25 जून को आपातकाल(इमर्जेंसी) के 50 साल पूरे हो गए । यह ऐतिहासिक दिन है, क्योंकि 25 जून, 1975 को देश में पहली बार इमर्जेंसी लगा था । उस समय कांग्रेस का शासन था और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी । 50वें साल में इस अवसर को भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मना रही है । इसकी योजना गत वर्ष जुलाई में ही केंद्र सरकार से बना ली और विधिवत् राजपत्र जारी करके 25 जून, 1975 की तारीख को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित कर दिया गया ।

11 जुलाई, 2024 को भारत सरकार की ओर से जारी ‘संविधान हत्या दिवस’ अधिसूचना के समय सरकार और विपक्ष के बीच संविधान को लेकर ठनी हुई थी । संसद में दोनों सदनों में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के नेतृत्व में सभी विपक्षी दल एक सुर में भाजपा पर आरोप लगा रहे थे कि देश में अघोषित इमर्जेंसी जैसे हालत हैं और केंद्र सरकार संविधान का मूल ढांचा खत्म करने पर तुली है । संसद के मानसून सत्र में इसी मुद्दे को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच नोक-झोंक होती रही । आखिरकार दिसंबर में इस बात पर सहमति बनी कि संविधान के 75वें वर्ष के उपलक्ष में संसद में संविधान पर दो दिन चर्चा की जाए । उसी क्रम में कांग्रेस ने देश भर में ‘संविधान बचाओ रैली’ का आयोजन शुरू कर दिया और भाजपा ने 25 जून की तारीख को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित कर दिया ।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और राज्य सभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला तथा राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ को वर्ष 2024 में शीतकालीन सत्र के समय संविधान पर चर्चा के लिए पत्र लिखा था । उसके अनुसार 13 और 14 दिसंबर को राज्यसभा में तथा 16 और 17 दिसंबर को लोकसभा में संविधान पर चर्चा हुई । चर्चा के दौरान भाजपा सदस्यों ने मुख्य रूप से इमर्जेंसी और उस दौरान शुरू हुए संविधान संशोधन को लेकर कांग्रेस पर निशाना साधा ।

आज संसद के अंदर, बाहर और सुप्रीम कोर्ट तक यह बहस छिड़ी हुई है कि संविधान सर्वोच्च या संसद । विपक्ष का सीधा आरोप है कि सरकार मनमाने तरीके से विपक्षी सदस्यों की बिल्कुल अवहेलना करके संसद से ऐसे-ऐसे संविधान संशोधन बिल पास करा रही है ताकि सुप्रीम कोर्ट के भी संवैधानिक अधिकार कम-से-कम किए जा रहे हैं । फोकस इस बात पर है कि कार्यपालिका का वर्चस्व कायम रखनेवाले संसद के पास किसी एक्ट की सुप्रीम कोर्ट संविधान से प्राप्त अधिकार के अंतर्गत् समीक्षा न कर सके ।

इसमें सरकार की ओर से उपराष्ट्रपति और राज्य सभा सभापति जगदीप धनखड़ ने झंडा उठा रखा है। सदन के अंदर और बाहर वे बार-बार संसद सर्वोच्च या संविधान का मसला बार-बार उछालते हैं ।

अभी इमर्जेंसी दिवस से पांच दिन पहले 20 जून को जगदीप धनखड़ ने याद दिलाते हुए कहा कि हर वर्ष ‘संविधान हत्या दिवस’ मनाने का सरकार का फैसला ‘बुद्धिमत्तापूर्ण’ है । उन्होंने इसी बहाने सुप्रीम कोर्ट पर निशाना फिर साधा ।

वर्तमान उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा इंटर्नशिप कार्यक्रम के सहभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि ‘आपातकाल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले न्यायिक इतिहास का सबसे काला अध्याय है और यह पूरी दुनिया में न्यायिक संस्थाओं के लिए काला पहलू है ।’ राज्यसभा उपसभापति ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने आपातकाल में 9 हाईकोर्टों के फैसले को पलटकर तानाशाही और निरंकुश शासन को न्यायिक मुहर लगा दी । अगले महीने संसद के मानसून सत्र में भी आपातकाल पर चर्चा हो सकती है और संभावना लग रही है कि राज्यसभा सभापति सदन के अंदर भी यह मामला उठाएंगे ।

भाजपा के वरिष्ठ नेता बैंकैया नायडू उपराष्ट्रपति पद से हटने के बाद से प्रायः चुप रहते हैं । अभी इमर्जेंसी दिवस के समय काफी दिनों बाद उन्होंने मुंह खोला कि कांग्रेस को इमर्जेंसी थोपने के लिए लोगों से माफी मांगनी चाहिए ।

भाजपा इस बात का प्रचार करती आ रही है कि आपातकाल में संविधान संशोधन समेत जितने काम हुए, सब गलत, जनविरोधी थे । उसी क्रम में संविधान के प्रस्तावना में 1976 में किए गए संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी । याचिकाकर्ता भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी और वकील अश्विनी उपाध्याय ने 42वां संशोधन करके प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ और ‘धर्म निरपेक्ष’ शब्द जोड़े जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । दलील यह दी गयी कि उस संशोधन के समय सारे विपक्षी नेता जेल में थे । संसद सदस्यों को कोई बात नहीं सुनी गयी और जबरन एक खास विचारधारा मानने को लोगों को विवश किया गया ।

2024 के जुलाई-अगस्त में इन याचिकाओं पर सुनवाई अंतिम चरण में थी और नवंबर में संसद के शीतकालीन सत्र के समय शीर्ष कोर्ट का फैसला आने के कयास लगाए जा रहे थे । वकीलों के बीच अटकलबाची चल रही थी कि सुप्रीम कोर्ट प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द जोड़नेवाले संसद से पास संशोधन को गलत नहीं मानेगा । उसके पहले जुलाई, 2024 में ही केंद्र सरकार ने राजपत्र अधिसूचना में इमर्जेंसी लागू होने की तारीख 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित कर दिया । 11 जुलाई, 2025 को जारी अधिसूचना के अनुसार भारत सरकार ने ‘आपातकाल की अवधि के दौरान सत्ता के घोर दुरूपयोग का सामना और संघर्ष करनेवाले सभी लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित किया है और भारत के लोगों को भविष्य में किसी भी तरह से सत्ता के दुरूपयोग का समर्थन न करने के लिए कुछ प्रतिबद्ध किया है।’ जी. पार्थसारथी संयुक्त सचिव केन्द्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी यह अधिसूचना(फा.स. 17015/53/2024)

ज्यों-की-त्यों प्रस्तुत की जा रही है।

25 नवंबर को संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हुआ और उसी दिन सुप्रीम कोर्ट का 1976 के प्रस्तावना से जुड़े 42वें संविधान संशोधन पर फैसला आया । चीफ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने पहले तो यह स्पष्ट कर दिया कि आपात्काल के दौरान संसद का हर फैसला निरर्थक नहीं हो सकता ।

सुप्रीम कोर्ट पीठ ने ‘समाजवाद’ शब्द को परिभाषित करते हुए कहा कि भारत में समाजवाद का अर्थ कल्याणकारी कार्य है और वो नहीं है, जैसा फ्रांस तथा पश्चिमी देशों में माना जाता है । इमर्जेंसी काल के संसद के हर फैसले को चुनौती देनेवाली कई याचिकाओं का सुप्रीम कोर्ट पहले ही निष्पादन कर चुकी है । 42वें संविधान संशोधन के बारे में भी भारत के प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना ने 25.11.2024 को कहा कि इसकी कई बार न्यायिक समीक्षा की गयी है और यह नहीं कहा जा सकता कि आपातकाल में लिया गया संसद का हर फैसला गलत था । सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि लगभग 44 वर्षों बाद 42वें संविधान संशोधन को चुनौती देने का कोई वैध कारण या औचित्य आधार नहीं मिलता । यदि पूर्वव्यापी तर्क स्वीकार किए जाते हैं तो सभी संशोधनों पर लागू होंगे । इस मुद्दे पर भाजपा के लिए सुप्रीम कोर्ट ‘सर्वोच्च’ थी । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस का इशारा उन संविधान संशोधनों की तरफ था, जो भाजपा गठजोड़ ने 2024 में पूर्ण बहुमत में आने के बाद लगातार तीसरे कार्यकाल तक विपक्ष की आवाज अनसुनी करके किए जा रहे हैं । 26 नवंबर, 2024 को संविधान दिवस के दिन भी संसद के बाहर संविधान सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के लिए राजनीतिक इस्तेमाल की चीज बनकर उभरी । संसद बनाम सुप्रीम कोर्ट पर चर्चा गरम थी । कांग्रेस ने संसद में चर्चा के लिए पत्र 26 नवंबर को ही लिखा । 2014 और 2019 में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आयी भाजपा गठजोड़ सरकार ने संविधान के साथ वही किया, जिसके लिए इमर्जेंसी घोषणा दिवस को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित किया गया । विपक्ष कमजोर था, कांग्रेस के पास विपक्ष का दर्जा देने लायक सीटें भी नहीं थी । भाजपा सरकार को संसद में विपक्ष की आवाज अनसुनी करके 10 साल में संशोधनों की झड़ी लगा दी । उसी अवधि के ज्यादातर संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी । 2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने ‘संविधान रक्षक अभियान’ चलाकर इतनी सीटें जीती की आज भाजपा कोई बिल विपक्ष को दरकिनार कर पास नहीं करा सकती । भाजपा को पहले की तरह सिर्फ अपनी बदौलत पूर्ण बहुमत नहीं मिला । भाजपा आज अपने शासन के 11वें साल का जश्न मना रही है, जब बेरोजगारी, महंगाई चरम पर है । गरीब और दिहाड़ी कमानेवाले मजदूरों की रसोई सरकार से हर महीने मिल रहे मुफ्त गेहूं, चावल राशन से चल रही है । निम्न और मध्य आर्य वर्ग के लोग पिस रहे हैं । कई राज्यों में चुनावों के दौरान किए गए रेवड़ी वायदे के पालन से गरीब परिवारों का खर्च चल रहा है । केंद्र सरकार लोगों का ध्यान भरमाने के हथकंडे आए दिन अपना रही है । भाजपा अपनी किसी भी नीति की आलोचना बर्दाश्त नहीं करती उसके खिलाफ तुरंत कार्रवाई होती है । यूट्यूब, सोशल मीडिया, इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया सभी संचार माध्यमों को केंद्र सरकार की ओर से आए दिन जारी की जा रही ‘एडवाइजरी’ के अनुसार चलना होता है । भाजपा से मतभेद का मतलब ‘देशद्रोह’ कानून के तहत जेल है । विपक्षी दल समेत देश के प्रबुद्ध और स्वतंत्र सोच रखनेवाले वर्गों के बीच आम चर्चा है कि 1974 जैसी ही हालात हैं, जब इंदिरा राज के खिलाफ जे. पी. आंदोलन शुरू हुआ था । इमर्जेंसी का एलान किए बगैर भाजपा सरकार जनभावनाओं की उपेक्षा करके अपनी नीतियां थोप रही है । इसका प्रमाण है 2024 आम चुनाव में झटका । उतना ही नहीं, कई राज्यों में या तो भाजपा सत्ता से बाहर है, अथवा अन्य दलों से गठजोड़ करके सरकार में शामिल है । 1974 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में शुरू हुए छात्र आंदोलन के देशव्यापी होने का कारण चरमरायी अर्थव्यवस्था से त्राहि में लथपथ जनआक्रोश था । दमनात्मक कार्रवाई से आक्रोश भड़का और सारे गैर-कांग्रेसी दल एकजुट होकर सड़कों पर उतरे । उसके जवाब में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सभी विपक्षी नेताओं को कड़े कानून बनाकर जेल में डाल दिया । उसके पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जगमोहन लाल सिन्हा ने अपने ऐतिहासिक फैसले में लोकसभा सदस्य के रूप में इंदिरा गांधी के निर्वाचन को धांधली पाए जाने के कारण निरस्त कर दिया । इंदिरा गांधी ने इसे नहीं माना और सत्ता में बनी रही । इमर्जेंसी के 2 साल बाद 1977 आम चुनाव में इंदिरा गांधी हारी, कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गयी । सभी गैर-कांग्रेसी दलों को मिलाकर जनता पार्टी की सरकार बनी, जिसमें पहली बार जनसंघ(आज की भाजपा) को सत्ता में आने का मौका मिला । लेकिन लगभग सभी दलों ने जनादेश की भावना की कद्र न करके कांग्रेस का मजबूत विकल्प प्रस्तुत करने के बजाए सिर्फ इंदिरा गांधी के खिलाफ बदले की कार्रवाई को लक्ष्य बना लिया । इसका परिणाम ये हुआ कि जनता पार्टी बिखर गयी और 5 साल पूरा नहीं कर पायी । इसका परिणाम ये हुआ कि जनता पार्टी बिखर गयी और 5 साल पूरा नहीं कर पायी ।

इंदिरा गांधी फिर से बहुमत से सत्ता में लौटी । कहा गया इमर्जेसी में सत्ता का दुरूपयोग और क्यों भूली जनता ज्यादतियां घ आज भी बूढ़े-बुजुर्ग इमर्जेंसी को ‘अनुशासन पर्व’ के रूप में याद करते हैं । सारी ट्रेनें समय से आती थी, खुलती थी । कार्यालयों में लोग समय से आते थे । स्कूल-कॉलेज में शिक्षक नियमित आते थे, परीक्षाएं,ं समय से होती थी । पुलिस राज में आम जनता को राहत थी । अस्पतालों में डॉक्टर मुस्तैद रहते थे ।

1977 का चुनाव परिणाम आर्थिक संकट का असंतोष था ।

इतने वर्षों में चुनावी हार-जीत नीतिगत या व्यवस्था बदलने के बजाए अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थ के वशीभूत खास दल के नेतृत्व के खिलाफ छींटाकशी पर हो रही है । भाजपा ने कांग्रेस नेतृत्व के एक ही परिवार में केंद्रित होने को मुद्दा बनाया, जो देश की जनता ने नहीं स्वीकारा । देश की आर्थिक हालत की ओर किसी दल का ध्यान नहीं है । संविधान के राजनीतिक मोहरा बनने का कारण भाजपा का बहुमत का लाभ उठाकर ऐसा संविधान बनाने का है, जिसमें सरकार के किसी काम को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सके । संवैधानिक पदों पर नियुक्तियों में सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष की भूमिका सरकार अमूमन समाप्त कर चुकी है ।

वर्तमान सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस बी. आर. गवई ने पूर्ववर्ती जस्टिस संजीव खन्ना की तरह शपथग्रहण के बाद बोल दिया कि संसद के पास संविधान में संशोधन का अधिकार है, लेकिन संविधान के मूल ढांचे को नहीं छू सकती ।

भाजपा को तो इमर्जेंसी और समाजवाद का कृतज्ञ होना चाहिए । समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण का पुछल्ला पकड़कर ही भाजपा को इमर्जेंसी के बाद केंद्र में सत्ता में भागीदारी का पहली बार अवसर मिला ।