छत्तीसगढ़ के नक्सल क्षेत्र बस्तर के लोगों ने स्वतंत्रता दिवस मातम दिवस के रूप में मनाया । इसका कारण यह नहीं था कि नक्सली ‘देशद्रोही’ हैं और पूर्वोत्तर के विद्रोहियों की तरह 15 अगस्त को काला दिवस के रूप में मनाकर स्वतंत्रता दिवस पर आयोजित सरकारी समारोहों का बहिष्कार करते हैं ।

आदिवासी बहुल आबादी वाले बस्तर के लोगों ने अपने 15 भाई-बन्धुओं के कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने के विरोध में 13 और 14 अगस्त को बस्तर बंद का आयोजन किया हुआ था । नक्सली संगठन सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का संगठन इस ‘मुठभेड़’ को फर्जी बता रहे हैं, जैसा पहले भी होता रहा है । जबकि छत्तीसगढ़ पुलिस ने स्वतंत्रता दिवस के एक सप्ताह पहले सुकमा जिले के दुर्गम कोंटा इलाके में 15 नक्सलियों को कथित ‘कठिन मुठभेड़’ में मार गिराने का दावा किया । नक्सल रोधी अभियान के स्पेशल डीजीपी डीएम अवस्थी ने इसे बहुत ‘बड़ी उपलब्धि’ बताते हुए कहा कि बारिश के समय पहाड़, जंगल के रास्ते से गुजरने में भारी दिक्कतों का सामना करते हुए पुलिस दल ने नक्सल गढ़ में घुसकर 15 माओवादियों को मुठभेड़ में मार गिराया । बरसात के महीने में पहली बार इतनी ‘बड़ी सफलता’ मिली है । डीएम अवस्थी का यह एलान सरकारी महकमे के लिए संतोषजनक होगा, क्योंकि स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद का एक महत्वपूर्ण कदम माना गया । लेकिन घटना की रात छह अगस्त से ही इस कथित ‘मुठभेड़’ पर सवाल उठ रहे हैं और जन-जन में रोष की लहर है । लोगों के बीच इस मुठभेड़ के फर्जी होने और अपनी झूठी वाहवाही दिखाने के लिए बेकसूर निहत्थे नागरिकों को मारकर उन्हें नक्सली बताने की पुलिस की चाल बतायी जा रही है ।

इसके विरोध में आयोजित बंद मातम के रूप में गुजरा और उसका असर 15 अगस्त को भी नजर आया । रायपुर से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार बस्तर इलाके में नक्सल गढ़ होने के कारण एक तो यों ही पुलिस और सीआरपी की किलेबंदी रहती है, दूसरे स्वतंत्रता दिवस के पहले चौकसी बढ़ी हुई थी । इसलिए लोग डरे सहमे तो थे, मगर उससे भी ज्यादा रोष और मातम में डूबे थे ।

लोगों का दुख और गुस्सा बेबुनियाद नहीं है । फर्जी मुठभेड़ का आरोप और न्यायिक जांच की मांग को पुलिस एक सिरे से खारिज नहीं कर पायी । मामला दबा नहीं है । क्योंकि पुलिस मुठभेड़ पर उठे सवालों का जवाब देने से पुलिस कतरायी और भ्रामक तथा संदिग्ध जवाब देकर पीछा छुड़ाती रही । नक्सल रोधी डीजीपी डीएम अवस्थी ने मारे गए 15 नक्सलियों में से एक को मिलिशिया गठन कमांडर वंजाम हुंगा बताया । उनके अनुसार मात्र एक ही शव की शिनाख्त हो पायी । पुलिस अधिकारियों ने बताया कि खास खुफिया सूत्रों से मिली गुप्त सूचना के आधार पर सुकमा जिला रिजर्व गार्ड और स्पेशल टास्क फोर्स के लगभग 200 जवान रात को कठिन रास्ते से नलकाटोंग गांव पहुंचे । पुलिस के अनुसार एक घंटे तक दोनों तरफ से फायरिंग हुई । लेकिन पुलिस का एक भी जवान हताहत नहीं हुआ । कोई जवान नक्सलियों की ओर से की गयी फायरिंग में घायल तक नहीं हुआ । डीजीपी अवस्थी ने संवाददाताओं को बताया कि घटनास्थल से 15 शव और हथियार बरामद हुए । पहला सवाल तो इसी पर उठा कि यह कैसी ‘मुठभेड़’ थी, जिसमें पुलिस का बाल बांका भी नहीं हुआ और 15 नक्सली ढेर हो गए, जबकि दोनों तरफ से फायरिंग बतायी गयी । डीजीपी ने बरामद हथियारों में 12 बोर और 315-बोर राइफलें बतायी ।

एक संवाददाता ने जब इस सवाल पर जोर दिया कि इनमें ‘इन्सास’ जैसे हथियार या एसएलआर क्यों नहीं शामिल हैं, जो नक्सल प्रायः इस्तेमाल करते हैं तो एक पुलिस अधिकारी ने अपना नाम उजागर करने से इन्कार करने के बाद बताया - ‘ये नक्सली कैंप हार्डकोर कमांडरों के नहीं थे । ये लोग मिलिशिया गठन का काम सीख रहे थे । उनलोगों ने हमलोगों पर 303 राइफलों से फायरिंग की ।’ इस पुलिस अधिकारी के अनुसार नक्सलियों में से कुछ भागने में सफल हो गए और फायरिंग करते हुए भागे । तब भी किसी पुलिस जवान को नक्सलियों की गोली नहीं लगी और स्पेशल टास्क फोर्स ने 15 नक्सलियों को भून दिया ।

यह मुठभेड़ बस्तर के बाहर गैर-आदिवासी नागरिकों के गले के नीचे भी नहीं उतरी । क्योंकि इसके 10-12 रोज पहले तेलंगाना की सीमा से सटे बीजापुर के टीमेबार जंगल में आठ माओवादियों के मारे जाने को भी छत्तीसगढ़ पुलिस ने मुठभेड़ बताया । वर्ष 2012 में बीजापुर के ही सारकेगुडा में तेलंगाना पुलिस के सहयोग से 17 माओवादियों का कथित मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया गया । गांववालों ने जबर्दस्त विरोध किया, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बेकसूर निहत्थे ग्रामीणों की हत्या के खिलाफ गांववालों के साथ मिलकर आवाज उठायी । फर्जी मुठभेड़ की खबर इतनी सुर्खियों में आयी कि राज्य सरकार को जांच आयोग गठित करनी पड़ गयी, जिसकी रिपोर्ट लंबित है । प्रायः आवाज दबाने के लिए पुलिस नक्सलियों के बहाने इलाके को ही नक्सल क्षेत्र घोषित कर निशाना बनाती है । छत्तीसगढ़ के भाजपा मुख्यमंत्री रमन सिंह को अभी चुनाव का सामना करना है । अब तो वो जांच रिपोर्ट आने से रही ।

15 नक्सलियों के फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने का हालिया मामला सबसे जोरदार तरीके से आम आदमी पार्टी(‘आप’) से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी ने उठाया है । वे बस्तर में ही ज्यादा समय गुजारती हैं और ‘आप’ की आदिवासी मोर्चा प्रमुख हैं । सोनी सोरी और छत्तीसगढ़ के ‘आप’ सचिव उत्तम जायसवाल ने पुलिस के पूरे दावे पर सवाल खड़ा कर दिया है । केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार और राज्य सरकार के लिए भले ‘आप’ कोई खास मायने नहीं रखता हो, मगर इस सवाल से पल्ला झाड़ना कठिन हो रहा है ।

‘बड़ी उपलब्धि’ हासिल होने के कारण ऑपरेशन और चाक-चौबंद गश्ती अभियान जारी रखी गयी । नक्सल निरोध डीजीपी के मुताबिक इसमें सीआरपी की एलीट कोबरा बटालियन को भी लगाया गया । इसके पीछे पहला कारण था, स्वतंत्रता दिवस और दूसरा नक्सलियों की ओर से बदले की आशंका । माओवादियों ने जवाब दिया भी । नक्सलियों ने दंतेवाड़ा जिले में नौ अगस्त को पांच ट्रकों में आग लगा दी और 10 अगस्त को एक आदमी की संदिग्ध पुलिस मुखबिर बताकर हत्या कर दी । लोकेश कर्तम नामक यह व्यक्ति घटनास्थल से सटे गुडरा गांव का रहनेवाला था और नक्सलियों को संदेह था कि उसी ने पुलिस को छह अगस्त को गुप्त सूचना दी थी । पुलिस ने ‘मुठभेड़’ के बाद एक महिला को और एक पांच लाख के इनामी नक्सली को पकड़ने की भी जानकारी दी, जिससे पूछताछ करके अन्य ठिकानों की भी सूचना प्राप्त की जा रही है । महिला के पैर में गोली लगी है ।

‘आप’ नेता सोनी सोरी ने ‘मुठभेड़’ स्थल और उसके नजदीकी गांवों का दौरा करने के बाद 11 अगस्त को जो जानकारी रायपुर में संवाददाता सम्मेलन में दी, उससे पुलिस का दावा कमजोर पड़ा । नुकलाटांग गांव के लोग खेत में ‘लाडी’(मचान) पर सो रहे थे । आदिवासी भाषा में ‘लाडी’(मचान) फसल को जानवरों से बचाने के लिए बनाए जाते हैं, और किसान रखवाली के लिए उसी में सोते हैं । तड़के जब वे घर लौट रहे थे, उसी समय पुलिस दल ने किसानों पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी । गांववालों से बातचीत के आधार पर आप कार्यकर्ता ने बताया कि हो सकता है, वहां कुछ नक्सली भी हों, लेकिन मृतकों में से छह लड़कों की उम्र 13-14 वर्ष है । ये लड़के फायरिंग की आवाज सुन के बगल के गांव से आ गए थे, जिन्हें पुलिस ने गोली मार दी । सुकमा जिले के एसपी अभिषेक मीना ने इस आरोप को खारिज कर दिया और ‘आप’ नेता ने पुलिस के दावे को ।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट में छत्तीसगढ़ सरकार को जवाब देते नहीं बना, जब 15 अगस्त आने से पहले ही इस मुठभेड़ पर स्पष्टीकरण देना पड़ गया । चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली तीन सुप्रीम कोर्ट जजों की पीठ के सामने इस मुठभेड़ पर सफाई देने छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी पेश हुए । सुकमा मुठभेड़ पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे नक्सल प्रभावित तेलंगाना के एक एनजीओ तेलंगाना स्टेट सिविल लिबर्टीज कमिटी की ओर से दायर की गयी और उसने अपने समर्थन में किशोरों के शव के फोटोग्राफ भी प्रस्तुत किए । छत्तीसगढ़ सरकार ने इसे ‘बोगस याचिका’ और फोटोग्राफ को भी ‘बोगस’ बताकर सुप्रीम कोर्ट पीठ से याचिका खारिज करने की अपील की ।

सुप्रीम कोर्ट जजों ने याचिकाकर्ता की दलील तो सुन ली, लेकिन फोटोग्राफ की सत्यता का प्रमाण रिकॉर्ड पर लाने कहा । जस्टिस डी. वाई. चन्द्रचूड़ ने कहा - ‘अगर यह साबित होता है कि फोटोग्राफ घटनास्थल के हैं तो यह गंभीर मामला है ।’

मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में छत्तीसगढ़ पुलिस का यह दावा भी दुहराया कि सुकमा में इस वर्ष 86 नक्सली मारे गए हैं । लेकिन उनमें से ज्यादातर ‘ऑपरेशन’ ऐसे निकले, जिसे पुलिस ने मुठभेड़ बताया और फर्जी का बिल्ला लगा ।

अभी ऐसे समय में यह मामला शीर्ष कोर्ट पहुंचा है, जब मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ में दोषी पाए गए सेना और अर्द्धसैनिक बलों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगायी है । 13 अगस्त को ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और असम सरकार को भी 30 मार्च, 2017 के ‘फर्जी मुठभेड़’ पर नोटिस भेजा है । इसका खुलासा सीआरपी आईजी रजनीश राय ने ही किया, जिसके जवाब में उन्हीं को परेशान किया गया । उनकी ओर से जनहित याचिका पूर्व ऊर्जा सचिव ई ए एस शर्मा ने दायर किया । उन्हीं की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार के लाइसेंसी नक्सली अभियान सलवा जुडूम को असंवैधानिक घोषित किया । उधर सेना के 300 से ज्यादा जवानों ने अफस्पा वाले क्षेत्रों में अभियान के दौरान की गयी कार्रवाई के खिलाफ उन पर मामला दर्ज किए जाने के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी है । 20 अगस्त को सुनवाई की तारीख है ।

छत्तीसगढ़ के सुकमा जैसा ही महाराष्ट्र का आदिवासी जिला गढ़चिरोली नक्सल गढ़ है । चार महीना पहले 23 अप्रैल को महाराष्ट्र पुलिस ने एक-दिन के आगे-पीछे 22 नक्सलियों को ‘मुठभेड़’ में मार गिराने का दावा किया और इसे ‘बहुत बड़ी ऑपरेशन सफलता’ बताया । उस कथित ‘मुठभेड़’ में भी एक भी पुलिसकर्मी के मारे जाने या घायल होने की रिपोर्ट नहीं आयी । पुलिस के अनुसार रात को कई घंटे मुठभेड़ चली । नागपुर से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार लाशों की गिनती के बाद 37 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई और सबको पुलिस ने नक्सली बताया । उस पर भी सबकी उंगलियां उठी । नक्सली गुट सीपीआई(माओवादी) की ओर से जारी विज्ञप्ति के मुताबिक मुखबिरों की मदद से पुलिस ने गांव के लोगों को विषाक्त भोजन खिलाया और फिर गोली मारकर मुठभेड़ दिखा दिया ।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने छत्तीसगढ़ के नक्सल क्षेत्र जगदलपुर के एक कालेज में 50 लाख स्मार्टफोन बांटने की योजना का 26 जुलाई को शिलान्यास किया । गरीबों में फोन बांटकर ‘कनेक्टिविटी’ बढ़ाने पर राष्ट्रपति ने बल दिया और इसे विकास की गाड़ी तेज करने के लिए जरूरी बताया । समारोह में मुख्यमंत्री के अलावे छत्तीसगढ़ इन्फोटेक सोसायटी के सीईओ एलेक्स पॉल मेनन भी मौजूद थे । इससे विकास हो न हो, विनाश तो हुआ । मुखबिरी बढ़ी, जो गांवों में मोबाइल कम होने से नहीं हो पा रही थी । 6 अगस्त की घटना के बाद संदिग्ध पुलिस मुखबिर मारा गया । बस्तर में सड़क निर्माण के लिए बड़ी ठेका कंपनी तैयार नहीं है, ऐसा कहना है सीआरपी का । सीआरपी ने यह ठेका ले लिया है ।

रमन सिंह 2003 में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने थे, जब केंद्र में भाजपा की सरकार थी । वे सबसे लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री हैं और उन्हीं के राज्य में अन्य किसी भी नक्सल प्रभावित राज्य से ज्यादा फर्जी मुठभेड़ और हथियार देकर सरकारी नक्सली बनाने(सलवा जुडूम) के मामले सामने आए ।

नक्सल प्रभावित इलाकों की असली समस्या आर्थिक और सामाजिक है । विकास की मुख्यधारा से उन इलाकों को मालदार कंपनियों की सुविधा से सरकार जोड़ना चाहती है । छत्तीसगढ़ के पड़ोसी ओडिशा के नक्सल गढ़ मलकानगिरी के 151 गांवों को 46 वर्षों के बाद अभी मुख्यधारा से जोड़ा गया है । 1972 में बालीमेला पनबिजली परियोजना के कारण इन गांवों को अलग-थलग कर दिया गया । यह जलाशय नक्सली मुठभेड़ों का गढ़ बना रहा । आदिवासी आर्थिक किल्लत झेलते रहे । अभी चुनाव के समय ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने 910 मीटर पुल का शिलान्यास किया है । इसके बारे में कहा जा रहा है कि सुरक्षा बलों की नक्सल क्षेत्र में पहुंचने की दिक्कतें आसान करने के लिए ऐसा किया गया है ।