केरल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के. सुधाकरन ने अपने पार्टी सांसद शशि थरूर और पूर्व केंद्रीय मंत्री के. वी. थॉमस को सीपीएम के 25वें वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन में शामिल होने से रोक दिया । केरल में मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (सीपीएम) के नेतृत्ववाली वाम लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकार है और वहां कांग्रेस विपक्षी पार्टी है । कांग्रेस के नेतृत्ववाली संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा 2021 के विधान सभा चुनाव में एक-दूसरे की प्रबल प्रतिद्वंद्वी थी और सीपीएम को भाजपा से ज्यादा कड़े मुकाबले का सामना कांग्रेस से करना पड़ा । लेकिन दूसरी ओर केरल के साथ ही हुए पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधान सभा चुनाव में दोनों मोर्चा का चुनावी गठजोड़ था । दरअसल इस बेमेल गठजोड़ की गांठ में चुनाव के समय साझा प्रतिद्वंद्वी से मुकाबले के लिए परिस्थितिवश गिरह डाल दी जाती है और हार के बाद एक-दूसरे पर ठीकरा फोड़ते हुए गिरह खुलते-खुलते खटास में बदल जाती है ।

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में करारी हार का जख्म अभी ताजा है । इसलिए मौजूदा रस्साकसी में उसका असर प्रतीत हो रहा है ।

सीपीएम ने अगले महीने कन्नूर में होनेवाले 23वें पार्टी कांग्रेस के लिए तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट से जीते कांग्रेस के शशि थरूर और दूसरे कांग्रेस नेता के. वी. थॉमस को सेमीनार में आमंत्रित किया । केरल प्रदेश कांग्रेस यूनिट के अध्यक्ष के. सुधाकरन ने 20 मार्च को डिक्टैट जारी कर दिया कि संसद सदस्य समेत कोई पार्टी नेता सीपीएम के सेमीनारों में अगर हिस्सा लेते हैं तो उन्हें कार्रवाई का सामना करना होगा ।

अभी वैसे समय में सीपीएम को कांग्रेस से अप्रिय संदेश मिला है, जब कांग्रेस के अंदर ही नेतृत्व को लेकर घमासान मचा हुआ है । कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं के ग्रुप-23 धड़े में शशि थरूर और के. वी. थॉमस दोनों हैं । लेकिन शशि थरूर ने जब सीपीएम के सेमीनार में शामिल होने से इंकार किया तो उसमें कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का ही हवाला दिया । 21 मार्च को दिल्ली में जारी एक वक्तव्य में सांसद शशि थरूर ने कहा कि उन्होंने सीपीएम के आमंत्रण का स्वागत किया, क्योंकि यह पार्टी का राष्ट्रीय स्तर का सम्मेलन है और सीपीएम केंद्रीय कमिटी का सबसे बड़ा मंच होने के कारण इस आयोजन में राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सीपीएम की राष्ट्रीय नीति तय होती है ।

सबसे महत्वपूर्ण बात शशि थरूर ने अपने वक्तव्य में ये कही, उन्हीं के शब्दों में. ‘इस मामले में सोनियाजी के विचारों का सम्मान करता हूं और उनसे बात होने के बाद सीपीएम आयोजनकर्ताओं को उसमें शामिल होने में अपनी असमर्थता से मैंने अवगत करा दिया है ।’ शशि थरूर ने एक बार भी कांग्रेस की केरल यूनिट के अध्यक्ष सुधाकरन का नाम नहीं लिया । सुधाकरन की ओर से सीपीएम सम्मेलन में शामिल होने पर प्रतिबंध के दिन 20 मार्च को तिरुवनंतपुरम में संवाददाताओं द्वारा इस संबंध में पूछे जाने पर शशि थरूर ने कहा. ‘मैं इस प्रतिबंध से अवगत नहीं हूं । अगर पार्टी की ओर से ऐसा कोई निर्देश है तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से बात करके तय किया जाएगा कि सेमीनार में शामिल होना है या नहीं । वैसे सीपीएम का यह राष्ट्रीय सम्मेलन है और उनके साथ राजनीतिक वार्ता में कुछ भी गलत नहीं है ।’

समझा जाता है कि कांग्रेस की केरल यूनिट इसके खिलाफ थी कि पार्टी के कोई नेता सीपीएम के आयोजन में शरीक हों । सीपीएम पोलित ब्यूरो ने धर्मनिरपेक्षता और केंद्र-राज्य संबंध जैसे ज्वलंत मुद्दे पर शशि थरूर तथा के. वी. थॉमस का वक्तव्य रखा था । के. वी. थॉमस राज्य सभा का चुनाव लड़ने के लिए टिकट न दिए जाने के कारण पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं, मगर उन्होंने भी कहा कि कांग्रेस आलाकमान तय करेगा कि मुझे सीपीएम के सेमीनार में भाग लेना चाहिए या नहीं ।

सीपीएम महासचिव सीताराम येचूरी से लेकर केरल के मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन को छोड़ सभी नेताओं ने कांग्रेस के इस रवैए की आलोचना की है ।

अभी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा विधान सभा चुनावों में करारी हार के कारण कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की मांग तेज हुई है । वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने वैसे सोनिया गांधी से मिलने और कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक के बाद कहा तो कि सोनिया गांधी से अध्यक्ष पद छोड़ने नहीं कहा गया है । मगर यह मामला दबा नहीं है । कांग्रेस नेतृत्व नहीं चाहता है कि सीपीएम के सम्मेलन में ऐसे प्रतिकूल माहौल में शशि थरूर असंतुष्ट होने के बावजूद हिस्सा लें ।

मगर वास्तविकता ये है कि कांग्रेस और सीपीएम में अप्रैल, 2021 में हुए विधान सभा चुनावों के समय से ही तनातनी चल रही है और उसके बाद से लागतार बढ़ती ही गयी है । चुनाव के कुछ महीने पहले केरल में साबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कार्यान्वयन को लेकर कांग्रेस और सीपीएम में तकरार बढ़ी । कांग्रेस ने हिंदू वोट भाजपा के खाते में जाने से रोकने के लिए अपनी नीति बदल दी । चुनाव परिणाम आने पर पता चला कि कांग्रेस का परंपरागत इसाई और मुस्लिम वोट वाम मोर्चा के पक्ष में चला गया । चार दशक में पहली बार वाम मोर्चा लगातार दोबारा सत्ता में बनी रह गयी । उसके पहले हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन होता था । कांग्रेस नीत मोर्चा और सीपीएम नीत वाम मोर्चा बारी-बारी से सरकार बनाते थे । वाममोर्चा ने कांग्रेस पर भाजपा से मिलीभगत का आरोप लगाया और कांग्रेस को आशा के अनुकूल हिंदू वोट मिला भी नहीं । अभी गुलाम नबी आजाद को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किए जाने पर भी सीपीएम के अंदर कुछ-कुछ चल रहा होगा ।

केरल के ठीक उल्टा उसी के साथ हुए पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधान सभा चुनाव में सीपीएम ने कांग्रेस के साथ न चाहते हुए भी विरोधाभासी वातावरण में गठजोड़ किया । ऐसा करना मजबूरी थी, क्योंकि बंगाल में एक साथ सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और उससे भी बड़ी चुनौती भाजपा का मुकाबला करना था । तमिलनाडु में डीएमके का हमेशा से कांग्रेस से गठजोड़ रहा है । द्रमुक सुप्रीमो एम. करुणानिधि की मौत के बाद हुए पहले चुनाव में उनके पुत्र एम. के. स्टालीन की बड़ी ताकत से मुकाबले में भी कांग्रेस तथा सीपीएम के अंदर तालमेल जबरन हुआ था । भाजपा ने पहली बार 4 सीटें जीत ली ।

पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा की बढ़ी शर्मनाक हार हुई खाता भी नहीं खुल पाया । आजादी के बाद से पहली बार ऐसा हुआ, जब पश्चिम बंगाल विधान सभा में वामदलों का एक भी विधायक नहीं है । कांग्रेस भी जीते हुए अन्य तीन में शामिल हो गयी । दोनों ने एक-दूसरे पर तृणमूल कांग्रेस और भाजपा से मिलीभगत का आरोप लगाया । 2016 के पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में कांग्रेस के 77 उम्मीदवार जीते थे, भाजपा को जो तीन सीटें मिली, उसमें दूसरे नंबर पर वाममोर्चा उम्मीदवार रहे । अभी भाजपा के भी 77 विधायक हैं ।

अभी 01/03/2022 को घोषित स्थानीय निकाय चुनाव में बंगाल में कांग्रेस भाजपा को तो खाता नहीं खुला, मगर वाम मोर्चा दूसरे नंबर पर रहा । ममता बनर्जी(दीदी) के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने 108 नगरपालिकाओं में से 102 पर कब्जा जमाकर अपना दबदबा बरकरार रखा । कांग्रेस नेताओं ने फिर से कहा कि वाममोर्चा के साथ गठजोड़ के कारण पार्टी को नुकसान हो रहा है ।

दरअसल सीपीएम ने कांग्रेस से हमेशा दूरी बनाए रखी । बेमेल गठजोड़ वाममोर्चा का दूसरा बड़ा घटक सीपीआई (भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी) का हमेशा कांग्रेस से नजदीकी के कारण चलता रहा ।

2011 में दीदी ने 37 वर्षों से सीपीएम के नेतृत्व में चल रही वाममोर्चा सरकार को अपदस्थ किया और उसके बाद से सत्ता में बरकरार है । उसी समय से वाममोर्चा और कांग्रेस दीदी से मुकाबले के लिए गठजोड़ करते आ रहे हैं । नामांकन भरने की अंतिम तारीख तक सीटों पर जिच बरकरार रहती है । हारने के बाद दोनों गठजोड़ के नुकसान पर मंथन करते हैं । लेकिन केरल की तरह एक-दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक रूप से कुछ बोलने से परहेज करते हैं । 1975-76 के जे पी आंदोलन के समय से ही यह घमर्थन जारी है, जब സിപിएम जे पी आंदोलन के साथ थी और सीपीआई प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ थी । इमर्जेंसी के बाद हुए 1977 आम चुनाव में सीपीएम सुप्रीमो कामरेड ज्योति बसु पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बने और उसके बाद से 2011 में सीपीएम नीत मोर्चा के सत्ता से हटने तक कांग्रेस तथा वाममोर्चा एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बने रहे ।