प्रतिबंधित नक्सली गुट सीपीआई(माओवादी) ने छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में अपने सबसे मजबूत गढ़ को ध्वस्त होते देख बातचीत का कथित प्रस्ताव प्रचारित किया है ।

यह शांति प्रस्ताव ऐसे समय में मीडिया के जरिए प्रकाश में आया जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने बस्तर क्षेत्र के दंतेवाड़ा जिला पहुंचने वाले थे ।

छत्तीसगढ़ सरकार ने 02 अप्रैल को नक्सली प्रस्ताव पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि बातचीत के लिए राज्य सरकार तैयार है ताकि नक्सली संगठन के लोग मुख्य धारा में लौटें और समाज से जुड़ें । मगर उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने साफ शब्दों में कह दिया कि वार्ता की कोई शर्त नहीं होगी ।

सीपीआई(माओवादी) की ओर से अखबारों को जारी प्रेस विज्ञप्ति में हैदराबाद में उनकी केंद्रीय कमिटी के 28 मार्च गोलमेज सम्मेलन का हवाला दिया गया और नक्सल प्रभावित सभी राज्यों से कहा गया कि वार्ता के लिए देशव्यापी माहौल बनाएं । माओवादियों के प्रवक्ता के रूप में प्रेस विज्ञप्ति पर दस्तखत करनेवाले अभय ने प्रस्तावित वार्ता की पूर्व शर्त रखी है कि छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा, मध्यप्रदेश, तेलंगाना सरकार नक्सल रोधी अभियान के नाम पर हत्या और सशस्त्र बलों के लिए नए शिविरों की स्थापना रोकें ।

केंद्रीय गृह मंत्री ने इस प्रस्ताव पर कोई टिप्पणी किए बगैर 05 अप्रैल को दंतेवाड़ा में परंपरागत स्थानीय आयोजन ‘बस्तर पांडुम’ में अपना पहले वाला एलान दुहराया कि 31 मार्च, 2026 तक नक्सलवाद खत्म करने को सरकार प्रतिबद्ध है । अमित शाह ने फिर से माओवादियों को हथियार डालकर समाज की मुख्यधारा में लौटने कहा ।

केंद्र सरकार की पहल पर चलाए जा रहे ‘ऑपरेशन कगार’ अभियान में केंद्रीय सुरक्षा बलों और राज्य पुलिस को भारी सफलता मिली है । इससे छत्तीसगढ़ के अलावे अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों में भी माओवादियों का अस्तित्व खतरे के कगार पर है । लगभग बैकफुट पर जा चुके नक्सली गुट ने प्रस्ताव में यह जताने का प्रयास किया है मानो वे सुरक्षा बलों के आगे कमजोर नहीं पड़े हैं और कहा है कि सरकार अगर सैन्य अभियान बंद करेगी तो वे युद्धविराम की घोषणा करेंगे । प्रेस विज्ञप्ति में हिंसा छोड़ने और हिंसा के जरिए ही ‘क्रांतिकारी बदलाव’ लाने वाली सोच बदलने का कोई संकेत नहीं है । राजनीतिक जुमले का इस्तेमाल करते हुए कहा गया. हम हमेशा जनहित में शांति वार्ता के लिए तैयार है । इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों के आगे सकारात्मक माहौल के लिए यह प्रस्ताव किया गया है ।

वार्ता प्रस्ताव प्रचारित किए जाने के दिन 02 अप्रैल को ही मध्य प्रदेश के मांडला जिले में 14 लाख की इनामी दो महिला नक्सलियों की मौत पुलिस की गोलियों से हुई । राज्य पुलिस की नक्सल रोधी दस्ता हॉक फोर्स के साथ तलाशी अभियान के साथ हुई मुठभेड़ में दोनों मारी गयी । मध्य प्रदेश पुराना नक्सली गढ़ रहा है । 2000 में छत्तीसगढ़ बनने के बाद ज्यादातर नक्सली गतिविधियों वाले जिले मध्यप्रदेश से अलग हो गए । ये दोनों माओवादी महिला मध्यप्रदेश.महाराष्ट्र.छत्तीसगढ़ नक्सल क्षेत्र में सक्रिय थीं ।

05 अप्रैल को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के छत्तीसगढ़ पहुंचने से कुछ घंटे पहले 20 लाख के इनामी चार माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया । उसी दिन शाम को तेलंगाना से 86 नक्सलियों के हथियार डालने की खबर आयी, जहां सीपीआई(माओवादी) गुट ने शांति वार्ता के लिए गोलमेज बैठक का जिक्र प्रस्ताव में किया । तेलंगाना सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार ये 86 लोग प्रतिबंधित सीपीआई(माओवादी) गुट के ही हैं, जिन्होंने समर्पण के बाद कहा कि हिंसा का रास्ता छोड़ दिया है ।

उधर छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में अमित शाह जनसभा में बता रहे थे कि 2025 के चौथे महीने की शुरूआत तक 521 माओवादियों ने हथियार डाले और 2024 में 881 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया । केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि नक्सलियों का अपने ही सुरक्षा बलों के हाथों मारे जाने से खुशी नहीं होती, दोनों ही अपने हैं । मार्च, 2026 तक नक्सल सफाया अभियान चलाना सरकार की विवशता है, ताकि माओवादी हथियार उठाकर आदिवासी भाई.बहनों का विकास न रोक सकें ।

‘बस्तर पांडुम’ सांस्कृतिक आयोजन के समापन समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री ने यह ऑफर भी दिया कि जो गांव नक्सलियों के आत्मसमर्पण में मदद करेंगे और खुद को माओवादी मुक्त घोषित करेंगे, उन्हें निर्माण तथा विकास के लिए एक करोड़ रूपये मिलेंगे । उस अवसर पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, उप मुख्यमंत्री अरूण साव और विजय शर्मा मौजूद थे । लेकिन अमित शाह समेत कोई भी माओवादियों की वार्ता पेशकश पर एक पंक्ति नहीं बोले ।

सीपीआई(माओवादी) का कथित प्रेस नोट तेलुगू में तैयार किया गया, जिसका हिन्दी अनुवाद छत्तीसगढ़ सरकार तक पहुंचा । उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा की एक और प्रतिक्रिया गौर करने लायक है । उन्होंने कहा कि पहले तो इस प्रेस नोट की प्रमाणिकता सुनिश्चित करनी है । पहले भी माओवादियों ने वार्ता की पूर्वी शर्त रखी कि सुरक्षा बल 6 महीने तक बैरकों से बाहर न निकलें और उनकी संख्या कम की जाए, जब इस पर अमल किया गया तो नक्सलियों ने फिर हमले की तैयारी कर ली ।

छत्तीसगढ़ सरकार का ऐसा कहना आधारहीन नहीं है । 2023 में छत्तीसगढ़ में भाजपा के सत्ता में वापस लौटने के बाद मुख्यमंत्री बने विष्णुदेव साय ने माओवादियों को बिना शर्त बातचीत के लिए सामने आने कहा । 2024 पूरे वर्ष सुरक्षा बलों के आगे लगातार पिछड़ने के बाद 2025 शुरू होते ही माओवादियों ने मौका पाकर हमला कर दिया ।

06 जनवरी, 2025 को बीजापुर में नक्सलियों ने उस रास्ते में बारूदी सुरंग बिछा दिया, जिधर से सुरक्षा बलों को तलाशी अभियान से लौटना था । इस जबर्दश्त विस्फोट में ‘ऑपरेशन कगार’ से जुड़े जिला रिजर्व बल के 8 जवान मारे गए, उनके सिविलियन ड्राइवर की भी जान गयी । नक्सलियों को यह संदेश देना था कि वे ध्वस्त होने के कगार पर नहीं है ।

उसके बाद चार महीने में सुरक्षा बलों की ओर से चलाए गए सफाया/सरेंडर अभियान का जवाब है कथित बातचीत प्रस्ताव । इस संबंध में छत्तीसगढ़ की ही 2021 की वारदात याद करना जरूरी है, जिस आलोक में वर्तमान सरकार ने प्रतिक्रिया दी है ।

17.03.2021 को नक्सलियों ने राज्य सरकार के पास शांति वार्ता का प्रस्ताव भेजाए और 28 मार्च को सीआरपी जवानों से भरी बस बारूदी सुरंग विस्फोट में उड़ा दी । 03 अप्रैल, 2021 को बीजापुर में ही मुठभेड़ में नक्सलियों ने तीन तरफ से टुकड़ियों में बंटकर जवानों को घेर लिया और अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी । उस हत्याकांड में 22 जवान मारे गए, कई घायलों और लापता का कोई सुराग नहीं मिला । एक लापता कोबरा बटालियन जवान रामेश्वर सिंह मनहास को नक्सलियों ने स्थानीय गणमान्य नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मध्यस्थता के बाद मुक्त किया ।

आज की तारीख में केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 12 से घटकर 6 रह गयी है । नक्सल प्रभावित अन्य राज्य बिहार, ओडिशा, झारखंड में बचे.खुचे नक्सली सरेंडर करने की हालत में हैं । महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस का सबसे पुराना एकमात्र नक्सल अड्डा गढ़चिरोली जिले को नक्सल मुक्त करके उसे विकास के नक्शे पर लाने का दावा सही है ।

जो नक्सली गुट हिंसा की बदौलत ‘क्रांतिकारी बदलाव’ के दिवास्वप्न देख रहे हैं, उन्हें शांति मुंडा से प्रेरणा और पश्चिम बंगाल से सबक लेनी चाहिए । 1967 में पश्चिम बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन की नींव रखने का श्रेय 83 वर्षीया शांति मुंडा उर्फ शांति सरकार को जाता है । आंदोलन के सूत्रधार कानू सान्याल, चारू मजुमदार, सरोज दत्ताए महादेव मुखर्जी की पीढ़ी के नेताओं में से एकमात्र शांति मुंडा जीवित बची हैं । शांति मुंडा पहली महिला हैं, जिन्होंने 25.05.1967 को आदिवासियों की जमीन हड़पने के लिए जमीन्दारों की ओर से पहुंची पुलिस टीम पर तीर चलाया था ।

2024 लोक सभा चुनाव के दौरान 13.04.2024 को नक्सलवाड़ी(दार्जिलिंग) में शांति मुंडा से बातचीत का अवसर मिला । उन्होंने कहा. ‘मेरे पास सिर्फ अपनी जोत की जमीन है और वृद्धावस्था पेंशन सरकार से मिलता है । आन्दोलन से इतना ही मिला । खात्मे की राजनीति गलत है, आप कितने को मारेंगे । इस पर मेरा कानूदा से मतभेद था, यहां कानू सान्याल की झोपड़ी को छोड़ कहीं लाल झंडा नहीं है ।’

चारू मजुमदार के बेटे अभिजित मजुमदार 2009 में दार्जिलिंग लोकसभा सीट से हार गए । ये इस बात की सबूत है कि जो मुख्य धारा की राजनीति में हैं, उन्हीं के परिवारजन को मतदाता स्वीकारते हैं ।

पश्चिम बंगाल आज नक्सल मुक्त है । नक्सल गढ़ जंगलमहल के हीरो छत्रधर महतो 11 साल जेल में रहकर फरवरी, 2020 में छूटे । 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा का साथ दिया, 2021 विधान सभा चुनाव में दीदी(ममता बनर्जी) के साथ हो गए ।

चारू मजुमदार द्वारा स्थापित सीपीआई(एमएल) ने वर्षों पहले मुख्यधारा को अपनाया । 2024 में झारखंड का नक्सल गुट मार्क्सवादी समन्वय समिति का सीपीआई(एमएल) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने अपने में विलय किया । बिहार में 2020 विधान सभा चुनाव में सबसे मजबूत वाम दल सीपीआई(एमएल) साबित हुआ, जिसके 13 प्रत्याशी जीते, 2024 लोकसभा चुनाव में भी एक जीते ।