पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC - सीइसी) एस॰ वाई॰ कुरेशी ने राजनीतिक विस्फोट वाली अपनी कुछ यादें सार्वजनिक करके चुनाव आयोग की भूमिका पर उठ रहे सवालों में नया बवाल छेड़ दिया है। उन्होंने अवसर देखकर ऐसे समय में नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है, जब चुनाव आयोग कांग्रेस समेत विपक्षी गठजोड़ इंडिया एलायंस के सभी घटक दलों के निशाने पर है। वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त (सीइसी) ज्ञानेश कुमार मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन - SIR) अभियान से लेकर पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव कराने के मामले पर लगातार विपक्षी हमले का सामना कर रहे हैं। कांग्रेस नेता और लोकसभा में भी विपक्ष के नेता राहुल गांधी चुनाव आयोग पर सीधा ‘वोट चोरी’ तथा भाजपा के एजेंडे के अनुसार चुनाव कराने का आरोप लगा रहे हैं। अभी कांग्रेस समेत 23 विपक्षी दलों ने भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकान्त को सीइसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पत्र लिखा है और राहुल गांधी पहले से ही चुनाव आयोग के खिलाफ ‘वोट चोरी’ के खिलाफ घूम-घूमकर मतदाताओं को जागरूक कर रहे हैं।
राहुल गांधी की अगुवाई में विपक्षी गठजोड़ के चुनाव आयोग के खिलाफ आक्रामक रवैए के बचाव में भाजपा एस॰ वाई॰ कुरेशी के ‘बमशेल’ से राहत महसूस कर रही है। भाजपा इसका इस्तेमाल अपना और चुनाव आयोग के बचाव में रक्षात्मक कवच के रूप में कर रही है।
अब देखिए कि पूर्व सीइसी कुरेशी ने संसद का मानसून सत्र शुरू होने से पहले ऐसा क्या विस्फोट कर दिया, जो सदन में भी ‘चोरी हंगामा’ में शामिल हो गया।
पाठक पहले से ही दो बातें ध्यान में रखें। एस॰ वाई॰ कुरेशी भारत के पहले मुस्लिम मुख्य चुनाव आयुक्त (सीइसी) थे और चुनाव आयोग में उनका कार्यकाल 2006 से जून, 2012 तक था। यह जानना इसलिए जरूरी है, क्योंकि अपने कार्यकाल की यादों में कुरेशी ने खुद को मुस्लिम अधिकारी और चुनाव आयुक्त के रूप में बार-बार फोकस किया है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की अगुवाई वाले संयुक्त प्रगतिशील गठजोड़ (यूपीए) सरकार के कार्यकाल के दौरान 2010 से 2012 एस॰ वाई॰ कुरेशी मुख्य चुनाव आयुक्त रहे।
यह भी याद रहे कि कुरेशी ने चुनाव आयोग की संवैधानिक मर्यादा और दायित्वों को उचित ठहराने के लिए मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल के मुस्लिम मंत्री सलमान खुर्शीद को मोहरा बनाकर मनमोहन सिंह पर ही अपने ‘बमशेल’ को केंद्रित रखा है। पूर्व सीइसी ने जनवरी, 2012 की घटना का जिक्र किया है, जब उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव का समय था। उस समय केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव प्रचार अभियान के दौरान अपनी उम्मीदवार पत्नी के समर्थन में मुस्लिम आरक्षण सम्बन्धी विवादित भाषण दे दिया। सलमान खुर्शीद ने एक चुनाव रैली को संबोधित करते हुए मतदाताओं से वायदा कर दिया कि अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी तो मुस्लिमों का आरक्षण कोटा 4.5% से बढ़ाकर 9% कर दिया जाएगा।
कुरेशी अपनी किताब में जैसा बताते हैं, उसके अनुसार उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए सलमान खुर्शीद के इस विवादास्पद भाषण को चुनाव आचार संहिता का गंभीर उल्लंघन माना और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई में अपने संविधान सम्मत अधिकार का इस्तेमाल किया। लेकिन उसके जवाब में कानूनी मंत्री रहते हुए सलमान खुर्शीद ने उल्टे चुनाव आयोग पर जवाबी हमला करते हुए अधिकारों के अतिक्रमण का आरोप लगाया। चुनाव आयोग और केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस के बीच बेहद तनातनी की नौबत आ गयी।
एस॰ वाई॰ कुरेशी के अनुसार सीइसी के रूप में उन्होंने राष्ट्रपति को कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के खिलाफ लिखा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की। बकौल कुरेशी प्रधानमंत्री अपने पार्टी नेताओं और मंत्रियों द्वारा चुनाव आयोग की आलोचना से काफी परेशान नजर आए तथा इस बात से इन्कार किया कि उन्होंने ऐसे हमलों के लिए अधिकृत किया है। पूर्व सीइसी लिखते हैं कि उनसे मुलाकात के दौरान मनमोहन सिंह ने चुनाव आयोग के प्रति संवैधानिक संस्था के रूप में सम्मान भाव रखने के बजाए निंदा करने वाले मंत्रियों के खिलाफ ‘गुस्से’ का इजहार किया। उसके बाद खिन्न मनमोहन सिंह ने कथित रूप से टिप्पणी की ‘अगर यह बात है, जो आप सोचते हैं तो मैं खुदकुशी कर लूंगा’ और भारतीय निर्वाचन आयोग के विषय में कहा - ‘यह संस्था हमारे लोकतंत्र की आत्मा है’। मनमोहन सिंह की इन्हीं दोनों पंक्तियों को एस॰ वाई॰ कुरेशी ने सेलिंग पोर्टल पर डाला है। कुरेशी के अनुसार यह बात मनमोहन सिंह ने अपने मंत्रियों की गैरजिम्मेदाराना टिप्पणियों से परेशान होकर मुलाकात के दौरान कही कि ‘मैं आत्महत्या कर लूंगा’ और चुनाव आयोग को ‘हमारे लोकतंत्र की आत्मा’ बताया।
पूर्व सीइसी ने अपनी इन यादों के आईने में अभी कांग्रेस के हमले से चुनाव आयोग के बचाव में जोड़ा है, जिसे राजनीतिक विस्फोट माना जा रहा है। कुरेशी के अनुसार यह प्रसंग जनवरी, 2012 उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के समय का है, जब उन्होंने मुस्लिम आरक्षण कोटा वायदे के खिलाफ कानून मंत्री सलमान खुर्शीद की चुनाव आचार संहिता उल्लंघन के मामले में खिंचाई की थी।
गौरतलब है कि रिटायरमेंट के 14 साल बाद सीइसी एस॰ वाई॰ कुरेशी ने ऐसे समय में यह राजनीतिक विस्फोट किया है, जब जनवरी, 2026 में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव होनेवाला है। कुरेशी ने अपनी किताब मार्केट में आने से एक पखवाड़ा पहले सोशल मीडिया के ‘सेलिंग प्वाइंट’ पर इन विवादास्पद यादों को सार्वजनिक किया और संसद का मानसून सत्र शुरू होने से लगभग एक हफ्ता पहले यह प्रसंग सुर्खियों में आया।
कांग्रेस के किसी बड़े नेता ने कुरेशी की प्रचारित विवाद ‘यादों’ को नोटिस ही नहीं लिया और कोई टिप्पणी नहीं की। उस वक्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के प्रधान सचिव रहे टी॰ के॰ ए॰ नायर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन दोनों ने ही इस पर चुप्पी साध रखी है। कांग्रेसजनों ने कुरेशी के ‘खुलासे’ की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया है और इसके वास्तविक तथ्य का ठोस आधार नहीं माना है। कांग्रेस ने तब तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की, जब भाजपा ने एस॰ वाई॰ कुरेशी के ‘खुलासे’ को अपना और चुनाव आयोग के बचाव में ढाल के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास किया। भाजपा के IT (आईटी) सेल प्रमुख अमित मालवीय ने तुरंत इसी आधार पर कांग्रेस के खिलाफ जवाबी हमला करते हुए कहा कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने का कांग्रेस का पुराना इतिहास रहा है। मालवीय ने एस॰ वाई॰ कुरेशी का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस नीत यूपीए गठजोड़ जब सत्ता में थी तो इसके मंत्रियों ने बार-बार चुनाव आयोग को निशाना बनाया। मालवीय ने कहा कि कुरेशी के तथ्यों से जाहिर है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह संवैधानिक संस्थाओं पर हमला करनेवाले अपने मंत्रियों के आगे विवश थे। कांग्रेस का रवैया बदला नहीं है, जब सत्ता से हटती है और चुनाव परिणाम उसके खिलाफ जाता है तो चुनाव आयोग को इसके लिए जिम्मेदार ठहराती है।
इसके जवाब में कांग्रेस राष्ट्रीय सचिव प्रणव झा ने कहा कि कुरेशी के 2012 प्रसंग की आड़ लेकर भाजपा देश के सामने गंभीर प्रश्नों से मतदाताओं का ध्यान हटाना चाहती है। कांग्रेस ने हमेशा चुनाव आयोग का भारत के संवैधानिक लोकतंत्र के आधारभूत खंभे के रूप में सम्मान किया, यह भाजपा है, जो चुनाव आयोग को अपनी सियासी राजनीति का हथकंडा बनाने के प्रयास में जुटी है। पहले से ही चली आ रही चुनाव आयोग के खिलाफ ‘वोट चोरी’ संसद के मौजूदा मानसून सत्र में पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम के बाद और उफनी नजर आ रही है। अयोध्या राम जन्म भूमि ट्रस्ट में ‘चढ़ावा चोरी’, नीट पर्चा लीक और उस मुद्दे पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर अनशन कर रहे सोनम वांगचुक को 21वें दिन जंतर-मंतर से दिल्ली पुलिस द्वारा नाटकीय ढंग से उठाकर अस्पताल ले जाने पर संसद के हंगामे में कुरेशी द्वारा किए गए ‘खुलासे’ का भाजपा सहारा ले रही है। जबकि विपक्ष ने रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में आयोजित हर संसदीय सत्र से पहले होने वाली सर्वदलीय बैठक में ‘सांकेतिक वाकआउट’ करके 19 जुलाई को ही सरकार को आगाह कर दिया था।
भाजपा द्वारा कुरेशी के ‘खुलासे’ का इस्तेमाल करने का कारण मौकापरस्ती प्रतीत होती है। क्योंकि एस॰ वाई॰ कुरेशी चुनाव आयोग से लेकर चुनाव से संबंधित भाजपा के सभी कामों की खुलेआम निंदा करते रहे हैं। हमेशा मीडिया में चर्चित रहने वाले एस॰ वाई॰ कुरेशी ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तरीके पर सवाल उठाए। मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की चयन समिति में प्रधानमंत्री के अलावा भारत के प्रधान न्यायाधीश को शामिल करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करने के लिए विधायिका के जरिए उनकी जगह किसी केंद्रीय मंत्री को रखनेवाले नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पास एक्ट को कुरेशी ने अनुचित बताया। एस॰ वाई॰ कुरेशी ने ही सबसे पहले घुसपैठियों की पहचान और निकाल बाहर करने का अभियान खास अल्पसंख्यक समुदाय को लक्ष्य करके चलाने के भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार के फैसले की आलोचना की। इसकी प्रतिक्रिया में झारखंड से भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कुरेशी को ‘मुस्लिम चुनाव आयुक्त’ बताया। कुरेशी ने वक्फ एक्ट की भी निंदा की।
एस॰ वाई॰ कुरेशी ने अपनी किताब का नाम रखा है - ‘भारत और मैं: एक सौ यादें, संस्मरण नहीं’। उन्होंने कांग्रेस शासनकाल में कोई महत्वपूर्ण पद नहीं लिया, ताकि मुस्लिम तुष्टीकरण का फायदा उठाने का आरोप न लगे। 2019 में नरेंद्र मोदी शासनकाल में सूचना और प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज का दूरदर्शन महानिदेशक बनने का प्रस्ताव कुरेशी ने मुस्लिम होने के कारण स्वीकार नहीं किया। सीइसी के रूप में कुरेशी ने कई चुनाव सुधार किए। 25 जनवरी को चुनाव आयोग का स्थापना दिवस ‘मतदाता जागरूकता दिवस’ के रूप में मनाने की शुरुआत उन्होंने ही की। ऐसा साफ-सुथरी छवि वाले कुरेशी का ऐसे ‘खुलासे’ और उसका समय, अवसर को लेकर अटकलबाजी जारी है।
कुरेशी के पूर्ववर्ती मुख्य चुनाव आयुक्तों में से कुछ की राजनीतिक तरफदारी में कांग्रेस और भाजपा दोनों की विवादित हिस्सेदारी रही है। 2009 लोकसभा चुनाव जब करीब आनेवाला था, उस समय भाजपा समर्थक मुख्य चुनाव आयुक्त एन॰ गोपालास्वामी ने भाजपा नेता अरूण जेटली और जसवंत सिंह के आवेदन पर चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के पास भेज दी। क्योंकि नवीन चावला कांग्रेस समर्थक थे, और 2009 से पहले वे सीइसी बन जाते। राष्ट्रपति ने जब सिफारिश ठुकरा दी तो अरूण जेटली सुप्रीम कोर्ट गए। भाजपा नहीं चाहती थी कि सीइसी नवीन चावला की देखरेख में 2009 लोकसभा चुनाव हो, लेकिन भाजपा की इच्छा पूरी नहीं हुई। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने दोनों भाजपा नेताओं को यह कहकर लौटा दिया कि यह अधिकार सीइसी और राष्ट्रपति का है। उस समय सीइसी को यह अधिकार था जो अब हटा दिया गया। 2009 में कांग्रेस सरकार सत्ता में लौटी और भाजपा नेताओं ने इवीएम में छेड़छाड़ का आरोप लगाकर देश भर में अभियान चलाया। एन॰ गोपालास्वामी अभी भी भाजपा के हर चुनावी सभा का समर्थन कर रहे हैं। एक कांग्रेस हिमायती सीइसी मनोहर सिंह गिल रिटायर होने के बाद मनमोहन सिंह शासनकाल में केंद्रीय मंत्री रहे।