प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र में चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में कांग्रेस पर ‘शहरी माओवादियों/नक्सलियों’ के समर्थन का आरोप लगाया । उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस वैसे ‘शहरी माओवादियों का साथ दे रही है, जिन्होंने गरीब आदिवासी युवकों की जिंदगी बर्बाद कर दी । छत्तीसगढ़ उन पांच राज्यों में शामिल हैं जहां चुनाव हो रहे हैं । छत्तीसगढ़ का आदिवासी आबादी वाला बस्तर क्षेत्र नक्सलियों का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है । 12 नवंबर को पहले चरण की वोटिंग चुनाव आयोग ने इसी क्षेत्र में करायी । क्योंकि यहां माओवादी हिंसा के कारण अन्य इलाकों की तुलना में ज्यादा कड़ी सुरक्षा की जरूरत थी ।
नक्सली संगठन वोटिंग के बॉयकाट का एलान कर वोट डालने वालों को चेतावनी देते हैं और उंगलियां काट लेने की धमकी देते हैं । ये सब बातें अब आयी गयी हो गयी हैं। उसके बावजूद चुनाव हो रहे हैं । इस बार तो चुनाव आयोग की रिपोर्ट के अनुसार लोगों ने 2013 के मुकाबले ज्यादा बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया । 70 प्रतिशत वोटिंग चुनाव आयोग की बहुत बड़ी उपलब्धि है ।
इस चुनाव में बिल्कुल नयी बात देखने को मिली, जिससे बस्तर के बाहर भी वोटर भ्रम में पड़ गए । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान ‘शहरी नक्सलियों’ की एक नयी परिभाषा वोटरों को बतायी कि इनका समर्थन कांग्रेस कर रही है । प्रधानमंत्री के ऐसा कहने का प्रथम दृष्टया कारण तो आम वोटरों की नजर में यह बनता है कि बस्तर क्षेत्र की 18 विधान सभा सीटों में से 12 कांग्रेस के कब्जे में है । भाजपा के पाले की छह सीटों में से एक राजनंदगांव से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह जीते हुए हैं। इस इलाके के लोकसभा सदस्य रमन सिंह के पुत्र अभिषेक सिंह हैं । बस्तर के जगदलपुर में 9 नवंबर को चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री ने ‘शहजादा’ या एक ही परिवार का शासन जैसी कोई बात नहीं कही । फिर अगले दिन मध्य प्रदेश के विलासपुर में नरेंद्र मोदी ने वही जुमला दुहराया । 12 नवंबर को बस्तर क्षेत्र 198 बूथों पर मतदान संपन्न होने के बाद बीजापुर से सुरक्षा बल अन्य इलाकों की ओर रवाना हुए और नक्सलियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट करके उनके ट्रक को रास्ते में उड़ा दिया, जिसमें पांच जवान समेत छह लोग घायल हो गए । 15 नवंबर को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह स्थिति का जायजा लेने रायपुर पहुंचे । राजनाथ सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ में जब चौथी बार भाजपा की सरकार बनेगी तब नक्सलवाद समाप्त होगा ।
उन्होंने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि तीन से पांच साल के अंदर माओवादियों का सफाया हो जाएगा । प्रधानमंत्री के कथन की तह में जाने पर उससे जुड़े सारे पहलू नक्सलियों की तरह ही भटकाव और वोटरों को दिग्भ्रमित करनेवाले हैं । इसका असर मध्यप्रदेश पर भी पड़ेगा, जहां साथ चुनाव हो रहे हैं । प्रधानमंत्री की योजना दूरगामी है, क्योंकि अगले साल लोकसभा चुनाव है । केंद्रीय गृहमंत्री ने कांग्रेस का नाम तो नहीं लिया । लेकिन नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषण को अगर राजनाथ सिंह के वक्तव्य से जोड़ा जाए तो माओवादियों का सफाया तभी संभव है जब कांग्रेस का सफाया हो । अगर ऐसा संभव न हो तो कम-से-कम 2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता में न आने पाए । अगर ऐसा न हुआ तो नक्सल सफाया अभियान चल नहीं पाएगा । प्रधानमंत्री ने बस्तर में चुनाव प्रचार के दौरान कहा कि अगर गलती से भी शहरी माओवादियों के समर्थक कांग्रेसी सत्ता में आ गए तो बस्तर बर्बाद हो जाएगा । प्रधानमंत्री के कहने का सीधा तात्पर्य था कि आदिवासी इलाकों में हिंसा के लिए शहरों में एयर कंडीशंड कमरों में रहनेवाले नक्सली जिम्मेदार हैं और कांग्रेस उनके साथ है । इसके जवाब में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी का बचाव करते हुए नक्सली हिंसा के शिकार हुए अपने पार्टी नेता नन्द कुमार पटेल और महेन्द्र कर्मा का नाम लिया । राहुल गांधी ने उन्हें शहीद बताया । नंद कुमार पटेल और महेन्द्र कर्मा समेत 27 लोग 2013 में नक्सली हमले में मारे गए । राहुल गांधी नरेंद्र मोदी के इस बयान का तगड़ा काट प्रस्तुत नहीं कर पाए और राफेल सौदा समेत अन्य मुद्दों की ओर बढ़ गए ।
2013 में केंद्र में कांग्रेस गठजोड़ सरकार थी, जब छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में कांग्रेस ने भाजपा से दोगुनी सीटें जीती । 2003 में जब केंद्र में भाजपा गठबंधन सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, उसी समय से छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है । नक्सली हिंसा का सरकारीकरण करके सत्ता समर्थक समानान्तर नक्सली हिंसा सलवा जुडूम के नेता रमन सिंह हैं, जिसने सैकड़ों आदिवासी परिवारों को बेघर कर दिया । इनका मामला अगर सुप्रीम कोर्ट में मानवाधिकार कार्यकर्ता नहीं ले जाते तो सरकार पोषित हिंसा पर अंकुश नहीं लगता । प्रधानमंत्री का सीधा हमला मानवाधिकार संगठनों पर है, जिनको वे ‘शहरी नक्सली’ बता रहे हैं । प्रधानमंत्री का कांग्रेस के प्रति पूर्वाग्रह का तार महाराष्ट्र से जुड़ा है जहां ‘शहरी नक्सली’ अपने घरों में नजरबंद हैं और उनका मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है । महाराष्ट्र में भी भाजपा की सरकार है और 28 अगस्त को ऐसे पांच ‘शहरी नक्सलियों’ को पुलिस ने गिरफ्तार किया था । इन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करनेवाले वकीलों में कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी कांग्रेस नेता हैं ।
31 दिसंबर, 2017 को एल्गार परिषद के कार्यक्रम के दौरान महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में सवर्ण पेशवा और दलितों के बीच हिंसा भड़की । उस सिलसिले में पुणे पुलिस ने जून, 2018 में पहले वकील सुरेन्द्र गाडलिंग, नागपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर शोमा सेन, दलित एक्टिविस्ट सुधीर ढवाले, एक्टिविस्ट महेश राउत और केरल निवासी रोना विल्सन को नक्सल समर्थक बताकर गिरफ्तार किया । इनके खिलाफ आरोपपत्र दायर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक दिसंबर की तारीख तय की है । 29 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान इन ‘शहरी नक्सलियों’ के समर्थन में कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी पहुंचे थे । फिर 28 अगस्त की गिरफ्तारी के समय महाराष्ट्र पुलिस ने इन ‘शहरी नक्सलियों’ के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत बड़े भाजपा नेताओं की हत्या की साजिश के ‘सबूत’ मिलने का दावा किया । इसका सच तो सुप्रीम कोर्ट के जरिए सामने आएगा । इन ‘शहरी नक्सलियों’ को आईपीसी की धारा 153(ए) के अंतर्गत गिरफ्तार करके इनके खिलाफ देशद्रोह का मामला बनाया गया है ।
वामपंथी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को ‘शहरी नक्सली’ बताकर अपने घर में नजरबंद रखने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर करने के बाद जानी मानी इतिहासकार ने जो सवाल उठाया उसका याद करना जरूरी है । रोमिला थापर ने 30 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट से बाहर निकलकर सरकार से जानना चाहा कि ‘शहरी नक्सली’ की परिभाषा क्या है । प्रख्यात इतिहासकार रोमिला थापर उन ‘शहरी नक्सलियों’ में शामिल हैं, जिन्होंने पांच एक्टिविस्टों की नजरबंदी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की हुई है । सुप्रीम कोर्ट से बाहर निकलकर सभी याचिकाकर्ताओं ने संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया, जिसे रोमिला थापर ने संबोधित किया । रोमिला थापर ने कहा कि सरकार चलानेवाले या तो ‘शहरी नक्सली’ का मतलब नहीं समझते हैं अथवा ये कार्यकर्ता सरकार को पसंद नहीं हैं । रोमिला थापर ने बार-बार इस बात का जिक्र करके ‘शहरी नक्सली’ की परिभाषा सरकार से स्पष्ट बताने कहा । रोमिला थापर के ही शब्दों में - क्या वे शहरी नक्सली का मतलब भी समझते हैं? अगर समझते हैं तो बताएं कि हमलोग कैसे उस श्रेणी में आ गए । लगता है कि या तो सरकार शहरी नक्सली का मतलब नहीं समझ रही है अथवा हमलोग ही शहरी नक्सली का अर्थ नहीं समझ रहे हैं ।
रोमिला थापर जिन पांच एक्टिविस्टों के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी वे हैं - वारावारा राव, अरूण फेरीरा, वर्नोन गोन्साल्वस, सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा । इन सबों को नक्सल प्रभावित राज्य महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश तथा देश के अन्य स्थानों से 28 अगस्त को गिरफ्तार किया गया । उन्हें नक्सली बताकर पकड़ने के लिए देश भर में छापे मारे गए । रोमिला थापर ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ये सभी कार्यकर्ता सामाजिक अन्याय के खिलाफ लड़ रहे हैं । सरकार ने उन्हें ‘देशद्रोही’ कहा और आतंक निरोधी कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया । 29 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस दीपक मिश्र, जस्टिस एस. एम. खानविलकर और जस्टिस वाई. वी. चन्द्रचूड़ की बेंच ने सुनवाई की । सुप्रीम कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर तो रोक लगा दी, लेकिन अपने घर में नजरबंद रखने का आदेश देकर कहा - ‘यह अंतरिम राहत है, सभी विकल्प खुले हैं ।’ उससे भी बड़ी बात सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी थी - ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतभेद सेफ्टीवाल्व की तरह होते हैं अगर इन्हें रोका गया तो प्रेशर कुकर फट जाएगा ।’ ‘शहरी नक्सली’ बताकर गिरफ्तार किए गए नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं में सारे भाजपा विरोधी बुद्धिजीवी थापर के अलावे अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक और देवकी जैन समाजशास्त्र के प्रोफेसर सतीश देशपांडे और मानवाधिकार वकील नाजा दारूवाला भी थे । सबों को सरकार ने शहरी नक्सली घोषित कर दिया । 29 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दिन ही भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने भोपाल में कहा - ‘शहरी नक्सली प्रधानमंत्री को कमजोर करनेवाली ताकतों को हवा दे रहे हैं । मध्य प्रदेश से निकलकर ही 2000 में छत्तीसगढ़ बना, लेकिन वो नक्सल मुक्त नहीं हुआ है । छत्तीसगढ़ की तरह मध्यप्रदेश में भी 15 वर्षों से भाजपा की सरकार है । मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एस सी एस टी(अत्याचार रोक) एक्ट में जो संशोधन किया, उसके खिलाफ हुई रैलियों से ‘शहरी नक्सलों’ को जोड़ दिया । दलित आदिवासियों के बीच ही सबसे ज्यादा नक्सलियों की पकड़ हमेशा से रही है ।