केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह नक्सल गढ़ बस्तर क्षेत्र के अंबिकापुर में केंद्रीय रिजर्व पुलिसबल (सीआरपी) की ‘बस्तरिया बटालियन’ की पासिंग आउट परेड को जिस दिन हरी झंडी दिखा रहे थे, उसी दिन नक्सलियों ने उसी जगह सात सीआरपी जवानों को उनकी गाड़ी समेत विस्फोट में उड़ा दिया ।
आईईडी(प्व - इंप्रूवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) विस्फोट से इस इलाके में सीआरपी की गश्ती / चौकसी गाड़ी को उड़ाकर गरीब बेकसूर सीआरपी जवानों को मार देना नक्सलियों के लिए कोई नयी बात नहीं है । आईईडी डिवाइस नक्सलियों का पुराना आजमाया हुआ युद्ध टेकनीक है, जिसका वार कभी खाली नहीं जाता ।
इस हफ्ते का हमला भी छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में उसी दंतेवाड़ा में हुआ है, जिसके नजदीकी गांव में नक्सलियों ने नौ सीआरपी जवानों की 13 मार्च को जान ले ली । पहाड़ी जंगल वाले ये दोनों इलाकों से गुजरने के लिए सरकार सड़क निर्माण में जुटी है । छत्तीसगढ़ सरकार इसे विकासमूलक बताकर सीआरपी की चौकसी में सड़क निर्माण करा रही है । यह दूसरा अवसर है, जब सड़क निर्माण सामान लेकर जा रहे ट्रकों की रखवाली के लिए तैनात सीआरपी जवान अपनी जान से हाथ धो बैठे । अभी यह हमला उसी समय हुआ है, जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह विकास कार्य सड़क निर्माण का जायजा लेने जा रहे थे । मार्च में भी मुख्यमंत्री के काफिले के साथ छत्तीसगढ़ पुलिस के साथ गए सीआरपी जवानों की जान गयी ।
बार-बार नक्सली इस बात का सबूत दे रहे हैं कि वे सीआरपी से ज्यादा चौकस रहते हैं और उनके गढ़ में सीआरपी के लिए सेंधमारी आसान नहीं है । नक्सलियों के पास लैंडमाईन(बारूदी सुरंग) बिछाने से लेकर आईईडी (प्व) समेत ऐसे-ऐसे डिवाइस हैं कि सीआरपी उनके गढ़ में प्रवेश ही नहीं कर सकते । नक्सलियों ने सड़क निर्माण कार्य को विनाशमूलक मान रखा है, इसलिए सड़कें बनाने नहीं दे रहे और जो सड़कें आधी-अधूरी बनी हुई हैं, उसमें आईईडी विस्फोट बिछा देते हैं । सीआरपी के पास न तो ऐसी डिवाइस है, जिससे उन्हें पहले ही पता चल जाए कि आगे कहां पर आईईडी फिट किया हुआ है न ही उसका शक्तिशाली काट और बच निकलने का उपाय है । उतना ही नहीं, सीआरपी टुकड़ियों के पास माईन प्रोटेक्टेड वेहिकिल(एमपीवी) या तो बहुत कम हैं या उन्हें वैसी गाड़ी तभी मुहैया की जाती है, जब वीआईपी की सुरक्षा के लिए उनकी ड्यूटी लगायी जाती है । जो भी एमपीवी वेहिकल हैं, वो सीआरपी जवानों की जान किसी विस्फोट में बचाने के काबिल नहीं है ।
गरीब परिवार से आनेवाले इन जवानों की किस्मत में ‘शहीद’ होकर नम आंखों से विदाई देना ही लिखा है । वीआईपी लोग सुरक्षित निकल जाते हैं और नक्सलियों को मुंहतोड़ जवाब देने का ढिंढोरा पीटकर बाकी जवानों का शहीद होने का हौसला बुलंद कर देते हैं। फिर बात आयी गयी हो जाती है ।
नक्सलियों के पास वो हथियार हैं जो सीआरपी के पास हैं, बल्कि ज्यादा पावरफुल हथियार हैं । जो नहीं है, सीआरपी जवानों को मारकर लूट लेते हैं । अभी भी नक्सलियों ने एके-47 और इन्सास(प्छौ) जैसी स्वचालित राइफलें लूट लीं ।
मार्च वाले हमले के दिन सीआरपी डायरेक्टर जनरल(डीजी) आर. आर. भटनागर छत्तीसगढ़ में थे । इस हफ्ते के हमले के वक्त तो केंद्रीय गृह मंत्री स्वयं मौजूद थे । उनके साथ तो सीआरपी डीजी को होना ही था । क्योंकि गृह मंत्री सीआरपी का ही ‘बस्तरिया बटालियन’ की पासिंग आउट परेड को ओके करने आए थे । छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार आईईडी विस्फोट केंद्रीय गृह मंत्री के पहुंचने से कुछ ही घंटे पहले हुआ । इसका मुंहतोड़ जवाब देने के लिए गृहमंत्री ने तेलंगाना पुलिस की ग्रेहाउंड टाईप नक्सल रोधी ‘ब्लैक पैंथर’ यूनिट बनाने का एलान किया और कहा कि खास तौर से नक्सलियों से निबटने की खास ट्रेनिंग से लैस यह यूनिट होगी ।
13 मार्च और अभी 20 मई को नक्सलियों ने आईईडी विस्फोट से वैसी सीआरपी एमपीवी गाड़ी उड़ायी, जो लैंडमाइन बचाव से लैस थी । न गाड़ी बची, न जवानों की जान बची । यह सवाल तो उठाना ही बेकार है कि जब नक्सल सफाया अभियान में झोंके गए सीआरपी जवान अपनी जान नहीं बचा पाते, तो वे किसकी सुरक्षा के लिए तैनात हैं । अगर इस सवाल पर गंभीरता से विचार किया गया होता तो मुंहतोड़ जवाब के एलान के बाद सीआरपी को वैसी ट्रेनिंग और वैसे हथियार मिलते । वाकई नक्सलियों का मुंह टूटता । अभी तो नक्सली का जवाबी मुंहतोड़ चल रहा है । 23 अप्रैल को महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित जिला गढ़चिरोली में पुलिस ने पहले 16 नक्सलियों को मुठभेड़ में मार गिराने का दावा किया । फिर एक दिन बाद उसी के निकट 6 और नक्सलियों को मुठभेड़ में मारने का दावा किया । अभी तक उस मुठभेड़ पर लोग ऊंगली उठा रहे हैं क्योंकि एक भी पुलिसकर्मी के घायल होने या मारे जाने की खबर नहीं है । इस पर भी संदेह है कि मारे गए ग्रामीण वास्तव में हार्डकोर नक्सली थे या नहीं, जैसा महाराष्ट्र पुलिस ने बताया । उसके बाद 27 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के ही बीजापुर में छत्तीसगढ़ पुलिस ने तेलंगाना की नक्सल सफाया पुलिस ग्रेहाउंड के साथ मिलकर आठ नक्सलियों को मार गिराया ।
20 मई को छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा आईईडी विस्फोट उसी का जवाब माना जा रहा है । लेकिन उस वक्त केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह जिस सिलसिले में बस्तर जिले के अंबिकापुर पहुंचे थे, उससे एक नया सवाल उठने की संभावना है । गृहमंत्री का नक्सल प्रभावित राज्यों में हमले के बाद और नक्सल सफाया अभियान की समीक्षा करने यदा-कदा जाना चलता रहता है । गत हफ्ते वे झारखंड से जायजा लेकर लौटे हैं ।
लेकिन अभी बस्तर में सीआरपी की ‘बस्तरिया बटालियन’ बिल्कुल नया और पहले से बिल्कुल अलग-थलग है । इसमें उन्हीं गांवों के लोगों को ट्रेनिंग देकर सीआरपी की एक अलग बटालियन बनायी गयी है, जहां नक्सली मोर्चाबंदी काफी मजबूत है । सीआरपी की ऐसी बटालियन अन्य किसी नक्सल प्रभावित राज्य में नहीं है । अब ये लोग अपने ही गांव में अपने ही नक्सली भाई-बन्धु से लड़ेंगे ।
2017 में 24 अप्रैल को सुकमा जिले में ही नक्सलियों ने 26 सीआरपी जवानों को मार दिया, जो सड़क निर्माण कंपनी की सुरक्षा में तैनात थे । वारदात की समीक्षा के बाद पता चला कि सीआरपी का सूचना तंत्र और खुफिया नेटवर्क कमजोर होने के कारण जवानों की जान गयी । सीआरपी जवानों की गतिविधियों की गुप्त सूचना गांववालों ने नक्सलियों को दी । उसके बाद से ही शायद सीआरपी के बड़े अधिकारी ऐसी बटालियन बनाने में जुटे थे, जिसमें उसी गांव के लोग हों, जहां से नक्सलियों का सफाया करना है । इससे खुफियागिरी आसान हो जाएगी और नक्सलियों को कमजोर करने में सहूलियत होगी । अभी क्या होता है कि सीआरपी के जवान देश के विभिन्नन हिस्सों में भेजे जाते हैं, जो स्थानीय लोगों और रास्तों से परिचित नहीं होते इसलिए वे पिछड़ जाते हैं ।
ये अपने ढंग की पहली बटालियन है, जिसे केंद्रीय गृहमंत्री और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने 20 मई को अपने मुहिम के लिए ‘बस्तरिया लड़ाकू’ कहकर हरी झंडी दी । इसमें 534 जवान हैं, जिनमें 241 महिला सीआरपी लड़ाकू हैं । ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि विगत दिनों मुठभेड़ों में मारे गए नक्सलियों में महिलाओं की संख्या भी पर्याप्त थी । ये सब दुर्गम बीहड़ जंगलों में स्थित सुदूर गांव से खोजकर लायी गयी है, जहां नक्सलियों के अड्डे हैं । ‘बस्तरिया बटालियन’ को सारे अत्याधुनिक हथियारों से लैस किए गए हैं जो अपने गांव के नक्सलियों से लड़ेंगे ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह समेत लगभग सभी नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्री हर नक्सल हमले के बाद नक्सलियों को ‘गरीब के दुश्मन और विकास के दुश्मन’ बताते हैं । अब इस नयी सीआरपी बटालियन के बनने से नक्सल सफाया ऑपरेशन में और विकास का रास्ता साफ करने में कितनी मदद मिलेगी, यह तो वक्त बताएगा । लेकिन एक बात तो अभी ही स्पष्ट है कि अब नक्सल प्रभावित गांवों के लोगों को आपस में ही एक-दूसरे के दुश्मन बनाने का कानूनी इंतजाम हो गया । गांव-समाज का एक हिस्सा हैं नक्सली, इसी वजह से 50वें वर्ष में भी नक्सल आंदोलन बंदूक का जवाब बंदूक से देकर खतम नहीं किया जा सका ।
अब गांव के लोगों का आपसी भाईचारा खतम तो होना ही है । अब परिवार में ही लोग एक-दूसरे की जासूसी करेंगे और संदिग्ध नक्सली बताकर अपने घर के सदस्यों को ही मारेंगे जो हत्या कानूनी होगी । उन्हें सड़क या मोबाईल टावर की जरूरत नहीं है । राज्य पुलिस और सीआरपी के ‘संयुक्त’ नक्सल ऑपरेशन में पहले से ही सामंजस्य नहीं है । 24 अप्रैल, 2017 से लेकर 13.03.2018 और 20.05.2018 के नक्सल हमले में सिर्फ सीआरपी जवान मारे गए । आसपास हुए तीनों हमले में स्थानीय पुसिल के एक भी जवान के हताहत होने की रिपोर्ट नहीं है ।
अमीर या जमीन्दार परिवार का कोई नक्सली नहीं बनता है । गरीबी, शोषण नक्सली बनने को प्रेरित करता है ।
इस बस्तरिया बटालियन से कैसा अमन चैन आएगा और ‘विकास’ होगा, इसका सबूत तो उसी समय मिल गया, जब इनकी ट्रेनिंग हो रही थी । बटालियन की एक लड़की के अपने भाई को और एक लड़के की मां को नक्सलियों ने उसी दौरान मार दिया, जब ट्रेनिंग चल रही थी । समारोह स्थल अंबिकापुर से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार सीआरपी अधिकारियों ने नाम बताए बिना इसकी पुष्टि की । तत्कालिक खुशी तो जरूर है कि कम-से-कम पेट भर खाना तो मिलेगा । ‘बस्तरिया बटालियन’ के 90 प्रतिशत जवान कुपोषण के शिकार हैं । कइयों को तो ट्रेनिंग के लायक शरीर बनाने में काफी दिन लगे ।
ट्रेनिंग के दौरान ही इनके परिवारजनों को वो जमीन छीन लेने की धमकी मिल चुकी है, जो नक्सलियों की बदौलत मिली है । फरमान जारी हुआ कि अपने बच्चों को वापस बुलाओ ।
इस बटालियन से बस्तर के गरीब-गुरबा की जिंदगी सुधर सकती है, बशर्ते कि ये जवान अपने भाई-बन्धुओं को मुख्यधारा में लौटने को प्रेरित कर, जो अभी तक सिर्फ सरकारी भाषणों तक सीमित है । अगर वो महिलाएं इस दिशा में पहल करती हैं तो उसका स्वागत किया जाए और हथियार रखकर बातचीत हो ।
मुख्यधारा में लौटने की अपील और यह ताजा ‘बस्तरिया बटालियन’ पहल साथ चलाना समाधान नहीं है । छत्तीसगढ़ सरकार ने ही 2005 में गांव के लोगों को हथियार देकर सरकारी नक्सली संगठन ‘सलवा जुडूम’ तैयार किया था, ताकि वो आपस में ही लड़ें मरें । 2008 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने इसके खिलाफ तीखी टिप्पणी करते हुए कहा - ‘अगर सरकार किसी को हथियार देती है तो वह छद्म पुलिस होने का दावा करके ऐसे अपराध करेगा, जिसका उसे कानूनी अधिकार नहीं है ।’ उसके बावजूद छत्तीसगढ़ सरकार ‘सलवा जुडूम’ को न्यायोचित ठहराती रही । अब छत्तीसगढ़ सरकार के ही आग्रह पर दूसरा प्रयोग है ‘सीआरपी बस्तरिया बटालियन’ ।
ऐसा प्रयोग अन्य राज्यों में भी आजमाया जा सकता है । फिलहाल केंद्र सरकार की नजर सिर्फ सूचना एकत्र करने और सूचना तंत्र विकसित करने पर है । 23 मई को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नक्सल प्रभावित 10 राज्यों के 96 जिलों में 4072 मोबाईल टावर लगाने के लिए 7330 करोड़ रूपये की मंजूरी दी ।
ये टावर लगेंगे कैसे, लगाने वालों की सुरक्षा का क्या होगा । नक्सली सबसे पहले मोबाईल टावर को अपना निशाना बनाते हैं। वे सूचनाओं के आदान-प्रदान पर आधारित ‘विकास’ के पुराने दुश्मन हैं ।