केरल विधान सभा में भाजपा की एकमात्र सीट भी हाथ से निकल जाने वाला परिणाम आने के बाद चुनाव में ‘नकद डील’ का मामला जोर पकड़े हुए है । भाजपा की केरल यूनिट के अध्यक्ष के. सुरेन्दन पर आदिवासी नेता सी. के. जानू को वायनाड जिले में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने के लिए कथित 25 लाख रूपए नकद भुगतान करने का आरोप है । इसको लेकर भाजपा प्रदेश यूनिट के अंदर घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है । सी. के. जानू की पार्टी जे आर एस(जनाधिपत्य राष्ट्रीय पार्टी) की कोषाध्यक्ष प्रसीता काझीकोड ने वायनाड पुलिस की अपराध शाखा के सामने हाजिर होकर वीडियो क्लिप दिखा दिया, जिसमें के. सुरेन्दन से प्रसीता की बातचीत दिखायी गयी है । इस वीडियो क्लिप में सुरेन्दन की आवाज में जे. आर. एस. को 25 लाख रूपये देने की बात बोलते सुनाया गया है ।

पुलिस सूत्रों के अनुसार जे आर एस पार्टी की प्रसीता ने वीडियो क्लिप में यह भी सुरेन्द्रन को कहते हुए सुनाया है कि यह ‘नकद डील’ भाजपा के संगठन सचिव एम. गणेश की जानकारी में हुई है । प्रसीता के अनुसार पार्टी प्रमुख सी. के. जानू को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ में आने के लिए 10 लाख रूपये नकद चुनाव से पहले ही दिए गए थे । वायनाड पुलिस ने भाजपा की केरल यूनिट प्रमुख के. सुरेन्द्रन के खिलाफ 17 जून को एफआईआर दर्ज की । उसके हफ्ते भर बाद इस वीडियो क्लिप के उजागर होते ही जांच में तेजी आ गयी । उधर प्रदेश भाजपा में कोहराम मच गया ।

सी. के. जानू के चुनाव क्षेत्र सुलतान बाथरी में चुनाव प्रचार प्रभारी भाजपा युवा मोर्चा के वायनाड जिला अध्यक्ष दीपू पुथेनपुटायिल और इस विधान सीट के पार्टी युवा मोर्चा अध्यक्ष लिविल कुमार दोनों को अपने पद से हटा दिया गया ।

दोनों ने इस ‘डील’ में शामिल पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई की जोरदार मांग उठायी । इससे नाराज प्रदेश भाजपा ने पार्टी के युवा मोर्चा नेताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर डाली । इसके विरोध में केरल भाजपा युवा मोर्चा में बवाल खड़ा हो गया । रिपोर्ट है कि कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पार्टी छोड़ दी, कितनों ने धमकी दी । सुलतान बाथरी समेत कई पंचायतों की संगठन कमिटियां भंग कर दी गयी । सभी एक स्वर से इस ‘नकद डील’ में शामिल नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं ।

केरल हाईकोर्ट ने लोकतांत्रिक युवा जनता दल अध्यक्ष सलीम माडाव्व की इस संबंध में दायर याचिका पर प्रवर्तन निदेशालय से विस्तृत हलफनामा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है । सलीम ने विधान सभा चुनाव में भाजपा द्वारा काला धन झोंके जाने की केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने की मांग की है । सलीम माडाव्वर ने चुनाव से तीन दिन पहले 3.50 करोड़ की डकैती में भाजपा के शामिल होने का आरोप लगाया है ।

मई के पहले सप्ताह में घोषित चुनाव परिणाम की एक ही बात रिकार्ड में है कि केरल के वाममोर्चा मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन ने मतदाताओं से किया गया यह वायदा पूरा कर दिया कि भाजपा का एकमात्र खाता इस चुनाव में बंद होगा । भाजपा ने 2016 में तिरुवनंतपुरम की नेमोम सीट से खाता खोला था, और वहां से भी हार गयी । भाजपा एक भी सीट नहीं जीत पायी और चुनाव के दौरान ‘नकद डील’ विवाद में फंस गयी ।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने दो सीटों से पर्चा भरा था । इस बार पार्टी ने अपने सारे पत्ते खोल दिए । पलक्कड़ सीट से दो बार निर्वाचित सफी पराम्बील को हराने के लिए ‘मेट्रोमेन’ ई. श्रीधरन को उतार दिए । कम-से-कम नेमोम सीट पर कब्जा बरकरार रखने के लिए मिजोरम के पूर्व राज्यपाल और पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कुम्मानम राजशेखरन को खड़ा किया । सब के सब हार गए ।

केरल में भाजपा ने बंगाल की तरह अपनी ताकत झोंकी । केरल में सीपीएम की मजबूत पकड़ बंगाल के तृणमूल कांग्रेस की तरह है । दोनों जगह इन दोनों दलों का जनाधार क्षेत्रीय पार्टी वाला है, जैसा दक्षिण में सर्वत्र दिखाई देता है । कांग्रेस ने केरल में हमेशा क्षेत्रीय दलों से तालमेल करके वाम की तरह मोर्चा बना रखा है । इसीलिए उलटफेर होता रहता है । इस बार दूसरी बार लगातार वाममोर्चा के सत्ता में बने रहने से कांग्रेस को भी झटका लगा । भाजपा ने अपनी स्वीकार्यता केरल के मतदाताओं पर केंद्र में सत्तारूढ़ दबंग राष्ट्रीय दल के रूप में थोपना चाहा । 2011 का वाकया याद आता है, जब केरल में कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार थी । केंद्र में भी कांग्रेस गठजोड़ सरकार थी और सुषमा स्वराज लोकसभा में विपक्ष की नेता थी । भाजपा के स्टार प्रचारकों में से एक सुषमा स्वराज ने केरल और तमिलनाडु से लौटकर दावा किया था - ‘केरल में खाता खोलना है और तमिलनाडु में मुख्य विपक्षी पार्टी बनना है ।’ उसके बाद 2016 और 2021 का चुनाव परिणाम सामने है । पुडुचेरी में मुख्यमंत्री एन. रंगास्वामी ने गठजोड़ घटक भाजपा से एक-डेढ़ महीने चली रस्साकसी के बावजूद भारी गतिरोध के माहौल में इस हफ्ते राज्यपाल को मंत्रिमंडल की सूची सौंपी । पुडुचेरी में किसी भी कीमत पर भाजपा को सरकार बनाना था । इसकी तैयारी चुनाव से कुछ दिन पहले ही कांग्रेस मुख्यमंत्री बी. नारायणसामी के विधायकों को फोड़कर भाजपा में लाया गया । सरकार गिराकर राष्ट्रपति शासन लगाया गया । भाजपा का एक नया खाता खुला कि पहली बार किसी केन्द्रशासित क्षेत्र में मंत्रिमंडल में शामिल हुई । पांच मंत्रियों में से दो भाजपा कोटे से लिए गए । भाजपा को पुडुचेरी में कुल 30 सीटों में से 6 पर जीत मिली । एन आर कांग्रेस के एन. रंगास्वामी ने भाजपा को मुख्यमंत्री पद नहीं लेने दिया । दोनों ने एक-दूसरे पर दबाव बनाया और मजबूरन सहमति हुई कि भाजपा को दो मंत्री और विधान सभा अध्यक्ष का पद दिया जाएगा। मंत्री बनाने में ए. नमशिवायम नंबर वन पर रहे, जिन्होंने एक दर्जन कांग्रेस विधायकों को मिलाकर पूर्व कांग्रेस सरकार को गिराया और चुनाव से एक महीना पहले भाजपा में शामिल हुए । भाजपा ने पुडुचेरी में अपने दूसरे गठजोड़ घटक अन्नाद्रमुक के अलावे निर्दलीय उम्मीदवारों से भी गठजोड़ किया । केरल और पुडुचेरी के साथ ही तमिलनाडु में भी चुनाव हुए । भाजपा तमिलनाडु में क्षेत्रीय दल द्रमुक और सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के मुकाबले में नहीं थी । लगभग भाजपा की सीधी टक्कर कांग्रेस से थी । कांग्रेस ने भाजपा के हाथों अपनी एकमात्र सीट खोयी, जहां जीतना भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न था । कोयम्बटूर(दक्षिण) सीट से भाजपा की महिला मोर्चा अध्यक्ष वनाती श्रीनिवासन जीती । कुल 234 में से मात्र 4 सीट भाजपा जीत पायी । इतनी ही सीटें भाजपा को 2001 में मिली थी, जब केंद्र में भाजपा गठजोड़ सरकार थी । 2016 में भाजपा का तमिलनाडु में खाता नहीं खुला । 2021 चुनाव में भाजपा कांग्रेस को बैकफुट पर लाना चाहती थी । इसके लिए भाजपा ने सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक से गठजोड़ के बावजूद उसकी हैसियत को कम करके आंका । जबकि भाजपा के पास तमिलनाडु में जमीन नहीं थी । कांग्रेस को पछाड़ने के लिए भाजपा ने कांग्रेस वाली रणनीति अपनाने में चूक कर दी । कांग्रेस ने तमिलनाडु समेत पूरे दक्षिण में क्षेत्रीय दलों के वजूद की बिल्कुल अनदेखी नहीं की । क्योंकि इसका खामियाजा कांग्रेस ने 2016 में भुगता और मात्र 8 सीटों पर सिमटकर रह गयी, जबकि द्रमुक ने 88 सीटें जीती । 2021 चुनाव में कांग्रेस को 18 सीटें मिली । कन्याकुमारी की एकमात्र लोकसभा सीट उपचुनाव जीतने के लिए भाजपा ने एड़ी-चोटी एक कर दी । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, निर्मला सीतारामन, नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह सब पहुंच गए । मगर जीते कांग्रेस उम्मीदवार वी. विजय कुमार उर्फ विजय वसंत, जिनका क्षेत्रीय आधार था । केंद्रीय नेतृत्व के सिर्फ मीडिया प्रबंधित प्रचार अभियान की बदौलत तमिलनाडु की भाजपा यूनिट प्रमुख एन. मुरुगन ने अपनी सीट बचाने के लिए द्रमुक उम्मीदवार एन. कायलविझी के खिलाफ चुनाव आयोग की नाक में दम कर दी । राज्य चुनाव आयोग और स्थानीय निर्वाची अधिकारी को दो बार वोटों की गिनती के लिए मजबूर कर दिया । लेकिन फिर भी द्रमुक जीती । अन्नाद्रमुक ने भाजपा का ज्यादा तवज्जो नहीं दी । मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी दो सीटों से लड़े और एक जीते । पार्टी ने 66 सीटें जीतकर दिखा दिया कि संस्थापक जयललिता के नहीं होने पर भी पार्टी जमीन से जुड़ी है । इसी माहौल में कर्नाटक में भी भाजपा सरकार के अन्दर उठापटक मची है । 2019 में वहां भाजपा की सरकार बनी नहीं, जबरन बनायी गयी । कर्नाटक में कांग्रेस समेत अभी तक जो भी पार्टी ने सरकार बनायी, वो तभी टिकी जब क्षेत्रीय दल के रूप में चली । उसके बावजूद कांग्रेस और पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल(सेक्युलर) में घमर्थन चला । भाजपा कर्नाटक में जद(एस) के एच. डी. कुमारस्वामी से बारी-बारी से मुख्यमंत्री बनने की राजनीति में धोखा खा चुकी है ।

भाजपा के पास कर्नाटक में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के भ्रष्टाचार में लिप्त रिकार्ड होने के बावजूद ऐसा नेता नहीं है, जो सिर्फ अपनी जनता से जुड़ा हो । जरा याद कर लें, 1977 के जिस जनता पार्टी संयुक्त मंच से भाजपा निकली है, उसके रामकृष्ण हेगड़े सिर्फ अपनी बदौलत जनता पार्टी के धराशायी होने के बावजूद मुख्यमंत्री बने रहे । उसके पहले इंदिरा गांधी शासनकाल में कांग्रेस के डी. देवराज अर्स अपने को इंदिरा कांग्रेस से अलग करके मुख्यमंत्री बने रहे ।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की बात करें तो दोनों जगह वर्चस्व क्षेत्रीय दल का है । कांग्रेस की गलती के कारण आंध्र प्रदेश में कांग्रेस से निकलकर वाईएसआर कांग्रेस के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी बने । तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति नेता के. चन्द्रशेखर राव दूसरी बार मुख्यमंत्री बने । वही गलती भाजपा दुहरा रही है, मगर कांग्रेस का अभी भी दक्षिण में वजूद बरकरार है ।

अब मुस्लिम बहुल आबादी वाले सुदूर दक्षिण के तटीय क्षेत्र लक्षद्वीप में भाजपा ने जो हिन्दुत्व एजेंडा लादा है, उससे पार्टी की स्थानीय यूनिट ही खफा है । कश्मीर की तरह आबादी संतुलन बिगाड़कर जबरन वोट बैंक बनाने की भाजपा की कोशिश नाकामयाब रही । केरल हाईकोर्ट ने लक्षद्वीप प्रशासक प्रफुल पटेल के दो विवादास्पद आदेशों पर 22 जून को रोक लगा दी । सरकार संचालित डेयरी फार्म बंद करने और स्कूली बच्चों के दोपहर के भोजन में से मांस और मुर्गा हटाने का आदेश लक्षद्वीप प्रशासन से जारी किया, जिसे वहां के वाशिंदे अजमल अहमद ने हाईकोर्ट में चुनौती दी । लक्षद्वीप में लोगों ने प्रशासक पटेल के खिलाफ ‘काला दिवस’ मनाया ।