नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण के मतदान के लिए चुनाव प्रचार समाप्त होते ही भाजपा विधायक भीमाराम मंडावी नक्सली हमले में मारे गए । बस्तर इलाका नक्सलियों का सबसे मजबूत गढ़ है, जहां की दंतेवाड़ा विधान सभा सीट से मंडावी जीते थे ।

गत वर्ष दिसंबर में छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव में बस्तर की 12 सीटों में से एकमात्र सीट भाजपा को मिली, जब भीमा मंडावी जीते । भाजपा की 15 साल से चल रही सरकार गिर गयी । कांग्रेस ने कुल 90 में से 68 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया । कांग्रेस के भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने । भाजपा के मुख्यमंत्री रमन सिंह बड़ी मुश्किल से अपनी सीट बचा पाए । रमन सिंह और भूपेश बघेल दोनों ही नक्सल प्रभावित दुर्ग व राजनंदगांव इलाके से आते हैं । बस्तर में नक्सलियों पर काबू पाना छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के लिए और केंद्र सरकारों के लिए हमेशा चुनौती बनी रही, उस क्षेत्र की 11 सीटें कांग्रेस ने जीती । 2013 विधान सभा चुनाव में सभी 12 सीटें कांग्रेस ने जीती । उस वक्त केंद्र में कांग्रेस गठजोड़ सरकार थी ।

नवंबर, 2018 में केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार ने यह कहकर छत्तीसगढ़ के मतदाताओं को भाजपा सरकार कायम रखने कहा कि नक्सलियों का कांग्रेस समर्थन कर रही है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान बार-बार कहा कि कांग्रेस शहरी माओवादियों/नक्सलियों का साथ दे रही है, जिन्होंने गरीब आदिवासी युवकों की जिंदगी बर्बाद कर दी । प्रधानमंत्री समेत सभी भाजपा नेताओं ने अपनी चुनाव रैलियों में इसी बात पर जोर दिया । आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ की जनता ने नक्सलियों के चुनाव बायकाट फरमान के बावजूद मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और कांग्रेस को सत्ता में बिठाया । अभी लोकसभा चुनाव के दौरान भी अंतिम समय तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने वही बात बार-बार दुहरायी । लोकसभा चुनाव में नक्सलियों / माओवादियों के लिए ‘देशद्रोही’ / ‘राष्ट्रविरोधी’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए भाजपा नेताओं ने कांग्रेस पर इनसे मिलीभगत का आरोप लगाया ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के अंतिम समय तक छत्तीसगढ़ की अपनी हर रैली में यही एक जुमला बार-बार दुहराया । 11 अप्रैल को मतदान के प्रथम चरण की शुरुआत से दो दिन पहले बस्तर में उसी जगह नक्सलियों ने स्थानीय भाजपा विधायक की घात लगाकर हत्या कर दी, जहां प्रधानमंत्री ने ज्यादा रैलियों को संबोधित किया । बारूदी सुरंग से नक्सली हमले में विधायक भीमा मंडावी के चार अंगरक्षक भी मारे गए । वे चुनाव प्रचार अभियान में निकले थे ।

घटना के तुरंत बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह पहुंचे और कहा कि विधायक का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा । प्रधानमंत्री ने भी हमले की कड़ी निंदा की ।

नक्सली भटके हुए हैं, इसलिए उन्हें रास्ते पर लाने से ज्यादा सरकार अपने रास्ते से हटाने पर जोर दे रही है । कांग्रेस का अब तक का रिकार्ड बताता है कि नक्सलियों का सफाया करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी । कम्यूनिस्ट पार्टियों को मिलाकर नक्सलियों का दमन किया गया । कांग्रेस ने नक्सलियों को भटकने छोड़ दिया और उनकी हिंसा का जवाब हिंसा से देने की नीति अपनायी, जिसमें राजनीति शामिल थी ।

नक्सल मुद्दे पर भाजपा के नेताओं के राजनीति प्रेरित बयान और रवैए नक्सल प्रभावित इलाकों की जनता को भटकाने वाले हैं । अभी छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार है तो भाजपा विधायक पर चुनाव के समय नक्सली हमला और कांग्रेस की नक्सलियों से ‘सहानुभूति’ का संदेश प्रचारित हुआ । 2013 में विधान सभा चुनाव से पहले झीरम घाटी में इतने सुनियोजित तरीके से नक्सली हमला हुआ, ताकि कांग्रेस के कोई नेता न बच पाएं ।

विद्याचरण शुक्ल, नंद कुमार पटेल, महेन्द्र कर्मा समेत 29 कांग्रेस नेता एक ही हमले में साफ हो गए । वे सब एक रैली में शामिल होने जुटे थे । उस वक्त छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार थी और केंद्र में कांग्रेस की । किसी भी सरकार ने उस हमले की जांच कराना जरूरी नहीं समझा । दिसंबर, 2018 में कांग्रेस के भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री बनने के बाद 2013 को उस घटना की याद दिलायी और वे जांच कराना चाहते हैं ।

मुख्यमंत्री का कहना सही है । जनता को पता तो चले कि नक्सलियों ने अपने ही ‘समर्थकों’ का एकदम से सफाया कैसे कर दिया । अभी 9 अप्रैल को जो भाजपा विधायक मारे गए, वो 2008 में महेन्द्र कर्मा जैसे धाकड़ कांग्रेस नेता को हराकर सुर्खियों में आए । 2013 चुनाव में भीमा मंडावी महेन्द्र कर्मा की विधवा पत्नी देवी के हाथों हारे ।

दिसंबर, 2018 में सरकार गठन के बाद कांग्रेस मंत्रिमंडल की पहली बैठक में गरीब आदिवासियों की वो सारी जमीन लौटाने का फैसला किया गया, जो पूर्व भाजपा सरकार ने हड़पी थी । 25 दिसंबर, 2018 को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की पहली ही बैठक में बस्तर के आदिवासी किसानों की 1,764 हेक्टेयर जमीन लौटाने का फैसला किया गया । जमीन की इसी हकमारी की लड़ाई लड़ने के लिए बस्तर नक्सल गढ़ के रूप में जाना जाता है । पूर्व की भाजपा सरकार ने इतनी सारी जमीन आदिवासियों को औना पौना मुआवजा देकर टाटा परियोजना के लिए हड़पी । जमीन अधिग्रहण के पांच साल बीत जाने के बावजूद टाटा परियोजना का न तो काम शुरू हुआ, न आदिवासी खेतिहर खेती कर पाए । कांग्रेस सरकार ने जमीन अधिग्रहण कानून में फेरबदल का भी फैसला कर लिया, ताकि गरीब खेतिहरों की जमीन वापस की जा सके ।

उसके बाद 7 फरवरी 2019 को पहला जबर्दस्त नक्सल रोधी ऑपरेशन में 10 माओवादी मारे गए । भूपेश बघेल सरकार ने उसी पुलिस अधिकारी डी एम अवस्थी को डीजीपी बनाया, जो भाजपा सरकार में नक्सल रोधी ऑपरेशन में तैनात थे । भाजपा शासनकाल के दौरान ज्यादातर मुठभेड़ फर्जी साबित हुए, जिसमें बेकसूर नागरिक मारे गए । सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ा । 6 फरवरी को मुठभेड़ की पहली वारदात सुकमा जिले के गोडेलगुडा गांव से हुई, जिसमें एक आदिवासी महिला मारी गयी और दूसरी गंभीर रूप से घायल हो गयी । उद्योग मंत्री कवासी लखमा ने अपने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर इस मुठभेड़ को फर्जी बताया । कवासी लखमा सुकमा के कोंटा विधान सभा सीट से लगातार पांच बार से जीत रहे हैं । मई, 2013 में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर हुए हमले में एकमात्र लखमा ही जीवित बचे थे ।

सुकमा लोकसभा सीट से 2014 में जीते रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह समेत भाजपा ने सभी 10 लोकसभा सीटों के उम्मीदवार बदल दिए । इसका कारण मतदाता प्रधानमंत्री के बयानों और कांग्रेस सरकार बनने के बाद के घटनाक्रमों में खोज रहे हैं। मतदाता यह नक्सल नीति देखकर दिग्भ्रमित है ।

लोकसभा चुनाव के शुरुआती दौर में चुनाव आयोग ने नक्सल प्रभावित इलाके और कश्मीर में मतदान कराया । बस्तर में नक्सलियों के बायकाट के बावजूद लोगों ने मतदान में हिस्सा लिया । नक्सल आंदोलन के उद्गम स्थल पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में मतदाताओं ने कांग्रेस और वामदलों को आंदोलन खतम करने के लिए जिम्मेदार ठहराया । वहां आरएसएस संचालित नक्सलबाड़ी शारदा विद्या मंदिर छह बीघा में फैला सबसे बड़ा स्कूल है, जो ‘नैतिक शिक्षा’, ‘राष्ट्रवादी मूल्यों’ की पढ़ाई पर केंद्रित है । यह स्कूल सेबडेला जोट में स्थित है, जहां नक्सल आंदोलन के प्रणेता कानू सान्याल जिंदगी के अंतिम समय तक रहे । ओडिशा के कालाहांडी में 6-7 बूथों पर लोगों ने मतदान से इन्कार कर दिया । वहां न कांग्रेस है, न भाजपा । अभाव और भुखमरी के रूप में परिभाषित कालाहांडी के लोग सिर्फ भूख जानते हैं । ‘राष्ट्रवाद’ और ‘देशद्रोही’ बयानों से जब पेट नहीं भरता, तब लोग उत्तेजित होते हैं ।

नक्सल मुद्दे की सियासी राजनीति की एक और महत्वपूर्ण वारदात है अगस्त, 2018 की । नक्सल प्रभावित आंध्र प्रदेश के विशाखापतनम में सत्तारूढ़ तेलुगू देसम पार्टी के एक विधायक और पूर्व विधायक नक्सली हमले में मारे गए । नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह समेत किसी भाजपा नेता ने उसे नोटिस नहीं लिया । क्योंकि मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू भाजपा गठजोड़ से अलग हो चुके थे ।