केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यह बात तो सही कही कि विगत दो दशकों में माओवादी(नक्सल) हमले में कमी और नक्सल प्रभावित जिलों में विकास कार्यों में तेजी आयी है। लेकिन इसे 2009 से कांग्रेस शासनकाल के समय से जोड़कर माओवादी हमले में कमी का राजनीतिक आंकड़ा प्रस्तुत किया ।

मध्य क्षेत्रीय परिषद की भोपाल में आयोजित 23वीं बैठक को संबोधित करते हुए अमित शाह ने इस हफ्ते कहा कि 2009 में वामपंथी उग्रवाद(एलडब्ल्यूई) पूरे उफान पर था, जो 2021 आने तक तेजी से घटता गया । केंद्रीय गृहमंत्री ने कहा कि 2009 में जहां नक्सल हमले की 2,258 वारदातें हुई, वहीं 2021 में घटकर 509 पर आ गयी । उनके अनुसार 2009 में माओवादी हमले में 1,005 लोग मारे गए, लेकिन 2021 में संख्या घटकर 147 पर आ गयी ।

मध्य क्षेत्रीय परिषद की 22 अगस्त की बैठक मध्य प्रदेश की मेजबानी में हुई, जिसमें सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने हिस्सा लिया । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह घामी भी मौजूद थे । बैठक में चर्चा मुख्य रूप से केंद्र और राज्य सरकारों के बीच विभिन्न केंद्र पोषित सामाजिक-आर्थिक सहायता योजनाओं के लिए फंड जारी करने तथा राज्य सरकार पर बकाया माफी से सम्बंधित कई मुद्दों पर हुई । उसी दौरान केंद्रीय गृहमंत्री ने उपस्थित मुख्यमंत्रियों की विकास कार्यों में योगदान के साथ.साथ छत्तीसगढ़ सरकार की अलग से वाम उग्रवाद पर काबू पाने के लिए किए गए उपायों की तारीफ की । अमित शाह ने कहा कि नक्सल प्रभावित जिलों में 5,000 डाकघर बनाए गए हैं । लेकिन इस बात पर जोर दिया कि कांग्रेस गठजोड़ शासनकाल की तुलना में भाजपा गठजोड़ शासनकाल में नक्सली हमले में कमी आयी है और वाम उग्रवाद सिमट गया है । ध्यान रहे कि 2014 से केंद्र में भाजपा के नेतृत्ववाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार चल रही है । उसके पहले 10 साल तक कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठजोड़ की सरकार थी ।

अभी कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 22 अप्रील की क्षेत्रीय परिषद बैठक में कहा कि बस्तर में प्रधानमंत्री सड़क निर्माण योजना में समय लगेगा और 17,000 करोड़ रुपया केंद्र का बकाया माफ करने का आग्रह किया । छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र किसी भी अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों की तुलना में सबसे संगठित और मजबूत नक्सल गढ़ है । नक्सली सबसे ज्यादा सड़क निर्माण कंपनियों की सुरक्षा के लिए तैनात केंद्रीय सुरक्षा बलों के जवानों को निशाना बनाते हैं । सड़क विकास कार्यों की पहली सीढ़ी है और सारे भाजपा नेता नक्सलियों को विकास का दुश्मन बताते हैं ।

अमित शाह नक्सल मामले के विस्तार में नहीं गए, लेकिन इतना जरूर कहा कि सख्त दमन नीति के कारण नक्सल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस संबंध में कोई चर्चा नहीं की ।

अब जरा ठीक एक महीना पहले 20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र में केंद्रीय गृह मंत्रालय के बयान पर गौर करते हैं । वामपंथ उग्रवाद के संबंध में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में विस्तृत आंकड़े के साथ राजनीतिक तस्वीर पेश की । उन्होंने भी शुरूआत 2009 से ही करते हुए कहा कि उस समय से माओवादी हिंसा में 77% गिरावट आयी है, मगर यह भी स्वीकारा कि हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों की मौतों में बढ़ोतरी हुई है । इतना मतलब तो स्पष्ट है कि नक्सलियों के सिमटने और नक्सली हिंसा में 2009 के बाद से कमी आने का भाजपा नेताओं का दावा सुरक्षा बलों की जान की कीमत पर टिका है । लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय के निशाने पर कांग्रेस और खासकर छत्तीसगढ़ सरकार है । लोकसभा में नित्यानंद राय ने अपने जवाब में 20 जुलाई को वही बयान दुहराया, जो अमित शाह ने 22 अगस्त को भोपाल में दिया । केंद्रीय गृह राज्यमंत्री राय ने कहा कि 2009 से 2021 के बीच नक्सली हिंसा में 77% गिरावट आयी है, लेकिन सुरक्षा बल जवानों की शहादत में बढ़ोतरी हुई है । उनके अनुसार सिर्फ छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों के जवानों की मौत विगत तीन वर्षों में दोगुनी से भी ज्यादा हुई है । नित्यानंद राय ने मौतों का आंकड़ा भी अमित शाह वाला ही दिया । राय ने सदन को बताया कि 2010 में नक्सली हिंसा मौतों का सिलसिला अपने चरम पर था, जो 2021 में घटकर 85% पर आ गया । इस मौत आंकड़े में सुरक्षा बल के जवान और आम नागरिक भी शामिल हैं ।

विदित हो कि विगत तीन वर्षों से छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है । उसके पहले 15 वर्षों से भाजपा की सरकार थी और रमन सिंह लगातार मुख्यमंत्री बने रहे । 2018 में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश दोनों ही राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर चुनावी सभा में कांग्रेस पर ‘शहरी नक्सलियों’ से ‘मिलीभगत’ का आरोप लगाया । उस वक्त केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी अलग-अलग चुनावी सभाओं में कहा कि सामाजिक जीवन से भटके युवकों को गुमराह करने के लिए कांग्रेस जिम्मेदार है । लेकिन दोनों ही राज्यों के मतदाताओं ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया । छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ गयी और मध्य प्रदेश में भाजपा को बहुमत नहीं मिला । कांग्रेस के कमलनाथ मुख्यमंत्री जरूर बने । मगर भाजपा को सत्ता में बरकरार रखने के लिए क्या-क्या खेल हुआ, उसके विस्तार में हमें यहां नहीं जाना है ।

मुख्य विषय अपने अंदरूनी नेतृत्व संकट से सिमटती कांग्रेस को नक्सली हिंसा ने बहाने निशाने पर लेकर इसे राजनीतिक मुद्दा बनाना है । आजादी के ‘अमृत महोत्सव’ के तिरंगा की तरह नक्सली हिंसा को कांग्रेस की फसल बताने का झंडा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं थाम रखा है । याद रहे कि 2013 में छत्तीसगढ़ में भाजपा शासन के दौरान 25/05/2013 को एक नक्सली हमले में मारे गए 31 लोगों में कांग्रेस के सारे बड़े नेता थे । उस हमले में पुलिस ने नक्सली हाथ होने से इन्कार किया था ।

फरवरी, 2022 में संसद के बजट सत्र में भी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री ने कांग्रेस को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ बताया और जोर देकर कहा कि यह पार्टी नक्सलियों के जंजाल में फंस गयी है । प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस की सोच पर शहरी नक्सलियों ने कब्जा कर लिया है और यह देश के लिए चिंता का विषय है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण ठीक वैसा ही था, जैसा 2018 में उन्होंने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकने के लिए चुनावी सभाओं में दिया था । 2019 के आम चुनाव में भी कांग्रेस पर ये आरोप लगाए गए । 2018 में ‘शहरी नक्सली’ का मसला महाराष्ट्र से उपजा, जहां उस वक्त भाजपा के देवेन्द्र फड़नवीस मुख्यमंत्री थे । जनवरी, 2018 से भीमा कोरेगांव हिंसा में कथित रूप से शामिल सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, इतिहासकारों, लेखकों को नक्सली समर्थक(देशद्रोही) बताकर उन्हें लगातार न्याय से वंचित किया जा रहा है । भाजपा की नजर में वे सभी ‘देशद्रोही’ हैं और कांग्रेस उनका समर्थन कर रही है । भाजपा का नजरिया जो भी हो, मगर वास्तविकता ये है कि नक्सली हिंसा शहर की नहीं देहात की और सामाजिक से ज्यादा आर्थिक समस्या है । जिन युवकों को सामाजिक जीवन से भटकाने के लिए भाजपा कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रही है, वो उन्हीं गरीब परिवारों से हैं, जिन परिवारों के जवान नक्सली हिंसा पर काबू पाने के लिए सख्ती के कारण जान गंवाते हैं ।

अभी 22 अगस्त को जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भोपाल में नक्सली हिंसा पर बयान दे रहे थे, उसी दिन माओवाद प्रभावित ओडिशा के पुराने नक्सल गढ़ मलकानगिरी में नक्सलियों के आत्मसमर्पण करने की खबरें आ रही थी । उसका जिक्र अमित शाह ने नहीं किया । ओडिशा में बीजू जनता दल मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का छठा कार्यकाल चल रहा है और वे भाजपा विरोधी नहीं हैं ।

छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार द्वारा नक्सली काट में जिन परिवारों के जो युवक नक्सली नहीं थे, उन्हें हथियार देकर नक्सली बनाने का ‘सलवा जुडूम’ अभियान चलाया गया । समाज के बाद परिवार में विद्वेष फैलाने के इस सरकारी अभियान पर 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगायी ।