केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में नक्सल समस्या को खत्म करने पर बल दिया । गृहमंत्रालय का कार्यभार संभालने के बाद अमित शाह ने पहली नक्सल समीक्षा बैठक इस हफ्ते आयोजित की । गृह मंत्री ने नक्सल प्रभावित 10 राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक में कहा कि वामपंथी उग्रवाद(सॅ) पर नियंत्रण के लिये इनको होनेवाली फंडिंग पर नकेल कसने और नक्सल समस्या को खत्म करने के लिए आर-पार की रणनीति अपनाने की जरूरत है ।

ऐसे समय में यह बैठक बुलायी गयी, जब सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ से मुठभेड़ों की रिपोर्ट थोड़े-थोड़े अंतराल पर आ रही है । पुलिस ने हर मुठभेड़ में पांच से सात नक्सलियों / माओवादियों को मार गिराने का दावा किया है । विवाद इस बात को लेकर है कि ये मौतें वास्तव में मुठभेड़ों में हुई हैं या नहीं । पूर्वोत्तर उग्रवाद की तरह नक्सल प्रभावित राज्यों में भी पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए फर्जी मुठभेड़ कोई नई बात नहीं है । उसमें सही मुठभेड़ पर भी सवाल उठ जाते हैं । लेकिन छत्तीसगढ़ में एक-डेढ़ महीने से जितनी मुठभेड़ों में पुलिस ने नक्सलियों को मार गिराने का दावा किया, लगभग सभी सवालों के घेरे में हैं ।

नोटबंदी गयी और उसके बाद आर्थिक मंदी आ गयी । पूर्व गृहमंत्री राजनाथ सिंह बार-बार कहते थे कि नोटबंदी से नक्सल फंडिंग पर अंकुश लगा है । नक्सलियों के निबटने का दावा सरकार कर रही है, और काफी हद तक यह सही भी है । अविभाजित मध्य प्रदेश में देश का सबसे बड़ा जिला बस्तर नक्सलियों का इतना मजबूत गढ़ था, जिसे अभेद्य दुर्ग माना जाता था । आज छत्तीसगढ़ का हिस्सा बनने के बाद बस्तर में नक्सलियों को सरकार से मोर्चा लेने के लिए रणनीति बदलनी पड़ी है । नक्सली योजनाबद्ध तरीके से हमले की रणनीति बनाते हैं ताकि कोई दांव खाली न जाए । नक्सलियों का सबसे बड़ा हथियार है - इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस(प्व), जिसका काट पुलिस के पास नहीं है । हार्डकोर नक्सली रिमोट से विस्फोट करके पुलिस दस्ते को गाड़ी समेत उड़ा देते हैं । वे मुठभेड़ से परहेज करते हैं । पुलिस के पास ऐसी टेकनीक नहीं है, ताकि आईईडी की पूर्व जानकारी मिल सके । गृहमंत्री अमित शाह ने आईईडी का काट तैयार करने पर भी जोर दिया ।

पुलिस को मुठभेड़ जवाबी कार्रवाई में दिखाना होता है । दोनों ही स्थितियों में गरीब बेकसूर मारे जाते हैं । पुलिसकर्मियों के परिवारजन यह सुनते-सुनते ऊब चुके हैं कि जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा । लेकिन व्यर्थ जाने का सिलसिला जारी है । आम जनता का मारा जाना बलिदान में नहीं आता । न उन्हें मुआवजा मिलता है । नक्सल समस्या सामाजिक संकट है और कश्मीर मिशन की तरह नहीं है । नक्सल समस्या उपेक्षित, आर्थिक रूप से पिछड़े गरीब-गुरबा आदिवासी की जिंदगी से जुड़ी है । इस सामाजिक समस्या को राजनीतिक रंग देने के बाद केंद्र की भाजपा सरकार ने केंद्र व राज्य सरकार के समन्वय से इसे समाप्त करने की बात कही । जबकि समन्वय और सहयोग का अभाव है । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि केंद्र सरकार सिर्फ समीक्षा बैठक करती है । सीआरपी की प्रतिनियुक्ति का खर्च राज्य सरकारों को वहन करना पड़ता है । मुख्यमंत्रियों ने इसमें केंद्र से मदद मांगी ।

इस मानसून में छत्तीसगढ़ की दुर्गम पहाड़ियों में पुलिस मुठभेड़ दो कारणों से महत्वपूर्ण है । पहला ये कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और गृहमंत्री राजनाथ सिंह समेत सभी भाजपा नेताओं ने इन दोनों राज्यों में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस पर नक्सलियों से मिले होने का आरोप लगाया । दूसरा ये कि अभी छत्तीसगढ़ की नक्सल मुठभेड़ों पर केंद्र की भाजपा सरकार बिल्कुल चुप है । इन मुठभेड़ों में लगभग 20-25 माओवादियों को मारने का पुलिस दावा कर रही है ।

सबसे विवादित है तीन अगस्त की मुठभेड़, जिसको पुलिस की सबसे बड़ी सफलता मानी गयी । तीन राज्यों की सीमाओं के पास नक्सलियों ने अपने लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाया, जिसे ‘एमएमसी’(महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़) कहा जाता है । छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव जिले में यह मुठभेड़ हुई, जो महाराष्ट्र की सीमा से लगा है, पुलिस ने ऐसी दुर्गम पहाड़ी में यह मुठभेड़ दिखायी, जहां बरसात में पहुंचना कठिन है । छत्तीसगढ़ की सभी नदियां उफान पर थीं । इलाकों का संपर्क टूटा हुआ था । पुलिस ने नए गढ़ एमएमसी में सात नक्सलियों को मारने का दावा किया । पुलिस के अनुसार सारे नक्सली भाग निकले, घटनास्थल से सात लाशें मिली । पुलिस का कोई जवान हताहत नहीं हुआ और सातों मृतकों के इनामी हार्डकोर नक्सली होने का दावा किया गया ।

24 अगस्त को नारायणपुर जिले में वैसी जगह मुठभेड़ दिखायी गयी जिसे नक्सलियों ने लिबरेटेड जोन(मुक्त किया गया क्षेत्र) घोषित कर रखा था । पांच माओवादी मारे गए, उसमें भी पुलिस का कोई जवान हताहत नहीं हुआ । 27 जुलाई की मुठभेड़ बस्तर जिले के तिरिया के निकट बतायी गयी, जो ओडिशा सीमा के पास है । नक्सल निरोध आपरेशन के डीआईजी पी. सुंदर राज के अनुसार मृतकों में तीन महिलाएं थी । सारे नक्सली भाग निकले, घटनास्थल से लाशें मिली ।

तीन अगस्त के सात मुठभेड़ मृतकों में पांच महिलाएं थीं । 24 अगस्त मुठभेड़ के पांच मृतकों में से भी दो महिलाएं थीं । 2018 में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने बस्तर में जिस सीआरपी की महिला बटालियन को हरी झंडी दिखायी, उसे ‘बस्तरिया बटालियन’ बताया गया । फिर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी स्पेशल टास्क फोर्स की महिला टीम बनायी । दंतेवाड़ा जिले के गुमियापाल गांव के लोग पुलिस पर भरोसा करने के बजाए दुहरी मार झेल रहे हैं । अगस्त के पहले सप्ताह में नक्सली गांव के छह लोगों को पुलिस मुखबिर होने के संदेह में घर से उठा ले गए । खुफिया सूचना तंत्र मजबूत करने में जुटे दंतेवाड़ा एसपी अभिषेक पल्लव आश्वासन दे रहे हैं और गांव में लोग अपने लापता साथियों की लाश के इंतजार में हैं । गांव से रिपोर्ट है कि सीपीआई(माओवादी) विनोद की बेटी मांगी को पुलिस ने मुठभेड़ में मार दिया, जो नक्सल संगठन से जुड़ी नहीं थी ।

समूचा बस्तर क्षेत्र आदिवासी आबादी वाला है, जो अपनी जगह-जमीन के साथ छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं करते । उनकी लड़ाई नक्सली लड़ते हैं । बस्तर के दंतेवाड़ा की एक और कहानी देखिए । जानेमाने उद्योगपति गौतम अडानी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से करीबी किसी से छिपी नहीं है । दंतेवाड़ा में लौह अयस्क खनन का ठेका अडानी ग्रुप को कांग्रेस मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने लोकसभा चुनाव समाप्त होने के बाद जून में दे दिया । नक्सलियों के समर्थन से जबर्दस्त विरोध के बाद वे रूक गए । इस जमीन को लेकर विवाद 2016 से चल रहा था, जब छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार थी । दिसंबर, 2018 में भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने और डिपोजिट-13 के नाम से परिभाषित लौह अयस्क का ठेका अडानी कंपनी को देने का झमेला क्लियर कर दिया । वे आदिवासियों की हड़पी गयी जमीन लौटाने का चुनाव वायदा पूरा करने का प्रचार अखबारों में विज्ञापन देकर कर रहे हैं ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रैल में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान बस्तर में दंतेवाड़ा से भाजपा विधायक भीमाराव मंडावी के नक्सल हमले में हत्या के पीछे कांग्रेस का हाथ बताया । उस हमले में विधायक की सुरक्षा में तैनात हेड कांस्टेबल के भाई झुमर ओयामी ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर करके उस हमले की राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एनआईए) से जांच का विरोध किया है । 13 अगस्त को उसकी सुनवाई हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पी. आर. रामचन्द्र मेनन ने की । याचिकाकर्ता ने एनआईए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए कहा कि इसकी जांच पर भरोसा नहीं है । जब 16 मई को राज्य पुलिस की जांच चल रही थी, उसी बीच एनआईए ने अपने हाथ में ले लिया । यह राज्य के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप और संघीय व्यवस्था के खिलाफ है । 24 सितंबर को इस मामले की अगली सुनवाई है और 23 सितंबर को दंतेवाड़ा विधान सभा सीट पर उपचुनाव है । देखना होगा, उस समय तक नक्सली क्या करते हैं । एनआईए ने 2013 की झीरम घाटी नक्सल हमले की जांच वापस सौंपने का छत्तीसगढ़ सरकार का आग्रह फरवरी 2019 में ठुकरा दिया । भाजपा शासनकाल के दौरान 2013 में छत्तीसगढ़ के झीरम घाटी में हुए नक्सल हमले में बस्तर के नक्सल विरोधी ‘टाइगर’ के नाम से मशहूर महेन्द्र कर्मा समेत 31 कांग्रेसी मारे गए, जिसमें सभी टॉप कांग्रेस नेताओं का सफाया हो गया ।