केरल में मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी(सीपीएम) के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ लोकतांत्रिक मोर्चा(एलडीएफ) को कांग्रेस ने झटका दिया है । हालिया विधान सभा उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार उमा थॉमस ने सीधे मुकाबले में सीपीएम प्रत्याशी डा. जो जोसेफ को 25000 वोटों के भारी अंतर से हराया। ये हार सीपीएम के लिए मायने रखती है क्योंकि केरल से बाहर पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में कांग्रेस तथा सीपीएम में प्रायः चुनाव गठजोड़ रहता है। खासकर बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और अभी मजबूत विपक्ष के रूप में उभरी भाजपा से मुकाबले के लिए वामदलों के साथ सीटों के तालमेल की बातचीत में मुख्य भूमिका ‘बिग ब्रदर’ के रूप में सीपीएम निभाती है। लेकिन केरल में एलडीएफ और कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा(यूडीएफ) हर चुनाव में एक-दूसरे के खिलाफ उम्मीदवार खड़े करती है। अभी केरल विधान सभा में कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है।

केरल के एर्नाकुलम जिले की थ्रिक्काकारा विधान सभा सीट कांग्रेस विधायक पी. टी. थॉमस के निधन से रिक्त हुई थी । उसके लिए हुए उपचुनाव में थॉमस की पत्नी उमा थॉमस को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया था । 3 जून को घोषित परिणाम ने मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन को कई कारणों से सकते में डाल दिया, जिनके लिए यह हार स्वीकारना कठिन हो रहा है । कांग्रेस की तरह सीपीएम ने भी इस उपचुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया हुआ था और सीपीएम ने अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस नेतृत्व में फूट डालने का भी प्रयास किया ।

इस विधान सभा सीट के लिए मतदान से पहले की चुनाव प्रचार और अन्य जितनी खबरें तिरुवनंतपुरम से मिली, उससे लगता है कि इन दोनों दलों की गांठों के बंधन में धार्मिक एजेंडा समाया था । सीपीएम और कांग्रेस दोनों को एक-दूसरे पर भाजपा के ‘हिन्दुत्व एजेंडे’ के प्रति नरम रवैया रखने का आरोप लगाकर इसाई समुदाय के वोटों पर दबदबा का सबूत जुटाया था । इसमें कांग्रेस के लिए ‘जीओ या मरो’ वाली यह जीत थी । क्योंकि केरल में निर्णायक भूमिका निभानेवाले मुस्लिम और इसाई वोटों पर कांग्रेस की परंपरागत पकड़ है । विशेषकर थ्रिक्काकारा सीट तो खास मायने रखती थी, जहां सबसे ज्यादा इसाई वोटर हैं । इस चुनाव परिणाम से कई परतें उजागर हुई हैं, जो अभी तक चुनावी परिपाटी मानी जाती थी और चुनाव परिणाम का अंदाजा पहले से ही तय रहता था ।

केरल में प्रायः उपचुनाव सत्तारूढ़ मोर्चा द्वारा जीतने की परंपरा रही है इस शहरी सीट ने विपक्षी मोर्चा के उम्मीदवार को जिताकर नयी परिपाटी शुरू की । उतना ही नहीं, 2011 में इस विधान सभा क्षेत्र के बनने के बाद से पहली बार किसी उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोटों के अंतर से जीत मिली है । उमा थॉमस के पति 2021 विधान सभा चुनाव में 14,300 वोटों से जीते थे, जो कांग्रेस के परंपरागत मजबूत नेता माने जाते थे ।

2011 से ही पश्चिम बंगाल से कांग्रेस और सीपीएम के बीच ऐसे बेमेल चुनावी गठजोड़ की शुरूआत हुई, जो केरल में दोनों दलों को असहज कर देती थी । 2011 में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का एक मजबूत क्षेत्रीय दल के रूप में उदय हुआ और ममता बनर्जी(दीदी) ने സിപിएम नीत वाम मोर्चा का 37 वर्ष से कायम एकछत्र राज समाप्त किया । उसके पहले तक कांग्रेस बंगाल में एकमात्र मजबूत विपक्षी पार्टी थी । 2011 से लेकर 2021 तक कांग्रेस और सीपीएम दोनों को ही तृणमूल कांग्रेस से लड़ने के लिए एक-दूसरे की औकात तौलते हुए मजबूरन चुनावी गठजोड़ करना पड़ रहा है । तीनों विधान सभा चुनावों में दीदी ने कांग्रेस से ज्यादा वाम मोर्चा को बैकफुट पर ला दिया है । सीपीएम तृणमूल कांग्रेस के सीधे निशाने पर पड़ रहा और कांग्रेस के प्रति दीदी ने कड़ा रवैया कभी नहीं अपनाया । इन 15 वर्षों में सीपीएम और कांग्रेस गठजोड़ एक-दूसरे पर हार का ठीकरा मढ़ता रहा ।

जबकि केरल में कांग्रेस मोर्चा और वाम मोर्चा हमेशा सीधे मुकाबले में रहे । केरल के मतदाताओं ने 2021 से पहले एक मोर्चा को लगातार दूसरी बार सरकार बनाने का मौका नहीं दिया ।

2021 में केरल और पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव के दौरान ही इन दोनों मोर्चों की आपसी खींचातानी में एक तरफ भाजपा का ‘हिन्दुत्व एजेंडा’ हावी रहा । दूसरी तरफ बंगाल में भाजपा की काट में दीदी की एक साथ कांग्रेस, वाम दल और भाजपा तीनों के घोषित वोट बैंक खाते में सेंधमारी सफल रही ।

बंगाल में पहली बार भाजपा 77 सीटें जीतकर विधान सभा में मजबूत विपक्ष बनी । वाम मोर्चा का खाता भी नहीं खुला और कांग्रेस अन्य तीन सीटों में शुमार हो गयी । केरल में वाममोर्चा सत्ता में बरकरार रह गयी । चुनाव परिणाम से दो बातें सामने आयीं । कांग्रेस का परंपरागत मुस्लिम और ईसाई वोट वाम मोर्चा को चला गया । वाम मोर्चा मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन ने कांग्रेस नीत मोर्चा पर भाजपा से मिलीभगत का आरोप लगाया । इस आरोप-प्रत्यारोप का असर एक साल बाद अभी मई, 2022 में ताजा विधान सभा उपचुनाव परिणाम में देखने को मिला ।

थ्रिक्काकारा में सीपीएम की एक चुनावी सभा में वरिष्ठ कांग्रेस नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री के. पी. थॉमस ने मुख्यमंत्री विजयन की तारीफ की और पार्टी पर आरोप लगाया कि कांग्रेस के ‘नरम हिन्दुत्व लाईन’ अपनाने से देश में सांप्रदायिक सद्भाव का माहौल खराब हो रहा है । केरल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के. सुधाकरन तुरंत एक्शन में आए और 12 मई को चुनाव सभा के दिन ही के. वी. थॉमस को पार्टी से निकाल दिया । कांग्रेस को अपना इसाई वोट बैंक सुनिश्चित करना था और भारी जीत से कांग्रेस नेताओं ने इत्मीनान महसूस किया ।

2021 विधान सभा चुनाव से कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट का केरल के साबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने के फैसले के कारण कांग्रेस और सीपीएम में तकरार बढ़ी । कांग्रेस ने हिन्दू वोट भाजपा के खाते में जाने से रोकने के लिए अपनी नीति बदली, क्योंकि भाजपा नेता इस मुद्दे को भुनाने में जुटे । मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन तटस्थ बने रहे । भाजपा का खाता भी नहीं खुला । कांग्रेस का वोट बंट गया । 2016 विधान सभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पर सोने की तस्करी में शामिल होने का आरोप लगा कि भरा थैला उन्हें मिला, जिसका तार संयुक्त अरब अमीरात से जुड़ा था । इसे भाजपा और कांग्रेस दोनों ने उछाला । अभी उपचुनाव परिणाम सामने आने के बाद पूर्व वाणिज्य दूतावास अधिकारी और एक अभियुक्त स्वप्ना सुरेश ने इसे फिर दुहराया । आरोप के जवाब में मुख्यमंत्री ने कहा कि यह ‘एक खास एजेंडे’ का हिस्सा है, जिसमें उनका इशारा कांग्रेस और भाजपा दोनों की ओर है ।

अप्रैल, 2022 में केरल के कन्नूर में आयोजित सीपीएम के 23वें वार्षिक सम्मेलन में भाग लेने के लिए के. पी. थॉमस और तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट से जीते कांग्रेस नेता शशि थरूर को आमंत्रित किए जाने पर भी कांग्रेस नेतृत्व असहज हो गया । केरल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुधाकरन ने पहले ही डिक्टैट जारी कर दिया कि संसद सदस्य समेत कोई पार्टी नेता सीपीएम के सेमीनारों में अगर हिस्सा लेते हैं तो उन्हें कार्रवाई का सामना करना होगा ।

2021 में तमिलनाडु विधान सभा चुनाव में भी कांग्रेस ने डीएमके से हमेशा रहनेवाला चुनावी गठजोड़ त्यागकर उसी से मुकाबले के लिए सीपीएम के साथ गठजोड़ कर लिया । दोनों में से किसी को भी एक भी सीट नहीं मिली । भाजपा ने 4 सीटों पर बाजी मार दी । डीएमके नेता एम. के. स्टालीन भारी बहुमत से मुख्यमंत्री बने ।

कांग्रेस तो प्रभावशाली राष्ट्रीय पार्टी थी । मगर सीपीएम की केरल की तरह ही मजबूत रीढ़ पूर्वोत्तर के एकमात्र राज्य त्रिपुरा में थी । त्रिपुरा में कांग्रेस मुकाबले में नहीं थी और भाजपा का नामोनिशान नहीं था । अभी त्रिपुरा में भाजपा की सरकार है ।