महाराष्ट्र पुलिस के लिए चुनौतीपूर्ण नक्सल क्षेत्र गढ़चिरोली में 15 पुलिसकर्मियों के नक्सली विस्फोट में मारे जाने के बाद जवाबी कार्रवाई में माओवादी नेता भास्कर और 39 अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गयी । पुलिस इस तहकीकात में जुटी है कि ‘महाराष्ट्र दिवस’ के रोज एक मई को नक्सलियों द्वारा शक्तिशाली बारूदी सुरंग फिट करने की खुफिया सूचना हासिल न कर पाने में चूक कहां हुई । पुलिस यह भी पता लगा रही है कि नक्सली सफाए के लिए ही मुख्य रूप से प्रशिक्षित ‘क्विक रिस्पांस टीम’(क्यूआरएस) दस्ते के उस रास्ते से गुजरने के समय और दिन की खुफिया सूचना नक्सलियों को किस मुखबिर ने दी । मजदूर दिवस के दिन एक मई को गढ़चिरोली जिले के कुरखेड़ा में जांभर खेड़ा गांव के निकट 11 बजे दिन में नक्सलियों ने एक प्राइवेट कार में सवार पुलिसकर्मियों को उड़ा दिया । पुलिसकर्मी वर्दी में थे, मगर कार प्राइवेट थी और ड्राइवर सिविलियन था ।

वारदात के अगले दिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस और केंद्रीय गृह राज्यमंत्री हंसराज अहीर घटनास्थल पर पहुंचे । लोगों को सांत्वना दी और शहीद पुलिसकर्मियों के परिवारजनों के लिए मुआवजे का एलान करके लौट आए । लेकिन गढ़चिरोली में सामान्य हालात नहीं लौटे हैं और निकट भविष्य में लौटने की संभावना नहीं लगती । छत्तीसगढ़ के बस्तर के बाद देश का दूसरा नक्सल क्षेत्र गढ़चिरोली है, जो केंद्र और राज्य सरकार दोनों के लिए चुनौती बनी हुई है । महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश तीनों के मुहाने पर होने के कारण गढ़चिरोली ज्यादा बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। यह हमला पुलिस के ‘क्विक रिस्पांस टीम’ दस्ते पर हुआ, जो आंध्र प्रदेश के ग्रेहाउंड्स की तर्ज पर नक्सली हमले की काट नक्सलियों की तरह प्रस्तुत करने के लिए स्पेशल ट्रेनिंग देकर तैयार की गयी है । हमले वाले गांव में नक्सलियों के ही समान दूसरा दहशत अभी कायम रहेगा ।

आगे बढ़ने से पहले दो कदम पीछे चलें । इस नक्सल हमले में हाथ होने के संदेह में पुलिस ने जिस नक्सली नेता भास्कर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, उसकी पत्नी रेमको नरोटा के बारे में महज एक हफ्ता पहले मुठभेड़ में मारे जाने की रिपोर्ट पुलिस ने प्रचारित की । मामला ये था कि अप्रैल के अंत में रेमको नरोटा ने अपनी पार्टी सीपीआई(माओवादी) की ओर से पूरे गढ़चिरोली जिले में बैनर लगाए थे । उन बैनरों में एक साल पहले इसी जगह इसी समय 40 संदिग्ध माओवादियों के पुलिस के हाथों मारे जाने की घटना की निंदा की गयी थी । पुलिस ने उसे अपनी बहुत बड़ी सफलता बतायी थी, लेकिन आज तक उस वारदात की असलियत पर संदेह बना हुआ है कि एक ही रात में एक ही गांव के 40 लोग नक्सली कैसे पाए गए और वो मुठभेड़ भी नहीं थी । पुलिस ने एकतरफा कार्रवाई की ।

15 पुलिसकर्मियों के नक्सली विस्फोट में मारे जाने के जवाब में पुलिस ने माओवादी नेता भास्कर के साथ पुलिस ने 39 अन्य के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की है । भास्कर को प्रतिबंधित नक्सली गुट सीपीआई (माओवादी) की उत्तरी गढ़चिरोली यूनिट का ‘डिवीजनल कमांडर’ बताया गया है। एफआईआर में नामजद संदिग्धों की संख्या भी 40 हो जाती है । गढ़चिरोली जिले के एसपी शैलेश वलकावले का कहना है कि नरोटा के मारे जाने के बाद ज्यादा सावधान रहना चाहिए था । नरोटा स्वयं भी प्रभावशाली माओवादी नेता थी । महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक सुबोध जायसवाल इसे बदले की कार्रवाई नहीं मानते हैं । एक मई के नक्सल हमले के शहीद जवानों के लिए मुआवजे का एलान हो गया । लेकिन इस घटना से पहले और बाद की कहानी पुलिस योजना के साथ-साथ सरकार के भेदभाव रवैए का भी खुलासा करती है । क्विक रिस्पांस पुलिस टीम के नक्सल रोधी दस्ते ने कार प्राइवेट लिया और ड्राइवर भी सिविलियन लिया । पहले तो इसी बात को लेकर लोगों में नाराजगी है । हमले में कार का ड्राइवर भी मारा गया । पुराडा थाना के अन्तर्गत आनेवाले कुरखेड़ा गांव के लोगों को इस बात को लेकर असंतोष है कि कार ड्राइवर तोमेश्वर सिंहनाथ को शहीद का दर्जा क्यों नहीं दिया गया और पुलिसकर्मियों के समान मुआवजे का हकदार वो क्यों नहीं है । ड्राइवर तोमेश्वर सिंहनाथ को उस समय थाने का फरमान मिला, जब वो अपने गांव की बारात लेकर जाने की तैयारी में था । थानावाले ने सिंहनाथ से कहा कि उसे पुलिस टीम को पुराडा थाना ले जाना है । उसे बारात छोड़कर जाना पड़ा और फिर वापस नहीं लौटा । पुलिस के काम के लिए गए सिविलियन के पुलिसकर्मियों के साथ मारे जाने में सरकार ने शुमार नहीं किया । 15 पुलिसकर्मियों के बारूदी सुरंग विस्फोट में मारे जाने की रिपोर्ट प्रचारित की गयी । 16वां मृतक सिविलियन ड्राइवर है, जिसे वर्दीधारी नहीं होने के कारण शहीद नहीं माना गया । महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस ने घटनास्थल पर जाकर प्रत्येक शहीद पुलिसकर्मी के परिवार को एक करोड़ मुआवजे का ऐलान कर दिया और पुलिस के काम के लिए गए ड्राइवर को उस मुआवजे का हकदार नहीं माना । तोमेश्वर सिंहनाथ के परिवार और गांव के लोग लगातार मांग करते रहे कि उसे भी 15 पुलिसकर्मियों के समान ‘शहीद’ का दर्जा दिया जाए । सिंहनाथ के पिता गरीब किसान हैं और उसके भाई हितेन्द्र दिहाड़ी कमानेवाला मजदूर है । गढ़चिरोली समूचा इलाका आदिवासी बहुल आबादीवाला क्षेत्र है । उनकी गरीबी और सरकार की उपेक्षापूर्ण रवैया भी नक्सल गढ़ होने का एक कारण है । लोगों के गुस्से के जवाब में डीजीपी सुबोध जायसवाल ने सिर्फ इतना ही कहा कि उस ड्राइवर को भी पैसे दिए जाएंगे । लेकिन क्या और कितना नहीं कहा ।

इसी गढ़चिरोली की 2016 की एक वारदात देखिए । जुलाई, 2016 में महाराष्ट्र जिला प्रशासन ने ठीक उसी समय नक्सलियों के लिए ‘पुलिस मदद केंद्र’ खोला, जब नक्सली गुट ने अपने शहीद साथियों की याद में शांतिपूर्ण ‘शहीद सप्ताह’ का आयोजन कर रखा था । उसमें लोग न जुटें, इसलिए गांववालोंं को धमकी भरे सरकारी पत्र मिले कि अगर वे ‘पुलिस मदद केंद्र’ के बैठक स्थल पर नहीं पहुंचे तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी । वो पत्र मीडियाकर्मियों के हाथ लग गयी । उसके बाद गढ़चिरोली के तत्कालीन एसपी संदीप पाटिल मीडिया के सवालों से बचते रहे । सरकारी खौफ के डर से लोग निर्धारित स्थल पर पहुंचे तो उन्हें वहां से उठाकर सरकारी वाहनों से वन विभाग के कार्यालय ले जाया गया और तीन दिनों तक बाहर नहीं निकलने दिया गया । ‘शहीद सप्ताह’ समाप्त होने के बाद ही गांव के लोग घर लौट पाए । उस समय भी नक्सली संगठनों की ओर से शहीदों की याद में बैनर पोस्टर लगाने की रिपोर्ट आयी थी । 2016 में उस समय संसद का मानसून सत्र शुरू हुआ था और बिहार के औरंगाबाद में नक्सली हमले में सीआरपी के कई जवान शहीद हो गए ।

अभी लोकसभा चुनाव अपने अंतिम चरण में है पूरे चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह समेत सभी स्टार प्रचारक भाजपा नेताओं ने हर चुनावी भाषण में नक्सलियों को कांग्रेस समर्थन और युवकों को बहलाकर नक्सली बनाने का जिक्र जरूर किया । मार्च में छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रचार के समय एक भाजपा विधायक को उनके चार अंगरक्षकों के साथ नक्सलियों ने विस्फोट में उड़ा दिया ।

लेकिन गढ़चिरोली से उठे नए नक्सली मुद्दे से सरकार की नीयत और नीति दोनों पर सवाल खड़े करता है । नक्सलियों के हाथों जो बेकसूर ग्रामीण मारे जाते हैं, उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिलता । पुलिस संदिग्ध नक्सली कहकर जिन बेकसूरों को मुठभेड़ में मार देती है, उन्हें तो कुछ मिल ही नहीं सकता । लेकिन जिस सिविलियन ने पुलिस के काम के लिए अपनी जान गंवाई, एक सिविलियन की जान की कोई कीमत नहीं समझी गयी । जबकि उसी ड्राइवर की मदद से पुलिसकर्मी सड़क निर्माण ठेकेदार को सुरक्षा प्रदान करने गए थे । नक्सलियों ने सड़क निर्माण कंपनी की 36 गाड़ियां उड़ा दी । क्विक रिस्पांस टीम डाडापुर गांव में घटनास्थल का जायजा लेने उसी ड्राइवर की मदद से जा रही थी । गांववाले पुलिस का साथ कैसे और क्यों दे?

लेकिन अभी जब खुफिया / मुखबिर चूक की समीक्षा हो रही है, उसका कारण है, गांववालों को विश्वास में लेने में पुलिस की विफलता । पुलिसकर्मी नक्सलियों से डरते हैं, इसलिए इक्का-दुक्का पुलिसकर्मियों की विभिन्न ठिकानों पर घात मोर्चाबंदी नहीं की जाती । इससे नक्सलियों को पूरी पुलिस टीम को एक साथ उड़ाने में सहूलियत होती है ।

जिस ग्रेहाउंड्स की तर्ज पर क्विक रिस्पांस टीम बनी उसकी भी एक ऐसी कहानी है । 29 जून, 2008 को आंध्र-ओडिशा सीमा पर नदी पार करते समय एक ही नाव पर सवार 36 ग्रेहाउंड्स पुलिसकर्मी रिमोट से किए गए विस्फोट में मारे गये । उसे खुफिया और गुप्तचर चूक बतायी गयी । अप्रैल, 2017 में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में ग्रामीणों को साथ लेकर नक्सलियों ने 26 सीआरपी जवानों की उस समय हत्या कर दी, जब वे धरपकड़ अभियान से लौटकर इत्मीनान से खाना खाने बैठे थे । नक्सलियों को सीआरपी की हर गतिविधि की सूचना थी ।