तेलंगाना राष्ट्र समिति(टीआरएस) सुप्रीमो और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव गैर.कांग्रेस विपक्षी एकता के प्रयास में जिस समय समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव से दिल्ली में मिल रहे थे, उसी समय भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी(सीपीआई) महासचिव डी. राजा विपक्षी एकता में कांग्रेस को बाधक बता रहे थे ।
केसीआर(के. चन्द्रशेखर राव) के लोकप्रिय संबोधन से पुकारे जाने वाले तेलंगाना के मुख्यमंत्री गैर. कांग्रेस, गैर.भाजपा विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए इन दिनों दिल्ली में हैं । इस सिलसिले में तेलंगाना राष्ट्र समिति प्रमुख केसीआर ने समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और वरिष्ठ सपा नेता रामगोपाल यादव से इस हफ्ते दिल्ली में मुलाकात की । उनकी मुलाकात के दिन 29 जुलाई को ही कांग्रेस गठजोड़ के एक पुराने सहयोगी दल सीपीआई महासचिव डी. राजा ने विस्तृत बयान जारी करके कांग्रेस की तीखी आलोचना की । सीपीआई नेता ने कांग्रेस को ‘वैचारिक स्तर पर कुंद और असामयिक’ हो चुकी पार्टी बताते हुए कहा कि विपक्ष को साथ लेकर चलने लायक अब यह पार्टी नहीं रह गयी है । डी. राजा ने यों तो क्षेत्रीय दलों को भी भाजपा के खिलाफ तगड़ा विपक्ष बनने में नाकामयाबी के लिए जिम्मेदार ठहराया । लेकिन सीपीआई महासचिव ने मुख्य रूप से कांग्रेस पर ही हमला बोला और कहा कि अंदरूनी कलह, दल.बदल के कारण कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों को एकजुट करने में विफल साबित हुई है । उन्होंने कांग्रेस की विपक्षी एकजुटता नीति को ‘एड.हॉक’ करार दिया ।
सीपीआई नेता का दिल्ली में जारी यह बयान पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की जुलाई के पहले सप्ताह में हुई बैठक में पारित राजनीतिक प्रस्ताव का दस्तावेज था । विजयबाड़ा में अक्टूबर में होनी वाली सीपीआई की 24वीं कांग्रेस में यह दस्तावेज पेश किया जानेवाला हैं । कांग्रेस के साथ कहीं तालमेल और कहीं घालमेल गठजोड़ जारी रखते हुए सीपीआई खुद देश भर में हाशिए पर जा चुकी है । कम्यूनिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय स्तर पर अभी.भी मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का निंदा थोड़ी बेतुकी जरूर मगर अर्थहीन नहीं लगती है । मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी(सीपीएम) का भी पश्चिम बंगाल के बाद त्रिपुरा में भी सत्ता से बाहर होने के बाद अपने ‘सौतेले भाई’ सीपीआई वाला हाल हो चुका है । अब ये दोनों वाम दल एकमात्र केरल में अस्तित्व बचाए हुए हैं । सीपीएम भी कांग्रेस की निंदा का कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देती । सीपीएम के नेतृत्ववाली केरल की वाम मोर्चा सरकार में कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है । सीपीआई नेता डी. राजा ने ‘कम्यूनिस्ट आन्दोलन की एकता’ पर बल दिया, जो कई दशकों से आपसी दरारों में फंसी है ।
गैर.भाजपा विपक्षी एकता की कोशिश तो समझ में आती है । क्योंकि भाजपा केंद्र के साथ.साथ कई राज्यों में सत्ता में है । लेकिन तेलंगाना राष्ट्र समिति(टी आर एस) नेता चन्द्रशेखर राव ने गैर.भाजपा के साथ.साथ गैर.कांग्रेस विपक्षी एकजुटता की बात कही । इससे इतना तो अंदाजा लग ही जाता है कि टी आर एस समेत जितनी क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय मंच तैयार करने में जुटी है । उनमें ज्यादातर कांग्रेस के साथ मंच साझा नहीं करना चाहती । केसीआर की तरह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तृणमूल कांग्रेस प्रमुख की हैसियत से विपक्षी एकजुटता में जुटी हैं । ममता बनर्जी(दीदी) और केसीआर दोनों ऐसी मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों के नेता हैं, जिनकी विपक्षी एकजुटता के प्रयासों के पीछे अपनी भी राष्ट्रीय नेतृत्व के रूप में उभरने की महात्वाकांक्षा है । कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाए रखकर केसीआर तथा दीदी के विपक्षी एकता बनाए रखकर केसीआर तथा दीदी के विपक्षी एका एजेंडे में कांग्रेस की छवि इसमें बाधक के रूप में उभरी है । ये दोनों कांग्रेस को विपक्षी मोर्चा का संयोजक या नेतृत्वकर्ता के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं । सीपीआई ने तो इसे कांग्रेस एकजुटता प्रयास की विफलता करार दिया, जो अपने अंदरूनी कलह से ही उबर नहीं पा रही है । सीपीआई की ओर से जारी दस्तावेज में यहां तक कहा गया कि 2019 आम चुनाव में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के केरल की वायनाड लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने के फैसले से वामदलों को नुकसान हुआ और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक एकता में बाधा पहुंची ।
अभी ऐसे समय में तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने विपक्षी एकजुटता अभियान को आगे बढ़ाया है, जब उपराष्ट्रपति चुनाव सामने है और विपक्षी दलों के लिए भाजपा के खिलाफ साझा उम्मीदवार तय करना चुनौती बनी हुई है । दिल्ली से प्राप्त सूत्रों के अनुसार दीदी(ममता बनर्जी) उसी सिलसिले में दिल्ली आनेवाली हैं और चन्द्रशेखर राव उनसे मिलेंगे । लेकिन केसीआर की अखिलेश यादव से बातचीत में उपराष्ट्रपति चुनाव का मामला चर्चा में आया, ऐसा सुनने को नहीं मिला । केसीआर की नजर इस बर्ष के अंत में होनेवाले तेलंगाना विधान सभा चुनाव और 2024 के आम चुनाव पर है । क्षेत्रीय दलों में भाजपा के आगे दीदी के बाद दूसरी चुनौती तेलंगाना राष्ट्र समिति है । केसीआर कांग्रेस और भाजपा दोनों को रास्ते से हटाना चाहते हैं ।
लेकिन राष्ट्रीय विपक्षी एकजुटता प्रयास में केसीआर और दीदी दोनों ही अखिलेश यादव को साथ लेकर चलना चाहते हैं । आम आदमी पार्टी प्रमुख दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाल में पंजाब विधान सभा में कांग्रेस तथा भाजपा दोनों को हाशिए पर ला दिया । तेजी से जनाधार मजबूत करने में जुटी आम आदमी पार्टी अभी एकमात्र क्षेत्रीय पार्टी है, जिसकी दो जगह सरकार है । इसलिए आम आदमी पार्टी को गैर.भाजपा और गैर.कांग्रेस विपक्षी एकजुटता में मजबूत कड़ी मानी जा रही है । संसद के चालू मानसून सत्र में कांग्रेस सदस्यों को लेकर अभी जो गतिरोध चल रहा है, उससे आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने खुद को अलग रखा है । तृणमूल कांग्रेस सरकार में मंत्री पार्थ चटर्जी के शिक्षक नियुक्ति घोटाला मामले में लिप्त पाए जाने के सबूत मिलने से दीदी का पलड़ा विपक्षी खेमे में हल्का पड़ा है । पार्थ को मंत्री पद से हटाए जाने और पार्टी से निलंबित किए जाने के बावजूद दीदी की पाक साफ छवि नहीं बन पायी है ।
पिछले कुछ महीनों से केसीआर और दीदी ने सभी क्षेत्रीय दलों से मिलने.जुलने का जो कार्यक्रम चलाया, उसमें कांग्रेस को शामिल नहीं किया । केसीआर और दीदी जो जहाज भंवर में उतारने में जुटी हैं, उसमें कांग्रेस को छोड़ने से छेद रह जाएगा, जिससे पानी भरना नहीं रूकेगा । फिर उस जहाज को डूबने से बचाना और किनारे ले जाना मुश्किल होगा । नेतृत्व संकट से जूझ रही कांग्रेस अभी राष्ट्रीय क्षितिज पर बीते दिनों की पार्टी नहीं बनी है । क्षेत्रीय दलों में भी कुछ ऐसी पार्टियां हैं, जो कांग्रेस से रिश्ता एकदम से तोड़कर गैर.भाजपा विपक्षी एकजुटता के पक्ष में नहीं है । केसीआर अपने विपक्षी एकजुटता प्रयास में जितने नेताओं से मिले, उनमें कांग्रेस से तालमेल रखनेवाले दल हैं. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सुप्रीमो शरद पवार, राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख तेजस्वी यादव, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री द्रमुक नेता एम. के. स्टालीन, झारखंड के मुख्यमंत्री झारखंड मुक्ति मोर्चा नेता हेमंत सोरेन और उनके पिता पार्टी संस्थापक शिबू सोरेन । झारखंड में कांग्रेस सरकार में शामिल है । महाराष्ट्र में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे जिस गठजोड़ सरकार के मुख्यमंत्री थे, उसमें कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस दोनों ही शामिल थी । हाल ही में शिव सेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे ने जो सरकार गिरायी है । केसीआर पूर्व प्रधानमंत्री जद( सेक्युलर) नेता एच. डी. देवेगौड़ा से भी मिले, जिनका कांग्रेस के प्रति नरम रवैया है । केसीआर को सीपीआई नेता डी. राजा ने अपनी पूर्व भेंट अभी सार्थक लगी होगी ।
2022 के जनवरी.फरवरी से ही केसीआर ने विभिन्न नेताओं से मिलना.जुलना शुरू कर दिया था । केसीआर ने ममता बनर्जी से कोलकाता जाकर, अरविंद केजरीवाल से दिल्ली में, शरद पवार से मुंबई में, एम. के. स्टालीन से चेन्नई में, देवेगौड़ा से बंगलोर में, हेमंत सोरेन से रांची जाकर मुलाकात की । इसमें ममता बनर्जी उनकी सहयोगी रही ।
लेकिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालीन ने 28 फरवरी को अपनी आत्मकथा के विमोचन समारोह के बहाने जो गैर.भाजपा विपक्षी एकजुटता का प्रयास किया, वो खटास में बदल गयी । आत्मकथा का विमोचन राहुल गांधी ने किया । ममता बनर्जी और केसीआर न्योते के बावजूद भी चेन्नई नहीं गए । केरल के मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन, जम्मू व कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री नेशनल कान्फ्रेंस प्रमुख फारूक अब्दुल्ला और तेजस्वी यादव चेन्नई पहुंचे ।
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मइपेजम ख्र ऐकींदण्पद