केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने फिर दुहराया है कि असम के साथ पूरे देश को अवैध विदेशी घुसपैठियों से मुक्त कराने का वादा निभाएंगे । गुवाहाटी में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि हमने असम से ही यह वायदा किया था, जिसे 10 साल में पूरा नहीं कर पाएए लेकिन वायदा निभांएगे । अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवसभाषण में घोषित केन्द्र का उच्चस्तरीय जनसांख्यिकी मिशन घुसपैठियों की पहचान दिशा में में एक निर्णायक कदम है । अमित शाह के भाषण पर तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि इस काम में विफल रहने के लिए शाह का सिर काटकर टेबल पर रख देना चाहिए ।

केन्द्रीय गृह मंत्री उस समय यह बात कर रहे थे, जब सुप्रीम कोर्ट घुसपैठियों को निकाल बाहर करने का आधार और बंगला भाषा को इसका जरिया बनाने के आरोपों पर केंद्र सरकार को जवाब.तलब कर रही थी । जस्टिस सूर्यकान्त और जस्टिस जोयमाल्या बागची की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने 29 अगस्त को केंद्र सरकार से कहा कि स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रक्रिया(एसओपी) अधिसूचना को स्पष्ट करेंए जिसमें अधिकारियों को अवैध आप्रवासियों की देशव्यापी पहचान अभियान चलाने और उन्हें निकाल बाहर करने को अधिकृत किया गया है । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने केंद्र से इन आरोपों पर भी जवाब मांगा कि बंगला.भाषी अल्पसंख्यकों को लक्ष्य करके यह अभियान चलाया जा रहा है । 29 अगस्त को ही अमित शाह असम के मतदाताओं से अपना वायदा याद दिला रहे थे । उसी दिन चुनाव आयोग के अधिकारियों ने बताया कि बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण(एसआईआर) के तहत ‘संदिग्ध नागरिकता’ को लेकर लगभग 3 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी किया गया है ।

चुनाव अधिकारियों के अनुसार जिन लोगों को नोटिस जारी किए गए हैं, उनके बांग्लादेशए नेपालए म्यांमार और यहां तक कि अफगानिस्तान से भी आने का संदेह है । ये मतदाता पश्चिम बंगाल और नेपाल की सीमा से सटे पूर्वी चंपारणए पश्चिमी चंपारणए मधुबनीए किशनगंजए पूर्णियाए कटिहारए अररियाए सुपौल के हैं । उनमें ज्यादातर बंगला भाषी अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हैं । किशनगंज जिले से रिपोर्ट है कि नेपाल से आयी बहुओं का नाम मतदाता सूची में नही जुड़ रहा है । बंगला भाषी अल्पसंख्यकों को लक्ष्य करके एसओपी अभियान चलाने का केंद्र सरकार पर आरोप पश्चिम बंगाल से निकलकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है और सबसे ज्यादा इसको लेकर विवाद पश्चिम बंगाल में ही तूल पकड़ा है । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) ने अपने राज्य के साथ.साथ असम में भी बड़ी तादाद में बंगलाभाषी अल्पसंख्यकों के समर्थन में केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है । केंद्र की ओर से सुप्रीम कोर्ट में जवाब देने पहुंचे अटोर्नी जनरल तुषार मेहता ने पीठ के दोनों जजों को यह कहकर आश्वस्त करना चाहा कि स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रक्रिया(एसओपी) अभियान को चुनौती देनेवाले याचिकाकर्ता संगठन के पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा समर्थन किया जाना ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ है । उन्होंने शीर्ष कोर्ट पीठ को बताया कि ‘भारत अवैध आप्रवासियों की विश्व राजधानी नहीं है । घुसपैठ की समस्या संसाधन चट कर जाती है, जो भारतवासी नागरिकों के लिए है ।’

एसओपी अधिसूचना केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 02 मई को जब जारी की और विदेशी घुसपैठियों की पहचान निकाल.बाहर अभियान शुरू हुआ, उसी समय सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी गयी । याचिका दायर करने वाले पश्चिम बंगाल आप्रवासी कामगार कल्याण बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि ‘बांग्लादेशी’ होने के संदेह में बंगाली बोलनेवाले पश्चिम बंगाल के मुसलमानों को लक्ष्य करके उन्हें हिरासत में रखा जा रहा है और आप्रवासी कामगारों के मौलिक अधिकार आजादीए गरिमा का खुला उल्लंघन हो रहा है । बंगाल आप्रवासी कामगार बोर्ड की ओर से एडवोकेट प्रशांत भूषण ने एक गर्भवती महिला सोमाली बीबी का मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किया और बताया कि उसकी नागरिकता निर्धारित किए बगैर सोनाली बीबी को कथित रूप से बांग्लादेश भेज दिया गया । उन्होंने दलील दी कि इस तरह निकाल.बाहर करना अवैध है, क्योंकि इसके लिए कोई प्रक्फिर्या नहीं अपानायी गयी और इस बात के भी सबूत नहीं हैं कि ऐसे लोगों को स्वीकार करने के लिए बांग्लादेश से कोई समझौता हुआ है ।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से एक दिन पहले 28 अगस्त को भारत और बांग्लादेश के बीच घुसपैठ पर रोक लगाने के संबंध में सहमति बनी है । बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना अपदस्थ किए जाने के बाद 05 अगस्त को भारत आ गयीं । उसके बाद से दोनों देशों के रिश्ते बिगड़े हुए हैं । लेकिन घुसपैठ पर अंकुश लगाने के मामले पर सीमा सुरक्षा बल के डायरेक्टर जनरल दलजीत सिंह चौधरी के नेतृत्व में गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के अधिकारियों के प्रतिनिधिमंडल ने ढाका जाकर बातचीत की । बांग्लादेश की ओर से मेजर जनरल मोहम्मद अशफज्जमन सिद्दीकी के नेतृत्व में सहमति पत्र पर दस्तखत हुए । ढाका ने भारतीय सीमा सुरक्षा बल पर अवैध रूप से आप्रवासियों को भेजने का आरोप लगाया । बांग्लादेशी सीमा सुरक्षा बल का आरोप था कि भारतीय और म्यांमार राष्ट्रीयता वालों को गैरकानूनी तरीके से बांग्लादेश भेजा जा रहा है । जबकि भारतीय अधिकारियों का कहना था कि आपसी सहमति से अपनायी गयी प्रक्रिया के तहत घुसपैठियों को निकाला जा रहा है ।

सुप्रीम कोर्ट पीठ ने माना कि यह ‘जटिल मुद्दा’ है और विभिन्न देशों ने इस पर अलग-अलग नीतियां अपना रखी है ।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा 8 हम कलकत्ता हाईकोर्ट से आग्रह करते हैं कि सोमाली बीबी और उसके रिश्तेदारों की नागरिकता सुनिश्चित करनेवाली हेबियाज कोरपस स्वीकार करके उनकी नागरिकता सुनिश्चित की जाय और तुरंत न्याय सम्मत आदेश जारी किया जाय ।’

29 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मजनू का टीला के पास रहनेवाले पाकिस्तान से आए हिन्दू शरणार्थियों को वहां से हटाने पर रोक लगा दी और केंद्र सरकार तथा डीडीए को नोटिस जारी करके जवाब मांगा । दिल्ली हाईकोर्ट ने राहत देने से इंकार कर दिया था । इस शरणार्थी वस्ती के प्रधान सुखनंदन के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि बड़ी मुश्किलों का सामना करते हुए वे लोग पाकिस्तान से भागकर अपने देश दिल्ली पहुंचे और नयी जिदंगी जीना चाह रहे थे । डीडीए ने मजनू का टीला खाली करने की नोटिस में बुलडोजर चलने का भी अल्टीमेटम दिया है ।

संयोग कुछ ऐसा है कि बिहार के मतदाता सूची विवाद की सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट पीठ के एक जज जस्टिस सूर्यकान्त ने ही नागरिकता कानून के सेक्शन 6। पर फैसला लिखा था, जो बांग्लादेश से आए आप्रवासियों को नागरिकता देने से जुड़ा है ।

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्ववाले भाजपा गठजोड़ ने अपने पहले शासनकाल में नागरिकता संशोधन कानून बनायाए जिसमें पड़ोसी इस्लामी देश पाकिस्तानए बांग्लादेशए अफगानिस्तान में प्रताड़ित हिन्दूए बौद्धए जैनए सिखए इसाईए पारसी लोगों को नागरिकता का प्रावधान किया गया था । उसे लेकर संसद के अंदर और बाहर इतना विवाद हुआ कि काफी समय तक केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने उस कानून को लागू करने के नियम नहीं बनाए । संसदीय समिति के सदस्यों में भी मतभेद था । समिति की समय सीमा बार-बार बढ़ायी गयी । अभी तक इसकी पक्की रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है कि अबतक इन देशों के कितने गैर.मुस्लिमों को नागरिकता मिली है । इससे संबंधित विसंगतियां दूर नहीं हो पायी है ।

इस बीच कंबोडियाए थाइलैंड और विएतनाम यात्र के क्रम में कंबोडिया के सैलानी हब फुकेट से राजधानी नॉम्पेन्ह जाने वाले विमान में कुछ पाकिस्तानी हिन्दुओं से मुलाकात हुई । ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद का वीजा दंश झेल चुके इन सिंधी लोगों ने बताया कि हमारा आधा परिवार भारत में है, वीजा अधिकारी और बाधा.सीमा पर तैनात पुलिसकर्मी हिन्दू होने के बावजूद कोई कारण बताए बिना आधारए राशन कार्डए पासपोर्ट सारे कागजात देखकर वापस लौटा देते हैं ।’ उनमें से एक नीलेश सोभराज का कहना था कि जिस सिंधु नदी को लेकर भारत.पाकिस्तान में तनाव है, वो बहुत गहरी और चौड़ी है । इस नदी का बहाव क्षेत्र बलूचिस्तान तक है, जहां डाकुओं का बोलवाला है । भारत पर पाकिस्तान बलूचियों को उकसाने का आरोप लगाता है और पाकिस्तान सरकार साफ कहती है कि यहां सुकून नहीं है तो हिन्दुस्तान चले जाओ । वे मुस्लिम डाकू लोग हिन्दुओं से रंगदारीए मनमाना टैक्स वसूलते हैं और नहीं देने पर जान भी मार देते हैं । नीलेश ने दर्द बताया. ‘हमारा क्या दोष है, दोनों तरफ से मारे जा रहे हैं ।’

जहां तक भारत में घुसपैठियों का मामला है, विवाद मुख्य रूप से बांग्लादेश से आए मुसलमानों को लेकर है । इसमें असम के बाद पश्चिम बंगाल निशाने पर है ।

असम से उजपा बांग्लादेशी घुसपैठिया विवाद के लपेटे में पश्चिम बंगाल भी शामिल था । असम में सत्ता में आने से पहले तक भाजपा ने इसे चुनाव मुद्दा बनाया । असम में विदेशी घुसपैठियों की पहचान करके उनकी नागरिकता की जांच पड़ताल और उन्हें निकाल बाहर करने का मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में संचालित प्रक्फिर्या के बावजूद एक दशक से नहीं सलटा है । भाजपा हमेशा से पश्चिम बंगाल में 37 वर्षों तक चले वाममोर्चा शासनकाल पर अवैध बांग्लादेशियों को नागरिकता प्रदान कर वोटर बनाने का आरोप लगाती रही है । अब यह आरोप तृणमूल कांग्रेस के मत्थे आ गया, जिसकी सुप्रीमो ममता बनर्जी का पश्चिम बंगाल में तीसरा कार्यकाल चल रहा है । वही मतदाता तृणमूल कांग्रेस के हो गए ।

अगले वर्ष असम और पश्चिम बंगाल में विधान सभा चुनाव है । इसलिए दोनों राज्यों के लिए एसओपी माएने रखता है । घुसपैठियों वाले मुद्दे पर पश्चिम बंगाल में भाजपा ने अच्छी खासी विधान सभा और लोकसभा सीटें जीती हुई है ।

गत वर्ष झारखंड विधान सभा के दौरान भी बांग्लादेशी घुसपैठियों का मामला भाजपा ने उछाला था । लेकिन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के जेल में डाले जाने के कारण झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाली गठजोड़ सरकार दोबारा सत्ता में लौटी ।

बिहार में इसी साल नवंबर में चुनाव है । भाजपा को यहां सरकार का नेतृत्व संभालने का अवसर नहीं मिला है । भाजपा मशहूर पलटू राम नीतीश कुमार का पुछल्ला पकड़कर सत्ता में शामिल हुई है ।

केन्द्रीय गृह मंत्रालय की ओर से 02 मई को जारी एसओपी अधिसूचना और उसके अनुसार चुनाव आयोग की कार्रवाई बिहार को ही लेकर विवाद में है ।

संयोग कुछ ऐसा रहा कि बिहार में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान और घुसपैठ वाला विवाद एक साथ सुर्खियों में आया । इस पर संसद के मानसून सत्र में हंगामाए बिहार में मतदाता सूची विवाद और पश्चिम बंगाल में एसओपी के तहत अधिकारियों द्वारा घुसपैठियों की पहचान तथा निकाल.बाहर प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लगभग साथ.साथ थोड़े.थोड़े समय के अंतर से चल रही है ।

सबसे ज्यादा बवाल बिहार में मतदाता सूची को लेकर मचा हुआ है, जिसमें एक विसंगति दूर करने के क्फ़्रम में कई विसंगतियां पैदा हुई हैं । चुनाव आयोग को मोहरा बनाकर बिहार में विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट से राहत मांगी तो सुप्रीम कोर्ट पीठ को भी यह बात सुनवाई के दौरान कहनी पड़ी । इस संबंध में 01 सितंबर की तारीख याद रखने लायक है, जिस दिन सुप्रीम कोर्ट पीठ ने दावेए आपत्तियां शामिल करने की चुनाव आयोग द्वारा दी गयी 01 सितंबर की डेडलाईन 15 सितंबर तक बढ़ाने का राजनीतिक दलों की याचिका पर सुनवाई की । बिहार में कांग्रेस के नेतृत्व में चलाए गए वोटर अधिकार यात्रा का समापन 01 सितंबर को ही वोटर सत्यापन के खिलाफ इंडिया गठजोड़ मार्च से हुआ । इसमें झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी शामिल हुए । तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन उसके पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी की यात्र में शामिल होने पहुंचे । तमिलनाडु में भी अगले वर्ष चुनाव है । कांग्रेस ने बिहार में 89 लाख वोटर का नाम काटने का आवेदन चुनाव आयोग को दिया है ।

सुप्रीम कोर्ट पीठ ने 01 सितंबर से आगे डेडलाईन बढ़ाने से इन्कार कर दिया और चुनाव आयोग की इस दलील पर मुहर लगा दी कि नामांकन की अंतिम तारीख तक दावेए आपत्तियां दाखिल कर सकते हैं । चुनाव आयोग ने 30 सितंबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की डेडलाईन पहले ही दे रखी है ।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान बिहार में विपक्षी दलों के रवैए पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने से कई गुना ज्यादा आवेदन चुनाव आयोग को नाम काटने के लिए मिला है । जबकि उन्हीं दलों ने एसआईआर पर रोक लगाने की अर्जी चुनाव आयोग पर सत्यापन के बहाने वोटरों के नाम हटाने का आरोप लगाकर दायर की थी । चुनाव आयोग ने शीर्ष कोर्ट में बताया कि पार्टियों के विपरीत 33ए326 निजी लोगों के आवेदन मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए और 2ए07ए565 नाम हटाने के लिए मिले हैं ।

सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि सूची से हटाए गये जिन 65 लाख मतदाताओं को चुनाव आयोग ने दावा दाखिल करने का नोटिस दिया है उनकी सहायता कोई भी राजनीतिक दल नहीं कर रहे हैं ।

सुप्रीम कोर्ट ने बिहार न्याय सेवा प्राधिकरण को विभिन्न दलों के बुथ स्तरीय एजेंटों से तालमेल करके वैसे मतदाताओं की मदद करने का और इसकी गोपनीय रिपोर्ट भेजने का आदेश भी दिया ।