बात की शुरूआत मैं कुछ समाचार कतरनों से करना चाहता हूँ, जिसका सीधा ताल्लुक उस विषय से है जिस पर आज चर्चा हो रही है । दरअसल ये समाचार नहीं, तथ्य हैं । इसे साथ लिए बिना मीडिया की छवि और समाज के प्रति दायित्वों पर बातचीत नहीं की जा सकती । और चूंकि आम चुनाव करीब है, इसलिए मीडिया की ओर सबकी नजर स्वाभाविक है ।

16वीं लोकसभा के अंतिम सत्र के समय आठ फरवरी को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राफेल लड़ाकू विमान सौदे के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने के लिए सदन में कहा कि मीडिया के ताजे खुलासे के अनुसार भारत और फ्रांस के बीच 59,000 करोड़ रूपये का सौदा हुआ । राहुल गांधी ने ‘हिन्दू’ अखबार का हवाला देते हुए उसे लहराकर रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और अन्य सदस्यों को दिखाया । इसके जवाब में रक्षा मंत्री ने कहा - ‘विपक्ष्ज्ञ बहुराष्ट्रीय कंपनियों और निहित स्वार्थों के हाथों में खेल रहा है ।’ उसी दिन समाजवादी पार्टी के सदस्य तेज प्रताप सिंह यादव ने एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश करके ‘फेक न्यूज’(फर्जी खबर) पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कदम उठाने की मांग रखी ।’ तेज प्रताप सिंह यादव ने कहा कि मीडिया में ‘फर्जी खबर’ गढ़ने और वितरित करने पर रोक लगायी जानी चाहिए ।

दो दिन बाद 10 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट जज ए. के. सीकरी ने कहा कि इस डिजिटल युग में सोसल मीडिया के कारण ‘बहुत मानसिक दबाव’ में न्याय का काम करना पड़ता है । जस्टिस सीकरी ने कहा कि सोसल मीडिया की करतूतों के चलते किसी मुकदमे पर फैसले प्रभावित होता है और किसी नतीजे पर पहुंचने के समय अनचाहा दबाव बना रहता है ।

सुप्रीम कोर्ट जज ने अफसोस जताते हुए कहा - ‘यहां तक कि कोई मुकदमा कोर्ट द्वारा स्वीकार किए जाने से पहले ही सोसल मीडिया पर इससे नतीजे पर बहस शुरू हो जाती है । जस्टिस सीकरी ने यह टिप्पणी ने ऐसी टिप्पणी ‘डिजिटल युग में प्रेस की आजादी’ पर दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में की । लॉ एसोसिएशन फॉर एसिया एंड दि पेसिफिक’ की ओर से इस सम्मेलन का आयोजन किया था । जस्टिस सीकरी ने कहा कि ‘डिजिटल युग ने मीडिया का ऐसा कायापलट कर दिया है कि हम दरअसल पेड और फेक न्यूज के युग में जी रहे हैं ।

लॉ एसोसिएशन फॉर एसिया एंड दि पेसिफिक’ का यह पहला सम्मेलन और पूरे कार्यक्रम में मीडिया की आलोचना पर ही फोकस था सबसे ज्यादा नाराजगी जतानेवाले सुप्रीम कोर्ट जज थे और उनका पूरा भाषण शुरू से आखिर तक इसी पर केंद्रित रहा कि प्रेस की आजादी के कारण किसी मामले में मीडिया ट्रायल से न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो रही है । जस्टिस सीकरी ने फेसबुक, वाट्सएप, ट्वीटर समेत एक साथ सबको लपेटे में लेते हुए कहा कि ये सारे मीडिया फोरमों द्वारा अपनी उपभोक्ता पसंद के हिसाब से डाटा पोस्ट करने के बढ़ते चलन से लोगों को आजादी, प्राइवेसी पर असर पड़ रहा है और यह बड़ी खतरनाक प्रवृत्ति है । पहले भी मीडिया ट्रायल होते थे । लेकिन अभी क्या हो रहा है कि कोई मामला उठाया नहीं कि अर्जी दायर कर दी गयी और कोर्ट द्वारा सुनवाई के लिए अर्जी मंजूर किए जाने से पहले ही लोग बहस शुरू कर देते हैं कि इसका फैसला क्या होगा और क्या होना चाहिए । वकीलों के फोरम में भाग लेने आयी अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल माधवी गोटाडिया दीवान ने कहा कि कानून और न्याय प्रक्रिया को पत्रकारों से बेहतर समझते हैं, लेकिन ट्वीटर के चुनौती बनने का एक कारण वकीलों का पत्रकारों की तरह एक्टिविस्ट बन जाना है । सुश्री दीवान ने कहा कि पत्रकारों को सुप्रीम कोर्ट कवर करने के लिए मान्यता दी जाती है, जिन्हें नहीं मिलता है । उनके लिए ट्वीटर है ।

जस्टिस सीकरी ने कहा कि स्टोरी गढ़ी जाती है और डिजिटल फोरमों के जरिए कुछ घंटों में ही वायरल होकर अरबों लोगों तक पहुंच जाती है । यह सििति एलार्मिंग है कि हम ‘पेड और फेक न्यूज’ के गुग में जी रहे हैं ।

इसका मतलब मीडिया में कुछ न कुछ ऐसा जरूर हो रहा है, जो नहीं होना चाहिए । मीडिया से समाज ऐसी अपेक्षा नहीं रखता । सुप्रीम कोर्ट जज की टिप्पणी बहुत गंभीर सोच का विषय है । जो तथ्य मैंने जुटाए हैं, वो ताजातरीन हैं और फरवरी के हैं। इसके बिना कोई बहस सार्थ नहीं होगी । क्योंकि मीडिया के सामने अभी सबसे बड़ी समस्या समाज के बीच अपनी विश्वसनीयता और स्वीकार्यता बनाए रखने की है । खबरों की प्रामाणिकता पर उंगली उठा जाती है । कोई खबर तथ्यपरक है या नहीं, इसी पर लोग सवाल खड़े कर देते हैं, राफेल सौदा का तो लोकसभा चुनाव पर हावी रहना ही है । विपक्ष का मुख्य मुद्दा तो यही रहेगा ।

राफेल सौदा को रद्द करने के लिए दायर याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट द्वारा 14 दिसंबर को खारिज किया जाना सरकार के लिए बड़ी राहत है । मगर 15 फरवरी को पुनर्विचार याचिकाओं की खामियों पर सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस संजीव खन्ना ने अपनी नाराजगी यह कहकर व्यक्त किया कि वकील खमियां दूर करने के बजाए मीडिया में चले जाते हैं । 15 फरवरी को ही केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति इरानी ने मीडियाकर्मियों पर ‘फेक न्यूज’ और तथ्यों को मरोड़ने का आरोप लगाया । उनका कहना था कि नेशनल सैम्पल सर्वे कार्यालय में बेरोजगारी पर चल रही बातचीत पर मीडिया फर्जी और मनगढ़ंत समाचार फैला रहा है । उसके एक दिन पहले केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने पुलवामा हमले के मद्देनजर सभी टीवी न्यूज चैनलों के लिए एक एडवाइजरी जारी करके चेतावनी दी कि ऐसा कुछ भी प्रसारित न करें, जिससे देश की एकता अखंडता प्रभावित हो । जनवरी, 2016 में पठानकोट एयरफोर्स स्टेशन पर हमले के समय सूचना और प्रसारण मंत्रालय को एक हिन्दी समाचार चैनल पर दिन भरके लिए प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया । मंत्रालय ने दावा किया कि इस चैनल ने देश की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील जानकारी दिखा दी । बहरहाल वो आदेश लागू नहीं किया गया । पुलवामा हमला आम चुनाव में राफेल से भी बड़ा मुद्दा बनेगा । मीडिया के खिलाफ ऐसा रवैसा अपनाने की निंदा करने से पहले हमें अपने स्वयं के काम काज की समीक्षा करना जरूरी है । आखिर ऐसी नौबत क्यों आयी? देश और समजा की चिंता करना क्या सिर्फ सरकार का काम है? सोसल मीडिया पत्रकारिता की किस श्रेणी में आएगी, इस संबंध में तो कुछ निर्णय करना कठिन है । इस डिजिटल मीडिया का नाम जरूर सोसल है, मगर इसके जरिए अनसोसल बातें ज्यादा वायरल होा रही हैं, जिससे समाज की रोजमर्रे की जिदंगी पर बुरा असर पड़ रहा है । इस वायरस ने पूरी मीडिया को संक्रमित किया हुआ है और इलेक्ट्रोनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया भी इसके पलेटे में आ चुकी है । अखबारों में ट्वीटर और फेसबुक से सामग्रियां निकालकर छापी जाती है । सूचना टेक्नोलोजी मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति ने ट्वीटर सीईओ जैक डोर्सी को सम्मन भेजा और फेसबुक, वाट्स एप समेत अन्य सोसल मीडिया प्लेटफार्मों को भी बुलाने का फैसला किया । मामला है - ‘नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और सामाजिक जनजीवन को ऐसे न्यूज मीडिया के संक्रमण से बचाना ।

15 फरवरी को ही मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने चुनाव आयोग की पुरानी मांग दुहरायी कि पेड न्यूज को चुनावी अपराध की कोटि में लाया जाए और इसके लिए छह महीने से दो साल तक की सजा का प्रावधान है । 21 जनवरी को केंद्रीय कानून सचिव सुरेश चन्द्र से मिलकर मुख्य चुनाव आयुक्त(सीईसी) ने इसके लिए कानून बनाने की दो दशक से चली आ रही चुनाव आयोग की मांग याद दिलायी । नए चुनाव आयुक्त सुशील चन्द्रा के कार्यभार ग्रहण करने के दिन 15 फरवरी को सीईसी ने सरकारी नियंतत्र से पूरी तरह मुक्त होने के लिए महालेखा परीक्षक व नियंत्रक(सीएजी) और संघीय लोकसेवा आयेग की तरह वित्तीय स्वायत्तता मांगी ।

चुनाव आयोग को अच्छी तरह पता है कि पेड न्यूज पर रोक लगानेवाला कानून सरकार बना नहीं सकती । क्योंकि राजनीतिक दल ही पेड न्यूज के पैरोकार हैं औरर यह ईवीएम की तरह चुनाव के समय उछलता है, चुनाव बाद दब जाता है ।

वर्ष 2000 से ईवीएम के जरिए चुनाव हो रहे हैं और लगातार विवाद के घेरे में है लगभग उसी समय से पेड न्यूज भी चुनाव आयोग का सिरदर्द बना हुआ है । उस समय से जितने सीईसी बने, सबको हर चुनाव में ईवीएम की विश्वसनीयता पर सफाई देनी पड़ती है और इसे बार-बार ‘फूलप्रूफ’ बताना पड़ता हे । हारी पार्टी छेड़छाड़ का मुद्दा उठाती है। दिसंबर, 2018 में सीईसी बने सुनील अरोड़ा को कहना पड़ा कि ईवीएम को दलों ने फुटबॉल बना दिया है । ठीक वही स्थिति पेड न्यूज के साथ हो रहा है । चुनाव आयोग दागी उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने के साथ-साथ पेड न्यूज पर रोक लगाने का भी अधिकार मांग रहा है । सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में दायर याचिका पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट पीठ ने 25 सितंबर, 2018 को हाथ खड़े कर दिए । सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून बनाना संसद का काम है और संसद को इसका शीघ्र हल निकालना चाहिए ताकि गंभीर आपराधिक मामलों का सामना कर रहे लोगों को राजनीति में प्रवेश रोका जा सके । फैसले के दि नही रिपोर्ट के अनुसार 542 लोकसभा सदस्यों में से 179 के खिल्लाफ आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें 114 के खिलाफ हत्या, बलात्कार जैसे गंभीर मामले में फंसे थे । 228 राज्य सभा सदस्यों में से 51 के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज थे । चुनाव आयोग ने पेड न्यूज को चुनावी अपराध बनाने पर जोर दिया है और वैसी सजा का प्रावधान चाहा है जो उम्मीदवारों को चुनाव खर्च की गलत जानकारी देने पर तथा निर्धारित सीमा से ज्यादा खर्च करने पर सुनाये जाते हैं । चुनाव खर्च सीमा भी सुप्रीम कोर्ट ने तय की हुई है । अगर किसी ने पेड न्यूज के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट में डाल दी तो लोकतंत्र के इस चौथे पाए की क्या गत होगी और समाज के बीच क्या संदेश जाएगा, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है । पेड न्यूज 2009 आम चुनाव बाद से चर्चा में है ।

जिन कर्मो कर्मों के के लिए पत्रकारिता पर पीत या येल्लो रंग का बिल्ला लगा है, उनमें यह भी शामिल किया जाएगा । स्वस्थ पत्रकारिता का क्या रंग होना चाहिए, इस पर तो शायद अब तक विचार नहीं किया गया । लेकिन अशुभ और बीमार पत्रिका के लिए ऐसा रंग पीत चुना गया, जो समाज में शुभ माना जाता है । जो भी हो कभी राजनीति की तरह पत्रकारिता भी संक्रमण के दौर से गुजर रही है । हमारा काम तो राजनीतिक खबरों के बिना नहीं चलनेवाला है, लेकिन हम राजनीति का हिस्सा न बनें, इस पर विचार करने की जरूरत है । चुनाव में तो सब कुछ राजनीतिक दलों के हिसाब से होता है । लेकिन अधिसूचना जारी होने के बाद सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही मीडिया के जरिए हर मतदाता को अपनी उपलब्धियां गिनाना चाहते हैं । उसी के लिए खबर के स्टाईल में विज्ञापन लगवाने की परिपाटी चली है । क्योंकि चुनाव कार्यक्रम के एलान के बाद चुनाव आचार संहिता लागू हो जाती है और मतदाताओं को लुभावने वाले तौर-तरीके पर प्रतिबंध लग जाता है । लेकिन मीडिया के लिए कोई आचार संहिता नहीं है, यह हमें खुद तय करना होगा ताकि पैसे लेकर खबरें लगाने और ज्यादा पब्लिसिटी देने का बिल्ला हटे । ऐसी बातें बेबुनियाद नहीं है । पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने अपनी किताब ‘एन