इस बार का चुनाव पहले के आम चुनावों से अलग है । चुनाव में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग को इतने बड़े पैमाने पर ताम-झाम, साम-दाम, दंड-भेद और ऐसे-ऐसे इंतजाम लगाने पड़े, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया । चुनाव नियमों में परिवर्तन करना पड़ा । पार्टियों को चुनाव आयोग पर भरोसा नहीं हो रहा है । चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों को विश्वास में लेकर चुनाव कराना है और दलों को सिर्फ जिताऊ चुनाव में हिस्सा लेना है । वोटर हमेशा जगे ही रहते हैं, उन्हें जागरूक करने की जरूरत नहीं है । लेकिन उम्मीदवार सिर्फ अपने चुनावी स्वार्थ के हिसाब से जगते हैं । वे अपने हिसाब से चुनाव चाहते हैं और ऐसा कोई अंकुश किसी पार्टी को बर्दाश्त नहीं होता तो येन-केन प्रकारेण वोटर लुभावन अभियान में बाधक हो ।
10 मार्च को चुनाव आयोग ने सात चरणों में होनेवाले 17वीं लोकसभा चुनावों का एलान किया । कांग्रेस और आम आदमी पार्टी समेत 23 विपक्षी पार्टियों ने 13 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी कि ईवीएम नतीजों का वीवोपैट पर्चियों से मिलान कराने का निर्देश चुनाव आयोग को दिया जाए । चुनाव आयोग के पास वैसे तो 2293 राजनीतिक दल पंजीकृत हैं जिनमें मात्र सात पार्टियों को ‘राष्ट्रीय दल’ और 59 पार्टियों को ‘राज्यस्तरीय दल’ के रूप में मान्यता प्राप्त है । लेकिन शुक्र है, वोट की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए मतदान प्रक्रिया शुरू होने से पहले सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगानेवाली पार्टियों की संख्या मात्र 23 है । इनमें भी कई हैं, जिनकी चुनावी हैसियत दांव पर लगी है और उन पर पंजीकरण खत्म होने का खतरा काफी समय से मंडरा रहा है । सुप्रीम कोर्ट ने याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार की और तुरंत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध की गयी । चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने 25 मार्च को चुनाव आयोग को नोटिस भेजा । चुनाव आयोग को एक से अधिक वीवोपैट उपलब्ध कराने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट में सफाई देनी है । 11 अप्रैल से मतदान प्रक्रिया शुरू हो जाएगी, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख एक अप्रैल तय की । चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों की यह मांग खारिज कर दी, तब वे सुप्रीम कोर्ट गए ।
ईवीएम अर्थात् इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन को ‘फूलप्रूफ’ साबित करते-करते और इस पर सफाई देते-देते चुनाव आयोग थक गया । हारी हुई पार्टियों के लगातार ईवीएम को संदिग्ध बताने वाले अभियान के बाद सुप्रीम कोर्ट के ही दबाव में चुनाव आयोग को वीवोपैट अर्थात् वोटर वैरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल की व्यवस्था करनी पड़ी, ताकि वोटर देख सकें कि वोट उनके पसंदीदा उम्मीदवार के ही पक्ष में गया है । वोटर से ज्यादा इसकी फिक्र उन राजनीतिक दलों को रहती है, जो चुनाव हारते हैं । ईवीएम में छेड़छाड़ की शिकायत हमेशा हारी पार्टियों के नेता करते हैं ।
चुनाव कार्यक्रम के एलान से मात्र एक पखवाड़ा पहले निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग ने आदर्श चुनाव आचार संहिता के नियम बदले । आदर्श चुनाव आचारसंहिता (एमसीसी) का भाग टप्प चुनाव घोषणापत्र से जुड़ा है और जनप्रतिनिधित्व कानून के अनुच्छेद-126 से संबंधित है । इसके अंतर्गत वोटिंग के 48 घंटे पहले चुनाव प्रचार पर रोक है । वही प्रतिबंध चुनाव घोषणापत्र जारी करने के समय पर भी लगाने पर चुनाव आयोग ने विचार किया और राजनीतिक दलों से कहा कि जन प्रतिनिधत्व कानून की धारा-126 की शुचिता का पालन करने के लिए वोटिंग समाप्त होने से कम-से-कम 72 घंटे पहले चुनाव घोषणापत्र जारी कर दें । कांग्रेस के नेतृत्व में कई पार्टियों ने इसका विरोध किया । संयोग कुछ ऐसा रहा कि 22 फरवरी को इधर कांग्रेस चुनाव आयोग के इस प्रस्ताव का विरोध कर रही थी और उधर सुप्रीम कोर्ट ने मतदान में इस्तेमाल हो रहे ईवीएम तथा वीवीपीएटी की समीक्षा के लिए दायर याचिका पर चुनाव आयोग से कैफियत मांगी । वीवीपीएटी पर भी चुनाव आयोग ने एक विशेषज्ञ समिति गठित करके इसी महीने राजनीतिक दलों को विश्वास दिलाने का प्रयास किया । चुनाव घोषणापत्र वोटिंग समाप्त होने से 72 घंटे पहले जारी कर लेने के कांग्रेस विरोध का एक रोचक पहलू ये है कि 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ कांग्रेस ने इसी मामले में चुनाव आयोग के पास शिकायत दर्ज करायी । भाजपा ने प्रथम चरण की वोटिंग के दिन ही चुनाव घोषणापत्र जारी किया । उसके खिलाफ कांग्रेस ने चुनाव आयोग के पास शिकायत किया कि यह वोटरों को लुभाएगा । चुनाव आयोग 2014 में कुछ नहीं कर पाया । क्योंकि आदर्श चुनाव आचारसंहिता घोषणापत्र जारी करने के समय पर चुप है । राजनीतिक दल अपने लिए चुनाव आयोग तो क्या, सुप्रीम कोर्ट का भी निर्देश अनुचित समझते हं । दागी छविवाले उम्मीदवारों के पच रद्द करने का अधिकार चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से तब मांगा जब भाजपा, कांग्रेस समेत किसी भी पार्टी ने इसे ‘व्यावहारिक’ नहीं माना । सुप्रीम कोर्ट ने भी हाथ खड़े कर दिए और जनता के ही हाथ में इस पर फैसला छोड़ दिया । गत वर्ष चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए कानून बनाना संसद के हाथ में है । सुप्रीम कोर्ट को पता था कि कोई दल ऐसा कानून बनाने के पक्ष में नहीं है । इसीलिए दागियों को निर्देश दिया कि अखबारों में विज्ञापन दे के तीन बार अपना आपराधिक रिकार्ड बताएं, पर्चे में ऊपर लिखें । अभी तक ऐसा विज्ञापन शायद ही कहीं देखा गया हो, जिसमें किसी दल या पार्टी ने अपना आपराधिक रिकार्ड एक बार भी बताया हो । ये वही दल हैं, जिनमें से किसी ने भी चुनाव आयोग के इस आग्रह हो नहीं माना कि दागियों को टिकट न दें । भाजपा शासन के कार्यकाल तक सुप्रीम कोर्ट में लोकपाल गठन की तरह ईवीएम, वीवीपीएटी और दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने वाला मुकदमा चला । भाजपा ने या तो चुप्पी लगायी अथवा चुनाव आयोग का बचाव किया । मानो यह कोई सरकारी संस्था हो । कांग्रेस ने भी 2004 से 2014 तक वही किया । 2004 से 2014 तक भाजपा ने ईवीएम छेड़छाड़ को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाया । कांग्रेस ने उसे आगे बढ़ाते हुए वीवीपीएटी को भी संदिग्ध बना दिया । मुश्किल ये है कि चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट को भी पूरी तरह आश्वस्त करने में विफल साबित हुआ है कि ईवीएम में छेड़छाड़ संभव नहीं । इसीलिए सुप्रीम कोर्ट को वीवोपैट के साथ पर्चियां मिलाने की बात माननी पड़ी । इस पर सुनवाई कर रही शीर्ष कोर्ट पीठ ने भी वीवोपैट पर्चियों और ईवीएम में पड़े मतों का मिलान बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने इसी बारे में चुनाव आयोग से जवाब मांगा है कि लोकसभा और विधान सभा चुनावों के प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र से वीवोपैट का एक-एक नमूना जांचने की बजाए क्या इनकी संख्या बढ़ायी जा सकती है । लेकिन जब चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के बीच ही अविश्वास के कारण मन का मिलान नहीं हो पा रहा है तो चुनाव के बाद अभी की 50: वीवीपैट पर्चियों का ईवीएम नतीजों से मिलाने की मांग शत प्रतिशत तक जा सकती है ।
चुनाव आयोग की इस बार की चुनौती पहले से कठिन है । इस चुनाव में आयोग को वोटर की ऊंगली में लगायो जानेवाली न छूटनेवाली स्याही 2014 की तुलना में बढ़ानी पड़ी है । वोटरों की संख्या बढ़ने के अलावे संदेह कम नहीं होना भी इसका एक कारण है । 33 करोड़ रूपये मूल्य के 26 लाख ऐसी स्याही के बोतल मंगाने के आदेश चुनाव आयोग ने दिए हैं ।
धन का दुरूपयोग रोकने के लिए चुनावी बांड का सरकार का प्रस्ताव भी सुप्रीम कोर्ट में चला गया । भाजपा ने दागियों को चुनाव लड़ने से रोकनेवाला बिल लाना चुनाव सुधार का हिस्सा नहीं समझा । लेकिन चुनावी बांड को पारदर्शिता सुनिश्चित करने और चुनाव सुधार की दिशा में ‘एक बड़ा कदम’ सुप्रीम कोर्ट में पेश अपनी दलील में बताया । केंद्रीय वित्त मंत्रालय के इस प्रस्ताव को सीपीएम के नेतृत्व में कुछ पार्टियों ने चुनौती दी ।
चुनाव कार्यक्रम के एलान के दो दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान केंद्र से जानना चाहा कि उम्मीदवारों की संपत्ति की मानीटरिंग करनेवाली मैकेनिज्म संभव है या नहीं । 2018 के फरवरी में भी शीर्ष कोर्ट ने संसद सदस्यों की संपत्ति में बेलगाम इजाफा पर चिंता जताते हुए ऐसी मैकेनिज्म की बात कही ।
तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग से ‘मीडिया आब्जर्वर’ की मांग कर डाली । अपने पूरे शासनकाल में कोई भी चुनाव पारदर्शी नहीं होने देने के लिए दीदी मीडिया उछाल को जिम्मेदार ठहरा रही हैं ।
चुनाव आयोग ने प्रभावित करनेवाले मुद्दे, विज्ञापन, फेक न्यूज, पेड न्यूज, सोसल मीडिया और 19 मई को चुनाव संपन्न होने तक एग्जिट पोल पर भी अंकुश लगाए । जम्मू व कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने श्रीनगर के दो अखबार - ‘गेटर कश्मीर’ और ‘कश्मीर रीडर’ के विज्ञापन पर रोक लगा दी, क्योंकि उसमें भाजपा नीति की आलोचना छपती थी । विरोध में सभी अखबारों ने 10 मार्च को प्रथम पृष्ठ बिल्कुल खाली छापा ।
राम मंदिर का मामला सुप्रीम कोर्ट में होने से चला नहीं । केरल में साबरीमाला मंदिर को भुनाने पर वहां के मुख्य चुनाव अधिकारी टीका राम मीना ने रोक लगायी तो भाजपा के राज्य महासचिव के सुरेन्द्रन को अखर गया । यूपी के पुलिस महानिदेशेक की चुनाव आयोग के निर्देश के खिलाफ दायर याचिका की सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई ही नहीं की ।
पूरा प्रकरण बताता है कि पारदर्शिता लाना संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग की जगह अब सुप्रीम कोर्ट की जिम्मेदारी हो गयी है । इसी स्थिति के कारण देश के प्रबुद्ध मतदाताओं ने ‘नोटा’(उपरोक्त में से कोई नहीं) विकल्प चुना । 2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर शुरू नोटा ने अब तक दो करोड़ वोट खाए । लेकिन एनआरआई(अप्रवासी भारतीयों) के लगभा 3.10 करोड़ वोट मंगाने की व्यवस्था के लिए भाजपा ने अगस्त 2018 में लोकसभा से बिल पारित कराया, जो राज्य सभा में अटका रह गया ।