नरेंद्र मोदी लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बननेवाले पहले राजनेता हैं । एक ही राजनीतिक दल के एक ही नेता का देश का ऐसा नेतृत्वकर्ता बनना अपने आप में एक रिकॉर्ड है और ऐतिहासिक है । भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और अब केंद्रीय मंत्री जे. पी. नड्डा समेत कई वरिष्ठ भाजपा नेता इस बात का बार-बार उल्लेख कर चुके हैं । उनका कहना सही है और कोई इससे इंकार नहीं नहीं कर सकते ।

साथ.साथ दूसरा ऐतिहासिक चुनाव परिणाम भी सामने आया है कि पहली बार मतदाताओं ने विपक्षी दलों को रिकॉर्ड जीत प्रदान की है । लोकसभा में इतनी बड़ी संख्या में विपक्षी दल जीतकर इसके पहले कभी नहीं पहुंचे थे । 18वीं लोकसभा में विपक्षी ‘इंडिया गठजोड़’ को प्राप्त इतनी मजबूती जनादेश का दूसरा ऐसा पहलू है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा के कोई नेता विपक्षी गठजोड़ की मजबूती ऐतिहासिक मानने को तैयार नहीं है । विपक्ष की इतनी बड़ी संख्या में जीत भाजपा नेता स्वीकारने को भी तैयार नहीं है ।

अपने 10 साल के कार्यकाल के दौरान नरेंद्र मोदी किसी.न.किसी सम्मेलन में प्रायः करते थे कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के सुचारू संचालन के लिए मजबूत विपक्ष जरूरी है । इस दौरान लोकसभा में विपक्ष तो था, मगर इतना मजबूत नहीं था कि विपक्ष का दर्जा मिले । किसी भी पार्टी के पास लोकसभा में इतनी सीटें नहीं थी कि उसे यह संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो । कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी थी, मगर उसके पास भी न्यूनतम 10: सीटें नहीं थी ताकि उसके नेता को विपक्षी नेता का दर्जा मिले । पूरे दस साल तक जनता से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक यह मुद्दा चर्चा में रहा । मुख्य सूचना आयुक्त(सीआईसी), केंद्रीय सतर्कता आयुक्त(सीबीसी), महालेखा नियंत्रक व परीक्षक(सीएजी) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) निदेशक, लोकपाल जैसे संवैधानिक पदों पर नियुक्ति सरकार इसी बहाने टालती रहती थी । इन पदों की नियुक्ति के लिए बने एक्ट और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति में भारत के प्रधान न्यायाधीश(सीजेआई) के अलावे लोकसभा में विपक्षी नेता का भी प्रावधान है ।

नियुक्तियां टलने और खाली पदों के प्रति सरकार का उदासीन रवैया के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर मिली नोटिस के जवाब में सरकार ने यह दलील देकर पल्ला झाड़ा कि लोकसभा में विपक्ष का नेता नहीं है । सुप्रीम कोर्ट ने फटकार के साथ ऐसा प्रावधान करने कहा ताकि लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता को चयन समिति के सदस्य के रूप में बैठक में बुलाया जाए ।

ऐसा प्रावधान तो हुआ और चयन समिति की बैठकों में लोकसभा में कांग्रेस नेता को बुलाया भी गया । लेकिन केंद्र सरकार ने न तो किसी कारण से लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता के बैठक में न आ पाने की परवाह की, न ही चयन के लिए सूचीबद्ध किसी नाम पर उनकी आपत्ति को तरजीह दी ।

10 साल के अंतराल के बाद लोकसभा में विपक्ष का नेता है, जिसकी उपेक्षा करके नरेंद्र मोदी नीत भाजपा गठजोड़ सरकार के लिए किसी संवैधानिक नियुक्ति पर एकतरफा निर्णय लेना कठिन होगा ।

इन दस वर्षों में नरेंद्र मोदी स्वयं और गृह मंत्री अमित शाह संसद के अंदर और बाहर सार्वजनिक सभाओं में कमजोर विपक्ष के खिलाफ ललकारने वाली हिकायत जैसी भाषा का इस्तेमाल करते हुए कहा करते थे कि मतदाताओं ने भाजपा के प्रति भरोसा जताया है । कांग्रेस को जनादेश ने ठुकरा दिया है ।

क्योंकि 2014 और 2019 में भाजपा को अपनी बदौलत लोकसभा में पूर्ण बहुमत हासिल हुआ था । दूसरा कार्यकाल समाप्त होने का समय नजदीक आते.आते राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठजोड़(एनडीए) सरकार मान चुकी थी कि देश में भाजपा का विकल्प नहीं है और कांग्रेस मजबूत नहीं होगी । 2024 में भी लोकसभा में किसी विपक्षी दल को विपक्षी नेता का दर्जा नहीं होगा । इसलिए दिसंबर, 2023 में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तथा सेवा शर्तों वाले एक्ट में केंद्र सरकार ने चयन समिति में से भारत के प्रधान न्यायाधीश का प्रावधान हटा दिया । अपनी पसंद के मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त चयन करने में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस एक बाधा सरकार के लिए बन सकते थे । इसलिए संसद के शीतकालीन सत्र में दिसंबर, 2023 में केंद्र सरकार ने कानून बनाकर यह प्रावधान हटा दिया, जो सीजेआई के निर्देश पर ही दिया गया था ।

उसके अलावे तीन अन्य एक्ट भी बिना किसी चर्चा के लगभग सभी विपक्षी सदस्य की गैर मौजूदगी में पास किया गया । ये तीन कानून हैं. भारतीय न्याय संहिता(बीएनएस) 2023, भारतीय साक्ष्य संहिता(बीएसए) 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता(बीएनएसएस) 2023, जो 01 जुलाई से लागू होना तय है ।

तृणमूल कांग्रेस(टीएमसी) सुप्रीमो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 18वीं लोकसभा का सत्र शुरू होने से तीन दिन पहले 21 जून को प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस कानूनों पर व्यापक चर्चा कराने का आग्रह किया । ममता बनर्जी(दीदी) ने प्रधानमंत्री को 20.12.2023 की तारीख याद दिलाते हुए लिखा कि किस प्रकार ये सारे बिल उस समय पास किए गए, जब लोकसभा के 100 सदस्य सदन से निलंबित थे और दोनों सदनों के 146 सदस्यों को सदन से बाहर कर दिया गया । दीदी ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि इन कानूनों के कार्यान्वयन पर रोक लगाकर सदन में चर्चा कराएं और समीक्षा करें ।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ममता बनर्जी से मिले । दोनों नेताओं ने गत 10 वर्षों में पास बिलों की समीक्षा और सदन में समन्वय पर चर्चा की ।

इंडिया गठजोड़ के तीन सबसे बड़े घटकों में संसद के दोनों सदनों को मिलाकर कांग्रेस के 125ए तृणमूल कांग्रेस के 42 और समाजवादी पार्टी के 41 सदस्य हैं ।

ममता बनर्जी ने कांग्रेस नेता से मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री को पत्र लिखा । चुनाव से पहले दीदी कांग्रेस के साथ एक मंच साझा नहीं करना चाहती थी । वामदलों को भी ज्यादा तवज्जों देने के पक्ष में नहीं थी । इसलिए भाजपा इंडिया गठजोड़ को चुनौती नहीं मान रही थी । जद(यू) नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इंडिया गठजोड़ के एक घटक राष्ट्रीय जनता दल का साथ छोड़कर वापस भाजपा का दामन थाम चुके थे ।

भाजपा को 2024 आम चुनाव में सरकार बनाने का दावा करने लायक सीटें नहीं मिली । नीतीश कुमार और तेलुगू देसम पार्टी नेता आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू के समर्थन से बहुमत जुटाकर नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली । ये दोनों मौकापरस्त ‘पलटू राम’ के रूप में मशहूर हैं । इसलिए नरेंद्र मोदी का तीसरा कार्यकाल पहले जैसा चलना मुश्किल हैं, जिसे उन्होंने जय श्री राम संबोधन के साथ 60 वर्षों के इतिहास में ‘महान और शानदार’ बताया । 24 जून को संसद सत्र के पहले ही दिन से शुरू गतिरोध में यह बात स्पष्ट उभरी कि भाजपा अभी भी विपक्ष को चुनौती नहीं मानती । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले तो सफाई दी कि सरकार चलाने के लिए बहुमत चाहिए । मगर देश चलाने के लिए सहमति जरूरी होती है । ‘सबका साथ,सबका विकास’ चुनावी नारा को दूसरे राज्य में प्रस्तुत करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘हम सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं । संविधान की मर्यादा का पालन करते हुए निर्णयों को मैं गति देना चाहता हूँ ।’ लेकिन उसके बाद 24.26 जून के बीच प्रोटोम स्पीकर की नियुक्ति और स्पीकर के चुनाव तक जो कुछ हुआ, उससे लगा कि प्रधानमंत्री विपक्ष से उम्मीद करते हैं कि उनके हर निर्णय पर सहमति दे । साथ लेकर चलने के संबोधन में प्रधानमंत्री का फंडा सिर्फ इतना है कि विपक्ष उनकी किसी भी नीति का विरोध न करे । नरेंद्र मोदी को इसीलिए जिम्मेदार विपक्ष तो चाहिए, मगर मजबूत नहीं । इस सोच के कारण सत्र की शुरुआत ही टकराव से हुई और आक्रामक रवैया दोनों पक्षों के बीच चुनाव प्रचार अभियान जैसा देश के मतदाताओं ने देखा । सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ नेताओं ने विपक्षी इंडिया गठजोड़ नेताओं से विचार,विमर्श करके कोई निर्णय लेना जरूरी नहीं समझा । सबमें भाजपा पहले, अन्य दल बाद में वाली नीति अपनायी । प्रधानमंत्री समेत नवनिर्वाचित लोकसभा सदस्यों को सदस्यता की शपथ दिलाने के लिए राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त प्रोटेम स्पीकर भर्तृहरि महताब हाल ही में बीजू जनता दल छोड़कर भाजपा में आए हैं । भाजपा को ओडिशा में कई वर्षों से चली आ रही बीजू जनता दल सरकार को अपदस्थ करने में सफलता मिली है । विपक्ष ने भर्तृहरि महताब के नाम का विरोध करते हुए केरल से 8 बार के सांसद के. सुरेश को वरीयता के आधार पर प्रोटेम स्पीकर बनाने का अनुरोध किया । सत्तापक्ष द्वारा इसे नहीं माने जाने के विरोध में इंडिया गठजोड़ खेमे से नियुक्त के. सुरेश, के टी बाबू और सुदीप बंदोपाध्याय ने शपथ नहीं ली । राष्ट्रपति ने शपथ दिलाने में महताब की सहायता के लिए इन तीनों के अलावे भाजपा के राधामोहन सिंह और फग्गन सिंह कुलस्ते को भी पीठासीन अधिकारी नियुक्त किया था । राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू ने भर्तृहरि महताब को प्रोटेम स्पीकर पद की शपथ दिलायी और फिर महताब ने राधामोहन सिंह तथा फग्गन सिंह कुलस्ते को शपथ दिलायी । लेकिन उस दौरान सदन का माहौल इतना हंगामेदार और अप्रिय प्रसंगों से डूबा रहा, उससे जनता के बीच अच्छा संदेश नहीं गया । विपक्षी सदस्य कांग्रेस के नेतृत्व में संविधान की प्रतियां लहराते हुए सदन में पहुंचे थे । राहुल गांधी ने संविधान हाथ में लेकर सदस्यता की शपथ ली । इसके पीछे की कहानी ये है कि चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के ष्ठस बार 400 पार’ के नारे के जवाब में कांग्रेस नेताओं ने कहा कि अगर भाजपा को इतनी सीटें मिली तो संविधान बदल देगी और आगे चुनाव नहीं होंगे । अगले दिन 25 जून की तारीख ने प्रधानमंत्री को कांग्रेस का मुंह बंद करने का मौका दे दिया । 25 जून, 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमर्जेंसी लगाकर विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया था ।

यह भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय है, यह बात नरेंद्र मोदी ने सही कही । उन्होंने कहा कि 50 साल पहले इसी दिन संविधान कुचल दिया गया था और भारत को जेल खाना बना दिया गया था, इसे नयी पीढ़ी कभी नहीं भूलेगी । इसकी प्रतिक्रिया में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का जवाबी हमला कहीं नहीं ठहरता कि 10 साल से अघोषित इमर्जेंसी को पीएम भूल गए, जिसका देश की जनता ने इस चुनाव में अंत कर दिया है । 26 जून को स्पीकर के चुनाव के दिन भी आपसी खटास हावी रही । ओम बिरला के नाम का भाजपा प्रस्ताव इंडिया गठजोड़ को मंजूर नहीं था । इसका कारण यही था जो ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र में लिखा था । स्पीकर के रूप में ओम बिरला ने दिसंबर, 2023 में बिना चर्चा के सारे बिल पास कराने के लिए 150 विपक्षी सदस्यों को सदन से निलंबित कर दिया । ओम बिरला को दोबारा लोकसभा स्पीकर बनाने के बजाए भाजपा अगर किसी अन्य नेता का नाम इस पद के लिए प्रस्तावित करती तो विपक्ष की नाराजगी टल सकती थी और शायद के. सुरेश के नामांकन की नौबत नहीं आती । ओम बिरला ध्वनिमत से 26 जून को स्पीकर चुन लिए गए । लेकिन यह बात छिपी नहीं रही कि भाजपा ने विपक्ष को टकराने के लिए ललकारा । मत विभाजन पर सदन में विपक्ष के जोर नहीं देने का कारण भाजपा की नजर में इंडिया गठजोड़ की भाजपा गठजोड़ की तुलना में संख्या बल की कमी है । इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस में फिर से मतभेद उभरा । जबकि दोनों सदन में साथ चलने पर सहमत हुए थे । लेकिन विपक्ष ने टकराव टालने की नीति अपनायी, इसे भी खारिज नहीं किया जा सकता । ओम बिरला विपक्ष की आपत्ति समझ रहे थे । इसलिए उन्होंने स्पीकर बनते ही कहा. ष्ठमैं कभी किसी सदस्य के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं चाहता, पर आप भी संसदीय परंपराओं का ख्याल रखें । संसद और सड़क के विरोध में अंतर होना चाहिए ।’ उसके बाद ओम बिरला ने नरेंद्र मोदी की इमर्जेंसी की टिप्पणी को आगे बढ़ाते हुए 25 जून, 1975 की तारीख को संविधान पर हमला बताया और इसकी निंदा प्रस्ताव पढ़ा । फिर स्पीकर ने सदस्यों से मौर रखने कहा । इसका जबर्दश्त विरोध हुआ और राहुल गांधी तथा समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने एक साथ कहा कि विपक्ष की आवाज दबायी नहीं जाए । सदन स्थगित हो गया । नरेंद्र मोदी अगर सही मायने में सबको साथ लेकर सरकार चलाना चाहते तो मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली कांग्रेस गठजोड़ सरकार वाली नीति अपना सकते थे । कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठजोड़ को अन्य दलों के अलावे वाममोर्चा सदस्यों का भी समर्थ लेकर बहुमत जुटाना पड़ा था । इसके एवज में स्पीकर का पद सीपीएम के वरिष्ठ नेता सोमनाथ चटर्जी को दिया । अमेरिका से परमाणु करार के मुद्दे पर जब वाममोर्चा ने सरकार से समर्थन वापस लिया तो सोमनाथ चटर्जी पर इस्तीफे का दवाब बनाया । लेकन सोमनाथ चटर्जी ने साफ कह दिया. ष्ठमैं अब लोकसभा स्पीकर हूँ किसी पार्टी का आदमी नहीं ।’ भाजपा अगर स्पीकर का पद अपने दुलमुल सहयोगी तेलुगू देसम पार्टी या जनता दल(यू) को दे देती तो फिर से एक स्वस्थ परंपरा कायम होती और विपक्षी गठजोड़ शायद उसका विरोध नहीं करता । डिप्टी स्पीकर के पद के लिए भी दोनों पक्षों में सहमति बन जाती, जो शर्त कांग्रेस ने ओम बिरला को समर्थन देने के लिए रखी । 03 जुलाई तक चलनेवाले इस सत्र में नीट.यूजीसी विवाद हर हंगामा तो जारी रहना ही है । न्याय संहिताओं का भी मामला उठ सकता है ।

सरकार के लिए विपक्ष की अनदेखी कठिन तब होगी, जब 22 जुलाई से संसद का मानसून सत्र चलेगा । उस समय तक सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त नियुक्ति एक्ट को चुनौती देनेवाली याचिका पर सुनवाई शुरू हो जाएगी । अर्जुन मेघवाल को फिर से कानून मंत्री बनाया गया है । 21.12.2023 को यह बिल पास कराने के समय कानून मंत्री मेघवाल ने ऐसे सफाई दी मानो भारत के प्रधान न्यायाधीश(सीजेआई) ने ही ऐसा कानून बनाने कहा हो, जिसमें चयन पैनल से सीजेआई को हटाकर उनकी जगह किसी केंद्रीय मंत्री को रखा जाए । कोर्ट जजों की संविधान पीठ ने 02 मार्च, 2023 को सरकार को निर्देश दिया कि सीईसी(मुख्य चुनाव आयुक्त) और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कानून बनाए और कानून बनने तक पीएम की अध्यक्षतावाली चयन समिति ये नियुक्तियां करे, जिसमें सीजेआई तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता हों । सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में दायर एक याचिका पर यह फैसला सुनाया, जिसमें सीईसी और चुनाव आयोग की नियुक्तियों के लिए भी अन्य संवैधानिक संस्थाओं की तरह पैनल की मांग की गयी । सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सरकारी संस्थाओं की तरह होती रही है । भाजपा सरकार ने यह सिलसिला जारी रखने का इंतजाम लगाते हुए कानून बनाकर पैनल से सीजेआई का प्रावधान हटा दिया । उसके आधार पर आम चुनाव कार्यक्रम के एलान से एक दिन पहले दो चुनाव आयुक्तों. ज्ञानेश कुमार और सुखवीर सिंह संधू की नियुक्ति सरकार ने कर डाली । पैनल की बैठक में पीम नरेंद्र मोदी के अलावे गृहमंत्री अमित शाह शामिल हुए । विपक्ष के नेता की जगह उस समय लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधुरी की परवाह नहीं की गयी । इस एक्ट को चुनौती देनेवाली याचिका पर सुनवाई के क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव को देखते हुए इन नियुक्तियों पर रोक से इन्कार कर दिया, मगर सुनवाई के लिए तैयार हो गयी ।

सुनवाई करनेवाली सुप्रीम कोर्ट पीठ के अध्यक्ष चीफ जस्टिस डी. वाई. चन्द्रचूड़ हैं, जिनका कार्यकाल 10 नवंबर, 2024 तक है । इसलिए सुनवाई तेजी से होगी । वर्तमान सीईसी राजीव कुमार का कार्यकाल फरवरी, 2025 में समाप्त होगा । उस समय तक सरकार को सुप्रीम कोर्ट और लोक सभा में विपक्ष के नेता से निबटना आसान नहीं होगा ।