कांग्रेस को लक्ष्य करके भाजपा के ‘संविधान हत्या दिवस’ मनाने के विवादास्पद आयोजन में इस बार नया विवाद जोड़ दिया गया । 25 जून को ‘इमर्जेंसी डे’ को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने की दूसरी बरसी पर सियासी राजनीतिक एजेंडे में अबकी स्कूली बच्चों को मोहरा बना दिया गया ।
राष्ट्रीय शैक्षिक शोध और प्रशिक्षण परिषद (एनसीइआरटी - नेशनल कौंसिल ऑफ एडुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग) की नौवीं कक्षा की समाज विज्ञान की नयी किताब ठीक 25 जून को ही रिलीज की गयी, जिसमें इमर्जेंसी पर एक नयी बहस जोड़ी गयी है । केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने इसे यह कहकर सही ठहराया है कि भावी पीढ़ी को जानना चाहिए कि इमर्जेंसी के दौरान ‘क्या-क्या काले कारनामे’ हुए ।
220 पृष्ठों की नयी नौवीं कक्षा की पाठ्य पुस्तक में विभिन्न अध्यायों में इमर्जेंसी की चर्चा संविधान को सामने रखकर की गयी है । सबसे ज्यादा फोकस इस पैरे पर किया गया है - ‘25 जून 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आंतरिक संकट बताकर राष्ट्रीय इमर्जेंसी (आपातकाल) लागू कर दिया । उस दौरान अधिकांश मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस, मीडिया पर सेंसर लगा दिया गया । बड़ी संख्या में राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया । लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिकों की आजादी पर कड़ी पाबंदी लगा दी गयी’ ।
भाजपा नीत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठजोड़ सरकार ने 2024 में संविधान गठन की 75वीं वर्षगांठ पर 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने का फैसला किया ।
इनसीइआरटी की पाठ्य पुस्तक में यह प्रसंग ‘संविधान हत्या दिवस’ की दूसरी बरसी पर जोड़ा गया है । इमर्जेंसी लागू होनेवाले पैरे की पंक्तियां उस अधिसूचना से मिलती-जुलती हैं, जो जुलाई 2024 में गृह मंत्रालय की ओर से ‘भारत का राजपत्र’ में जारी की गयी थी ।
25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाए जाने की गृह मंत्रालय की अधिसूचना 12 जुलाई, 2024 को जारी की गयी, जबकि 22 जुलाई, 2024 से संसद का बजट सत्र शुरू होनेवाला था । 18वीं लोकसभा के गठन का पहला सत्र 24 जून को जब शुरू हुआ तो कांग्रेस से जीते 99 सदस्यों ने अपने सहयोगी दलों के साथ संविधान का बैनर पोस्टर लगी तख्तियों के साथ सदन में प्रवेश किया और सदस्यता की शपथ ली । जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नेताओं ने अगले दिन 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ पर फोकस किया । उन्होंने संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्यों को संविधान की प्रतियां भी बांटी ।
फिर आ गया वर्ष 2024 का संसद का शीतकालीन सत्र । मुख्य विपक्षी दल, कांग्रेस की मांग पर सरकार संविधान की 75वीं वर्षगांठ के सिलसिले में दोनों सदनों में चर्चा कराने को सहमत हुई । लोकसभा चुनाव परिणाम सामने आने के बाद से भाजपा की ‘संविधान हत्या’ प्रचार और उसकी काट में कांग्रेस का देशव्यापी ‘संविधान बचाओं’ अभियान 25 जनवरी, 2025 गणतंत्र दिवस तक चला ।
लोकसभा में 13 और 14 दिसंबर को और राज्य सभा में 16 तथा 17 दिसंबर को संविधान पर चर्चा हुई । संसद के अंदर और बाहर भाजपा और कांग्रेस का राजनीतिक संविधान छाया रहा ।
संविधान की प्रति हाथ में लेकर सभी जनप्रतिनिधि अपने दायित्वों के निर्वहन की शपथ सदन की सदस्यता ग्रहण करते समय लेते हैं । संविधान को पवित्र बताकर और आदर श्रद्य का भाव व्यक्त कर मखौल तथा उपहास का विषय राजनीतिकरण करके बना दिया गया ।
‘संविधान हत्या’ का भाजपा ने कांग्रेस के खिलाफ जोरदार अभियान जैसा 2024 में चलाया, वैसा 2025 में इमर्जेंसी के 50वें साल में पहला ‘संविधान हत्या दिवस’ में देखने को नहीं मिला । लेकिन इस बार 25 जून, 2026 को भाजपा का यह अभियान 2024 की तुलना में हमलावर है । इस बार भाजपा की कांग्रेस के खिलाफ रणनीति दूरगामी परिणाम वाली योजना का संकेत देती है । इसके पीछे के सियासी राजनीतिक कारण पर गौर करते हैं ।
अभी एनसीइआरटी नौवीं कक्षा के बच्चों को संविधान से पहले संवैधानिक विवाद पढ़ाने और संविधान की मूल भावना प्रस्तावना को गोल कर अपना सियासी एजेंडा थोपने के समय देश का राजनीतिक माहौल भाजपा के अनुकूल नहीं चल रहा है । मई से शुरू हुआ नीट-यूजी प्रश्न-पत्र लीक विवाद थमा नहीं है । अभूतपूर्व सुरक्षा बंदोबस्त के बीच हुई पुनर्परीक्षा भी कदाचार मुक्त नहीं रही । केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान देश के लाखों पीड़ित प्रभावित अभिभावकों को आश्वस्त नहीं कर पा रहे हैं । इसी बीच महाराष्ट्र में टीइटी शिक्षा पात्रता परीक्षा में भी पर्चा लीक हुई । धर्मेन्द्र प्रधान को काफी दवाब में घपले घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपने के बाद स्वीकारना पड़ा कि नीट-यूजी परीक्षाएं आयोजित करनेवालों की इसमें साजिश है ।
कांग्रेस नेता और लोकसभा में भी विपक्ष के नेता देश भर में इसके खिलाफ ‘छात्रों की गूंज’ आंदोलन चला रहे हैं । जून में जब भाजपा का ‘संविधान हत्या दिवस’ मनाने का समय करीब आया, उस समय अयोध्या रामजन्म भूमि ट्रस्ट में चढ़ावा अनुदान चंदा चोरी अजागर हो गयी । भाजपा की राजनीति का सबसे बड़ा एजेंडा रहा है अयोध्या का राम मंदिर । इसलिए रामजन्म भूमि ट्रस्ट के अंदर जनता से मिले श्रद्धा चढ़ावा, अनुदान राशि, सोना, चांदी की प्रबंधक रामभक्तों द्वारा ही चोरी देश की सबसे बड़ी खबर बनी । उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष चुनाव है । मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए संभावना कठिन हो रहा है, जिनके 10 साल के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि है, अयोध्या का राम मंदिर ।
कांग्रेस नेताओं ने ‘संविधान हत्या दिवस’ के दिन इंदिरा गांधी और उनके परिवारजनों पर भाजपा नेताओं द्वारा संविधान के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोपों तथा इमर्जेंसी काल के विषय में टिप्पणियों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी । कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने एक बार में खंडन करके जवाब दे दिया कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के 12 साल के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि है, संवैधानिक संस्थाओं को सरकारी बनाना ।
उत्तर प्रदेश में भाजपा की चुनौती समाजवादी पार्टी समेत इंडिया गठजोड़ के संयोजक कांग्रेस और अन्य घटक दलों का फोकस अब नीट-यूजी विवाद के बाद राम जन्मभूमि ट्रस्ट के अंदर चोरी पर है । राहुल गांधी ने 25 जून को ही ‘छात्रों की गूंज’ आंदोलन को सफल बनाने के लिए भी कांग्रेसजनों को एकजुट होने कहा ।
भाजपा की छिटपुट संविधान हत्या दिवस चर्चा, गोष्ठी जारी है । इसके लिए लोकनायक जयप्रकाश नारायण की मूर्ति को श्रद्धांजलि देने के बहाने इमर्जेंसी को ‘काला अध्याय’ बताकर कांग्रेस को संविधान की धज्जियां उड़ानेवाली पार्टी कही जा रही है । जेपी आंदोलन की कर्मभूमि बिहार में बड़ा आयोजन हुआ, जिसमें मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के साथ समारोह में शामिल भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा ने कहा कि इंदिरा गांधी के पोता-पोती का संविधान की प्रतियां लेकर घूमना ‘संविधान का अपमान’ है ।
भाजपा को अगले साल पंजाब में भी आम आदमी पार्टी को हराना है । आम आदमी पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल अयोध्या जाकर मत्था टेकने के बहाने कह आए कि राम जन्मभूमि ट्रस्ट के छुटभैयों को फंसाकर रसूखवाले लोगों को बचाया जा रहा है । ट्रस्ट के अंदर से चोरी, घपला का आए दिन नया-नया खुलासा हो रहा है ।
यह तो हुआ पूरी तरह सियासी चुनावी राजनीति का मामला । अब देखिए कि ‘संविधान हत्या दिवस’ के बहाने भाजपा नीति निर्धारकों का निशाना कहां-कहां है । एक तरफ कांग्रेस के प्रति इतनी नफरत फैलानी है ताकि अभी जो युवा हैं, उनके साथ-साथ किशोर उम्र की दहलीज पर पैर रखनेवाले भी जानें कि कांग्रेस के शासनकाल में संविधान की धज्जियां उड़ायी गयीं । दूसरी तरफ एनसीइआरटी की पाठ्यपुस्तक के जरिए ही सुप्रीम कोर्ट से टकराव टालने और कार्यपालिका का वर्चस्व दिखानेवाला संतुलन बनाए रखना है । इसमें पहला बिंदु आता है, नौवीं की किताब से संविधान की प्रस्तावना हटाया जाना और ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द का लोप ।
उसकी जगह मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण ( SIR -एसआईआर) को जगह दी गयी है । पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव से पहले एसआईआर जितना संवैधानिक-राजनीतिक विवाद किसी और मामले को लेकर नहीं हुआ । 25 जून, 2026 को एसआईआर के एक साल पूरे होने पर 6 करोड़ वोटरों के नाम कटे । इसको यह कहकर संविधान वाले अध्याय में जोड़ा गया कि पढ़ाई की शुरूआत में ही नयी पीढ़ी को यह जानना जरूरी है कि किस प्रकार चुनाव आयोग ने स्वतंत्रता और निष्पक्ष रूप से एसआईआर अभियान चलाया ताकि कोई भी अपात्र व्यक्ति मतदाता सूची में शामिल न हो।
नौवीं कक्षा के बच्चों को अभी किताब में पढ़ाया गया है कि ‘न्यायपालिका निष्पक्ष और स्वतंत्र’ है । सुप्रीम कोर्ट की तारीफ करते हुए कहा गया है शीर्ष कोर्ट अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए जनहित याचिका समय-समय पर लेती है, ताकि सबके लिए न्याय सुनिश्चित हो ।
गत फरवरी में एनसीइआरटी की कक्षा 8 की समाज विज्ञान पाठ्यपुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ की चर्चा की गयी थी । सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद यह किताब वापस ली गयी और एनसीइआरटी ने माफी मांगी । सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा एतराज जताते हुए केंद्र, राज्य और शैक्षणिक संस्थानों को निर्देश दिया कि यह प्रसंग जोड़नेवाले एक्सपर्ट मिकेल डेनियो, सुपर्णा दिवाकर, आलोक प्रसन्न कुमार से खुद को अलग करें ।
2024 के नवंबर में संविधान दिवस की 75वीं वर्षगांठ के समय का जिक्र करते हैं, जब सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावना के खिलाफ दायर याचिकाओं पर फैसला सुनाया ।
भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी और भाजपाई वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके 1976 में इमर्जेंसी के दौरान किए गए 42वें संविधान संशोधन के सेक्शन-2 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए दलील दी कि प्रस्तावना में जोड़े गए शब्द ‘समाजवादी’ ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ संविधान की मूल भावना के खिलाफ है । याचिका पर सुनवाई करनेवाली भारत के प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने संविधान दिवस (26 नवंबर) से एक दिन पहले 25/11/2024 को फैसला सुनाते हुए सबसे पहले यही कहा कि ‘इमर्जेंसी’ में कुछ गलत ही नहीं हुआ । 1949 में संविधान को अपनाते समय ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को वस्तुनिष्ठ रूप से पारिभाषित नहीं किया गया था । 1976 में संशोधन करके जोड़े गए शब्दों को नहीं हटाया जा सकता । क्योंकि हमारे संदर्भ में समाजवाद का अर्थ कल्याणकारी राज्य है, जो अन्य देशों से बहुत अलग है । अगर यह दलील स्वीकार की जाती है, तो सभी संशोधनों पर लागू होंगे ।
26 नवंबर, 2024 को पुराने संसद भवन के ऐतिहासिक केंद्रीय कक्ष में दोनों सदनों के संयुक्त सत्र को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के संबोधन के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने 30 नवंबर, 1949 को छपे आरएसएस के अखबार ‘ऑर्गनाइजर’ के संपादकीय का हवाला दिया, जिसमें 26 नवंबर, 1949 को स्वीकार किए गए संविधान को भारतीयता और मनुवादी संस्कृति के खिलाफ बताया गया ।
अभी संविधान हत्या दिवस के आयोजन पर जारी एनसीइआरटी की किताब से प्रस्तावना के साथ-साथ ‘धर्मनिरपेक्ष’ (सेक्यूलर) शब्द ही हटा दिया गया है । उसकी जगह संविधान में मनुस्मृति का एक श्लोक जोड़ा गया है, जिसमें कहा गया है कि जहां महिलाओं का सम्मान होता था देवी-देवताओं का वास होता था ।
यह सारा कार्यक्रम भाजपा के राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 और स्कूल शिक्षा फ्रेमवर्क का राष्ट्रीय करीकुलम, 2023 के तहत चल रहा है ।
2007 में कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठजोड़ सरकार के समय एनसीइआरटी ने 12वीं कक्षा की राजनीति शास्त्र पाठ्यपुस्तक में इमर्जेंसी का जिक्र संविधान निर्माण पर पूरा अध्याय के साथ किया था, जब बच्चे किशोर उम्र में पहुंच जाते हैं और किसी तथ्य की समीक्षा के लायक मानसिक विकास हो जाता है । उसमें प्रस्तावना को संविधान का मूल आधार बताकर छात्रों को ‘समाजवादी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ (पंथनिरपेक्ष) और ‘लोकतांत्रिक’ शब्दों का अर्थ विस्तार से समझाया गया था ।
अब ‘संविधान हत्या दिवस’ वाले संविधान का ज्ञान 9वीं कक्षा के छात्र ‘इमर्जेंसी काला अध्याय’ पाठ से हासिल करेंगे । सीखने की पहली उम्र में बच्चे संविधान की जानकारी संविधान के नाम पर चल रही सियासी राजनीति से हासिल करेंगे । इसके पहले सुप्रीम कोर्ट के गठन कार्यकलाप वाले पाठ में एक कक्षा और नीचे 8वीं के बच्चों को ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ से संविधान का ज्ञान देने का प्रयास किया गया ।
एक बुजुर्ग शिक्षक सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को सही से हटाते हुए कहते हैं, इमर्जेंसी में ऐसी अराजकता नहीं थी, और कटाक्ष किया कि भाजपा को तो इमर्जेंसी को स्वर्णिम अध्याय मानना चाहिए, जिसके चलते पहली बार केंद्र में सत्ता में भागीदारी का अवसर मिला ।