यह लेख नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरकार की दमनकारी नीति की आलोचना करता है और अमन नीति की आवश्यकता पर जोर देता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा विकास की कमी को असंतोष का कारण बताने के बावजूद, लेखक सुरक्षा समीक्षा बैठकों को केवल औपचारिकता मानता है जो दमन पर केंद्रित होती हैं। लेख फर्जी मुठभेड़ों, सुरक्षा बलों की उदासीनता और विकास कार्यों में बाधाओं को उजागर करते हुए, सरकारों से हिंसा के बजाय विश्वास और विकास पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह करता है।
यह लेख नक्सल समस्या से निपटने के लिए आक्रामक नीतियों के बजाय सकारात्मक नीति की आवश्यकता पर बल देता है। यह छत्तीसगढ़ के सुकमा में सीआरपीएफ जवानों पर हुए हमले का विश्लेषण करता है, जिसमें खुफिया जानकारी और सुरक्षा बलों के बीच तालमेल की कमी को उजागर किया गया है। लेखक सरकार की 'समाधान' नीति की प्रभावशीलता पर सवाल उठाता है और नक्सल आंदोलन के ऐतिहासिक संदर्भ पर भी प्रकाश डालता है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कहा कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने पर तीन साल में नक्सलवाद का सफाया हो जाएगा। लेख छत्तीसगढ़ और झारखंड में हालिया नक्सली मुठभेड़ों और भाजपा द्वारा कांग्रेस पर नक्सल-सांठगांठ के आरोपों पर प्रकाश डालता है। यह झीरम घाटी हमले और सलवा जुडूम जैसे ऐतिहासिक संदर्भों का भी उल्लेख करता है, साथ ही फर्जी मुठभेड़ों के आरोपों पर सवाल उठाता है।
यह लेख आंध्र प्रदेश के विशाखापतनम में तेलुगू देसम पार्टी के विधायक और पूर्व विधायक की नक्सली हमले में हुई हत्या पर केंद्र सरकार की कथित चुप्पी की आलोचना करता है। लेखक बताता है कि केंद्र सरकार आमतौर पर ऐसे हमलों पर ध्यान नहीं देती जिनमें सुरक्षाकर्मी या ठेकेदार शामिल न हों, और इस घटना को नक्सलवाद के राजनीतिकरण और शहरी नक्सलियों के मुद्दे से जोड़ता है। इसमें नक्सलवाद के मूल कारणों, अवैध खनन और आदिवासी विस्थापन पर भी प्रकाश डाला गया है।
यह लेख छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले के बाद केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया की आलोचना करता है, जिसमें प्रधानमंत्री 'मन की बात' के 100वें एपिसोड के जश्न में व्यस्त थे। लेखक का तर्क है कि नक्सल समस्या को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने के बजाय एक ठोस नीति और विकास-उन्मुख दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसमें नक्सली हिंसा में कमी के सरकारी दावों और फर्जी मुठभेड़ों के आरोपों के बीच विरोधाभास पर भी प्रकाश डाला गया है।
यह लेख बताता है कि भारत में नक्सलवाद कमजोर हो रहा है, खासकर पूर्वी क्षेत्र में, और केंद्रीय गृह मंत्रालय के रेडियो कार्यक्रम नक्सली भर्ती को हतोत्साहित कर रहे हैं। लेखक सरकार के रवैये की आलोचना करता है, जो नक्सल समस्या को चुनावी मुद्दा बनाती है, और सुझाव देता है कि उत्तर-पूर्व की तरह शांति वार्ता और विकास नीतियों को अपनाया जाए। इसमें बीजापुर मुठभेड़ और कोरेगांव भीमा घटना का भी जिक्र है, साथ ही "शहरी नक्सलियों" के आरोप पर राजनीतिक बयानबाजी पर भी प्रकाश डाला गया है।
यह लेख केरल में हाल ही में हुई नक्सल मुठभेड़ों पर सवाल उठाता है, खासकर इसलिए क्योंकि वहां वाममोर्चा सरकार है। सत्तारूढ़ एलडीएफ के घटक सीपीआई ने इन मुठभेड़ों को फर्जी बताया और न्यायिक जांच की मांग की, जबकि मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन ने पुलिस का बचाव किया। लेख यूएपीए के तहत सीपीएम कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और माओवादी होने को अपराध न मानने वाले केरल हाईकोर्ट के आदेश पर भी प्रकाश डालता है, साथ ही धार्मिक कट्टरपंथियों और माओवादियों के बीच संभावित लिंक पर भी चर्चा करता है।
केरल में हालिया नक्सल मुठभेड़ों और यूएपीए के तहत सीपीएम कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी ने सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) सरकार के भीतर गंभीर आंतरिक कलह पैदा कर दी है। सीपीआई ने इन मुठभेड़ों को फर्जी बताते हुए न्यायिक जांच की मांग की है, जबकि मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन पुलिस का बचाव कर रहे हैं। यह मुद्दा वाममोर्चा के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है, जिससे उसके सिद्धांतों और चुनावी राजनीति पर सवाल उठ रहे हैं।
यह लेख छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में भाजपा विधायक भीमा मंडावी की नक्सली हमले में हुई हत्या के संदर्भ में नक्सल मुद्दे पर राजनीति की आलोचना करता है। यह बताता है कि कैसे भाजपा ने कांग्रेस पर शहरी माओवादियों का समर्थन करने का आरोप लगाया, जबकि कांग्रेस सरकार ने आदिवासियों की जमीन लौटाने और नक्सल विरोधी अभियान चलाने जैसे कदम उठाए हैं। लेखक का तर्क है कि नक्सल समस्या के समाधान के लिए राजनीतिक बयानबाजी के बजाय ठोस नीति की आवश्यकता है।
यह लेख छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में कथित फर्जी नक्सली मुठभेड़ों पर सवाल उठाता है, विशेषकर स्वतंत्रता दिवस से पहले सुकमा में 15 नक्सलियों के मारे जाने की घटना पर। स्थानीय लोगों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम आदमी पार्टी ने पुलिस के दावों पर संदेह व्यक्त किया है, क्योंकि मुठभेड़ में कोई पुलिसकर्मी हताहत नहीं हुआ और मारे गए लोगों में किशोर भी शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले और मणिपुर व असम में इसी तरह के फर्जी मुठभेड़ों पर संज्ञान लिया है, जिससे सरकार पर जवाबदेही का दबाव बढ़ रहा है।
यह लेख छत्तीसगढ़ चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कांग्रेस पर 'शहरी माओवादियों/नक्सलियों' का समर्थन करने के आरोप पर केंद्रित है। यह आरोप मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और भीमा-कोरेगांव मामले से जुड़ा है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी टिप्पणी की थी। लेख इस राजनीतिक बयानबाजी के दूरगामी प्रभावों और लोकतंत्र में असहमति के महत्व पर प्रकाश डालता है।
यह लेख 'शहरी नक्सली' मुद्दे के कानूनी और राजनीतिक पहलुओं की पड़ताल करता है, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा के यूएपीए मामले पर बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर प्रकाश डाला गया है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चुनावी भाषणों में 'शहरी नक्सली' शब्द के बार-बार इस्तेमाल और कांग्रेस व आम आदमी पार्टी जैसे विपक्षी दलों को निशाना बनाने पर भी चर्चा करता है। लेख का तर्क है कि यह मुद्दा कानूनी से अधिक राजनीतिक है, जिसका उपयोग भाजपा द्वारा अपने विरोधियों को बदनाम करने के लिए किया जाता है।
यह लेख नक्सलवाद को एक सामाजिक-आर्थिक समस्या के बजाय राजनीतिक मुद्दा बनाने की प्रवृत्ति की आलोचना करता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय द्वारा माओवादी हमलों में कमी के आंकड़ों को कांग्रेस शासनकाल से जोड़कर प्रस्तुत करने पर सवाल उठाया गया है। लेखक जोर देता है कि नक्सलवाद की जड़ें ग्रामीण गरीबी में हैं, न कि 'शहरी नक्सलियों' के समर्थन में, जैसा कि भाजपा आरोप लगाती है।
यह लेख 'बस्तरिया बटालियन' के गठन पर सवाल उठाता है, जिसे केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र में लॉन्च किया था। लेखक तर्क देता है कि यह बटालियन, जिसमें स्थानीय ग्रामीण शामिल हैं, नक्सलियों के खिलाफ प्रभावी नहीं होगी और इसके बजाय गांवों में आपसी दुश्मनी को बढ़ावा देगी। लेख में सीआरपीएफ जवानों पर हुए हालिया नक्सली हमलों और सरकार की नक्सल विरोधी रणनीति की आलोचना की गई है, जिसमें 'सलवा जुडूम' के पिछले असफल प्रयोग का भी उल्लेख है।
यह लेख केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ आयोजित नक्सल समीक्षा बैठक की आलोचनात्मक समीक्षा प्रस्तुत करता है। यह छत्तीसगढ़ में हाल ही में हुई कथित फर्जी मुठभेड़ों पर सवाल उठाता है, नक्सल समस्या के सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर प्रकाश डालता है, और केंद्र व राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी को उजागर करता है। लेख में बस्तर क्षेत्र में आदिवासियों की भूमि और खनन अधिकारों से जुड़े विवादों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों पर भी चर्चा की गई है।
यह लेख बताता है कि नक्सल आंदोलन अपने अंत के करीब है, जिसका मुख्य कारण मई 2025 में केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशन में चलाए गए 'ऑपरेशन संकल्प' जैसे संयुक्त सुरक्षा अभियानों की सफलता है। इन अभियानों ने छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा पर बस्तर जैसे नक्सलियों के गढ़ों को ध्वस्त कर दिया है और कई शीर्ष कमांडरों को मार गिराया या आत्मसमर्पण करने पर मजबूर किया है। सरकार अब नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास और सुरक्षा बलों के आक्रामक रुख पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जिससे इन क्षेत्रों में शांति और सामान्य जीवन की वापसी हो रही है।
गढ़चिरोली में 15 पुलिसकर्मियों और एक सिविलियन ड्राइवर की नक्सली हमले में मौत के बाद, यह लेख खुफिया चूक, पुलिस की जवाबी कार्रवाई और सरकार के भेदभावपूर्ण मुआवजे की नीति पर प्रकाश डालता है। यह महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पुलिस की चुनौतियों और ग्रामीणों का विश्वास जीतने में विफलता पर भी चर्चा करता है। लेखक सरकार की नीतियों और नक्सल समस्या के मूल कारणों पर सवाल उठाता है।
यह लेख भाजपा सरकार द्वारा अपने आलोचकों को 'शहरी नक्सल' और 'साहित्यिक नक्सल' करार देने की प्रवृत्ति पर केंद्रित है। यह विशेष रूप से पारुल खक्कड़ की कविता 'शववाहिनी गंगा' पर गुजरात साहित्य अकादेमी की प्रतिक्रिया और गंगा में तैरते शवों के मामले में मीडिया की भूमिका पर सरकार की आपत्ति का विश्लेषण करता है। लेख यूएपीए कानून के दुरुपयोग और लोकतंत्र में असहमति को दबाने के प्रयासों पर भी प्रकाश डालता है।
यह लेख झारखंड विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के नक्सलवाद पर दिए गए बयानों की समीक्षा करता है, जिसमें उन्होंने नक्सलियों की कमर तोड़ने का दावा किया। लेखक इस बात पर जोर देता है कि सरकार की नक्सल रणनीति केवल सुरक्षा बलों की आक्रामकता पर केंद्रित है, जबकि एक समेकित नीति की आवश्यकता है। लेख छत्तीसगढ़ और केरल में हुए कथित फर्जी मुठभेड़ों और 'शहरी नक्सलियों' के मुद्दे पर भी प्रकाश डालता है, यह तर्क देते हुए कि सरकारें राजनीतिक लाभ के लिए इस समस्या का उपयोग करती हैं और बेकसूर लोग मारे जाते हैं।
यह लेख सीपीआई(माओवादी) द्वारा छत्तीसगढ़ में अपने गढ़ ध्वस्त होने के बाद दिए गए शांति वार्ता प्रस्ताव का विश्लेषण करता है। केंद्र और राज्य सरकारें बातचीत के लिए तैयार हैं, लेकिन बिना किसी शर्त के, जबकि माओवादी नक्सल विरोधी अभियानों को रोकने की पूर्व शर्त रखते हैं। लेख में सरकार के 'ऑपरेशन कगार' की सफलता, नक्सलियों के आत्मसमर्पण और अतीत में वार्ता के दौरान हुए हमलों का भी जिक्र है, साथ ही पश्चिम बंगाल के नक्सल मुक्त होने का उदाहरण भी दिया गया है।
छत्तीसगढ़ के बीजापुर में हुए नक्सली हमले के बाद, यह लेख सरकार की 'मुंहतोड़ जवाब' की रणनीति की आलोचना करता है। यह तर्क देता है कि यह प्रतिक्रिया केवल खानापूरी है और वास्तविक समाधान नहीं है, क्योंकि सरकार की प्राथमिकताएं चुनावी राजनीति पर केंद्रित हैं। लेख खुफिया विफलताओं, सुरक्षा बलों की पुरानी रणनीति और नक्सलियों की बदलती चालों को उजागर करता है, साथ ही शांति वार्ता के प्रस्तावों की अनदेखी पर भी प्रकाश डालता है।
यह लेख लॉकडाउन के दौरान भारत में नक्सली गतिविधियों और सरकार के जवाबी प्रयासों पर केंद्रित है। इसमें छत्तीसगढ़ के बस्तर में शहरी नक्सली नेटवर्क का भंडाफोड़, सुकमा में सीआरपीएफ जवानों पर हमला, महाराष्ट्र और ओडिशा में नक्सली कमांडरों की गिरफ्तारी, और ओडिशा में एक नक्सली नेता द्वारा एकतरफा संघर्षविराम की घोषणा जैसी घटनाओं का विवरण है। लेखक इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना संकट पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि नक्सल समस्या को कानून-व्यवस्था का मामला माना गया।
यह लेख महाराष्ट्र के गढ़चिरौली मुठभेड़ और बिहार के गया में नक्सली हत्याओं की हालिया घटनाओं पर प्रकाश डालता है, साथ ही छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सली हमलों/मुठभेड़ों की न्यायिक जांच रिपोर्टों पर चल रहे विवादों की पड़ताल करता है। इसमें 2013 के एडेसमेट्टा मुठभेड़ (जिसे फर्जी बताया गया) और झीरम घाटी हमले की जांच रिपोर्टों पर राजनीतिक खींचतान का उल्लेख है। लेखक नक्सल दमन नीति की आलोचना करते हुए शांति वार्ता और सुरक्षा बलों के तनाव जैसे मुद्दों पर विचार करने का सुझाव देता है।
यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कांग्रेस पर 'नक्सल कांग्रेस' और 'अर्बन नक्सल' का आरोप लगाकर चुनावी लाभ उठाने की रणनीति का विश्लेषण करता है। विशेष रूप से छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में इस जुमले का प्रयोग किया जाता है। लेख भीमा कोरेगांव हिंसा और यूएपीए के तहत दर्ज मामलों का भी उल्लेख करता है, जहाँ कांग्रेस नेताओं ने कथित माओवादी विचारकों का समर्थन किया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कांग्रेस को 'शहरी नक्सली' और 'टुकड़े-टुकड़े गैंग' बताया, आरोप लगाया कि शहरी नक्सलियों ने कांग्रेस की सोच पर कब्जा कर लिया है। यह लेख मोदी के इस बयान को एक 'सियासी तकिया कलाम' बताता है जिसका इस्तेमाल वे चुनावी समय में करते हैं। इसमें 2018 के मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों, 2019 के लोकसभा चुनावों और हाल ही में चल रहे पांच राज्यों के चुनावों के दौरान मोदी और भाजपा नेताओं द्वारा कांग्रेस पर लगाए गए इसी तरह के आरोपों का विश्लेषण किया गया है।