वाममोर्चा के ‘बिग ब्रदर’ सीपीएम(मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी) के हैदराबाद में आयोजित 22वें राष्ट्रीय सम्मेलन की शुरूआत और समाप्ति इसी उठापटक से हुई कि कांग्रेस से कोई चुनावी गठजोड़ रखा जाए या नहीं । नौबत यहां तक आ गयी कि पार्टी के वर्तमान महासचिव सीताराम येचुरी और पूर्व महासचिव प्रकाश करात इसी मुद्दे को लेकर अपनी औकात आजमाने में जुटे रहे । देशभर से जुटे सारे पोलित ब्यूरो सदस्य कांग्रेस से गठजोड़ वाले बिंदु पर दो फाड़ हो गए ।
झमेला तो 2019 लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस से गठजोड़ को लेकर चला । मगर अभी पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव होने हैं, कांग्रेस वामदलों की एकजुटता में बाधक बनेगी। यह सिलसिला तो कई दशकों से चला आ रहा है और सीपीएम के ‘बिग ब्रदर’ वाली जिस दबंगई नीति के चलते वामदल एकजुटता की बातचीत के दौरान ही बिखरी हालत में वापस आ जाते हैं, उसकी कील कांग्रेस ही है । सीपीएम के अंदर अभी जो घमासान कांग्रेस गठजोड़ मुद्दे पर हुआ, उसकी पृष्ठभूमि 2016 में पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में करारी हार के बाद से ही तैयार हो रही थी । दो पोलित ब्यूरो और केंद्रीय कमिटी बैठकों में यही रस्साकसी चली । क्योंकि वोट बंटने का लाभ कांग्रेस को मिला ।
वामदलों की झुंझलाहट का कारण ये है कि इसके अंतिम निर्णय लेनेवाले पोलित ब्यूरो नेता जनता और जमीन से कट चुके हैं । पैर उखड़ जाने के कारण आम मतदाताओं को इनकी पोलित ब्यूरो राजनीति समझ में नहीं आती । हाशिए पर आ जाने के बाद कम्यूनिस्ट नेता अवाम द्वारा लगातार नकारे जाने का कारण दूसरी पार्टियों में खोजते हैं । यही वजह है कि कांग्रेस से गठजोड़ करना / न करना ही वामदलों की वोटनीति तय करता है, जबकि दल के पास वोट है नहीं । इससे जनता के बीच दिग्भ्रमित संदेश अखबारों और मीडिया चैनलों के जरिए पहुंचता है । क्योंकि इसके नेता अपना जनाधार तैयार करने खुद जनता के बीच नहीं जाते ।
अभी हैदराबाद से पांच दिनों के सम्मेलन की जो रिपोर्ट आयी है उससे आम गरीब-गुरबा को कोई दिलचस्पी नहीं है, जिनके बीच वामदलों की सबसे गहरी पैठ थी । ऐसे साक्षर वोटर पूछ रहे हैं - ‘ये कौन हैं प्रकाश करात और सीताराम येचुरी, क्या हैं, एमपी हैं या एमएलए, इन दोनों ने कभी लोकसभा या विधान सभा चुनाव जीता है? कभी किसी चुनाव में खड़े होने की बात तो नहीं सुनी ।’
ऐसे वोटरों ने नहीं समझा कि प्रकाश करात द्वारा तैयार किया गया ‘कांग्रेस से कोई तालमेल नहीं’ वाला ड्राफ्ट प्रस्ताव नहीं मानने की कौन-सी विवशता थी? दोबारा तीन साल के लिए महासचिव चुने गए सीताराम येचुरी ने ‘कांग्रेस से कोई तालमेल नहीं,’ वाला बिंदु हटाकर जो कुछ जोड़ा उसका क्या मतलब है? - वो तालमेल होगा या ‘घालमेल’? प्रकाश करात ने जनवरी में पार्टी केंद्रीय कमिटी की बैठक में ही यह मसौदा तैयार किया था और ज्यादातर सदस्यों ने समर्थन किया था । लेकिन सीताराम येचुरी कांग्रेस से गठजोड़ कायम रखने के पक्ष में थे । दोनों में ऐसी सीधी रार देखने को मिली कि प्रकाश करात ने सम्मेलन के पहले ही दिन 19 अप्रैल को ‘कांग्रेस से तालमेल नहीं’ वाला प्रस्ताव का मसौदा पेश कर दिया । यह भी सुनने में आया कि शायद करात सीताराम येचुरी को फिर से महासचिव न बनने देने की मुहिम चलाएं । कई सदस्यों ने इस बिंदु पर पार्टी का रवैया तय करने के लिए गुप्त मतदान तक की मांग कर डाली । सीताराम येचूरी सर्वसम्मति के पक्ष में थे । दोनों खेमों की भिड़न्त में येचुरी जीते । येचुरी ने ‘आश्वस्त’ करने के लिए बयान दिया - ‘कांग्रेस से राजनीतिक गठजोड़ नहीं होगा, मगर चुनावी तालमेल होगा ।’
सीताराम येचुरी और उनके समर्थकों के अनुसार भाजपा और ‘सांप्रदायिक फासीवादी’ ताकतों को 2019 लोकसभा चुनाव में हराने के लिए ऐसा करना जरूरी है । सम्मेलन में भाग लेने विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों में मात्र दो ही राज्यों का रूख स्पष्ट हुआ । पश्चिम बंगाल से आए प्रतिनिधि येचुरी के साथ थे और केरल से आए प्रतिनिधि प्रकाश करात का समर्थन कर रहे थे । सीपीएम के मजबूत और पुराने गढ़ केरल तथा बंगाल विधान सभा चुनाव के समय ही पोलित ब्यूरो नेता दिग्भ्रमित स्थिति में थे । पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को हराने के लिए विपक्षी सीपीएम के नेतृत्ववाली वाममोर्चा को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी समेत शीर्ष कांग्रेस नेताओं का साथ देना था । केरल में सत्तारूढ़ कांग्रेस नीत संयुक्त मोर्चा सरकार को हराने के लिए राहुल गांधी का विरोध करना था । पश्चिम बंगाल में कई नेताओं ने इसे आत्मघाती नीति बताया और सीटों के बंटवारे को लेकर अंत-अंत तक सीपीएम और वाममोर्चा के अंदर खींचातानी जारी रही । उतना ही नहीं, उसके बाद से सीपीएम की आपसी बैठक समेत वाम एकता की भी तमाम बैठकी में कांग्रेस के साथ यही मौका और मतलब के हिसाब से राजनीतिक सांठगांठ तय करने की सत्तानीति हावी रही । इसलिए वाम एकता लगातार खंडित चल रही है और अब सीपीएम के अंदर ही फूट पड़ी हुई है । उसका एकमात्र कारण है कांग्रेस । अभी हालत ये है कि कांग्रेस से गठजोड़ बिना वाम दलों को अपना ठौर-ठिकाना ढूंढने का संकट है, वजूद कायम रखना कठिन है ।
वामदलों ने हमेशा जनसरोकार से ज्यादा कांग्रेस सरकारों से चिपके रहने को ज्यादा तवज्जो दी । जनता वामदलों के साथ थी, वामदलों ने जनता का साथ नहीं दिया । अभी केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार के बारे में जितने विपक्षी दल इमर्जेंसी वाली नीतियों का आरोप लगा रहे हैं, उनमें वामदल भी हैं। हो सकता है, उनका आरोप सही हो । जनता इसे स्वीकार करे, उसके पहले वामदलों के एक मजबूत घटक सीपीआई(भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी) को 1974 के जनान्दोलन और इमर्जेंसी में अपना रवैया याद कर लेना चाहिए । जे पी आंदोलन राष्ट्रीय जनान्दोलन था, लेकिन सीपीआई ने उसका विरोध किया । सीपीआई ने जनहित से ज्यादा अपने हित को महत्व दिया । 1975 से 77 तक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा जनान्दोलन के दमन के लिए लगायी गयी इमर्जेंसी का सीपीआई ने समर्थन किया । സിപിएम नेता ज्योति बसु जे पी आंदोलन के साथ थे । 1977 में पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को अपदस्थ करके ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने । केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद काफी समय तक सीपीआई के अंदर मंथन होता रहा कि इमर्जेंसी का समर्थन करना और जे पी आंदोलन का विरोध करना सही था या नहीं ।
30 मार्च, 1978 को भटिंडा में आयोजित सीपीआई राष्ट्रीय परिषद सम्मेलन में सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव में कहा गया - ‘इमर्जेंसी का समर्थन करना बहुत बड़ी भूल थी ।’ लेकिन साथ में यह भी दावा किया गया कि जे पी आंदोलन का विरोध सही था । लेकिन सीपीआई अध्यक्ष एस. ए. डांगे ने जोर देकर कहा कि इमर्जेंसी का समर्थन सही था ।
सीपीआई 1969 से ही कांग्रेस-कम्यूनिस्ट एकता की दुहाई देकर कांग्रेस का पुछल्ला छोड़ना नहीं चाहती । जे पी आंदोलन से पहले जनसंघ का कोई राष्ट्रीय जनाधार नहीं था । जे पी आंदोलन से जुड़कर जनसंघ को पहली बार केंद्र में सत्ता में आने का अवसर मिला । आज वही जनसंघ भारतीय जनता पार्टी के रूप में केंद्र में प्रचंड बहुमत से सत्ता में है और राज्यों में भी सभी गैर-भाजपा सरकारों को अपदस्थ करने पर आमादा है ।
वामदलों ने देश में ऐसी क्रांति की शुरूआत की, जिससे जुड़कर समाज का हर कमजोर वर्ग अपने को मजबूत महसूस करता था । लेकिन वामदलों ने इसे महसूस नहीं किया । वामदलों के नेताओं ने अपने गांव के मजदूर किसानों की समस्या के खिलाफ आंदोलन खड़ा करके जनाधार बनाया और उसका लाभ कांग्रेस को पहुंचाने का इंतजाम भी लगाया । हमेशा अपने देश की नीति रूस और चीन के हिसाब से तय किया और कांग्रेस से सत्ता गठजोड़ करने को लालायित रहे ।
प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के ही समय से कांग्रेस की नीति वामदलों को आपस में फोड़कर पिछलग्गू बनाने की रही है, ताकि वे कांग्रेस के लिए मजबूत विपक्ष न बन सकें । उस नीति में इंदिरा गांधी ने इजाफा किया ।
2008 में मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली कांग्रेस गठजोड़ सरकार से वामदलों का समर्थन वापस लेने का कारण आम जनता आज तक नहीं समझ पायी । अमेरिका से परमाणु करार होना गलत क्यों था और रूस से अगर होता तो कैसे सही होता ।
मतदाताओं पर अपना मतलबी सोच थोपने का खामियाजा वामदल भुगत रहे हैं । भाजपा का कांग्रेस का मजबूत विपक्ष बनना और फिर प्रचंड बहुमत हासिल करके कांग्रेस को कमजोर विपक्ष बनाने के लिए वामदल भी जिम्मेदार हैं । अभेद्य किला त्रिपुरा हाथ से चला गया, जहां कांग्रेस विपक्ष में थी, भाजपा कहीं नहीं थी । पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी कांग्रेस और भाजपा दोनों ही गठजोड़ों में शामिल होकर वामदलों को जड़ से उखाड़ने में जुटी रही । वामदल ममता बनर्जी को कमजोर समझकर कांग्रेस के साथ सत्ता में भागीदारी और विपक्षी दोनों का अवसरवादी खेल खेलते रहे । 2011 में वाममोर्चा की 1977 से चली आ रही सरकार ममता बनर्जी ने गिराया और उसके बाद से वाममोर्चा गिरते जा रहे हैं । वाममोर्चा से गठजोड़ का कांग्रेस ने फायदा उठाया है और भाजपा जमीन तैयार कर रही है ।
ममता बनर्जी ने अब भाजपा से लड़ने के लिए कांग्रेस की तरफ मुड़ने के संकेत दिए हैं । कांग्रेस ममता को ज्यादा तवज्जो देगी, ऐसे में सीपीएम के हाथ क्या और कितना लगेगा, इसका अन्दाजा सीताराम येचुरी को होगा ही ।
फरवरी, 1967 में बंगाल में पहली गैर-कांग्रेसी कम्यूनिस्ट मोर्चा सरकार बनी, जिसे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नक्सल सफाया के नाम पर एक साल भी ठीक से नहीं चलने दिया । मार्च, 1968 में बर्खास्त करके बार-बार राष्ट्रपति शासन लगाने और हटाने का सिलसिला चला, ताकि कांग्रेस के हाथ में नेतृत्व हो और कम्यूनिस्ट पिछलग्गू बने रहें ।
सीधे जमीन से जुड़ी जंग में बार-बार पिटने के बाद सीपीएम ने टेढ़ी आकाशी लड़ाई छेड़ी है । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस दीपक मिश्र के खिलाफ महाभियोग का पहला आइडिया सीताराम येचुरी का है । कांग्रेस के साथ जुगलबंदी से इस ‘आइडिया’ को मीडिया उछाल मिला, जिसकी बदौलत सीपीएम की राजनीति चल रही है ।