‘एक देश, एक चुनाव’ - यानी कि लोकसभा के साथ विधान सभाओं के चुनाव कराने से संबंधित बिलों पर विचार कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का कार्यकाल फिर बढ़ा दिया गया ।
अभी चल रहे संसद के मानसून सत्र में जेपीसी अध्यक्ष पी पी चौधरी ने इसका कार्यकाल शीतकालीन सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक बढ़ाने का प्रस्ताव लोकसभा में रखा, जिसे सदन ने मंजूरी दे दी । संसद का यह पांचवां सत्र है, जिसमें संयुक्त संसदीय समिति की फाइनल रिपोर्ट सौंपने की डेडलाइन बढ़ायी गयी है । हर सत्र के बीच में जेपीसी अध्यक्ष इसका कार्यकाल बढ़ाने के प्रस्ताव में कहते हैं कि अगले संसदीय सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन फाइनल रिपोर्ट सदन में रखी जाएगी । वर्ष 2025 के बजट सत्र से यह सिलसिला चला आ रहा है और अभी पांचवीं बार डेडलाइन बढ़ायी गयी है ।
सदन में इसका कोई कारण नहीं बताया गया, न ही कोई सदस्य इस संबंध में सवाल उठाते हैं । जेपीसी का विभिन्न राज्यों का दौरा और राज्य सरकारों, विधान सभा चुनावों से जुड़े व्यक्तियों तथा देश भर के सभी तबके के लोगों से विचार-विमर्श जारी है । इस संबंध में जेपीसी अध्यक्ष पी पी चौधरी ही सिर्फ बयान राज्य दौरों के क्रम में देते हैं कि 2029 में लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ होना है । उनके अनुसार विचार-विमर्श पूरा होनेवाला है और ज्यादातर लोग ‘एक देश, एक चुनाव’ के पक्ष में हैं ।
इसके लिए जरूरी संविधान संशोधन बिलों पर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) 2024 के शीतकालीन सत्र के समय से ही विचार कर रही है, जब बिल संसद में पेश किया गया । ये बिल हैं - संविधान (129वां संशोधन) बिल, 2024 और संघ शासित क्षेत्र कानून (संशोधन) बिल, 2024 ।
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक कमिटी 2024 लोक सभा चुनाव करीब आने से कुछ महीने पहले सितंबर, 2023 में गठित की गयी, जिसने मार्च, 2024 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘एक देश, एक चुनाव’ आइडिया के अनुसार 2029 में लोकसभा और विधान सभा चुनाव साथ-साथ कराने की योजना को ध्यान में रखकर रामनाथ कोविंद कमिटी ने रिपोर्ट तैयार की । केंद्र सरकार ने रिपोर्ट तो स्वीकार कर ली, मगर इसके लिए संविधान संशोधन बिल संसद के दोनों सदनों से पास नहीं हो पाया ।
17-12-2024 को संसद में दोनों बिल पेश करते ही सरकार को भारी विरोध का सामना करना पड़ा और इस पर आगे विचार के लिए संयुक्त संसदीय समिति गठित की गयी । इस समिति में दोनों सदनों के सभी दलों के 39 सदस्य हैं । उनमें से कोई भी सदन के अंदर या बाहर इस संबंध में कुछ नहीं बोलते । दिसंबर, 2024 में संसद के शीतकालीन सत्र में बताया गया कि जेपीसी 2025 बजट सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन रिपोर्ट सौंपेगी । 25 मार्च, 2025 को बजट सत्र के बीच में अध्यक्ष पी पी चौधरी ने संसद के मानसून सत्र के अंतिम सप्ताह के पहले दिन तक अवधि बढ़ाने का प्रस्ताव रखा ।
जाहिर है कि इस सिलसिले के जारी रहने का मुख्य कारण जेपीसी में सत्तापक्ष और विपक्षी सदस्यों के बीच संविधान संशोधन बिलों पर सहमति न होना है । इसलिए जेपीसी अवधि बढ़ाने का प्रस्ताव अध्यक्ष के रखते ही ऐसे ध्वनि मत से पास होता है, मानो सदन पहले से इसके लिए तैयार बैठा हो ।
रामनाथ कोविंद कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि लोकसभा के साथ सभी विधान सभाओं के चुनाव संपन्न होने के 100 दिनों के अंदर पंचायतों, नगर निगमों, नगर पालिकाओं के चुनाव कराए जाएं । ऐसा उन्होंने सुरक्षा और प्रशासनिक इंतजाम को ध्यान में रखकर सुझाव दिया ताकि चुनावकर्मियों तथा सुरक्षा बलों की तैनाती में सहूलियत हो । कोविंद कमिटी के अनुसार ‘एक देश, एक चुनाव’ प्रस्ताव पर सहमति बनाने के लिए 65 बैठकों के दौरान 47 राजनीतिक दलों से राय ली गयी । उनमें से 32 दल इस प्रस्ताव के समर्थक और 15 विरोधी थे । इस जानकारी को सही मानकर चलें तो 15 विरोधी दलों में कइयों की विभिन्न राज्यों में उस समय सरकारें थीं, जब कोविंद कमिटी विचार-विमर्श कर रही थी ।
2024 लोकसभा चुनाव परिणाम भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व के अनुकूल नहीं आया । कांग्रेस 2014 और 2019 आम चुनाव में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के बावजूद इतनी सीटें नहीं जीत पायी ताकि लोकसभा में कांग्रेस को मुख्य विपक्षी दल का दर्जा मिले । तो कांग्रेस और उसके इंडिया गठजोड़ सहयोगियों ने 2024 में इतनी बड़ी संख्या में सीटें जीती कि विपक्ष की सहमति के बगैर सरकार लोकसभा में कोई बिल पास नहीं करा सकती ।
कांग्रेस शुरू से ही ‘एक देश, एक चुनाव’ को संविधान के बुनियादी ढांचे और देश की संघीय व्यवस्था के खिलाफ बता रही है । ‘इंडिया गठजोड़’ के घटक दलों के भी विरोध का ही स्वर है । केंद्र में सत्तारूढ़ (एनडीए) राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ को साथ लेकर भी भाजपा के पास ‘एक देश, एक चुनाव’ संशोधन बिलों को पास कराने के लिए जरूरी दो तिहाई बहुमत जुटाना मुश्किल है ।
इस वर्ष अप्रैल-मई में हुए पांच विधान सभाओं के चुनाव परिणाम भाजपा के लिए झटका भी था और इजाफा भी । पश्चिम बंगाल में भाजपा पहली बार सत्ता में आयी और 15 साल से कायम तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गयी । तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ‘एक देश, एक चुनाव’ का कांग्रेस की ही तरह शुरू से विरोध कर रही हैं । हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में फूट से पार्टी छोड़नेवाले 20 लोकसभा सदस्यों ने खुद को एक छोटी पार्टी के बैनर तले आकर भाजपा गठजोड़ का हिस्सा बताया है । महाराष्ट्र में शिव सेना छोड़कर भाजपा के साथ सत्ता गठजोड़ में शामिल हुए 6 लोकसभा सदस्यों को भाजपा समर्थक ‘अलग गुट’ के रूप में मान्यता देने के लोकसभा स्पीकर के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है । विपक्षी दलों का आरोप है कि यह सारा जोड़-तोड़ भाजपा लोकसभा में लंबित संशोधन बिल पास कराने को समर्थन जुटाने के लिए कर रही है । आम आदमी पार्टी से सभी टूटकर सांसद भाजपा में शामिल हुए सीनियर एडवोकेट ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर दल-बदल करने/कराने की ऐसी प्रवृत्ति पर रोक लगाने में हस्तक्षेप का आग्रह किया है, जिसमें सदन की सदस्यता समाप्त न हो ।
ओडिशा में भी भाजपा 2024 से सत्ता में है । वहां लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहे बीजू जनता दल प्रमुख नवीन पटनायक ने ‘एक देश, एक चुनाव’ पर स्पष्ट राय नहीं दी ।
2026 में पश्चिम बंगाल के साथ हुए असम, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी विधान सभा चुनावों का परिणाम भी मिला-जुला रहा । असम में भाजपा तीसरी बार सत्ता में लौटी । लेकिन केरल और तमिलनाडु विधान सभाओं में भाजपा प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर रहा ।
2027 में उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, नगालैंड और मणिपुर में चुनाव होना है । फिर 2028 में भी कुछ राज्यों में चुनाव होंगे । 2029 में लोकसभा के साथ चुनाव कराने के लिए इन राज्यों की विधान सभाओं को भंग करना होगा । यह तभी संभव है, जब संविधान संशोधन करके सरकार चुनाव आयोग को इतना अधिकार दे ।
संविधान की धारा 83 और 85 संसद के कार्यकाल और भंग करने से सम्बन्धित है, जिसके लिए राज्यों की मंजूरी नहीं चाहिए । धारा 172 और 174 राज्य विधान सभाओं के कार्यकाल बढ़ाने, भंग करने तथा धारा 356 का इस्तेमाल करके राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू करने से जुड़ा है । मगर इससे सम्बन्धित संविधान संशोधन के लिए संसद में दो तिहाई बहुमत चाहिए ।
रामनाथ कोविंद कमिटी की सिफारिशों के अनुसार स्थानीय निकायों - पंचायत, नगर निगम, नगर पालिकाओं के कार्यकाल में बदलाव के लिए राज्यों की मंजूरी चाहिए ।
अभी मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक और संवैधानिक विवादों में घिरे चुनाव आयोग पर सभी विपक्षी दल भाजपा के कथित एजेंडे के अनुसार काम करने के आरोप लगा रहे हैं । राज्य चुनाव आयोग राज्य सरकारों की सहमति के बिना आगे कोई कदम उठाएगा, इसकी संभावना नहीं लगती ।
‘एक देश, एक चुनाव’ पर राजनीतिक के अलावा वैधानिक अड़चनें भी हैं । यह सिर्फ सत्तापक्ष और विपक्ष के आपसी मतभेद का मामला नहीं है । एक साथ चुनाव पर विधि आयोगों ने अलग-अलग समयों में अलग-अलग राय दी है । भारत के रिटायर प्रधान न्यायाधीशों ने जेपीसी के सामने चुनाव आयोग के अधिकारों में उल्टे कटौती करने की राय दी है और मौजूदा संवैधानिक सेट-अप में ‘एक देश, एक चुनाव’ को अव्यावहारिक बताया है । चुनाव आयोग की भी समय के हिसाब से अलग-अलग राय रही है । ‘एक देश-एक चुनाव’ संशोधन बिलों में चुनाव आयोग को ज्यादा अधिकार देने का प्रावधान है ।
पूर्व सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने मार्च, 2025 में राज्य सभा सदस्य के रूप में जेपीसी बैठक को चेताया कि लोकसभा और विधान सभाओं का चुनाव साथ कराने का अधिकार चुनाव आयोग को नहीं दिया जाना चाहिए । रिटायर प्रधान न्यायाधीश यू यू ललित, डी. वाई. चन्द्रचूड़, संजीव खन्ना और जेपीसी के कई संसद सदस्यों ने भी सितंबर, 2025 में यही सुझाव दिए ।
मतदाता सूची पुनरीक्षण विवाद को लेकर चुनाव आयोग अपने वर्तमान संवैधानिक अधिकार पर ही सुप्रीम कोर्ट को बार-बार आश्वस्त नहीं कर पा रहा है । सुप्रीम कोर्ट यह मानने को तैयार नहीं है कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची पुनरीक्षण के क्रम में किसी मतदाता की नागरिकता सुनिश्चित करने का भी अधिकार है । राजनीतिक दलों ने देश की संघीय व्यवस्था और राज्यों के महकमे में हस्तक्षेप का आरोप लगाया है ।
1999 के बाद से लोकसभा चुनाव तो निर्धारित पांच साल पर हो रहा है, मगर कुछ-कुछ राज्य विधान सभाओं के चुनाव हर वर्ष होते हैं । किसी दल के सत्ता में बरकरार रहने या सत्ता से हटने का क्रम चल रहा है । अभी जहां तक संविधान संशोधनों को राज्यों की मंजूरी की बात है, वो इस बात पर निर्भर है कि 2029 लोकसभा चुनाव करीब आने तक किस राज्य में किस दल की सरकार बनती है और किसकी गिरती है ।
लोकसभा और विधान सभा चुनावों के मुद्दे अलग-अलग होते हैं । स्थानीय निकाय चुनावों में स्थानीय मुद्दे हावी रहते हैं और प्रायः राज्य सरकारें ये चुनाव टालती रहती हैं । कई राज्यों में हाईकोर्टों में मामला जाने पर नगरपालिकाओं के चुनाव होते हैं । ऐसी स्थिति में राज्य सरकारें यह अधिकार चुनाव आयोग को देनेवाले संविधान संशोधन को मंजूरी देंगी, इसकी उम्मीद कम लगती है । अभी कहीं-कहीं नयी पार्टी सत्ता में आ रही है, जिनका रुझान तय नहीं है । उदाहरण के लिए तमिलनाडु, जहां नयी पार्टी TVK (टीवीके) नेता जोसेफ सी. विजय द्रमुक को 2026 में हराकर मुख्यमंत्री बने । कांग्रेस उसकी समर्थक हो गयी ।
नरेंद्र मोदी 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही ‘एक देश, एक चुनाव’ पर देश में चर्चा कराने पर जोर दे रहे हैं, ताकि 1967 से पहले वाली स्थिति वापस आए जब लोकसभा के साथ विधान सभाओं के चुनाव हो रहे थे । लेकिन इसमें भाजपा शासित राज्यों की सरकारों ने भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी । चुनाव आयोग ने इसके लिए आवश्यक संविधान संशोधन करके सरकार से वो अधिकार देने कहा, जिसे लेकर यह संशोधन बिल संसद से पास नहीं हो रहा है ।
सितंबर, 2024 में चुनाव आयोग ने रामनाथ कोविंद कमिटी और विधि आयोग को बताया कि संविधान संशोधन के अलावा की दिक्कतें ज्यादा हैं । इसके लिए बड़े पैमाने पर इवीएम EVM (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) और (VVPAT) वी वी पी ए टी (वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल) खरीदनी होंगी, जिसकी अनुमानित लागत आएगी 9,284.15 करोड़ । मुख्य चुनाव आयुक्त (सीइसी) राजीव कुमार के अनुसार 400-500 से ज्यादा अतिरिक्त सुरक्षा बल कंपनियों की जरूरत होगी, जिनकी एक साथ चुनाव में यहां से वहां तैनाती कठिन होगी । 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान 10.48 लाख बूथ बनाए गए, जिसमें एक करोड़ चुनावकर्मी और सुरक्षाकर्मी लगाए गए । अगर विधान सभा चुनाव साथ कराए गए तो इनकी संख्या बढ़ेगी । चुनाव कर्मियों की किल्लत रहती है, स्कूल शिक्षकों को लगाना पड़ता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है ।
लॉजिस्टिक्स संबंधी दिक्कतों का जिक्र करते हुए CEC ने कहा कि 2029 में एक साथ चुनाव व्यवस्था लागू करने के लिए 53.76 लाख बैलेट यूनिट और इवीएम की 38.67 लाख कंट्रोल यूनिट खरीदने के अतिरिक्त इन मशीनों के स्टोरेज से वेयरहाउसिंग की लागत भी बढ़ेगी । 2015 और 2023 में भी चुनाव आयोग ने केंद्रीय कार्मिक, जन शिकायत, कानून और न्याय मंत्रालय से संबद्ध स्थायी संसदीय समिति के सामने अपना यह पक्ष रखा था ।
लेकिन 2022 में CEC (मुख्य चुनाव आयुक्त) सुशील चन्द्रा ने कहा कि चुनाव आयोग एक साथ चुनाव कराने को तैयार है, सिर्फ संविधान संशोधन की जरूरत है । वर्तमान CEC ज्ञानेश कुमार ने भी वही जुमला दुहराया है ।
अभी 23वें विधि आयोग की भाषा केंद्रीय कानून मंत्रालय वाली है कि इस संशोधन से संविधान के संघीय ढांचे पर कोई आंच नहीं आएगी । 2022 और 2018 में विधि आयोग ने एक साथ चुनाव के खिलाफ राय दी ।
2029 में आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, सिक्किम विधान सभाओं को तो फर्क नहीं पड़ेगा, 2024 लोकसभा के साथ जिनके चुनाव हुए । बाकी विधान सभाओं का भविष्य संशोधन पर टिका है यह बात भी याद रखने की है कि 2022 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधान सभाओं का कार्यकाल साथ पूरा होने के बावजूद चुनाव आयोग एक साथ चुनाव नहीं करा पाया । 2024 में जम्मू व कश्मीर विधान सभा का चुनाव लोकसभा के साथ नहीं करा पाया, जहां संशोधन की जरूरत नहीं थी । सुरक्षा कारणों से पूरे प्रशासन ने हाथ खड़े कर दिए कि वे एक साथ चुनाव नहीं करा सकते, जैसा कि सीइसी राजीव कुमार ने सितंबर, 2024 में बताया ।