राजनीति और सामाजिक आंदोलन
नक्सल आंदोलन के 50 साल : रास्ता किधर है?
नक्सल आंदोलन स्वतंत्र भारत के सबसे जटिल और लंबे सामाजिक-राजनीतिक संकटों में से एक रहा है। 1967 के नक्सलबाड़ी विद्रोह से शुरू होकर यह आंदोलन भूमि, असमानता, शोषण, राज्य की प्रतिक्रिया, हिंसा और लोकतांत्रिक राजनीति के कठिन प्रश्नों से लगातार जुड़ा रहा है।
यह पुस्तक नक्सल आंदोलन के लगभग पाँच दशकों के उतार-चढ़ाव, उसके सामाजिक आधार, राजनीतिक इस्तेमाल, दमन, वैचारिक विचलन और जन-संघर्षों की बदलती दिशा का तथ्यपरक लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है।
शशिधर खान ने चार दशकों से अधिक समय तक राष्ट्रीय और प्रादेशिक अखबारों में सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों पर नियमित लेखन किया है। पीटीआई-भाषा में वरिष्ठ संवाददाता के रूप में काम करते हुए और उसके बाद भी उन्होंने नक्सलवाद, पूर्वोत्तर, कश्मीर और सीमांत समाजों से जुड़े मुद्दों पर लगातार लिखा। यही लंबा पत्रकारिक अनुभव इस पुस्तक को विशिष्ट बनाता है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो नक्सल आंदोलन को नारे, भय या विचारधारा से आगे जाकर उसके सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भों में समझना चाहते हैं।