रणनीति तैयार नहीं कर पाए ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहली जनवरी को एक समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत ही यह कहकर शुरू किया कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश नहीं लाया जाएगा । प्रधानमंत्री ने जो कुछ कहा उसे सुनकर उनके पार्टीजन हतप्रभ हो गए और कांग्रेस समेत सभी विरोधी दल भ्रम में पड़ गए । प्रधानमंत्री ने राम मंदिर पर ऐसा गोलमटोल और सबको उलझन में डालनेवाले रवैया अपनाया कि किसी के लिए भी यह समझना कठिन हो गया कि नरेंद्र मोदी आखिर इस विवादित मसले का कैसा समाधान चाहते हैं । प्रधानमंत्री ने विपक्षी कांग्रेस समेत अपनी पार्टी नेताओं को फंसा दिया और बहुत बारीकी से खुद को मंदिर मुद्दे के फांस से निकाल लिया । नरेंद्र मोदी ने एक बार भी नहीं कहा कि कांग्रेस मंदिर निर्माण में अड़ेंगे डाल रही है । उन्होंने बार-बार दुहराया कि कांग्रेस से जुड़े वकील इस पेचीदे समस्या के संवैधानिक समाधान में बाधा डाल रहे हैं । प्रधानमंत्री ने कहा कि आजादी के बाद 70 साल से जो लोग सत्ता में रहे हैं, उन्होंने अयोध्या मसले का निदान निकालने के लिए भरपूर प्रयास किया, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता । कांग्रेस पड़ गयी चक्कर में कोई टिप्पणी करते नहीं बना । संसद में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सुरजेवाला समझ ही नहीं पाए कि प्रधानमंत्री के वक्तव्यों का तात्पर्य क्या है । कुछ नहीं सूझा तो अयोध्या मुद्दे पर अध्यादेश लाने के सवाल पर नरेंद्र मोदी ने जो कहा, उसी को लपक लिया, लेकिन कांग्रेस प्रवक्ता संभाल नहीं पाए ।

प्रधानमंत्री ने कहा कि अयोध्या वाला मसला सुप्रीम कोर्ट में है, न्यायिक प्रक्रिया पहले समाप्त तो होने दें । नरेंद्र मोदी ने एक बार भी नहीं कहा कि सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने के बाद अध्यादेश पर विचार करेंगे । 2010 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देनेवाली अयोध्या मंदिर संबंधित याचिका 2017 में सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार की गयी । 28 अक्टूबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए तीन महीने आगे की तारीख तय की । उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार का जल्द सुनवाई का आग्रह ठुकरा दिया । चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि जनवरी, 2019 में सुनवाई की तारीख तय की जाएगी । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कई भाजपा नेताओं को सुप्रीम कोर्ट का यह रूख अखर गया कि लोकसभा चुनाव का शीर्ष कोर्ट ने ख्याल नहीं किया । वे लोग आज भी भाजपा का नंबर वन चुनावी मुद्दा मंदिर को बनाए रखने के समर्थक हैं । नरेंद्र मोदी शायद अकेले भाजपा नेता हैं, जिन्होंने इससे हमेशा अपने को अलग रखा । भाजपा नेतागण मंदिर निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट की काट में अध्यादेश लाने की बात करने लगे । प्रधानमंत्री खुद को ‘सबका साथ सबका विकास’ पर केंद्रित रखकर इसी मुद्दे पर लोकसभा चुनाव के लिए मतदाताओं के बीच जाना चाहते थे और उस पर वे कायम हैं । उनके एक जनवरी के संबोधन से यह स्पष्ट हो गया । क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने कह रखा था कि एक अलग पीठ 10 जनवरी को सुनवाई की तारीख तय करगी । अयोध्या मसले का निष्पादन सुप्रीम कोर्ट में लोकसभा चुनाव तक होनेवाला नहीं है, यह बात प्रधानमंत्री भलीभांति जानते हैं । इसी वजह से भाजपा के संघ परिवार से करीबी होने का दावा करनेवाले नेताओं ने अध्यादेश लाने की बात की, जिनका जवाब प्रधानमंत्री ने दे दिया ।

यही सवाल एएनआई संवाददाता ने प्रधानमंत्री से पूछा था कि वे अयोध्या मंदिर पर अध्यादेश लाना चाहते हैं या नहीं । अध्यादेश क्यों और क्यों नहीं? इन दोनों सवालों का जवाब नरेंद्र मोदी ने अपने पार्टीजनों तथा कांग्रेस दोनों को दे दिया । उसके चार दिन बाद पांच जनवरी को भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अगरतला में कहा कि देश की रक्षा और विकास लोकसभा चुनाव में पार्टी का मुख्य मुद्दा होगा । उन्होंने मंदिर का नाम ही नहीं लिया । उस दिन तक केरल के साबरीमला मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश को लेकर हिंसा अपने उफान पर थी । उसमें केरल की वाममोर्चा सरकार और भाजपा की केरल यूनिट आमने-सामने है । नरेंद्र मोदी केरल में भी वाम गठजोड़ और कांग्रेस गठजोड़ का गढ़ ध्वस्त तो करना चाहते हैं मगर मंदिर मुद्दे पर नहीं । हिन्दू आस्था की स्वयंभू ठेकेदार भाजपा नेताओं को अयोध्या से मोहभंग होने के बाद साबरीमला की परंपरागत आस्था के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट से बिगाड़ मोल लेने प्रधानमंत्री ने छोड़ दिया और स्वयं इस धर्मसंकट से निकलकर मुस्लिमों के ‘पर्सनल’ धर्मसंकट से जुड़ी आस्था से जड़ गए । अध्यादेश लाने का मामला अयोध्या से हटकर मुस्लिम महिलाओं के ‘तीन तलाक’ से जुड़ गया । इससे संबंधित सवालों के जवाब में नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘तीन तलाक अध्यादेश सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लाया गया और अयोध्या पर उन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार है ।

साबरीमला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला 28 सितंबर को आया जिसमें सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की इजाजत दी गयी । उसमें 15 से 50 वर्ष की उम्र तक की महिलाओं का प्रवेश वर्जित है । केरल में सत्तारूढ़ वाम गठजोड़ का कांग्रेस से बैर है । राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट फैसला लागू करने का फैसला किया और कांग्रेस के लिए दूसरा धर्मसंकट खड़ा हो गया । भाजपा परंपरागत हिन्दू आस्था के साथ है और सरकार से टकराव पर आमादा है । दो जनवरी को रजस्वला उम्र की दो महिलाओं के प्रवेश को लेकर भाजपा और सत्तारूढ़ सीपीएम कार्यकर्ता एक-दूसरे के खिलाफ हिंसक हमले पर उतारू हो गए । सरकार ने दोनों महिलाओं को पुलिस संरक्षण दिया । कांग्रेस को इस आस्था का न तो साथ देते बनता है, न विरोध करते ।

6 जनवरी को आम चुनाव की तैयारियों के लिए गठित 17 समूहों में से पार्टी का घोषणापत्र तैयार करनेवाली कमिटी का प्रमुख गृह मंत्री राजनाथ सिंह बनाए गए । उन्हें अब इस बात का ख्याल रखना होगा कि नरेंद्र मोदी पार्टी को पूर्व गृह मंत्री वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के समय के चुनावी मुद्दे से बाहर निकालना चाहते हैं । आडवाणी को अपना वजूद कायम रखने के लिए अयोध्या राममंदिर की मदद लेनी पड़ी थी । संसद का मौजूदा सत्र समाप्त होते-होतेे प्रधानमंत्री ने गरीब सवर्णों को आरक्षण देने वाला ‘विकास’ का दूसरा कार्ड खेल दिया । कांग्रेस और भाजपा को शुरू से सवर्णों की पार्टी मानी जाती है ।

नरेंद्र मोदी ने ‘सबका साथ’ में अपने गठजोड़ सहयोगी दलों को भी उस विंदु पर ला खड़ा किया कि न साथ रहते बनता है, न छोड़ते । यही दोनों मुद्दे हैं - ‘मंदिर निर्माण और तीन तलाक’ । तबतक दलित परिवारों के घर से लाए गए दाल-चावल से दिल्ली के रामलीला मैदान में बनी 5,000 किलो खिचड़ी का विश्व रिकार्ड तैयार हो गया । राफेल और मंदिर दोनों लगभग समा गए ‘सबका साथ सबका विकास’ के पेंचों में ।