सबसे मजबूत और संगठित नक्सली गढ़ छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में पुलिस ने माओवादियों का शहरी नेटवर्क सेल बरामद किया और इस सिलसिले में सात लोगों को गिरफ्तार किया । इस नेटवर्क का पता लगाने के लिए बस्तर पुलिस उसी समय से धरपकड़ और तलाशी अभियान चला रही थी, जब कोरोना लॉकडाउन का एलान हुआ ।

लॉकडाउन के एक महीना पूरा होने के दिन 24 अप्रैल को इस प्रयास में सफलता मिली, जिसमें माओवादियों से सहयोग, सांठगांठ करनेवाले प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के व्यवसायी और ठीकेदार निकले । बस्तर रेंज के आईजी सुन्दरराज पी के अनुसार नक्सल प्रभावित दुर्गम इलाके कांकेड़ में यह नेटवर्क दो साल से काम कर रहा था और इसमें शामिल पकड़े गए लोग मध्यप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश के भी हैं । आई जी के अनुसार 24 मार्च को राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन एलान के दौरान ही पकड़े गए एक ठीकेदार राजनंदगांव निवासी तापस पालित के एक एसयूवी पर निगरानी से यह गुपचुप नेटवर्क की गुत्थी खुली । पूछताछ के दौरान प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से जुड़े ठीकेदार ने स्वीकारा कि सड़क निर्माण की आड़ में वो माओवादियों के लिए जूते, वर्दी, कपड़े, वॉकी टॉकी लाता था । उसके पास से बड़ी मात्रा में ऐसे सामान बरामद हुए । पुलिस सूत्रों ने बताया कि कांकेड़ और सिकसोद इलाके में पकड़े गये नक्सलियों के बीच कारोबार करनेवालों में से तीन प्रधानमंत्री ग्राम सड़क निर्माण योजना के ठीकेदार हैं । उसी काम के दौरान वे नक्सलियों के संपर्क में आए या पहले से उनके ताल्लुकात थे, इसकी गहन छानबीन पुलिस कर रही है। यह भी पता लगाया जा रहा है कि और कितने लोग नक्सलियों की जरूरत के सामान सप्लाई नेटवर्क सेल में शामिल हैं । बस्तर रेंज के आईजी ने एडिशनल एसपी कीर्तन राठौड़ के नेतृत्व में कांकेड़ पुलिस की एसआईटी(स्पेशल जांच टीम) को यह काम सौंपा है ।

यह तो हुई लॉकडाउन के दौरान की गतिविधि । इसमें फिलहाल यह कहना कठिन है कि ये सातों कारोबारी नक्सल इलाके में अपना धंधा चलाने के लिए डर से नक्सलियों को सहयोग कर रहे थे या यह मिलीभगत उनके धंधे का ही एक हिस्सा थी ।

24 मार्च को सुकमा जिले में नक्सलियों के साथ जबर्दश्त मुठभेड़ में 17 सीआरपी जवान मारे गये और 15 अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए । तीन साल में वैसा घातक हमला नहीं हुआ था । सुकमा जिला नक्सलियों का किलाबंदी हॉटबेड है । यह मुठभेड़ एलमागुडा जंगल में मिन्या और कसालपाड के बीच हुआ । छत्तीसगढ़ में दो साल पहले कायम कांग्रेस शासनकाल में यह पहला ऐसा जानलेवा हमला है । अप्रैल 2017 में सुकमा जिले में इसी जगह नक्सली हमले में 25 सीआरपी जवान शहीद हो गए । वे सभी प्रधानमंत्री ग्राम सड़क निर्माण काम में लगे ठीकेदारों और मजदूरों की सुरक्षा के लिए तैनात किए गए थे ।

20-21 मार्च को कयास लगाए जा रहे थे कि कोरोना पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार कोई कठोर कदम उठानेवाली है । उसके पहले से भी पुलिसकर्मियों को डॉक्टर, नर्स और अस्पताल कर्मचारियों की तरह कोरोना नियंत्रण में ड्यूटी करनी पड़ रही थी । ठीक उसी समय नक्सलियों ने सुकमा जिले के एलमागुडा जंगल में भीषण मुठभेड़ में 17 सीआरपी जवानों को मार दिया । गंभीर रूप से घायल 15 जवानों को राजधानी रायपुर लाकर अस्पताल में भर्ती कराया गया । अस्पताल सूत्रों ने बहुतों की हालत चिंताजनक बतायी । इस वारदात की रिपोर्ट 22 मार्च को आयी । छत्तीसगढ़ के डीजीपी डी. एम. अवस्थी के अनुसार पांच घंटे चली इस मुठभेड़ में सबसे ज्यादा चिंता की बात यह थी कि माओवादियों ने यूबीजीएल(अंडर बैरेल ग्रेनेड लांचर) बंदूकों का इस्तेमाल किया, जो सीआरपी के सिर्फ एलीट कोबरा बटालियन के पास है । कोबरा बटालियन को इसके लिए विशेष ट्रेनिंग दी जाती है और यूबीजीएल से लैस करके नक्सल इलाके में तैनात होती है । यूबीजीएल बेहद विनाशकारी हथियार है । नक्सलियों की सक्रियता की गुप्त सूचना पाकर कोबरा बटालियन के 150 जवानों की टीम ने मोर्चा लिया । उनके साथ एसटीएफ(स्पेशल टास्क फोर्स) और डीआरजी(जिला रिजर्व पुलिस) जवान थे, जिनमें से ज्यादातर स्थानीय युवक तथा आत्मसमर्पण किए हुए नक्सली थे । डीजीपी के मुताबिक छत्तीसगढ़ पुलिस की इस टुकड़ी को इतना जबर्दश्त नुकसान पहली बार उठाना पड़ा । घटनास्थल से जवानों के शव तो मिले, लेकिन माओवादियों का एक भी शव नहीं मिला । संभवतः वे अपने घायल साथियों को और मृतकों को भी साथ ले गए । पुलिस सूत्रों ने बताया कि नक्सलियों ने एलएमजी, असाल्ट राइफल और यूबीजीएल लूट लिए ।

इस घटना के हफ्ता भर पहले महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित जिला गढ़चिरोली में पुलिस ने छत्तीसगढ़ के बस्तर से ही आए सीपीआई(माओवादी) गुट के तीन कमांडरों को गिरफ्तार किया । सरगना एरिया कमांडर भूपति उर्फ वेणुगोपाल राव पकड़ाया ।

कोरोना एलान के बाद ओडिशा के नक्सल क्षेत्र मलकानगिरी - कोरापुट - विशाखा से एक अलग रिपोर्ट आयी । इस इलाके के एरिया कमांडर ने एकतरफा संघर्षविराम की घोषणा करके सरकार से आग्रह किया कि चिकित्सा और राहत कर्मियों को सुदूर गांवों में रह रहे लोगों को सहायता करने कहा जाए । नक्सल नेता ने अपना वीडियो तेलुगू में जारी किया । 6 अप्रैल को जारी वीडियो में कहा गया कि सरकारी कर्मचारी निडर होकर मलकानगिरी के सुदूर इलाके में आकर लोगों को आवश्यक सेवाएं दें और साथ में चेतावनी भी दी कि संघर्षविराम का अगर पुलिसकर्मी नाजायज फायदा उठाने की कोशिश करेंगे तो उसका बदला लिया जाएगा ।

उसके बाद 18 अप्रैल को छत्तीसगढ़ से रिपोर्ट मिली कि पुलिस ने एक इनामी हार्डकोर नक्सली को मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया । छत्तीसगढ़ पुलिस ने इस नक्सली की पहचान पोडियम कामा उर्फ नागेश के रूप में की । इस पर छत्तीसगढ़ सरकार ने 5 लाख और ओडिशा सरकार ने 4 लाख इनाम घोषित किया हुआ था । यह मुठभेड़ भी सुकमा जिले के ही चिंतलनार और मुंडवाल गांवों के बीच हुई । गुप्त सूचना के आधार पर जिला रिजर्व गार्ड(डीआरजी) पुलिस टीम ने इलाके की घेराबंदी की, जहां का वो नक्सली एरिया कमांडर था । यह नक्सली नागेश सुकमा का ही निवासी था और इसका संगठन कालीमेला आंध्रप्रदेश - ओडिशा सीमा पर नक्सली गतिविधियों की मोर्चाबंदी करता था । इसके पास से जिला पुलिस ने 315 बोर बंदूक, दो ग्रेनेड, एक टिफिन बम, विस्फोटक, हथियार गोला बारूद और डेटोनेटर बरामद किए ।

पुलिस सूत्रों के अनुसार राजनंदगांव की महाराष्ट्र से लगी सीमा के पास नक्सलियों ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क निर्माण योजना के अंतर्गत सड़क निर्माण काम में लगी तीन भारी वाहनों में आग लगा दी । घटनास्थल पर माओवादियों द्वारा छोड़े गए पर्चे के अनुसार सड़क निर्माण के नाम पर घपला किया जा रहा है और घटिया श्रेणी के सामान इस्तेमाल किए जा रहे हैं। पुलिस ने इसमें रंगदारी वसूली का संदेह जताया है ।

बिहार से भी नक्सल प्रभावित जिलों में माओवादी सक्रियता की रिपोर्ट है । गया के बाराचट्टी में नक्सलियों की सीआरपी की कोबरा बटालियन से भिड़न्त की जानकारी पुलिस सूत्रों ने दी । हालांकि किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है । नक्सली घने जंगलों से होते हुए झारखंड की सीमा में भाग निकले । मुंगेर रेंज के डीआईजी मनु महाराज ने बताया कि लॉकडाउन अनुपालन में पुलिसकर्मियों के लगे होने के कारण नक्सली उसका नाजायज फायदा उठाने की कोशिश में लगे हैं । इस रेंज में आनेवाला जमुई का चकाई क्षेत्र नक्सलियों का गढ़ है, जो झारखंड की सीमा से लगा है । झारखंड नक्सलियों का बिहार से भी बड़ा अभयारण्य है । चकाई पुलिस ने बम से भरे चार डब्बे, 97 जिलेटीन छड़ें और विस्फोटक जमुई जिले के जहरबाद तथा बार्सोलिया गांवों से बरामद किए । यह लॉकडाउन पहला चरण समाप्त होने के समय की रिपोर्ट है ।

शहरी नक्सली के आरोपितों में महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव हिंसा में अभियुक्त बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं । उनमें से एक पत्रकार गौतम नवलखा को लॉकडाउन के दौरान ही आत्मसमर्पण करना पड़ा । जनवरी, 2018 में भीमा कोरेगांव हिंसा में उन पर भड़काऊ बयान देने का आरोप है, और पुलिस उनका नक्सली गुट सीपीआई(माओवादी) से संदिग्ध संपर्क मानती है । बंबई हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की मदद से गौतम नवलखा एक साल से गिरफ्तारी से बच रहे थे । 14 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट जज अरूण मिश्र की अध्यक्षता वाली पीठ ने नवलखा को राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एनआईए) के आगे आत्मसमर्पण करने कहा । गौतम नवलखा ने लॉकडाउन का हवाला देते हुए गुहार लगायी कि कोरोना संक्रमण में जेल जाना तो ‘एक प्रकार से सजाए मौत’ है । लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने नवलखा को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया ।

लॉकडाउन शुरू होने के समय ही सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया कि जेलों की भीड़ कम करने के लिए ऐसे विचाराधीन कैदियों को रिहा करें, जिन पर ज्यादा गंभीर अपराध का मामला नहीं है । जिन राज्यों ने सैकड़ों विचाराधीन कैदियों को रिहा किया, उनमें नक्सल प्रभावित राज्य महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश भी शामिल है ।

लेकिन ऐसा सुनने को नहीं मिला कि नक्सल प्रभावित किसी राज्य ने ऐसे कैदियों को रिहा किया हो, जिनके खिलाफ संदिग्ध नक्सली होने का मामला विचाराधीन है । सुप्रीम कोर्ट के अनुसार भारतीय जेलों की 70 प्रतिशत आबादी विचाराधीन कैदियों की है । छत्तीसगढ़ सरकार ने संदिग्ध नक्सली के आरोप में जेलों में बंद आदिवासियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने के लिए पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज ए. के. पटनायक की अध्यक्षता में आयोग गठित किया । आयोग ने फरवरी, 2020 में 91 मुकदमे वापस लेने की अनुशंसा की । लेकिन लॉकडाउन के दौरान भी छत्तीसगढ़ से उसके अनुपालन की रिपोर्ट नहीं मिली ।

कोरोना सामाजिक संक्रमण से लड़ने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश, समाज से सहयोग मांगा । राज्य सरकारों ने भी अपील की और जनता सहयोग कर भी रही है । 24 मार्च से 27 अप्रैल तक प्रधानमंत्री ने राज्य सरकारों से तीन बार वीडियो कान्फ्रेंसिंग करके स्थिति की समीक्षा की । 27 अप्रैल को भी प्रधानमंत्री ने राज्य सरकारों से लॉकडाउन खत्म करने की नीति तैयार करने कहा ।

नक्सल समस्या देश का सामाजिक आर्थिक संक्रमण है, जिसके आधी सदी से ज्यादा गुजर गए । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने छह साल के शासनकाल में किसी भी राज्य सरकार से नक्सल नीति तैयार करने नहीं कहा । प्रधानमंत्री ने स्वयं नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से विमर्श नहीं किया । केंद्र और राज्य सरकारों के लिए यह सिर्फ कानून व व्यवस्था का मामला है । सुरक्षा बलों को घात प्रतिघात और जान लेकर या देकर नक्सलियों से जूझना है ।

कोरोना संक्रमण के मद्देनजर संसद का सत्र निर्धारित अवधि से पहले समाप्त कर दिया गया । केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जी. किशन रेड्डी ने तीन मार्च को लोकसभा में नक्सल हमले से संबंधित एक सवाल के जवाब में बताया कि 2017-18 और 2019-20 के तीन वर्षों में नक्सल प्रभावित राज्यों को 3414.50 करोड़ रुपये आवंटित किए गए । केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार नक्सल प्रभावित राज्य हैं - आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और केरल ।

जिन योजनाओं के तहत ये फंड दिये गए, उनमें प्रमुख हैं - सुरक्षा बलों का नक्सल दमन में सक्षम बनाना, दूसरा है नक्सल इलाके में सड़क निर्माण जो विकास और विनाश दोनों के लिए जरूरी है । इसके प्लस माइनस पहलू रिपोर्ट सामने हैं ।