हाशिए पर जाते वाम दलों में अन्य के मुकाबले बेहतर स्थिति वाली सीपीएम(मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) उन कारणों की तलाश में जुट गयी है कि अवाम के बीच उसकी पहुंच क्यों कम हो गयी और जनाधार क्यों घटता जा रहा है ।

सीपीएम की हाल में मदुरई में संपन्न 24वीं कांग्रेस में निर्वाचित नए महासचिव एम. ए. बेबी ने दायित्व ग्रहण करते ही कहा कि पार्टी इस बात का आत्मनिरीक्षण करेगी कि अवाम से कटती क्यों जा रही है और आम लोगों से जुड़ने की कोशिश में जुटेगी ।

पार्टी सम्मेलन शुरू होने से पहले पूर्व सीपीएम महासचिव प्रकाश करात ने इस बात पर बल दिया कि पार्टी इंडिया गठजोड़ घटकों को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की स्वतंत्र पहचान खतम करने की इजाजत नहीं देगी । उनका सीधा प्रहार कांग्रेस और तमिलनाडु में सत्तारूढ़ द्रमुक मुख्यमंत्री एम. के. स्टालीन पर था । कांग्रेस की पहल पर भाजपा के खिलाफ एकजुट के लिए बने विपक्षी गठजोड़ ‘इंडिया’ में शामिल क्षेत्रीय दलों में मजबूत घटक है- द्रमुक(डीएमके) । सीपीएम के अखबार पीपुल्स डेमोक्रेसी में प्रकाश करात ने कहा कि 02 अप्रैल से 06 अप्रैल के बीच आयोजित सम्मेलन में इसी बात पर विचार होगा कि पार्टी की स्वतंत्र शक्ति और पहचान बढ़ाने के लिए क्या-क्या किया जाए । इंडिया गठजोड़ में सीपीएम की लगभग कांग्रेस की पिछलग्गू वाली पहचान से क्षुब्ध प्रकाश करात ने अपनी नाराजगी मुख्य रूप से कांग्रेस पर सीधा निशाना लगाकर उतारी । लेकिन साथ में डीएमके को भी लपेटा ।

वाममोर्चा में सिर्फ सीपीएम बची है, जिसकी हैसियत बची है और वो भी केरल को लेकर । केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा का नेतृत्व सीपीएम के हाथ में है और पिनारायी विजयन दूसरी बार लगातार मुख्यमंत्री बने हैं । 2026 में उन्हें पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के साथ विधान सभा चुनाव का सामना करना है । भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी (सीपीआई) वाम मोर्चा का नंबर 2 दल है, जिसका सिर्फ कहने भर के लिए अस्तित्व बचा है । केरल में वाम मोर्चा का सीधा मुकाबला कांग्रेस से है, जो वहां मुख्य विपक्षी दल है । पश्चिम बंगाल में 37 वर्ष राज कर चुकी सीपीएम के नेतृत्ववाला वाम मोर्चा और कांग्रेस दोनों को दुहरे मुकाबले से जूझना है । गत वर्ष के लोकसभा चुनाव की तरह 2026 विधान सभा चुनाव में वाम मोर्चा और कांग्रेस दोनों को पश्चिम बंगाल में एक ही साथ सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस तथा मुख्य विपक्षी दल भाजपा से भिड़ना होगा । तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) का लगातार तीसरा कार्यकाल चल रहा है । दीदी ने खुद को कभी भी ‘इंडिया’ गठजोड़ का ऐसा घटक नहीं माना, जिसका संयोजन/नेतृत्व कांग्रेस के हाथ में हो ।

लोकसभा चुनाव से पहले बनी संयुक्त विपक्षी मंच इंडिया गठजोड़ से दीदी ने शुरू से ही दूरी बना रखी है । ममता बनर्जी सीपीएम और सीपीआई के साथ भी नहीं बैठ सकती । क्योंकि 2011 में सत्तारूढ़ वाम मोर्चा को ही अपदस्थ करके तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आयी है । 2021 विधान सभा चुनाव परिणाम के बाद सीपीएम की जगह पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी दल भाजपा हो गयी ।

31.03.2025 को दीदी ने ईद रैली संबोधन में कहा कि राम(भाजपा) और वाम दंगा भड़काना चाहते हैं।

लोकसभा चुनाव 2024 में कांग्रेस की सीटों में भारी उछाल आया और यह सबसे ज्यादा सीटें जीतनेवाली पार्टी बनी । 2019 आम चुनाव में कांग्रेस को इतनी भी सीटें नहीं मिली कि सदन में विपक्षी पार्टी का दर्जा मिले । आज वामदलों को सदन के अंदर और बाहर कांग्रेस के साथ चलने की विवशता है । दूसरी तरफ केरल की फांस है, जो सीपीएम के लिए कांग्रेस के अनुसार चलकर भाजपा से मुकाबले में बाधक है ।

केरल के मामले में कांग्रेस की रणनीति वामदलों से अन्य राज्यों के लिए इंडिया गठजोड़ धर्म निभाने वाली नहीं है । कांग्रेस का पहला लक्ष्य है, 2026 विधान सभा चुनाव में वाम मोर्चा को लगातार तीसरी बार सत्ता में न आने देना । 2021 से पहले दोनों मोर्चा में से कोई भी लगातार दूसरी बार सत्ता में नहीं आती थी । मतदाता बारी-बारी से दोनों को सत्ता में लाते और हराते थे । अभी मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन अपनी पार्टी में ही उनके प्रति बढ़ते असंतोष से उबर नहीं पा रहे हैं । भ्रष्टाचार समेत कई आरोपों से घिरे मुख्यमंत्री के खिलाफ पार्टी के अंदर और घटक सीपीआई के लोग आवाज उठा रहे हैं ।

इसके बावजूद सीपीएम के अधिवेशन(कांग्रेस) में पहले दिन 02 अप्रैल को ही मदुरई में जुटे कामरेडों ने इस बात पर मुहर लगा दी कि केरल में 2026 विधान सभा चुनाव मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन के ही नेतृत्व में पार्टी लड़ेगी ।

एक महीना पहले 03 मार्च को सीपीएम के केरल सम्मेलन में राज्य के और बाहर से आए प्रतिनिधि ने वाम एकता पर बल दिया ।

तमिलनाडु में डीएमके बेशक वाम दलों से ज्यादा कांग्रेस को महत्त्व देती है । लेकिन वाम को नाराज नहीं करना चाहती । मदुरई में जब सीपीएम का सम्मेलन शुरू हुआ, उसी समय एम. के. स्टालीन ने तमिलनाडु विधान सभा में नियम के तहत एलान किया कि चेन्नई में कार्ल मार्क्स की मूर्ति स्थापित की जायेगी । उन्होंने अपनी सरकार को द्रविड़ मोडल की बताते हुए सर्वाधिक प्रचलित कम्युनिस्ट नारा. ‘दुनिया के मजदूरो एक हो’ दुहराया । उसके साथ-साथ मुख्यमंत्री ने एक वाम घटक ऑल इंडिया फारवर्ड ब्लॉक के पुराने नेता पी. के. मूकिया थेवर की मूर्ति मदुरई में ही स्थापित करने की घोषणा की । वामदलों का पुराना आधार ट्रेड यूनियन रहा है । सीपीएम से संबद्ध ट्रेड यूनियन सीटू (CITU) ने हाल ही में कांचीपुरम में सैमसंग के मजदूरों को यूनियन अधिकारों की लड़ाई जीती है ।

सीपीएम का प्रस्ताव लगभग 6 महीने से चर्चा में था । महासचिव सीताराम येचूरी की सितंबर, 2024 में मृत्यु से पहले ही अधिवेशन की जगह और तारीख तय हो गयी थी । प्रकाश करात उस समय से पार्टी ‘कोऑर्डिनेटर’ के रूप में काम कर रहे थे ।

एम. ए. बेबी सीपीएम महासचिव बननेवाले ई. एम. एस. नंबुदिरीपाद के बाद केरल के दूसरे नेता हैं, जिनका चुनाव लड़ने और आम मतदाताओं से सीधा वास्ता रखने का अनुभव रहा है । सीपीएम के अवाम से कटते जाने का एक प्रमुख कारण है सारे निर्णय लेनेवाली पार्टी की एलीट पोलित ब्यूरो । इसके ज्यादातर सदस्य वही रहे हैं, जिनकी वैसे किसान, मजदूर, दलित तबके के बीच पकड़ नहीं है, जो सबसे ज्यादा संख्या में जुटकर वोट डालते हैं । काफी समय से जेएनयू ब्रांड पोलित ब्यूरो सदस्य महासचिव बन रहे हैं, जो आम मतदाताओं की नब्ज मीडिया के जरिए टटोलते हैं । पार्टी पोलित ब्यूरो में फेरबदल के साथ-साथ सीपीएम ने इंडिया गठजोड़ की मजबूती और अवाम तक पहुंच दोनों को अहमियत दी ।

सीपीएम अधिवेशन समाप्त होने के बाद 08 और 09 अप्रैल को गुजरात में कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक चली । 64 वर्षों बाद अहमदाबाद में आयोजित इस सम्मेलन में कांग्रेस में संगठनात्मक ढांचा मजबूत करने के उपाय मुख्य रूप से गुजरात पर केंद्रित थे, जहां कांग्रेस को भाजपा 30 वर्षों से सत्ता में आने नहीं दे रही है । इस सम्मेलन में इंडिया गठजोड़ पर कोई चर्चा नहीं हुई । कांग्रेस के विषय में आम चर्चा होती है कि यह मुट्ठी भर नेताओं द्वारा ड्राइंग रूम में बैठकर चुनावी निर्णय लेनेवाली पार्टी हो गयी है । वही फैसला जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं तक आलाकमान के आदेश के रूप में जाता है, जिसके नेता कार्यकर्ताओं से बात करके कोई फीडबैक लेना जरूरी नहीं समझते ।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा का लाभ कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में मिला । चुनाव परिणाम के बाद कांग्रेस का सुर बदल गया, जो हाल में दिल्ली विधान सभा चुनाव में देखने को मिला । कांग्रेस ने अगर विधान सभा चुनाव की जमीनी सच को समझा होता तो आम आदमी पार्टी इंडिया गठजोड़ का हिस्सा बनी रहती और भाजपा को बहुमत में शिकस्त देने लायक सीटें जीत सकती थी । कांग्रेस का फिर से सफाया हो गया ।

अभी नवंबर, 2025 में बिहार विधान सभा चुनाव है । विपक्षी महागठबंधन का चुनावी तालमेल बैठकों का सिलसिला जारी है । अगर कांग्रेस ने तौर-तरीका नहीं बदल तो ज्यादा नुकसान उसी को उठाना होगा । वाम दलों की निचले तबके के बीच कांग्रेस से बेहतर पकड़ है । राष्ट्रीय जनता दल की तरह कांग्रेस के पास जनाधार वाला नहीं है ।

इसी बीच महाराष्ट्र में विपक्षी महाविकास आघाड़ी के घटक उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने कांग्रेस से जानना चाहा है कि लोकसभा चुनाव के समय अस्तित्व में आया इंडिया गठजोड़ कहां है, अहमदाबाद में चर्चा क्यों नहीं हुई?