प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कांग्रेस को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ बताने के साथ-साथ यह भी कहा कि यह पार्टी नक्सलियों के जंजाल में फंस गयी है । बजट सत्र में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस के जवाब में प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर फोकस करते हुए कहा कि इस पार्टी के सोचने के तरीके पर शहरी नक्सलियों ने कब्जा कर लिया है और यह देश के लिए चिंता का विषय है । अर्बन नक्सल ने कांग्रेस की दुर्दशा का फायदा उठाकर ऐसा किया है ।
संसद के बजट सत्र के पहले चरण में मुख्य रूप से राष्ट्रपति के अभिभाषण पर ही चर्चा हुई । कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों ने बेरोजगारी, महंगाई समेत कई गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे उठाए । लेकिन उस सबके जवाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिर्फ कांग्रेस पर फोकस करते हुए मुख्य विपक्षी दल को ही निशाना बनाया और ऐसे पहलू से जोड़ा, जिसकी दोनों सदनों में से किसी में चर्चा तक नहीं हुई ।
परिवारवाद से ग्रसित कई पार्टियां विभिन्न राज्यों में सत्ता में हैं और विपक्ष में भी हैं तो मजबूत हैसियत में हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस से ही इसकी शुरुआत करते हैं और सबसे ज्यादा कांग्रेस पर ही इस मुद्दे को लेकर हमला करते हैं ।
लेकिन जहां तक कांग्रेस को शहरी नक्सली या शहरी नक्सलियों से ‘मिलीभगत’ का मामला है, यह नरेंद्र मोदी का सियासी तकिया कलाम है, जिसका इस्तेमाल वे चुनाव के समय करते हैं । अभी पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। इसी समय प्रधानमंत्री ने संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस के जवाब की शुरुआत ही कांग्रेस के शहरी(अर्बन) नक्सली के जंजाल में फंसे होने के आरोप लगाकर की ।
अब जरा नवंबर, 2018 में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ विधान सभाओं के चुनाव और फिर उसके बाद 2019 में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषणों को याद करते हैं । नवंबर, 2018 में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश विधान सभाओं के चुनाव हुए । उस वक्त केंद्रीय गृह मंत्री थे राजनाथ सिंह और अमित शाह उस वक्त भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ और अलग-अलग चुनाव सभाओं में भी राजनाथ सिंह तथा अमित शाह ने बार-बार कांग्रेस पर शहरी नक्सलियों से ‘मिलीभगत’ का आरोप लगाया । खासकर प्रधानमंत्री और 2018 में गृहमंत्री राजनाथ सिंह दोनों ने कांग्रेस पर नक्सलियों से मिलीभगत होने का आरोप लगाते हुए यह भी कहा कि सामाजिक जीवन से भटके युवकों को गुमराह करने के लिए कांग्रेस जिम्मेदार है ।
छत्तीसगढ़ में 15 साल से चली आ रही रमन सिंह के नेतृत्ववाली भाजपा सरकार गिर गयी और कांग्रेस पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ गयी । दिसंबर, 2018 में कांग्रेस के भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बने । मध्य प्रदेश में भी 15 साल से चली आ रही शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्ववाली भाजपा सरकार बहुमत हासिल नहीं कर पायी । कांग्रेस के कमलनाथ मुख्यमंत्री बने । लेकिन कांग्रेस विधायकों को फोड़कर भाजपा ने कमलनाथ को अल्पमत में ला दिया और मार्च, 2020 में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने से पहले ही कमलनाथ को इस्तीफा देना पड़ गया ।
इन दोनों राज्यों के नक्सलियों के पुराने संगठित गढ़ होने के कारण लोकसभा चुनाव के समय भी प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह और अमित शाह ने लगभग हर चुनावी सभा में कांग्रेस पर नक्सलियों से ‘मिलीभगत’ के आरोपवाला जुमला दुहराया ।
अभी उत्तर प्रदेश, मणिपुर, गोवा, पंजाब, उत्तराखंड में मतदान प्रक्रिया जारी है । इनमें से कोई राज्य छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश की तरह नक्सलियों के गढ़ कभी नहीं रहे । लेकिन सीमा से सटे ओडिशा, आंध्रप्रदेश, झारखंड, बिहार, महाराष्ट्र, तेलंगाना में नक्सलियों से निबटना केंद्रीय सुरक्षा बलों और राज्य पुलिस के लिए चुनौती तो बनी हुई है ही ।
यह पहला अवसर है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पर सदन के अंदर चुनावी भाषण की तरह हमला बोला और उसके लिए शहरी नक्सल वाला जुमला अपनाया । सदन के अंदर 08.02.2022 को प्रधानमंत्री का जुमला बदला हुआ था । नरेंद्र मोदी ने कहा कि कांग्रेस शहरी नक्सलियों के जंजाल में फंस गयी है और कांग्रेस की सोच पर अर्बन नक्सलियों ने कब्जा कर लिया है । जबकि नवंबर, 2018 और अप्रैल,मई 2019 में प्रधानमंत्री ने चुनावी रैलियों में कांग्रेस पार्टी को नक्सलियों से ‘मिली हुई’ बताया था । हो सकता है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नक्सलियों और उनके ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ कांग्रेस की सोच के बारे में धारणा सही हो । लेकिन नरेंद्र मोदी की सोच पर भी भारत की जनता को तरस आती है कि उन्हें प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और राहुल गांधी में कोई फर्क नहीं लगता । अपनी सियासी राजनीति के तहत नरेंद्र मोदी कांग्रेस की आलोचना करते समय राहुल गांधी और जवाहर लाल नेहरू को सिर्फ इसी नजरिए से देखते हैं कि दोनों कांग्रेसी हैं । बहरहाल, कांग्रेस के नक्सलियों के कब्जे में चले जाने के लिए नरेंद्र मोदी की ‘देश’ के रूप में चिंता का एक प्रमुख कारण नागरिकता संशोधन कानून(सीएए) का विरोध प्रतीत होता है । इस एक्ट का विरोध असम से शुरू होकर पूरे देश में फैला । खासकर दिल्ली और उत्तर प्रदेश में तो 2019 में सीएए विरोध ने इतिहास रच दिया । विरोध करनेवालों के समर्थन में कांग्रेस और वामदल उतरे । दिल्ली में शाहीनबाद घटना महीनों चला । उससे सहानुभूति रखनेवाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरबिंद केजरीवाल ने 2020 चुनाव में फिर भारी बहुमत हासिल किया । इसी हफ्ते सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को सीएए का विरोध करनेवालों से तोड़फोड़ और नुकसान की रिकवरी के लिए 2021 में बनाया गया कानून रद्द करने का अल्टीमेटम देते हुए कहा कि अगर सरकार ने ऐसा नहीं किया तो सुप्रीम कोर्ट कर देगी । प्रधानमंत्री के संसद में दिए गए वक्तव्य के तीन दिन बाद 12 फरवरी को छत्तीसगढ़ के बीजापुर में नक्सल हमले में सीआरपी के असिस्टेंट कोऑर्डिनेट शांति भूषण टिर्की और एक जवान मारे गए । टिर्की झारखंड के रहनेवाले थे, जो नक्सल प्रभावित राज्य है और वहां झारखंड मुक्ति मोर्चा कांग्रेस गठजोड़ सरकार है । दूसरा जवान नक्सल प्रभावित राज्य आंध्रप्रदेश के आदिवासी बहुल जिला पूर्वी गोदावरी का रहनेवाला था । जहां कांग्रेस के ही दूसरे गुट की सरकार है । छत्तीसगढ़ और झारखंड दोनों आदिवासी राज्य है । भाजपा का आदिवासी क्षेत्र में ‘टुकड़े-टुकड़े’ जनाधार है । छत्तीसगढ़ सरकार ने इस हमले के जवाब में कहा कि नक्सली अब पूरी तरह सिमट चुके हैं और पुलिस उन्हें बस्तर से आगे नहीं बढ़ने दे रही है । छत्तीसगढ़ की और ऐतिहासिक वाकया देखिए । 2013 में जब वहां भाजपा की सरकार थी और केंद्र में कांग्रेस. गठजोड़ सरकार थी, उसी वर्ष 25 मई को एक नक्सल हमले में 31 लोग मारे गए । उस हमले में कांग्रेस के सारे टॉप नेताओं का सफाया हो गया । छत्तीसगढ़ पुलिस ने उसमें नक्सली हाथ होने से इन्कार कर दिया । उसकी जांच के लिए भाजपा सरकार द्वारा 2013 में गठित आयोग की रिपोर्ट आयोग ने नवंबर, 2021 में राज्य के कांग्रेस मुख्यमंत्री को नहीं, राज्यपाल को सौंपी । उसको लेकर विवाद थमा नहीं है । महाराष्ट्र में शिवसेना के नेतृत्ववाली गठजोड़ सरकार में कांग्रेस भी शामिल है । वहां के नक्सल गढ़ गढ़चिरोली में नवंबर, 2021 में एक मुठभेड़ में 26 नक्सलियों को मार गिराया । महाराष्ट्र में जनवरी, 2018 में भीमा कोरेगांव हिंसा में कथित रूप से शामिल होने के आरोप में स्थायी रूप से जेल में बंद सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, लेखकों के माओवादियों से मिले होने का मुकदमा जारी है । इनकी जमानत की अर्जी 2018 में सुप्रीम कोर्ट तक गयी, जिनकी ओर से वकील और कांग्रेसी अभिषेक मनुसिंघवी शीर्षकोर्ट में पेश हुए । ये मामला कांग्रेस के इन शहरी नक्सलियों से ‘मिले’ होने का नरेंद्र मोदी के हिसाब से बनता है । लेकिन चुनावी राजनीति के क्रम में असम के भाजपा मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा का इस हफ्ते उत्तराखंड में राहुल गांधी पर यह टिप्पणी कि क्या आप प्रमाण दे सकते हैं कि राजीव गांधी के पुत्र हैं या नहीं, से कैसी सोच झलकती है, इस पर नरेंद्र मोदी को सोचना चाहिए ।