अंतरराष्ट्रीय प्रेस इंस्टीच्यूट(आईपीआई) ने भारत में पत्रकारों पर बढ़ती दंडात्मक कार्रवाई की भर्त्सना करते हुए इसे ‘प्रेस की आजादी’ के लिए खतरा बताया है । एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने भी कोरोना संक्रमण को आधार बनाकर पत्रकारों पर पुलिसिया दमन की निंदा की है। इन संस्थाओं ने अपने निंदा बयानों में मुख्य रूप से जिस घटना का जिक्र किया है, वो है गुजरात के पत्रकार धवल पटेल को ‘देशद्रोह’ के आरोप में गिरफ्तार किया जाना । धवल पटेल ने अपने पोर्टल ‘फेस ऑफ नेशन’ में एक स्टोरी गुजरात की भाजपा सरकार के खिलाफ निकाल दी । धवल पटेल का यह अपराध ‘देशद्रोह’ का मामला बना और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । धवल पटेल की स्टोरी ये थी कि गुजरात में कोरोना पर काबू पाने में मुख्यमंत्री विजय रूपाणी की विफलता के कारण भाजपा हाईकमान नतृत्व परिवर्तन पर विचार कर रहा है । यह स्टोरी 7 मई को गुजरात के सभी अखबारों में छपी । स्टोरी में कहा गया कि भाजपा हाईकमान ने केंद्रीय जहाजरानी मंत्री मनसुख मंडाविया को बुलाया था, जिनके विजय रूपाणी की जगह लेने की संभावना है ।

इस स्टोरी के कारण गुजरात सरकार ने पत्रकार धवल पटेल के खिलाफ ‘देशद्रोह’ का आरोप लगाया और इस अपराध के अंतर्गत आनेवाली आईपीसी की धाराओं के अंतर्गत कार्रवाई शुरू कर दी ।

ऐसा सिर्फ एक ही मामला नहीं है । कोरोना नियंत्रण के लिए केंद्र और राज्य सरकारें भरपूर प्रयास में जुटी है । जिन राज्यों में संक्रमण बेकाबू होती जा रही है, उनमें पहले नंबर पर है, गुजरात । महाराष्ट्र दूसरे नंबर पर है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित लॉकडाउन की अवधि तीसरी बार बढ़ायी गयी है, जिसके दायरे से मीडिया को बाहर रखा गया है । केंद्र और राज्यों की भाजपा सरकारों को कोरोना पर काबू पाने के लिए अपनी हर नीति सही लग रही है । कोई नीति गलत है या कहीं कोई त्रुटि है, तो प्रेस और मीडिया इसे न उछाले । अगर कोई पत्रकार ऐसा करता है तो पहले उसी पर नियंत्रण जरूरी समझा गया । अखबार का कार्यालय बंद नहीं हुआ, टीवी चैनल भी चल रहे हैं । लेकिन जिस पत्रकार ने कोरोना नीति के खिलाफ ऐसा कुछ भी उछाला जो सरकार नहीं चाहती, उसे पुलिस हिरासत वाले ‘लॉकडाउन’ में डाल दिया गया ।

भाजपा की किसी भी नीति का विरोध ‘देशद्रोह’ के अपराध में आने का संक्रमण तो नरेंद्र मोदी के 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के समय से ही शुरू हो गया । फिर 2019 में उनके दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद तो ‘देशद्रोह’ कोरोना वायरस ने देश को ऐसा संक्रमित किया कि नरेंद्र मोदी की नीति का समर्थन न करनेवालों को देशद्रोही घोषित करके लॉकडाउन में डालने का सिलसिला चल पड़ा ।

24 मार्च, 2020 को प्रधानमंत्री द्वारा आपात्स्थिति से मिलते-जुलते लॉकडाउन घोषित किए जाने के बाद से कोरोना नीति की त्रुटि निकालने के कारण पत्रकारों पर भाजपा का ‘देशद्रोह’ संक्रमण कहर बरपा । अंतरराष्ट्रीय प्रेस इंस्टीच्यूट(आईपीआई), एडीटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया और प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने जिन घटनाओं की निंदा की है, उनमें गुजरात के बाद दिल्ली पुलिस की पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई शामिल है । ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के संवाददाता महेन्दर सिंह मनराल को दिल्ली पुलिस ने पूछताछ के लिए बुलाया । हिमाचल प्रदेश की भाजपा सरकार ने कोरोना संक्रमण से पीड़ित लोगों की तकलीफ उजागर करने के कारण 6 पत्रकारों के खिलाफ ‘देशद्रोह’ समेत 10 मामले दर्ज किए । रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ महाराष्ट्र सरकार की कोरोना नीति की आलोचना कर दी । गैर-भाजपा शासित होने के बावजूद महाराष्ट्र पुलिस इस ‘अपराधी’ के खिलाफ तुरंत एक्शन में आ गयी । सुप्रीम कोर्ट से प्राप्त संरक्षण के कारण 11 मई को अर्नब गोस्वामी गिरफ्तारी से बचे । सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार और किसी मामले की जांच में पुलिस की ड्यूटी के बीच एक संतुलन बनाए रखना चाहिए ।

11 मई को ही गुजरात पुलिस ने ‘फस ऑफ नेशन’ पोर्टल के पत्रकार धवल पटेल को गिरफ्तार किया । कोरोना संक्रमण से लड़ाई में पुलिसकर्मियों और स्वास्थ्यकर्मियों के योगदान की कितनी भी तारीफ की जाए, कम होगी । लेकिन प्रधानमंत्री के गृह राज्य गुजरात में पुलिसकर्मियों का ‘देशप्रेम’ ध्यान देने योग्य है । धवल पटेल के खिलाफ एफआईआर एक सिपाही ने दर्ज करायी और 11 को अपराध शाखा ने उन्हें ‘देशद्रोह’ के जुर्म में गिरफ्तार किया ।

दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा ने पत्रकार महेन्दर सिंह मनराल को तबलीगी जमात नेता मौलाना साद कांधालवी से सम्बन्धित रिपोर्ट का स्त्रोत खुलासा करने के लिए पूछताछ के लिए सम्मन किया । मनराल ने एक ऑडियो क्लिप में मौलाना साद से जुड़ी पुलिस छानबीन में छेड़छाड़ की संभावना जतायी ।

प्रेस क्लब ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से हस्तक्षेप का आग्रह किया है । प्रेस क्लब ने गुजरात के मामले में खास तौर से कहा हे कि कोरोना के मद्देनजर नेतृत्व परिवर्तन की संभावना वाली स्टोरी अहमदाबाद के अन्य अखबारों में भी छपी, लेकिन धवल पटेल को ही ‘देशद्रोह’ का अभियुक्त बनाया गया ।

आईपीआई ने कहा है कि कोरोना पर रिपोर्टिंग को नियंत्रित करने के लिए लॉकडाउन एलान के तुरंत बाद भारत सरकार ने 31 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगायी । भारत सरकार सुप्रीम कोर्ट के जरिए मीडिया पर कोविड-19(कोरोना) के संबंध में ऐसी कोई भी सूचना के प्रकाशन/प्रसारण पर प्रतिबंध लगाना चाहती थी, जो सरकार द्वारा क्लियर न किया जाए । सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी याचिका नामंजूर कर दी । लॉकडाउन में ही केंद्र सरकार को कोरोना नियंत्रण जैसा ही जरूरी काम त्रिमूर्ति भवन का पुननिर्माण लगा । प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की धरोहर संग्रहालय को मिटाकर उसकी जगह नरेंद्र मोदी समेत सभी प्रधानमंत्रियों का जीवनवृत्त लगाने के लिए त्रिमूर्ति भवन का टेंडर इसी अवधि में निकाला गया और काम शुरू हो गया । इस पर 10.30 करोड़ लागत का अनुमान है । सुप्रीम कोर्ट से अगर पाबंदी मिल जाती, तो 12 मई को यह खबर लगानेवाले संवाददाता अंदर चले जाते और ‘देशद्रोही’ होते ।

लॉकडाउन के दौरान ही ‘फर्जी समाचारों’ का प्रचार अभियान तेज हुआ । दिल्ली स्थित पुलिस शोध और विकास ब्यूरो(बीपीआरडी) ने वेबसाईट पर फर्जी समाचारों की पहचान के लिए का ऑनलाईन मैनुअल डाला । कोरोना लॉकडाउन के दौरान केंद्र सरकार को कई ‘खबरें फर्जी’ और सांप्रदायिक हिंसा फैलानेवाली ‘पीली पत्रकारिता’ लगी । उसके लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन ‘थिंक टैंक’ ने एक विस्तृत निर्देश तैयार किया । इसमें कानून अनुपालन एजेंसियों को सभी वीडियो रिपोर्ट, फोटो रिकार्डिंग का स्थान, उसके लेखक, तैयार करनेवाले की पूरी पड़ताल करनी थी कि वो सही तथा प्रामाणिक तथ्यों पर आधारित है या नहीं । अचानक 11 मई को ही ‘तकनीकी गड़बड़ी’ के कारण वो वेबसाईट हटा लिया गया ।

15 मई को एक अन्य घटना में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘दि वायर’ न्यूज पोर्टल के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ बरदराजन को अग्रिम जमानत दे दी । उत्तर प्रदेश पुलिस ने अयोध्या में बरदराजन के खिलाफ दो एफआईआर दर्ज की । इस पत्रकार ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ रामनवमी उत्सव विवाद से संबंधित कथित स्टोरी चला दी ।

लॉकडाउन के दौरान ही पत्रकार गौतम नवलखा को सुप्रीम कोर्ट ने 14 अप्रील को राष्ट्रीय जांच एजेंसी के आगे आत्मसमर्पण करने कहा । ‘इकोनोमिक एंड पोलिटिकल वीक्ली’ से संबद्ध रहे पत्रकार नवलखा जनवरी, 2018 में महाराष्ट्र भीमा कोरेगांव हिंसा में कथित रूप से भड़काऊ बयान देने के आरोप में ‘देशद्रोह’ के अभियुक्त हैं । गौतम नवलखा का पुलिस ने सीपीआई(माओवादी) गुट से संपर्क माना है । वे सुप्रीम कोर्ट की मदद से एक साल से गिरफ्तारी से बच रहे थे । उनके साथ सुधा भारद्वाज, बारबरा राव समेत कई बुद्धिजीवी(शहरी नक्सली) नरेंद्र मोदी के आलोचक होने के कारण ‘देशद्रोह’ के जुर्म में जेल में हैं ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिसंबर, 2018 में गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान शहरी नक्सलियों को ‘देशद्रोही’ बताते हुए कांग्रेस पर इनसे मिलीभगत का आरोप लगाया । फिर नवंबर, 2019 में नरेंद्र मोदी और उनके गृहमंत्री अमित शाह ने झारखंड विधान सभा चुनाव प्रचार में भी सभी भाजपा विरोधियों को ‘देशद्रोही’ तथा कांग्रेस को शहरी नक्सलियों का समर्थक बताया ।