महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित जिला गढ़चिरोली में भीषण मुठभेड़ में 26 नक्सलियों /माओवादियों के मारे जाने और चार पुलिस कर्मियों के घायल होने की खबर के अगले दिन बिहार के गया जिले से भी नक्सलियों द्वारा चार व्यक्तियों की हत्या करके उनकी लाशों को घर के बाहर फंदे से लटकाने की भी खबर आई।
गढ़चिरोली में मुठभेड़ नई बात नहीं है। लेकिन पुलिस जिस वारदात को मुठभेड़ बताती है उस पर प्रायः फर्जी का सवाल उठ जाता है। क्योंकि पुलिस के तरफ से कोई हताहत नहीं होता है और पुलिस पर संदिग्ध बताकर गांव के बेकसूरों को गोली मार देने का आरोप लग जाता है। घटनास्थल से कुछ बरामद भी नहीं होता लेकिन गढ़चिरोली एस.पी. अंकित गोयल ने 13 नवम्बर की इस मुठभेड़ की जो जानकारी दी, इस पर सवाल नहीं उठा। क्योंकि इस में 26 नक्सलियों में प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) गुट का टॉप कमाण्डर मिलिन्द टलटुम्बड़े समेत कई इनामी थे। उनके पास से एक-47, इनसास, एसएलआर राइफल समेत भारी मात्रा में विस्फोटक व गोला बारूद बरामद हुए। नागपुर से प्राप्त सूचना के अनुसार मुठभेड़ में घायल चारों पुलिसकर्मियों का वहां के अस्पताल में इलाज चल रहा है।
गढ़चिरोली नक्सल मुठभेड़ पुलिस की बहुत बड़ी सफलता है, जो सुबह 6 बजे से शाम 4 बजे तक चली। गढ़चिरोली जिले की इसके पहले की इतनी लंबी मुठभेड़ 23/04/2018 में हुई जिसमें पुलिस ने दो मुठभेड़ों में 40 माओवादियों के मारे जाने का दावा किया। लेकिन दोनों के फर्जी होने की बात अभी तक दुहरायी जाती है। बोरिया-कसनापुर इलाके की एटापल्ली तहसील में रात भर चली 2018 की उस मुठभेड़ में एक भी पुलिसकर्मी के मारे जाने या घायल होने की रिपोर्ट नहीं मिली। उस पर सबकी उंगलियां उठी। लाशों को छोड़ कुछ नहीं मिला। सीपीआई (माओवादी) गुट ने नागपुर से विज्ञप्ति जारी करके मीडिया को बताया कि पुलिस ने मुखबिरों की मदद से गांववालों को पहले विषाक्त भोजन खिलाया और फिर गोली मारकर मुठभेड़ दिखा दिया।
अभी ऐसे समय में महाराष्ट्र के गढ़चिरोली मुठभेड़ और बिहार के गया में नक्सलियों द्वारा की गई हत्या की खबर सामने आई है, जब नक्सलियों के सबसे मजबूत गढ़ छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र की मुठभेड़ /हमला दोनों की ही न्यायिक जांच रिपोर्ट विवाद के घेरे में है। पहले गया के डुमरिया / शेरघाटी की 14.11.2021 की घटना देखें। काली वर्दी में लैस हथियारबंद सीपीआई (माओवादी) गुट के नक्सलियों ने एक ही परिवार के दो महिलाओं समेत चार व्यक्तियों की हत्या कर दी। शवों को घर के बाहर गौशाला में नारियल रस्सी के सहारे इस तरह लटकाया ताकि गांववाले देखें। पुलिस को घटनास्थल से एक हस्तलिखित पर्चा मिला, जिसमें कहा गया कि 16 मार्च 2021 को कोबरा कमाण्डो ने जो चार नक्सलियों को मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया, वो फर्जी था। उसी का बदला लिया गया है। इसी जगह पर इसी परिवार के लोगों ने झूठी मुखबिरी करके पुलिस को सूचना पहुंचाई थी। गया जिले के एसएसपी आदित्य कुमार ने मुखबिरी के नाम पर बेकसूरों की हत्या को शर्मनाक बताते हुए सफाई दी कि 16 मार्च की घटना का इनपुट इस परिवार से नहीं मिला था। पुलिस सतर्क है, क्योंकि 16 से 20 नवम्बर तक चलने वाले नक्सलियों के दमन विरोधी सप्ताह का यह हिस्सा था। छत्तीसगढ़ में नक्सल हमला/मुठभेड़ की न्यायिक जांच रिपोर्ट में विवाद ने राजनीतिक रंग पकड़ लिया है। दोनों जांच रिपोर्टों में से एक मुठभेड़ से संबंधित है, जिसमें न्यायिक आयोग ने मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए पुलिस के दावे को खारिज कर दिया। इस रिपोर्ट पर छत्तीसगढ़ सरकार खामोश हैं। विपक्षी भाजपा भी चुप है। लेकिन नक्सली हमले की न्यायिक जांच रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक माहौल गर्म है। यह हमला 25 मई 2013 को बस्तर के झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन रैली पर हुआ था जिसमें मारे गये 29 लोगों में कांग्रेस के लगभग सभी प्रमुख नेताओं का सफाया हो गया। 2013 में छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार थी और रमन सिंह मुख्यमंत्री थे। केन्द्र में कांग्रेस गठजोड़ सरकार थी और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। उस समय छत्तीसगढ़ सरकार ने झीरम घाटी हमले में नक्सलियों का हाथ होने से इंकार किया था।
इस घटना के हफ्ता भर पहले 17 मई 2013 को बीजापुर जिले के एडेसमेट्टा गांव में सीआरपी की कोबरा बटालियन की फायरिंग में मारे गये आठ ग्रामीणों में चार बच्चे थे। न्यायिक जांच रिपोर्ट में यह बात सामने आयी है। पुलिस ने जिस वारदात को मुठभेड़ बताया था उसे लेकर विवाद इतना बढ़ा कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के रिटायर जज बी. के.अग्रवाल की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग गठित करना पड़ गया।
गत सितम्बर में सरकार को सौंपी गई अपने रिपोर्ट में जस्टिस अग्रवाल ने कहा कि 44 राउण्ड फायरिंग में मारे गये एडेसमेटा गांव के वे आदिवासी निहत्थे थे और 44 में 18 राउण्ड कोबरा के एक कान्स्टेबल ने चलायी। रिटायर जज ने अपने रिपोर्ट में इस वारदात को तीन बार “गलती” बताया। जांच रिपोर्ट के अनुसार 17 मई की रात को गांव के 25-30 आदिवासी लोग अपना वार्षिक पर्व बीज पांडुंग मनाने जुटे थे। उसी दौरान 1000 सुरक्षा दस्ते ने उनलोगों को घेर लिया। जज ने पुलिस की इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया कि हमले के जवाब में फायरिंग की गयी। यह जांच रिपोर्ट आयी-गयी हो गयी क्योंकि मुठभेड़ फर्जी हो या असली, केन्द्र सरकार या राज्य सरकारों को कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि यह नक्सल रोधी दमन का हिस्सा है। इसलिए जांच आयोग गठन से लेकर रिपोर्ट आने तक कहीं कोई हलचल नहीं हुई। मई 2019 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआई जांच भी चल रही है।
झीरम घाटी हमले की जांच के लिए न्यायिक आयोग का गठन तत्कालीन छत्तीसगढ़ सरकार ने घटना के तीन दिन के बाद 28 मई 2013 को ही कर डाली। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पूर्व जज प्रशांत कुमार मिश्र की अध्यक्षता में गठित इस न्यायिक आयोग ने राज्य सरकार के बजाय राज्यपाल अनुसुइया उइकी को गत हफ्ते सौंपी। जबकि एडेसमेट्टा मुठभेड़ की जांच रिपोर्ट जस्टिस वी.के.अग्रवाल ने राज्य सरकार को सौंपी। अभी छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है और भूपेश बघेल मुख्यमंत्र हैं। विवाद 7 नवम्बर को ही उभरा, जब जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र ने जांच रिपोर्ट राज्यपाल को सौंपी। विवाद उस समय और बढ़ गया, जब राज्य सरकार जस्टिस प्रशांत मिश्र की जगह छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के एक अन्य पूर्व जज सतीश के. अग्निहोत्री को न्यायिक आयोग का अध्यक्ष और जस्टिस जी.मिनहाजुद्दीन को सदस्य के रूप में मनोनीत कर दिया। उतना ही नहीं सरकार ने जांच का दायरा भी बढ़ा दिया और छह महीने में आयोग को नया रिपोर्ट पेश करने को कहा। उसके तीनदिन बाद 14 नवम्बर को राज्यपाल ने झीरम घाटी जांच रिपोर्ट राज्य सरकार को भेज दिया। विवाद केजवाब में राज्यपाल ने अपनी ओर से सफाई में संवाददाताओं से कहा-“न्यायिक जांच आयोग से पूछे किउन्होंने मुझे यह रिपोर्ट क्यों सौंपी? मैनें इसे पढ़ा भी नहीं।”
संसद का शीतकालीन सत्र 29 नवम्बर से शुरू होनेवाला है। हो सकता है यह मामला उठे। जांच रिपोर्ट की राजनीति अपने जगह पर हैं। अब तो छह महीने बाद ही पता चलेगा कि दोनों जांच रिपोर्टों में क्या-क्या फर्क है। और भाजपा सरकार द्वारा गठित जांच आयोग की रिपोर्ट वर्तमान कांग्रेस सरकार सार्वजनिक करतीहै या नहीं।
लेकिन जहां तक नक्सली हमला/मुठभेड़ की बात है, केन्द्र और राज्य सरकारों को नक्सल दमन नीति की जगह अमन नीति के लिए सुरक्षा बलों को नक्सलियों की तरह आक्रामक बनने का निर्देश देने के बजाय अन्य विकल्प पर विचार करना चाहिए। यह देखते-सनते 54 साल गुजर गये।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी हिंसा और हिंसा का काट सीख रही है। जब पूर्वोत्तर के उग्रवादियों से शांति वार्ता हो सकती है, तो नक्सलियों से क्यों नहीं।
बस्तर क्षेत्र के सुकमा जिले में एक हफ्ता पहले सीआरपी के एक जवान ने अपने चार साथियों को सोते में ही गोली मार दी। सीआरपी सूत्रों के अनुसार वो जवान तनाव में था। वास्तविकता यह है कि नक्सल इलाके में तैनात सुरक्षा बल तनाव में ड्यूटी करते हैं और तनाव में ही मारे जाते हैं। अपने साथियों को मारनेवाले जवान रितेश रंजन को घर जाने के लिए छुट्टी नहीं मिल रही थी। छुट्टी मिली तो पता चला कि लौटकर उसे कश्मीर जाकर ड्यूटी करनी है। छत्तीसगढ़ हमेशा चर्चा में रहनेवाला नक्सल प्रभावित राज्य है। गढ़चिरोली मुठभेड़ में मारा गया मिलिन्द महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ क्षेत्र (एमएमसी) का कमाण्डर था। छत्तीसगढ़ सरकार ने ही 2005 में नक्सलियों के काट में गांव के बेरोजगार युवकों को हथियार देकर लाइसेंसी नक्सली बनाने का सलवा जुडूम अभियान चलाया था। इस संबंध में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में पर 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार के साथ रोक लगाने को कहा। 2013 झीरम घाटी हमले में नक्सलियों का हाथ होने से राज्य सरकार ने इंकार किया था।
1985 में आंध्र प्रदेश सरकार ने पुलिस का एक एलीट नक्सल रोधी दस्ता ग्रेहाउंड्स बनाया, जिसमें जवानों को नक्सलियों के छापामार/गुरिल्ला और लुका-छिपी घात लगाकर हमले की तकनीक सिखाई गयी। इसको मॉडल आक्रामक रवैया माना जाता है। लेकिन उसे अपनाया नहीं गया है। पुलिस बल घर तलाशी/धर-पकड़ अभियान के लिए टीम में निकलते हैं। जब वे लौटकर सुस्ताने लगते हैं, उसी अवसर पर इंतजार नक्सलियों को रहता है। नक्सली छोटी-छोटी टुकड़ियों में बंटकर विभिन्न कोने में मोर्चाबंदी किये रहते हैं।
छत्तीसगढ़ में ही इस वर्ष 3 अप्रैल को नक्सलियों ने सुरक्षा बलों के 22 जवानों को तलाशी अभियान से लौटते हुए तीन कोने से फायरिंग करके एक ही हमले में मार दिया। उसके पहले 17 मार्च को नक्सलियों ने शांति वार्ता का प्रस्ताव भेजा था।
सुकमा जिले के बुरकापाल में 24.04.2017 को 25 सीआरपी जवान उस समय नक्सली हमले में मारे गये जब धार-पकड़ अभियान से लौटकर सुस्ताने बैठे और खाना खा रहे थे। केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने उसके जवाब में 8 मई नक्सल प्रभावित दस राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक में “समाधान” (SAMADHAN) का आक्रामक फार्मूला पेश किया- (एस) स्मार्ट लीडरशिप, (ए) एग्रेसिव स्ट्रैटजी, (एम) मोटिवेशन एंड ट्रेनिंग, (ए) एक्शनेवल इंटेलिजेंस, (डी) डैशबोर्ड की परफॉर्मेंस इंडिकेटर, की रिजल्ट एरिया(KRA), (एच)-हार्नेशिंग टेक्नोलॉजी, (ए) एक्शन प्लान फॉर इच थिएटर, (एन) नो एक्सेस टु फिनान्सिंग।
उसी फार्मूले पर चलते हुए 01.10.2021 को गृहमंत्री अमित शाह ने भी नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और आला अधिकारियों के साथ सुरक्षा समीक्षा बैठक में दमन अभियान तेज करने पर बल दिया है।
एलीट ग्रेहाउंड्स अभी तेलंगाना पुलिस का दस्ता है। इस दस्ते के 36 जवानों को 29.08.2008 को उस समय जान गंवानी पड़ी जब वे एक ही बड़ी नाव में बैठकर ओडिशा सीमा पर नदी पार कर रहे थे। उन्हें ओडिशा के नक्सल क्षेत्र मलकानगिरी पहुंचना था। नक्सलियों ने दोनों किनारे से हमला करके बीच नदी में सबको एक ही हमले में मार दिया। अधिकारियों ने इसे भारी सुरक्षा चूक बताई और कहा कि एक ही नाव में बैठने के बजाय उन्हें कई नावों में सवार होकर छोटी-छोटी टुकड़ियों में नदी पार करना चाहिए था।