झारखंड विधान सभा के लिए चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया कि भाजपा के पांच साल के शासन में नक्सलियों की कमर टूट गयी । झारखंड में इसके पहले माओवाद अपने चरम पर था । प्रधानमंत्री ने यह बात झारखंड के प्रथम चरण के मतदान से पहले 25 नवंबर को और फिर दूसरे चरण के मतदान से पहले तीन दिसंबर को भी दुहरायी । नरेंद्र मोदी को चुनाव रैली से एक दिन पूर्व 24 नवंबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह रांची पहुंचे । उन्होंने चुनाव रैली में आक्रामक लहज में कहा कि नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा । रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के ऐसा आक्रामक रूख अपनाने का कारण था । पलामू जिले के डाल्टनगंज विधान सभा क्षेत्र में प्रधानमंत्री ने जहां रैली को संबोधित किया, वहीं 22-23 नवंबर को नक्सली हमले में चार पुलिसकर्मी समेत 6 लोग मारे गए । नक्सलियों ने लातेहार और पलामू में दो अलग-अलग घटनाओं में चंदवा थाना को निशाना बनाकर घात लगाकर हमला किया, जिसमें चार पुलिसकर्मियों की मौत हो गयी । अगले दिन 24 नवंबर को उसी जगह चुनाव रैली को रक्षा मंत्री ने संबोधित किया ।

30 नवंबर को प्रथम चरण का मतदान कराने के लिए तय विधान सीटों में पलामू और लातेहार जिले की सीटें सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित हैं । उनमें छह जिले की 13 सीटें आती हैं । मतदान शांतिपूर्ण संपन्न हुआ और भारी संख्या में वोटर जुटे । डाल्टनगंज विधान सभा क्षेत्र में कांग्रेस और भाजपा समर्थकों के झगड़े में पिस्तौल लहराने की खबर है । अगर किसी आम वोटर के हाथ में पिस्तौल होता तो पुलिस को उसे संदिग्ध माओवादी बताकर मार देने में जरा भी देर नहीं लगती, क्योंकि यह नक्सल क्षेत्र है । यही है नक्सल नीति, जो सुरक्षा बलों की रिपोर्ट पर सरकार रणनीति के रूप में हर नक्सल हमले के बार तय करती है । दो दिसंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी रांची पहुंचे । राहुल गांधी ने तो अपना भाषण जल, जंगल, जमीन की रक्षा और किसानों की कर्ज माफी तक सीमित रखा । लेकिन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अन्य बातों के अलावे नक्सलवाद खत्म करने का दावा करते हुए कहा कि लोग नक्सलवाद की तरह आतंकवाद का भी खात्मा चाहते हैं । प्रधानमंत्री, रक्षा मंत्री और गृह मंत्री तीनों को झारखंड के नक्सल प्रभावित राज्य होने के कारण इसकी चर्चा तो करनी ही थी । लेकिन तीनों नेताओं ने इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी और धारा-370 तथा राम मंदिर की ओर निकल गए । प्रधानमंत्री ने ही नक्सलवाद पर ज्यादा जोर दिया और स्थायित्व की चर्चा करते हुए लोगों से कहा कि झारखंड में पांच साल का कार्यकाल पूरा करनेवाली पहली सरकार भाजपा ने दी, इसलिए यह सिलसिला कायम रखें । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार भी नक्सलियों के कांग्रेस से मिले होने की बात नहीं कही और कांग्रेस पर नक्सलियों को शह देने का आरोप भी नहीं लगाया ।

इस बात का जिक्र यहां जरूरी है । क्योंकि दिसंबर, 2018 में छत्तीसगढ़ तथा मध्य प्रदेश विधान चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी और उस समय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने अपनी चुनाव रैलियों में बार-बार यह बात दुहरायी कि नक्सलियों का कांग्रेस समर्थन कर रही है । उस वक्त भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी शहरी नक्सलियों को ‘देशद्रोही’/ ‘राष्ट्रविरोधी’ बताते हुए कांग्रेस पर इनसे मिलीभगत का आरोप लगाया । नक्सलियों के चुनौतीपूर्ण गढ़ वाले राज्यों में छत्तीसगढ़ के बाद दूसरे नंबर पर झारखंड है । छत्तीसगढ़ के साथ-साथ मध्यप्रदेश में भी भाजपा को अपनी सरकार चौथी बार भी बरकरार रखनी थी । दोनों जगह भाजपा नेताओं ने नक्सल समस्या को कांग्रेस से जोड़ा ।

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भाजपा सत्ता से बाहर हो गयी । अभी भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व झारखंड में अपनी सरकार दोबारा लाना चाहता है। लेकिन नक्सल समस्या के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराने की बात किसी भाजपा नेता ने नहीं की ।

नक्सलियों ने झारखंड में अपना वजूद कायम रखने का सबूत मतदान शुरू होने से पहले दे दिया । छत्तीसगढ़ के नक्सल गढ़ बस्तर क्षेत्र में अप्रैल, 2019 में लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण के मतदान के लिए चुनाव प्रचार समाप्त होते ही भाजपा विधायक भीमाराव मंडावी नक्सली हमले में मारे गए । छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव में बस्तर की 12 सीटों में से एक ही सीट भाजपा को मिली, जहां से भीमा मंडावी जीते थे । 15 साल से भाजपा मुख्यमंत्री रमन सिंह की सरकार गिर गयी । कांग्रेस के भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने । नक्सलियों के प्रति सरकार का आक्रामक रवैया भ्रामक और रणनीति राजनीति प्रेरित साबित हो रही है । जब-जब सुरक्षा बलों पर नक्सली हमला होता है, सरकार आक्रामक रूख का प्रचार करती है । सुरक्षा बलों का नक्सल क्षेत्र में तलाशी अभियान भी उसी का हिस्सा है । रणनीति वास्तव में सिर्फ उसी बिंदु तक केंद्रित है कि सुरक्षा बल पिछड़ें नहीं, पछाड़ें । इसी रणनीति की समीक्षा होती है । कोई एक समेकित नक्सल नीति बनाना सरकार ने जरूरी नहीं समझा । हमले और जवाबी हमले में दोनों तरफ से बेकसूर गरीब मारे जाते हैं । सुरक्षा बल अपनी झुंझलाहट और तनाव की बौखलाहट फर्जी मुठभेड़ दिखाकर बाहर निकालते हैं । सरकारों को कोई फर्क नहीं पड़ता, चाहे वो कांग्रेस हो या भाजपा अथवा केरल की वाममोर्चा सरकार ही क्यों न हो ।

झारखंड विधान सभा चुनाव प्रचार के समय ही छत्तीसगढ़ ‘मुठभेड़’(2012) की न्यायिक जांच रिपोर्ट का खुलासा हुआ । न्यायिक आयोग ने जून, 2012 कथित ‘मुठभेड़’ को फर्जी बताते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा कि ग्रामीणों की ओर से कोई फायरिंग नहीं हुई और उनके माओवादी होने के कोई सबूत नहीं हैं । छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिलान्तर्गत सर्केगुडा गांव में जून, 2012 में 17 ग्रामीणों को सीआरपी द्वारा संदिग्ध माओवादी बताकर कथित ‘मुठभेड़’ में मार दिए जाने पर बवाल मचा । उसकी जांच के लिए मुख्यमंत्री रमन सिंह ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के रिटायर जज बो. के. अग्रवाल की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया । जस्टिस अग्रवाल ने अपनी जांच रिपोर्ट में उस मुठभेड़ को यह कहकर फर्जी बताया कि उसमें ग्रामीणों की आर से फायरिंग नहीं हुई और उनके नक्सली होने के कोई सबूत नहीं हैं । 28 जून, 2012 की रात को सीआरपी गश्ती दल ने गांववालों की एक सभा पर हमले करके 17 ग्रामीणों को मार दिया, जिनमें 6 बच्चे थे । उसे मुठभेड़ बताया गया । उसकी जांच रिपोर्ट का खुलासा गत सप्ताह हुआ, जिसको लेकर छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार और विपक्षी भाजपा दोनों आमने-सामने हैं । मुठभेड़ के समय छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार थी, जिसने न्यायिक जांच आयोग गठित किया । अभी कांग्रेस की सरकार है, जिसके अंदर ही जांच रिपोर्ट को लेकर घमासान मचा है । भाजपा नेता रमन सिंह जांच रिपोर्ट को सबसे पहले विधान सभा में पेश करने पर जोर दे रहे थे । जबकि कांग्रेस मंत्रिमंडल में ही इस बात को लेकर मतभेद था कि जांच रिपोर्ट को सही माना जाए या नहीं । विधान सभा का शीतकालीन सत्र समाप्त होने के दिन 03 दिसंबर तक इस पर सहमति नहीं बन पा रही थी कि न्यायिक जांच रिपोर्ट सदन में रखा जाए या नहीं । जबकि जस्टिस अग्रवाल ने रिपोर्ट एक महीना पहले सौंपी और 15 नवंबर को मंत्रिमंडल की बैठक में उस पर चर्चा हुई । मुख्यमंत्री ने कहा कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, जबकि रमन सिंह ने सवाल उठाया कि रिपोर्ट सदन में सत्र के अंतिम दिन क्यों पेश की गयी । जांच रिपोर्ट को दिसंबर में होनेवाले शहरी निकाय चुनावों के नजरिए से देखा गया । उस मुठभेड़ में किसी भी सीआरपी जवान के मारे जाने की रिपोर्ट नहीं है ।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली में सीजीओ कॉम्प्लेक्स स्थित सीआरपी हेडक्वार्टर में 15 नवंबर को सीआरपी जवानों से शहरी नक्सलियों से ‘निपटने’ और छह महीने में वाम उग्रवाद(एल डब्लयू ई) के खिलाफ निर्णायक सफाया अभियान चलाने कहा । उसी दिन अर्थात् 15 नवंबर को ही ‘शहरी नक्सली’ गौतम नवलखा को बंबई हाईकोर्ट ने दो दिसंबर तक गिरफ्तारी से छूट दी । नवलखा समेत कई मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक, वकील, प्रोफेसर ‘शहरी नक्सली’ होने के कारण देशद्रोह कानून यूएपीए(गैर कानूनी गतिविधियां रोक कानून) के अंतर्गत जेल में हैं । गौतम नवलखा को काफी दिनों तक सुप्रीम कोर्ट से छूट मिली, लेकिन फिर वापस पुणे कोर्ट में मामला चला गया ।

17 नवंबर को प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में सीआरपी कैंप के ऊपर नक्सलियों द्वारा ड्रोन के इस्तेमाल का संकेत मिलते ही देखते ही गोली मारने का आदेश दिया गया । मगर सच्चाई ये है कि नक्सल इलाके में तैनात सीआरपी जवान हमेशा इस आदेश से लैस रहते हैं । तभी तो मुठभेड़ की आए दिन नौबत आती है और उसके फर्जी होने को लेकर विवाद होता है । केरल की वाम मोर्चा सरकार ने एक ओर जहां 28 अक्टूबर को चार माओवादियों के पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने को सही बताया वहीं दूसरी ओर दो सीपीएम कार्यकर्ताओं के कथित नक्सली संपर्क होने के कारण गिरफ्तारी पर पशोपेश में है । केरल के मुख्य सचिव टॉम जोसे ने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में लेख लिखकर नक्सलियों के मारे जाने को उचित ठहराया और उसे कहा - ‘यह युद्ध जैसा है, मरो या मारो’ । उसके लेकर विवाद छिड़ा । गिरफ्तार दोनों सीपीएम कार्यकर्ताओं को जमानत देने से केरल हाईकोर्ट ने इन्कार कर दिया और पलाक्काड जिले में 28 अक्टूबर को हुए मुठभेड़ की जांच में घटनास्थल से बरामद नक्सलियों के हथियार पर अंगुलियों के निशान की भी फोरेन्सिक जांच का आदेश दिया । मृतकों के परिजनों की याचिका पर 12 नवंबर को यह आदेश देते हुए हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी से कहा कि शवों की अंत्येष्टि से पहले उंगलियों के निशान लिए जाएं और पुलिस द्वारा मुठभेड़ में इस्तेमाल किए गए हथियार जब्त करके फोरेन्सिक तथा बैलिस्टिक विश्लेषण के लिए भेजे जाएं । परिजनों के विरोध के कारण शवों की अंत्येष्टि नहीं हुई है । केरल हाईकोर्ट के ही 2015 के एक फैसले के अनुसार माओवादी होना अपराध नहीं माना जा सकता । पुलिस के अनुसार नक्सलियों ने फायरिंग की, जिसका जवाब दिया गया, जो हर मुठभेड़ में पुलिस कहती है । पूरे प्रकरण पर भाजपा चुप है । वाममोर्चा का घटक सीपीआई और विपक्षी कांग्रेस मुठभेड़ को फर्जी बता रही है । 22-23 अप्रैल, 2018 को महाराष्ट्र के नक्सल गढ़ गढ़चिरोली में पुलिस ने दो अलग-अलग मुठभेड़ों में 40 संदिग्ध नक्सलियों के मारे जाने का दावा किया, जिसमें पुलिस का कोई जवान घायल तक नहीं हुआ । उसकी असलियत पर आज तक संदेह बना हुआ है कि एक ही रात में एक ही गांव के 40 लोग नक्सली कैसे पाए गए । प्रतिबंधित सीपीआई(माओवादी) ने एक पर्चा जारी किया कि गांव के लोगों को रात में विषाक्त भोजन कराया गया और फिर गोली मारकर मुठभेड़ दिखा दिया गया । उसके साल भर बाद एक मई को नक्सली बारूदी सुरंग विस्फोट में 15 पुलिसकर्मी मारे गए ।

24 अप्रैल, 2017 को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सलियों ने सीआरपी कैंप पर हमला करके 25 जवानों को मार दिया । गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने 10 नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलायी और नक्सल समस्या का जवाबी आक्रामक ‘समाधान’(SAMADHAN) फार्मूला प्रस्तुत किया - - स्मार्ट लीडरशिप, । - एग्रेसिव स्ट्रैटजी, ड - मोटिवेशन एंड ट्रेनिंग, । - एक्शनेवल इंटेलिजेंस, व - डैशबोर्ड की परफॉर्मेंस इंडिकेटर, भ - हार्नेसिंग टेक्नोलॉजी, । - एक्शन प्लान फॉर इच थिएटर, छ - नो एक्सेस टु फाइनान्सिंग ।