प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कांग्रेस पर हमला करने के क्रम में किसी राजनीतिक मंच पर यह आरोप लगाने का अवसर नहीं भूलते कि कांग्रेस की नक्सलियों से ‘मिलीभगत’ है और इस पार्टी में अब नक्सलियों की चल रही है ।

खासकर नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश विधान सभा चुनावों में प्रधानमंत्री सबसे ज्यादा इसी बात का प्रचार करते हैं । फिर बारी-बारी से भाजपा के और भी वरिष्ठ नेता कांग्रेस को नक्सलियों से सांठगांठ रखनेवाली पार्टी बताकर इसका चुनावी लाभ उठाने का प्रयास करते हैं ।

वर्ष 2018 की तरह इस बार भी नरेंद्र मोदी ने इस प्रचार की शुरूआत भोपाल चुनावी सभा से कर दी । 25.09.2023 को नरेंद्र मोदी जब भोपाल में मतदाताओं को कांग्रेस की ‘असलियत’ समझा रहे थे, उस दिन कांग्रेस नेता राहुल गांधी छत्तीसगढ़ में थे । नक्सल प्रभावित राज्यों में छत्तीसगढ़ अभी भी माओवादी गुटों का मजबूत गढ़ बना हुआ है । मध्य प्रदेश पहले से ही नक्सली अड्डा है, जिससे कटकर छत्तीसगढ़ बना है ।

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के साथ-साथ राजस्थान और तेलंगाना में भी चुनाव हो रहे हैं । उनमें तेलंगाना तो पुराना नक्सल गढ़ है, लेकिन वहां इन पर काबू पा लिया गया है । तेलंगाना में कांग्रेस-नक्सली मिलीभगत की चर्चा भाजपा नेता नहीं करते । वहां भाजपा के मुकाबले में कांग्रेस है भी नहीं । तेलंगाना में टक्कर सत्तारूढ़ भारत राष्ट्र समिति और भाजपा के बीच है, ऐसा भाजपा नेता मानकर चल रहे हैं ।

अभी नरेंद्र मोदी ने जयपुर में भी चुनाव रैली को संबोधित किया, जहां कांग्रेस की सरकार है । मगर वहां कांग्रेस पर हमले के दौरान नक्सलियों से जोड़कर कांग्रेस की परिभाषा तय नहीं की । इसका प्रचार भोपाल में किया और कांग्रेस की ‘असलियत’ अपने हिसाब से नरेंद्र मोदी ने मतदाताओं को समझाया । प्रधानमंत्री ने भाषण की शुरुआत महिला आरक्षण बिल पर समर्थन की राजनीतिक लीपापोती से की, लेकिन उसके बाद पूरा फोकस कांग्रेस को नक्सलियों के पाले में डालने पर केन्द्रित रखा । ऐसा करने के लिए प्रधानमंत्री एक खास टर्म ‘अर्बन नक्सली’(शहरी नक्सली) का इस्तेमाल करते हैं, जो इनका पिटा-पिटाया चुनावी जुमला हो गया है । उस पर नया लेप चढ़ाने के अंदाज में नरेंद्र मोदी ने कहा - ‘कांग्रेस का ठेका अब कुछ ‘अर्बन नक्सलियों’ के पास है और कांग्रेस में अब उन्हीं नक्सलियों की चल रही है । यह जमीन पर कांग्रेस का हर कार्यकर्ता महसूस कर रहा है, इसलिए जमीन पर कांग्रेस लगातार खोखली हो रही है और यह पार्टी हो गयी है जंग लगा लोहा ।’ ये बातें प्रधानमंत्री ने भोपाल में कही, जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी भाजपा को उद्योगपतियों के रिमोट कंट्रोल से चलनेवाली पार्टी बता रहे थे । राहुल गांधी ने कहा - ‘नरेंद्र मोदी रिमोट कंट्रोल दबाते हैं तो अडानी को एयरपोर्ट, रेलवे का ठेका मिल जाता है और हम बटन दबाते हैं तो किसान को खाते में पैसा मिलता है, अंग्रेजी स्कूल खुलते हैं ।’

बता दें कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है, जहां 2018 में कांग्रेस को 15 साल से चल रही भाजपा की सरकार को हटाने में सफलता मिली थी । उसी चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के विषय में जोर-शोर से प्रचार किया कि कांग्रेस नक्सलियों के जंजाल में फंस गयी है । फिर उसके बाद बारी-बारी से भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि कांग्रेस की नक्सलियों से मिलीभगत है, जो युवाओं को गुमराह कर रहे हैं । 2018 में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश दोनों ही राज्यों में विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान इन जुमलों का प्रचार किया गया । उस वक्त गृहमंत्री राजनाथ सिंह और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ कांग्रेस,नक्सल मिलीभगत का झंडा उठाए चल रहे थे । नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ के मतदाताओं ने कांग्रेस को ही लाना बेहतर समझा और रमन सिंह के नेतृत्ववाली भाजपा सरकार सत्ता से बाहर हो गयी । मध्य प्रदेश में भी शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्ववाली भाजपा सरकार बनाने का दावा करने लायक सीटें जीत नहीं पायी । 2021 में कांग्रेस को फोड़कर फिर शिवराज सिंह चौहान सत्ता में लौटे । अभी भाजपा के लिए सबसे ज्यादा मुश्किल मध्य प्रदेश में सत्ता में बने रहने के प्रयासों में हो रही है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के अन्य नेता छत्तीसगढ़ भी जाएंगे ही । कांग्रेस,नक्सल मिलीभगत जुमले का ही ज्यादा प्रचार चुनावी सभाओं में करेंगे, इसका संदेश प्रधानमंत्री ने स्वयं भोपाल से भिजवा दिया है । नरेंद्र मोदी ने गत 25 सितंबर को भोपाल में कांग्रेस,नक्सल वाले अपने नजरिए का खुलासा फिर से किया, उस पर कांग्रेस के किसी वरिष्ठ नेता ने कोई टिप्पणी नहीं की । महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले की प्रतिक्रिया आयीहै जिन्होंने प्रधानमंत्री के दलितों के कथित नक्सल कहने पर एतराज किया है । नाना पटोले ने प्रधानमंत्री पर जुबानी हमला करते हुए इस बयान पर निशाना साधा है कि कांग्रेस को अर्बन नक्सल चला रहे हैं । कांग्रेस नेता ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा - ‘प्रधानमंत्री ने दलितों को नक्सल करार दिया और उनके खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों को आतंकवादी, नक्सल और खालिस्तानी घोषित कर दिया । अगर 800 मिलियन किसान नक्सल हैं, जिन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाया, फिर तो वे खुद भी नक्सली हैं’ प्रधानमंत्री की सियासी लाभवाली इस परिभाषा का ओर-छोर ये है कि हमेशा से दबे-कुचले सामाजिक पहचान से वंचित दलित,आदिवासी इलाके में नक्सलियों की पैठ गहराई तक है । गुजरात चुनाव के दौरान भी 2022 में प्रधानमंत्री ने कांग्रेस के साथ-साथ आम आदमी पार्टी प्रमुख दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ भी इस जुमले का इस्तेमाल उस समय किया, जब केजरीवाल आदिवासी इलाके में चुनाव रैली करने पहुंचे । उस समय प्रधानमंत्री ने अपने गृह राज्य के मतदाताओं को सचेत करते हुए कहा - ‘समाज को गुमराह करनेवाले भेष बदलकर नक्सली रास्ते पर ले जाने का प्रलोभन दे रहे हैं’ छत्तीसगढ़ के बाद दूसरा राज्य झारखंड है, जहां दलित,आदिवासी वोट निर्णायक होता है । अभी इन्हीं दोनों राज्यों में नक्सली कमजोर नहीं पड़े हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों के लिए चुनौती बने हुए हैं । छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल शायद तब प्रतिक्रिया दें, जब प्रधानमंत्री वहां जाकर कुछ बोलें । इसकी बारीकी में जाने के लिए छत्तीसगढ़ में 2013 की बहुविवादित और बहुप्रचारित वारदात याद रखना जरूरी है, जब वहां भाजपा की सरकार थी । मई, 2013 में झीरम घाटी इलाके में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की रैली में हुए हमले में छत्तीसगढ़ के सारे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता समेत 29 लोग मारे गए और अमूमन उतने ही गंभीर रूप से घायल हुए । राज्य सरकार ने उसे नक्सली हमला करार दिया और जांच कमिटी भी बनायी । जांच कमिटी की रिपोर्ट आज तक सामने नहीं आयी । 2018 में सत्ता में आयी कांग्रेस सरकार ने एक रिटायर हाईकोर्ट जज की अध्यक्षता में फिर से जांच आयोग गठित किया । राज्य सरकार ने राज्यपाल पर उस रिपोर्ट को दबाने का आरोप लगाया । इतना पता चल पाया कि कांग्रेस रैली के दौरान तैनात किए गए ज्यादातर पुलिसकर्मी वही थे, जो नक्सल गिरफ्तार वाले इलाके में युवकों को हथियार देकर नक्सलियों के खिलाफ खड़ा करनेवाले भाजपा सरकार के सलवा जुडूम अभियान के तहत पुलिसकर्मी बनाए गए थे ।

छत्तीसगढ़ की तरह झारखंड में भी भाजपा नेता कांग्रेस और झारखंड मुक्ति मोर्चा का लिंक नक्सली से जोड़ते हैं, जिनकी गठजोड़ सरकार झारखंड में चल रही है ।

झारखंड में 2024 में चुनाव होना है । छत्तीसगढ़ और झारखंड दोनों राज्य वर्ष 2000 में बने हैं, जब केंद्र में भाजपा गठजोड़ सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे । संयोग कुछ ऐसा रहा कि झारखंड में भाजपा और उसकी काट में झारखंड मुक्ति मोर्चा कांग्रेस की सरकार सत्ता में लगातार दूसरी बार नहीं लौटी । लेकिन छत्तीसगढ़ में भाजपा 15 साल लगातार सत्ता में रही ।

आदिवासी बहुल आबादी वाला राज्य ओडिशा भी नक्सल प्रभावित राज्यों की सूची में है, लेकिन वहां कुल मिलाकर स्थिति नियंत्रण में है । ओडिशा में जन्मी आदिवासी द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाने का कितना चुनाव लाभ नरेंद्र मोदी को मिल पाएगा, यह तो आनेवाला कल बताएगा । द्रौपदी मुर्मू का ताल्लुक झारखंड से भी रहा है, जहां की राज्यपाल रह चुकी हैं । ओडिशा में भी 2024 में चुनाव है ।

कांग्रेस को अर्बन नक्सल से जोड़ने का जुमला 01 जनवरी, 2018 से शुरू हुआ है, जब महाराष्ट्र में भीमा कोरेगांव हिंसा का मामला सामने आया । भाजपा की नीतियों से सहमति नहीं रखनेवाले जानेमाने लेखक, प्रोफेसर, वकील, सामाजिक कार्यकर्ताओं को कथित रूप से भड़काऊ भाषण देने के आरोप में उनका ताल्लुक नक्सली गुट सीपीआई(माओवादी) से जोड़कर उनके खिलाफ यूएपीए(गैर कानूनी गतिविधियां रोक एक्ट) 1967 की धाराएं लगाकर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया गया ।

इनके मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंपी गयी । पुणे की स्थानीय अदालत से लेकर बंबई हाईकोर्ट तक इन देशद्रोहियों की जमानत अर्जी खारिज हो गयी । मामला सुप्रीम कोर्ट में गया । सुप्रीम कोर्ट में इन अभियुक्तों की ओर से कांग्रेस नेता और वकील अभिषेक मनु संघवी खड़े हुए । सुप्रीम कोर्ट जज ने तल्ख टिप्पणी की. ‘प्रेशर कूकर को अगर दबाया गया तो बर्स्ट कर जाएगा, लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आवाज दबाने के परिणाम का ख्याल रखा जाए ।’ कांग्रेस नेताओं की इन कथित माओवादी विचारकों के प्रति हमदर्दी थी और आज भी है । अभी तक इन बुद्धिजीवियों को सुप्रीम कोर्ट से भी कोई खास राहत नहीं मिली है ।