17वीं लोकसभा के लिए मतदान प्रक्रिया समाप्त होने के दिन तक राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच चुनाव आचारसंहिता उल्लंघन के आरोप-प्रत्यारोप और चुनाव आयोग के पास उसकी शिकायतों ने आदर्श / मोडल की धज्जियां उड़ा दी । इतने घटिया और निम्न स्तर पर छींटाकशी और एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने का सिलसिला चला कि चुनाव आचार संहिता में से आदर्श का तो नामो-निशान ही मिट गया । पहले के किसो लोकसभा चुनाव में ऐसा नहीं दखा गया था । 19 अप्रील को चुनाव प्रक्रिया के अंतिम दिन से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव प्रचार की समय-सीमा समाप्त होते ही चल दिए बदरीनाथ-केदारनाथ । इधर चुनाव आयोग के अंदर नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को आदर्श चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के मामले में क्लीन चिट देने पर विवाद खड़ा हो गया । इस मौके का राजनीतिक फायदा उठाने में सबसे आगे नजर जाए तेलुगू देसम पार्टी अध्यक्ष आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस । दोनों पार्टियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बदरीनाथ - केदारनाथ तीर्थयात्रा को आदर्श चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन बताकर चुनाव आयोग के पास इसकी शिकायत दर्ज करायी । उधर भाजपा ने चुनाव आयोग से कहा कि आदर्श चुनाव आचार संहिता की समय-सीमा समाप्त होने तक पश्चिम बंगाल में केंद्रीय बलों की तैनात कायम रखी जाए । बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा-तृणमूल कांग्रेस के बीच हिंसक झड़पों के कारण चुनाव आयोग ने चुनाव प्रचार पर समय-सीमा समाप्त होने से एक दिन पहले ही रोक लगा दी । प्रबल भाजपा विरोधियों में चन्द्रबाबू नायडू 18 और 19 मई को दिल्ली में सबसे ज्यादा सक्रिय देखे गए । वोटों की गिनती से पहले ही नायडू कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष शरद पवार, सीपीआई नेता सुधाकर रेड्डी और डी. राजा से मिलकर गैर-भाजपा गठजोड़ सरकार गठन में जुट गए । नायडू ने महागठबंधन घटक समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, बहुजन समाज पार्टी की मायावती समेत विभिन्न नेताओं से मैराथन मुलाकातें 18 अप्रील को मतदान प्रक्रिया समाप्त होने से एक दिन पहले ही कर डाली । चुनाव परिणाम का इंतजार किए बिना ही नायडू के नेतृत्व में भाजपा विरोधी गठबंधन नेताओं में सत्तापलट की बड़ी व्यग्रता देखी गयी । यहां तक सुनने में आया कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के पास भी चुनाव परिणाम आने से पहले ही एप्रोज करने की तैयारी थी कि भाजपा को सरकार बनाने का न्योता देने में जल्दबाजी न करें ।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को भाजपा की भोपाल से उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने ‘देशभक्त’ कहा । 1981 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए सिख-विरोधी दंगे पर कांग्रेस नेता सैम पित्रोदा ने बयान दिया ‘हुआ तो हुआ’ । प्रज्ञा सिंह ठाकुर की छवि मालेगांव बम विस्फोट की सजायाप्ता अभियुक्त होने के कारण हिंदू आतंकवादी के रूप में बनी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ‘मैं प्रज्ञा ठाकुर को माफ नहीं करूंगा’ । कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कहा कि सैम पित्रोदा देश के सामने माफी मांगे । सैम पित्रोदा का बयान जैसे प्रायः नेताओं की जवान फिसलती है, उस कोटि में रखा जा सकता है । क्योंकि बात वहीं खतम हो गयी । लेकिन महात्मा गांधी के हत्यारे को ‘देशभक्त’ बतानेवाला बयान नियोजित जैसा था । क्योंकि साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के अलावे भाजपा के पूर्वमंत्री कर्नाटक के अनंत कुमार हेगड़े और कर्नाटक से ही भाजपा सांसद नलिन कुंमार कतील भी ऐसे बयान को लेकर विवाद के घेरे में आए ।
महात्मा गांधी के साथ-साथ जिन्ना के भी ‘जिन्न’ को जिंदा करने का प्रयास किया गया । कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी को ‘भारतीय जिन्ना पार्टी’ बताया । यह बयान भाजपा के रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट से उम्मीदवार गुमान सिंह दामारे के विवादित चुनाव भाषण के जवाब में आया । गुमान सिंह दामारे ने दावा किया कि जवाहर लाल नेहरू अगर मोहम्मद अली जिन्ना को प्रथम प्रधानमंत्री बनने देते तो विभाजन टाला जा सकता था । यह विवाद तब सुर्खियों में आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने उम्मीदवार के समर्थन में चुनाव प्रचार करने रतलाम गए । उसके बाद कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने भाजपा को ‘भारतीय जिन्ना पार्टी’ कहा । यह विवाद उत्तर प्रदेश तक पहुंचा, जहां भाजपा की सरकार है । उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने कांग्रेस का केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के साथ गठजोड़ से जोड़कर कहा कि यह विभाजन से पहले जिन्ना की मुस्लिम लीग का हिस्सा है ।
यह सब चुनाव प्रचार के अंतिम दिन तक 17 मई को व्यापक चर्चा का विषय बना रहा । बहरहाल चुनाव आयोग ने ऐसे बयानों से खुद को अलग रखकर राजनीतिक दलों को ही आपस में निबटने छोड़ दिया ।
लेकिन मतदान के अंतिम दिन 19 मई को जिन बातों को लेकर चुनाव आयोग के अंदर विवाद छिड़ गया, वो था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीधे जुड़ा आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन । मुख्य चुनाव आयुक्त(सीईसी) सुनील अरोड़ा और अशोक लवासा के बीच इस बात को लेकर मतभेद खुलकर सामने आ गया । मामला था, प्रधानमंत्री कार्यालय और नीति आयोग की कुछ विवादित कार्यों का आदर्श चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के दायरे में आना और सीईसी सुनील अरोड़ा का क्लीन चिट देना, जबकि चुनाव आयोग टीम के दूसरे चुनाव आयुक्त अशोल लवासा उससे सहमत नहीं थे । 19 मई की सुबह अखबारों का प्रथम पृष्ठ मतदान के अंतिम चरण पूरा करने जा रहे मतदाताओं को बड़ा रोचक लगा । प्रधानमंत्री और अमित शाह को आचार संहिता उल्लंघन के मामले में क्लीन चिट देने को लेकर चुनाव आयोग के अंदर उभरा विवाद प्रमुखता से छपा दिखा । साथ में यह खबर भी टीवी चैनलों से अलग हटकर छपी नजर आयी कि नरेंद्र मोदी ने अपनी वाराणसी सीट ‘राम भरोसे’ छोड़कर 18 अप्रील की रात केदारनाथ में हिमालय की 11,700 फीट ऊंचाई पर ध्यानवाली गुफा में गुजारी ।
19 मई को जिस तरह चन्द्रबाबू नायडू ने प्रधानमंत्री की केदारनाथ यात्रा पर सवाल उठाकर चुनाव आयोग के पास आचारसंहिता उल्लंघन की शिकायत की, ठीक वैसे ही भाजपा ने मायावती के खिलाफ शिकायत की लेकिन चुनाव आयोग के अंदर-बाहर विवाद मुख्य रूप से नरेंद्र मोदी, अमित शाह के आचारसंहिता उल्लंघन मामले में चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर उठा । इस विवाद में नरेंद्र मोदी पर बनी बॉयोपिक नमो टीवी भी शामिल है । जिसके प्रदर्शन को लेकर निर्माता सुप्रीम कोर्ट तक गए ।
नीति आयोग और प्रधानमंत्री कार्यालय के कथित रूप से मोडल आचार संहिता उल्लंघन को लेकर विवाद मई पूरे महीने तक चला । प्रधानमंत्री की चुनाव रैलियों से पहले गोंडिया, वर्धा और लातुर से सूचना एकत्र करने के लिए नीति आयोग का इस्तेमाल प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा किया गया । इसकी शिकायत कांग्रेस ने चुनाव आयोग से की । इस संबंध में नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत से चुनाव आयोग ने जवाब मांगा और उससे संतुष्ट होकर उप चुनाव आयुक्त संदीप सक्सेना ने 12 मई को नीति आयोग के क्लीन चिट दे दी । लेकिन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा इससे संतुष्ट नहीं थे वे अमिताभ कांत से और भी सफाई चाहते थे । अशोक लवासा की असहमति का कारण मोडल आचार संहिता उल्लंघन के विभिन्न मामलों में अमित शाह और प्रधानमंत्री के खिलाफ मिली पांच शिकायतों में चार सीधे नरेंद्र मोदी से जुड़े थे । सबमें चुनाव आयोग ने क्लीन चिट दे दी ।
पहली बात तो ये कि चुनाव आचार संहिता में मोडल ही अपने-आप में एक तमाशा के सिवाए और कुछ नहीं है । मॉडल चुनाव आयोग का अपना फितूर है, जिसका कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है । चुनाव आयोग ने खुद चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के समय 15 अप्रील को सुप्रीम कोर्ट में स्वीकारा कि जात, धर्म या अन्य मामलों में वोट बटोरने के लिए विवादित बयान देनेवाले राजनीतिज्ञों को अनुशंसित करने के उसके अधिकार ‘बहुत सीमित’ हैं ।
सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे माना जब नरेंद्र मोदी पर बनी बायोपिक रिलीज करने का मामला चुनाव आयोग से निकलकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनाव आयोग के कड़े तेवर से असहमति जतायी । चुनाव में मॉडल आचारसंहिता के उल्लंघन को लेकर इतना हंगामा पहले के किसी लोकसभा चुनाव में नहीं हुआ ।
किस नेता के खिलाफ चुनाव आचारसंहिता उल्लंघन की शिकायत के निबटारे में क्या मॉडल चुनाव आयोग अपनाता है, इसका कोई निर्धारित संवैधानिक मानदंड ही तय नहीं है । इसलिए सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के उम्मीदवार खुली धज्जियां उड़ाते हैं । विवाद इसलिए उठा क्योंकि चुनाव आयोग प्रधानमंत्री के मामले में नरम पड़ा, जो संवैधानिक संस्था से अपेक्षा नहीं की जाती ।