बिहार प्(एसआईआर) पर विशेष गठन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान वोट डालने के अधिकार से वंचित लोगों का भविष्य अभी अधर में लटका है । निर्वाचन आयोग ने चुनाव कार्यक्रम के एलान से पहले 30 सितंबर को जो मतदाता सूची जारी की, उनमें से 3.66 लाख नाम हटा दिए गए । अब यह सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि वोटर लिस्ट से काटे गए इतने लोगों को मतदाता माना जाए अथवा नहीं ।
अंतिम मतदाता सूची जारी करने के बाद निर्वाचन आयोग की टीम ने मुख्य चुनाव आयुक्त(ब्ब) ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में पटना जाकर चुनाव तैयारियों का जायजा लिया और 06 अक्टूबर को चुनाव कार्यक्रम का एलान कर दिया । बिहार में 06 नवंबर और 11 नवंबर को दो चरणों में मतदान होना है । 14 नवंबर को नतीजे आ जाएंगे और 16 नवंबर तक चुनाव प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। दोनों चरणों के मतदान की अधिसूचना जारी हो चुकी है ।
इस बात को ध्यान में रखकर सुप्रीम कोर्ट स्पेशल इन्वेस्टिगेटिव रिवीजन(एसआईआर) प्रक्रिया पर जल्दी. जल्दी सुनवाई कर रहा है ताकि मतदान शुरू होने से पहले वंचित मतदाताओं की भागीदारी पर संशय का समाधान निकल आए ।
06 अक्टूबर को निर्वाचन आयोग ने चुनाव तारीखों का एलान किया और 07 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की । जस्टिस सूर्यकान्त और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने निर्वाचन आयोग से कहा कि एसआईआर के बाद तैयार अंतिम मतदाता सूची से बाहर रखे गए 3066 लाख मतदाताओं का विवरण पेश करे । इसके लिए सिर्फ एक दिन का समय दिया । शीर्ष अदालत ने कहा कि अंतिम सूची में जो नए मतदाताओं के नाम जोड़े गए हैं, वे उन मतदाताओं की सूची से हैं, जिन्हें ड्राफ्ट सूची से बाहर कर दिया गया था अथवा ये फिर नए नाम है । इससे भ्रम की स्थिति पैदा हुई है । अंतिम सूची में मतदाताओं की संख्या देखने से ऐसा लगता है कि ड्राफ्ट सूची में बढ़ोतरी हुई है । इस संशय को स्पष्ट करने के लिए जोड़े गए नए नाम की पहचान उजागर होनी चाहिए । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग किसी मतदाता का नाम अगर सूची से हटा रहा है, जो उसके लिए नियम 21 और मानक परिचालन प्रक्रिया(व्. स्टेंडर्ड ऑपरेशन प्रोसिजियर) का पालन किया जाना चाहिए ।
30 सितंबर को निर्वाचन आयोग द्वारा जारी बिहार की 243 विधान सभा क्षेत्रों की वोटर लिस्ट में 21,53,343 नए वोटरों के नाम जोड़े गए और कुल 69,30,817 मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए । निर्वाचन आयोग के अनुसार 24 जून से 30 सितंबर तक चली एसआईआर प्रक्रिया के दौरान 22,34,26 मतदाता मृत पाए गए, जबकि 6 लाख 85 हजार मतदाताओं के नाम दो.तीन जगह पाए गए । कुल 36,44,939 वोटरों के बारे में पता चला कि वे स्थायी रूप से अन्यत्र चले गए हैं । इस प्रकार एसआईआर में 65,64,75 मतदाताओं के नाम अंतिम लिस्ट से हटाए गए ।
01 अगस्त को जारी ड्राफ्ट सूची में 07 करोड़ 24 लाख 5 हजार 756 मतदाताओं के नाम शामिल थे । ड्राफ्ट सूची के आधार पर किए गए दावा आपत्ति के बाद 3.66 लाख अयोग्य वोट हटाए गए और 21 लाख 53 हजार 343 योग्य मतदाताओं के नाम जोड़े गए । चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़े के अनुसार अंतिम सूची में मतदाताओं की संख्या लगभग 47 लाख घटकर 7.42 करोड़ रह गयी है, जबकि एसआईआर से पहले यह संख्या 7.89 करोड़ थी ।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से 07 अक्टूबर को कहा कि आंकड़े तुलनात्मक विश्लेषण के साथ पेश किए जाने चाहिए, ताकि मतदाताओं को भ्रम न हो । 09 अक्टूबर को निर्वाचन आयोग ने अपनी सफाई में शीर्ष कोर्ट पीठ को बताया कि सूची से नाम हटाए गए किसी भी मतदाता ने इसके खिलाफ अपील नहीं की है, न ही किसी राजनीतिक दल ने शिकायत दर्ज करायी है ।
एसआईआर को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देनेवाले याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण और अभिषेक मनुसिंघवी ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने मतदाताओं को सूची से नाम हटाने का न तो कोई कारण बताया, न ही नोटिस दिया । जिनके नाम काटे गए वे कारण जाने बगैर अपील दायर नहीं कर सकते । सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट पीठ को जानकारी दी कि हटाए गए वोटरों के नाम की कोई सूची भी प्रकाशित नहीं की गयी है। पीठ के एक सदस्य जस्टिस सूर्यकान्त ने पूछे जाने पर निर्वाचन आयोग की ओर से पेश वकील राकेश द्विवेदी ने सुनवाई के दौरान शीर्ष कोर्ट से एक आदेश जारी करने का आग्रह किया जिसमें अंतिम सूची से हटाए गए मतदाता इसके खिलाफ अपील समय,सीमा के अंदर दायर करें, क्योंकि एक हफ्ते के अंदर दरवाजे बंद हो जाएंगे । प्रशांत भूषण ने जजों को यह भी ध्यान दिलाया कि एसआईआर के दौरान महिलाओं और मुस्लिम मतदाताओं के नाम अनुपातहीन तरीके से हटाए गए । दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद शीर्ष कोर्ट पीठ ने कहा कि अंतिम सूची से बाहर किए गए मतदाताओं को अपील करने का उचित अवसर दिया जाए और उनके पास विस्तृत जानकारी होनी चाहिए कि उनके नाम क्यों काटे गए । ऐसे मतदाताओं की सहायता के लिए जजों ने निर्देश दिया कि अपील का समय कम है, इसलिए बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष आज(09 अक्टूबर) ही जिला न्याय सेवा प्राधिकारणों को संदेश भेजें । जस्टिस सूर्यकान्त ने कहा कि सूची से हटाए गए मतदाताओं को सक्षम अधिकारियों के पास अपील ड्राफ्ट करने और लड़ने में सचिव लोग अपने-अपने क्षेत्रों में पारालीगल(अर्ध.कानूनी) वोलंटियरों और बूथ स्तरीय अधिकारियों के साथ मिलकर सहायता करें । इसके लिए पहले वोट डालने से वंचित किए गए मतदाताओं के नाम इकट्ठा करें और ऐसे वोटरों के विषय में पूरी जानकारी विधिक सेवा प्राधिकरण एक हफ्ते के अंदर स्टेटस रिपोर्ट के रूप में जमा करे । इसलिए अगली सुनवाई की तारीख इसी हफ्ते में 16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट जजों ने रख दी । कोर्ट ने यही कानूनी सहायता उन लोगों को भी उपलब्ध करायी, जिनमे नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए और जिन्होंने निर्वाचन आयोग के इस काम को चुनौती देनेवाले दावे दायर किए । 01 सितंबर की सुनवाई के दौरान भी शीर्ष कोर्ट पीठ ने बिहार न्याय सेवा प्राधिकरण को राजनीतिक दलों के बूथ एजेंटों से तालमेल करके जमीनी रिपोर्ट गोपनीय तरीके से भेजने का आदेश दिया । ये नौबत तब आयी, जब याचिकाकर्ताओं और चुनाव आयोग दोनों की ही दलीलों में धुंधली तस्वीर पेश की गयी । आयोग ने कोर्ट को बताया कि 33,326 निजी आवेदन मतदाता सूची में नाम शामिल करने और 20,75,65 आवेदन नाम हटाने के लिए मिले हैं । बिहार में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल ने कांग्रेस, वामदल और इंडिया गठजोड़ घटकों के साथ मिलकर एसआईआर पर रोक लगाने की अर्जी चुनाव आयोग पर सत्यापन के बहाने वोटरों के नाम हटाने का आरोप लगाकर दायर की हुई है। निर्वाचन आयोग ने दावे, आपत्तियां दाखिल करने की डेडलाईन 01घ09 रखी थी । उसी के खिलाफ सुनवाई थी । सुप्रीम कोर्ट ने डेडलाईन 01घ09 से आगे और अंतिम मतदाता सूची जारी करने की अंतिम तारीख भी 30घ09 से आगे बढ़ाने की राजनीतिक दलों की अपील ठुकरा दी । उल्टे इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने से कई गुना ज्यादा आवेदन चुनाव आयोग को नाम हटाने के लिए मिले हैं । किसी दल को उन 65 लाख वोटरों की चिंता नहीं है, जिसका नाम कटा है । अगस्त के अंतिम सप्ताह में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में बिहार में वोटर अधिकार यात्र चलायी जा रही थी, जिसमें झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन भी शामिल होने पहुंचे । केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम में 2026 के अप्रैल, मई में चुनाव है । निर्वाचन आयोग ने पूरे देश में एसआईआर चलाने का निर्देश राज्य निर्वाचन अधिकारियों को दिया हुआ है । 09 अक्टूबर को हालिया सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के दिन झारखंड में सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा कांग्रेस गठजोड़ समेत सभी गैर.भाजपा दलों ने एक साथ बैठक करके एसआईआर का मिलकर विरोध करने का फैसला किया । बिहार और झारखंड में मिलते,जुलते राजनीतिक दल सक्रिय हैं । पश्चिम बंगाल में जबर्दश्त विरोध जारी है । इंडिया गठबंधन घटकों और उनसे जुड़े संगठनों ने सर्वसम्मति से झारखंड सरकार से आग्रह किया कि राज्य में एसआईआर का प्रयास रोकने के लिए विधान सभा से इस आशय का प्रस्ताव पास किया जाए । 21.स्तरीय कमिटी 15 अक्टूबर को एसआईआर के खिलाफ आंदोलन का कार्यक्रम तैयार करेगी । भाजपा शासित असम में एसआईआर ओकेहै जहां 2026 में चुनाव है और वहां घुसपैठिया निकाल,बाहर अभियान चल रहा है । बिहार में 22 साल के लंबे अंतराल के बाद निर्वाचन आयोग ने विधान सभा चुनाव करीब होने के समय एसआईआर चलाया और इसकी अवधि भी कम रखी । एसआईआर राजनीतिक दलों से शुरू होकर पटना हाईकोर्ट तथा फिर सुप्रीम कोर्ट तक विवाद के साथ निर्वाचन आयोग के शीर्ष कोर्ट से टकराव के साथ चल रही है । 24 जून से
एसआईआर प्रक्रिया शुरू करने का निर्वाचन आयोग निर्देश जारी होते ही इसे चुनौती दी गयी और इस पर रोक लगाने का आग्रह पार्टियों से सुप्रीम कोर्ट से किया । देशभर में विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया । अर्जी पटना हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंची । सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर करनेवाले एसोसिएसन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स(एडीआर) के साथ राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने भी सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगायी ।
07 जुलाई को पहली सुनवाई जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की सुप्रीम कोर्ट पीठ के सामने हुई । पीठ ने एसआईआर पर रोक लगाने से तो इन्कार कर दिया, लेकिन 10 जुलाई को तुरंत सुनवाई को राजी हो गयी । उसी दिन से निर्वाचन आयोग की सुप्रीम कोर्ट से सीधी तकरार शुरू हो गयी । मतभेद इस बात को लेकर उभरा, जब सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि चुनाव आयोग ने अबतक चल रहे सभी मतदाता पहचान पत्रों को अमान्य घोषित कर दिया । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने पहले इसी पर सवाल उठाया कि एसआईआर बिहार में चुनाव करीब होने के समय क्यों चलाया और निर्देश दिया कि आधार कार्ड को पहचान पत्र माने चुनाव आयोग । चुनाव आयोग द्वारा ही जारी मतदाता पहचान पत्र को न मानने और राशन कार्ड के साथ-साथ आधार कार्ड को भी आईडी प्रूफ न मानने पर स्पष्टीकरण मांगा ।
फिर सुनवाई ने क्रम में निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के अधिकार पर ही सवाल उठा दिया और कहा कि धारा.324 के तहत चुनाव से संबंधित सारे अधिकार संविधान से निर्वाचन आयोग को प्राप्त है, सुप्रीम कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है ।
शीर्ष कोर्ट की बिल्कुल परवाह न करते हुए निर्वाचन आयोग ने 10 सितंबर को सभी राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों के मुख्य चुनाव अधिकारियों का दिल्ली में सम्मेलन बुलाकर देश भर में एसआईआर प्रक्रिया चलाने का निर्देश दिया । सम्मेलन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दो अन्य चुनाव आयुक्त सुखवीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी ने विभिन्न प्रदेश चुनाव अधिकारियों से कहा कि आयोग द्वारा निर्धारित 11 दस्तावेजों को पहचान पत्र मानकर एसआईआर चलाएं ताकि कोई योग्य नागरिक मतदाता सूची ने छूटे नहीं । साथ-साथ किसी अयोग्य व्यक्ति का नाम शामिल न हो । लेकिन निर्वाचन आयोग ने अपने चुनाव अधिकारियों से यह स्पष्ट नहीं कहा कि 08 सितंबर को दिए गए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार बिहार एसआईआर प्रक्रिया में आधार कार्ड को 12वें आईडी प्रूफ(पहचान प्रमाण) दस्तावेज के रूप में जोड़कर एसआईआर अभियान चलाया जाए । 11 दस्तावेजों को लेकर पहले से विवाद चल रहा था, फिर आधार पर भी विवाद खड़ा किया गया ।
आखिरकार शीर्ष कोर्ट पीठ ने 15 सितंबर को चुनाव आयोग को चेतावनी दे दी कि एसआईआर प्रक्रिया में अगर अनियमितता और गड़बड़ी मिली तो पूरी एसआईआर प्रक्रिया रद्द कर दी जाएगी । उस समय तक पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची के साथ जस्टिस सूर्यकान्त आ गए थे । सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर यह शिकायत मिली कि कानूनी गड़बड़ी के कारण बड़े पैमाने पर नागरिक अपने मताधिकार से वंचित किए गए तो अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बावजूद हस्तक्षेप करेगा और जरूरत पड़ी तो पूरी प्रक्रिया रद्द की जा सकती है ।
उसी समय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि बिहार एसआईआर पर टुकड़ों में राय नहीं दी जा सकती, अंतिम फैसला पूरे देश में लागू होगा । पीठ ने 1977 के सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा.324 चुनाव आयोग को कानून का सर्वेसर्वा खुद को मानने का असीमित अधिकार नहीं देता, अधिकारों के दुरुपयोग और संतुलन बिगड़ने की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप का अधिकार संविधान से प्राप्त है ।
एक देश एक चुनाव बिल पर विचार.विमर्श कर रही संयुक्त संसदीय समिति की बैठक में 11 जुलाई को भारत के चार प्रधान न्यायाधीशों ने एक स्वर से राय दी कि एक देश एक चुनाव बिल की धारा 82(5) में चुनाव आयोग को मिले असीमित अधिकारों पर अंकुश लगाया जाना चाहिए । ये पूर्व सीजेआई हैं. रंजन गोगोई, यू यू ललित, जे एस खेखर और डी. वाई. चन्द्रचूड़ ।
इस पूरे प्रकरण में नागरिकता, उसी से जुड़ा घुसपैठियों को निकाल-बाहर अभियान और नागरिकता सुनिश्चित करना तथा उसके लिए निर्वाचन आयोग द्वारा निर्धारित पहचान दस्तावेजों में आधार कार्ड तक एक साथ विवाद के घेरे में है । योग्य मतदाता तय करने का यह मामला बिहार के बाद पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु विधान सभा चुनावों तक विवादित बना रहेगा । काफी कुछ सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर निर्भर है, जो बिहार एसआईआर से संबंधित सारे विवरणों की पड़ताल के बाद ही सामने आएगा ।
कलकत्ता हाईकोर्ट का एक हालिया मामला माएने रखता है, जो सीधे आधार कार्ड और नागरिकता से जुड़ा है । इसका ताल्लुक बांग्लादेश से है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में चलाए जा रहे मुसलमानों को बांग्लादेशी घुसपैठिया बताकर निकाल-बाहर करनेवाले अभियान का विवाद कलकत्ता हाईकोर्ट के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा । केंद्र सरकार ने 02 मई को एसओपी(स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रक्रिया) अधिसूचना जारी की, जिसमें सभी अधिकारियों को अवैध आप्रवासियों को पहचान करके निकाल-बाहर करने के लिए अधिकृत किया गया । पश्चिम बंगाल निवासी एक मुस्लिम महिला सुनाली खातुन को बांग्लादेशी घुसपैठिया बताकर दिल्ली से निकाल दिया गया ।
29 अगस्त को उसी महिला की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट पीठ ने केंद्र सरकार से एसओपी अधिसूचना को स्पष्ट करने कहा । बता दें कि सुनवाई करनेवाली वही जस्टिस सूर्यकान्त और जस्टिस बागची की सुप्रीम कोर्ट पीठ थी, जो बिहार एसआईआर विवाद पर सुनवाई कर रही है । 29 अगस्त को सुनाली खातुन की फरियाद पर सुनवाई के दिन ही चुनाव आयोग के अधिकारियों ने पटना में बताया कि 3 लाख मतदाताओं को ‘संदिग्ध नागरिकता’ के कारण नोटिस जारी किया गया है । ये सभी मुस्लिम बहुल आबादी वाले बिहार के सीमांचल क्षेत्र के हैं, जिनके बारे में विदेशी घुसपैठिए का संदेह है ।
10 अक्टूबर को बांग्लादेश के एक न्यायिक मजिस्ट्रेट ने ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग से कहा कि पश्चिम बंगाल की रहनेवाली गर्भवती महिला सुनाली खातुन और पांच अन्य वो वापस ले जाएं क्योंकि वे भारतीय नागरिक हैं, उनके पास आधार कार्ड है । चार दिन पहले कलकत्ता हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को इस बात के लिए फटकार लगायी कि बहुत जल्दीबाजी में सुनाली और उसके परिवारजनों को बांग्लादेशी घुसपैठिया बताकर निकाल-बाहर कर दिया । सुप्रीम कोर्ट ने सुनाली खातुन को कलकत्ता हाईकोर्ट जाने कहा था ।
09 अक्टूबर को बिहार एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दिन ही चुनाव आयोग को भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की अर्जी पर जारी नोटिस के जवाब में कहना पड़ा कि एसआईआर प्रक्रिया में आधार कार्ड को 12वें आईडी प्रूफ मानने के निर्देश का पालन किया गया । अश्विनी उपाध्याय ने यह कहकर सुप्रीम कोर्ट के 08/09 के इस निर्देश पर स्पष्टीकरण मांगा कि आधार कार्ड को नागरिकता का आधार नहीं माना जाए, क्योंकि इससे अवैध घुसपैठिए मतदाता के रूप में पंजीकृत हो जाएंगे । जबकि सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा था कि आधार कार्ड नागरिकता का प्रमाण नहीं होगा ।
चुनाव आयोग ने ऐसे पहचान दस्तावेज तय किए हैं, जिनसे दावेदारों की और उनके माता-पिता के भी जन्मतिथि के साथ-साथ जन्मस्थान भी पता चले । विवाद का मुख्य कारण यही है ।