गुजरात साहित्य अकादेमी की मासिक पत्रिका ‘शब्दसृष्टि’ प्रसिद्ध गुजराती कवि पारूल खक्कड़ की कविता ‘शववाहिनी गंगा’ पर विफर उठी और इस कविता की चर्चा तथा प्रचार-प्रसार करनेवालों को ‘साहित्यिक नक्सल’ करार दिया ।
गुजरात में भाजपा की सरकार है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गृह राज्य है । नरेंद्र मोदी समेत भाजपा केंद्रीय नेतृत्व के लिए उनकी नीतियों का विरोध करनेवाले सभी बुद्धिजीवी तथा सामाजिक कार्यकर्ता ‘शहरी नक्सल’ हैं ।
जानी मानी गुजराती कवि पारूल खक्कड़ की कविता ‘शववाहिनी गंगा’ मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा में तैरती पायी गयी लाशों पर केंद्रित है । उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा के आसपास मिला इन शवों के विषय में घटनास्थल से प्राप्त रिपोर्ट में कोरोना से संदिग्ध मौतों की पुष्टि हुई ।
गंगा की पवित्रता और शुद्धिकरण की स्वयंभू ठीकेदार भाजपा ने लाशों के मिलने से ज्यादा इस घटना को मीडिया द्वारा उछाले जाने पर जबर्दश्त रोष प्रकट किया । संयोग से उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार और बिहार में भी नीतीश कुमार भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बने हुए हैं ।
गंगा में इतने सारे शव तैरते मिलने पर देश भर में बवाल मचना स्वाभाविक था । यह मामला एक सामाजिक विवाद का विषय था, लेकिन भाजपा ने इसे राजनीतिक विवाद का रंग दे दिया । बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने एक-दूसरे पर फेंकाफेंकी जरूर किया, लेकिन जनता के सामने सफाई देने में दोनों ही सरकारों ने असहज महसूस किया ।
बिहार में लाशों की संख्या को लेकर पटना हाईकोर्ट में सरकार की फजीहत हुई । राज्य के मुख्य सचिव और स्थानीय अधिकारी आंकड़े में कोर्ट ने फर्क पाया । सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से इस घटना पर दी गयी दलील में कहा गया कि मीडिया को ‘शववाहिनी गंगा’ कहकर इस घटना को इतना उछालना नहीं चाहिए था । सुप्रीम कोर्ट ने जवाब में फटकार लगायी और मीडिया की भूमिका को उचित ठहराते हुए उल्टे केंद्र सरकार से ही पूछा कि गंगा में लाशें तैरती मिलने से ज्यादा सरकार को इस बात से परेशानी क्यों हो रही है कि मीडिया ने इसकी जानकारी समाज तक पहुंचायी । अगर मीडिया ने अपना कर्त्तव्य निभाया नहीं होता तो लोग जान भी नहीं पाते ।
सरकार ने जितना पल्ला झाड़ना चाहा, उतना ही यह मामला तूल पकड़ता चला गया । इस ‘शववाहिनी गंगा’ प्रकरण से आहत संवेदनशील कवि पारूल खक्कड़ से सद्गति देनेवाली पावनी गंगा की यह दुर्गति नहीं देखी गयी । उन्होंने अपने चोटिल मन की व्यथा ‘शववाहिनी गंगा’ कविता में व्यक्त कर डाली ।
यह कविता यूट्यूब, इंटरनेट, फेसबुक सर्वत्र ऑनलाइन पर उपलब्ध है और चारों तरफ समाज के हर वर्ग के बीच बहुचर्चित है । पाठकों की सहूलियत के लिए ‘शववाहिनी गंगा’ कविता का पहला पैरा प्रस्तुत है - एक साथ सब मुर्दे बोले
सब कुछ चंगा-चंगा
साहिब तुम्हारे रामराज में
शववाहिनी गंगा
14 पंक्तियों की कविता में हर पैरे की समाप्ति इस पद से की गयी है - ‘साहिब तुम्हारे रामराज में शववाहिनी गंगा’
एक तो ‘रामराज’ और दूसरे उसमें गंगा को ‘शववाहिनी’ बताया जाना भाजपा कैसे बर्दाश्त करेगी । इस कविता की चर्चा करनेवाले वही लोग हैं, जो भाजपा के विचारों और ‘नीतिगत सिद्धांतों’ से सहमत नहीं हैं । चूंकि पारूल खक्कड़ गुजरात की मशहूर रचनाकार हैं, इसलिए गुजरात साहित्य अकादेमी भाजपा की तरह ‘धर्मसंकट’ में फंस गयी । मामला साहित्य और समाज से जुड़ा है, इसलिए तुरंत में इसे राजनीतिक रंग देना संभव नहीं था, तो अकादेमी ने बीच का रास्ता निकाला । अपनी दकियानूसी सोच साहित्य पर थोपी, मगर बचते-बचाते संभल-संभलकर । गुजरात साहित्य अकादेमी ने अपनी पत्रिका ‘शब्दसृष्टि’ के जून अंक के संपादकीय में पारूल खक्कड़ पर टिप्पणी तो की, मगर ‘शववाहिनी गंगा’ शब्द का लोप कर दिया । साहित्य अकादेमी पत्रिका में पारूल खक्कड़ के विषय में कहा गया कि यह कविता ‘अराजकता’ फैलाने के लिए लिखी गयी है । पारूल खक्कड़ की कविता का कई भाषाओं में अनुवाद और हर जगह प्रशंसा के बाद सहजता से इसे स्वीकारना अकादेमी के लिए असंभव हो गया । आखिरकार गुजरात साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष विष्णु पांड्या ने जोर देकर ऐसी संपादकीय लिखे जाने की पुष्टि करते हुए कहा कि यह कविता व्यर्थ का आंदोलन खड़ा करने के लिए अनावश्यक गुस्से का इजहार किया गया है । ‘शववाहिनी गंगा’ का जिक्र न करते हुए ‘शब्दसृष्टि’ पत्रिका ने संपादकीय में लिखा कि पारूल खक्कड़ ने अपनी कविता में जिन शब्दों का उल्लेख किया है, उसका गलत इस्तेमाल केंद्र की नीतियों और ‘राष्ट्रीय सिद्धांतों’ का विरोध करनेवाली ताकतें कर रही हैं । पत्रिका में कविता की चर्चा और प्रचार-प्रसार करनेवालों को ‘साहित्यिक नक्सल’ बताते हुए उनके विषय में वही टिप्पणियां की गयी हैं, जो भाजपा के सभी बड़े-छोटे नेता भाजपा से मतभेद रखनेवालों के खिलाफ करते हैं । संपादकीय में लिख गया है कि पारूल खक्कड़ की कविता का इस्तेमाल तथाकथित उदारवादी और वामपंथी कर रहे हैं, जो देश में अराजकता पैदा करने की साजिश में लगे हैं । सभी मोर्चों पर ये ‘साहित्यिक नक्सली’ सक्रिय हैं और अब साहित्य में भी गंदे इरादे से घुस गए हैं । पारूल खक्कड़ ने ‘शववाहिनी गंगा’ 11 मई को अपने फेसबुक पेज पर डाली । उसका हिन्दी अनुवाद इलियास शेख ने किया । गुजरात साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष विष्णु पांड्या ने पत्रिका के बचाव में जो कुछ कहा उसके ये शब्द गौरतलब हैं - ‘यह कविता किसी की हताशा या रंजिश हो सकती है । मगर इसका इस्तेमाल उदारवादियों, मोदी विरोधियों, भाजपा विरोधियों और संघ(आरएसएस) विरोधियों द्वारा किया जा रहा है ।’ गुजरात साहित्य अकादेमी ने नरेंद्र मोदी की विचारधारा से सहमति न रखनेवाले ‘शहरी नक्सलोंं’ को ‘साहित्यिक नक्सल’ कहकर नया नामकरण किया । लगभग एक दर्जन कवि, लेखक, वकील, प्रोफेसर, सामाजिक कार्यकर्ता भाजपा द्वारा ‘शहरी नक्सली’ घोषित किये जा चुके हैं । मुख्य रूप से आतंकवाद पर काबू पाने के लिए बने गैर गतिविधियां रोक कानून(यूएपीए) के अंतर्गत ये लोग मुंबई, पुणे, नागपुर जेलों में बंद हैं । उनमें से चर्चित नाम हैं - तेलुगू कवि वारावारा राव, वकील अरूण फेरीरा, सुधा भारद्वाज, प्रोफेसर हनी बाबू दलित लेखक आनंद तेलतुंबड़े, लेखक वर्नोन गोन्साल्वस । भाजपा के लिये ये सभी ‘देशद्रोही’ और ‘शहरी नक्सली’ हैं । 2018 में छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश विधान सभा चुनावों में प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह और उस वक्त भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने अपने राजनीतिक फायदे के लिए कांग्रेस पर ‘शहरी नक्सलियों’ से मिले होने का आरोप लगाया । संयोग से गुजरात साहित्य अकादेमी ने ऐसे समय में भाजपा विरोधी बताकर ‘साहित्यिक नक्सल’ कहकर उछाला है जब अगले वर्ष गुजरात में चुनाव होने वाला है । यूएपीए कानून के अंतर्गत राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने इन सारे ‘शहरी नक्सलियों’ को नक्सली गुट सीपीआई(माओवादी) से संपर्क बताकर ऐसी धाराओं में फंसाया है, ताकि जमानत न हो । जनवरी, 2018 से इनका मामला बॉम्बे हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक जमानत के लिए भटक रहा है । जमानत की अर्जी पर ही 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे बुद्धिजीवियों को जेल में डालने पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा - ‘लोकतंत्र में आवाज को दबाना प्रेशर कूकर की तरह है, ज्यादा प्रैशर से फट जाएगा ।’ प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर को कहना पड़ा कि ‘ऐसे सामाजिक कार्यकर्ताओं का साथ दे रहे हैं तो क्या हम ‘देशद्रोही’ हैं ।
इस हफ्ते दिल्ली हाईकोर्ट ने तीन छात्र एक्टिविस्टों को जमानत देते हुए दिल्ली पुलिस को फटकार लगायी और कहा कि यूएपीए का इस्तेमाल गलत हो रहा है । हाईकोर्ट के अनुसार इनके खिलाफ दायर आरोपपत्र में वैसा मामला नहीं बनता, जिसका प्रावधान यूएपीए में है और इस प्रवृत्ति को लोकतंत्र के लिए खतरनाक बताया । पिछले वर्ष दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में प्रदर्शन के दौरान इन तीनों - नताशा नरवाल, देवांगना कोलिता और आसिफ इकबाल तन्हा को गिरफ्तार करके उन्हीं धाराओं में डाला गया जो ‘शहरी नक्सलियों’ के खिलाफ लगा है । दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी ।
गुजरात साहित्य अकादेमी के अनुसार पारूल खक्कड़ की कविता की चर्चा करनेवाले वैसे ही नक्सल ग्रुप के ‘साहित्यिक नक्सल’ हैं ।
तमिलनाडु की जयललिता सरकार के समय का ऐसा ही एक मामला लोक कवि एसत्र कोवन का है, जिन्हें ‘देशद्रोह’ के जुर्म में नक्सली बताकर नवंबर, 2015 में जेल में डाल दिया । जयललिता और नरेंद्र मोदी के विचार मेल खाते थे । मद्रास हाईकोर्ट ने कोवन को जमानत दे दी तो उसके खिलाफ जयललिता सरकार सुप्रीम कोर्ट गयी, लेकिन उनकी अर्जी ठुकरा दी ।