छत्तीसगढ़ के नक्सली किला बीजापुर में 22 जवानों के नक्सल हमले में मारे जाने के बाद केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा और इस हमले का ‘मुंहतोड़ जवाब’ दिया जाएगा । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसी से मिलता-जुलता बयान दिया और शहीद जवानों के शोकसंतप्त परिवारजनों को सांत्वना दी कि इस सदमे में पूरा देश उनके साथ है ।

छत्तीसगढ़ के पुराने नक्सल प्रभावित बस्तर क्षेत्र की दंतेवाड़ा - सुकमा- बीजापुर धुरी पर ऐसी वारदातें कोई नई बात नहीं है । नक्सलियों का सबसे मजबूत किला माना जाने वाला इस इलाके में आए दिन मुठभेड़ होते रहते हैं । जैसा प्रायः होता है, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली में नक्सल सुरक्षा की समीक्षा की, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से बात की । फिर जवानों का हौसला बढ़ाने के लिए बदले की कार्रवाई अर्थात् ‘मुंहतोड़ / करारा जवाब’ देने लायक मारक क्षमता बढ़ाने पर बल दिया और फिर सबकुछ यथावत् चलता छोड़ दिया । अब अगले हमले(मुठभेड़) तक के लिए पल्ला झाड़ लिया । सुरक्षा बलों के जवान ऐसी स्थिति देखने-सुनने के आदी हो गए हैं । यह सांत्वना और ‘मुंहतोड़ जवाब’ के लिए जोश दिलाना, सिर्फ झाड़फूंक खानापूरी मात्र रह गयी है । ऐसे अवसरों के लिए उपयुक्त बयानों के जुमले प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के पास तैयार रहते हैं । हमले/मुठभेड़ के बाद के एक्शन के लिए समय निकाल लेते हैं । अमूमन सामान्य सी बन चुकी छत्तीसगढ़ की ऐसी वारदातें सरकार में शीर्ष पदों पर बैठे व्यक्तियों को विचलित नहीं करती । जबकि नक्सल सफाया अभियान में दोनों पक्षों में बेकसूर गरीब परिवार के लोग मारे जाते हैं ।

लेकिन अभी जैसे समय में बीजापुर में हमला हुआ, उसके लिए केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार तैयार नहीं थी । क्योंकि बड़ी मुश्किल से नक्सली से ज्यादा महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रतिद्वंदी सफाया अभियान बीच में ही छोड़कर गृहमंत्री को सुरक्षा समीक्षा बैठक के लिए दिल्ली आना पड़ा । शहीद जवानों की मातमपुर्सी के लिए छत्तीसगढ़ जाना पड़ा ।

4 अप्रैल को जब छत्तीसगढ़ के बीजापुर जंगल से माओवादियों के हाथों मारे गए 22 जवानों के शव मिलने की खबर फैली, उस समय केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सरकार का सफाया करने के लिए ताबड़तोड़ चुनाव प्रचार अभियान में जुटे थे । मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) को हर हाल में सत्ता से हटाने को ‘प्रतिष्ठा का प्रश्न’ बना चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी धुंआधार चुनाव रैलियां संबोधित कर रहे थे । उन्हें भी बीच में बयान बदलना पड़ा । गृहमंत्री को भी मुख्य राजनीतिक अभियान छोड़कर नक्सलियों को ‘उपयुक्त समय पर माकूल / मुंहतोड़ जवाब’ देनेवाला सुरक्षा समीक्षा बैठक बयान जारी करने दिल्ली आना पड़ा । उसके बाद प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों तृणमूल को ‘निर्मूल’ अभियान में बंगाल में व्यस्त हो गए, जहां मतदान का दौर जारी है । उनके लिए नक्सल स्टोरी खतम, क्योंकि अभी असली लक्ष्य है तृणमूल खतम करना ।

लेकिन बीजापुर की स्टोरी चल रही है । हमले के दिन से जो सूचनाएं आ रही हैं, उससे पहले के नक्सल हमले से अलग टाईप मामला बन गया है । सारी जानकारी पुलिस और सुरक्षा बल अधिकारियों के हवाले से ही बाहर आयी हैं । लेकिन सबमें इतने विरोधाभास हैं कि इस वारदात से जुड़े सारे पहलू सवालों के घेरे में हैं । पहली बात तो यह मुठभेड़ नहीं, सुरक्षा टुकड़ियों पर तितरफा हमला है । अधिकारियों ने पहले इसे मुठभेड़ बताया, लेकिन जवानों की लाशें मिलने के बाद बयान बदला और फिर बदलता ही चला गया । इससे सबसे पहले तो जवानों में अपने ही साथियों और अधिकारियों की संवेदनहीनता और उपेक्षापूर्ण रवैए को लेकर असंतोष व्याप्त है ।

3 अप्रैल को पहली खबर आयी कि बीजापुर के घने जंगल में नक्सलियों के साथ तीन घंटे चली मुठभेड़ में पांच जवान मारे गए । पुलिस अधिकारियों के अनुसार दो दर्जन से ज्यादा गंभीर रूप से घायल हुए, जिनमें सात की हालत चिंताजनक थी । उन्हें विमान से राजधानी रायपुर ले जाया गया और अन्य घायलों को बीजापुर जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया ।

इस कथित मुठभेड़ में पुलिस ने नक्सलियों के हताहत होने के बारे में कहा कि एक महिला समेत दो नक्सली भी मारे गए । साथ में दूसरी खबर ये भी रायपुर से आयी कि बड़ी संख्या में नक्सली भी मुठभेड़ में मारे गए और माओवादी अपने साथियों की लाशें ट्रैक्टर-ट्रालियों में भरकर ले गए । तीन अप्रैल को पुलिस ने कई जवानों के लापता होने की जानकारी भी मीडियाकर्मियों को दी ।

मगर 4 अप्रैल को 22 जवानों के शव घटनास्थल से मिलने और सीआरपी की कोबरा बटालियन के एक जवान राकेश्वर सिंह मनहास के लापता होने की जानकारी अधिकारियों ने दी । लेकिन कथित ‘मुठभेड़’ में नक्सलियों के मारे जाने और उनके साथियों द्वारा ट्रैक्टर-ट्रालियों में भरकर लाशें ले जाने की बात अधिकारियों ने नहीं दुहरायी । उसी समय से स्टोरी का एंगल बदलना शुरू हो गया । खुफिया चूक और नक्सलियों की बदलती रणनीति के हिसाब से मोर्चाबंदी न बदलने का पुराना राग अलापा गया, जो हर विफलता के बाद दुहराया जाता है ।

बीजापुर सुकमा सीमा से सटे नारायणपुर में 23 मार्च को भी हमला हुआ, जिसमें नक्सलियों ने सुरक्षाबलों को लेकर जा रही एक भरी बस को बारूदी सुरंग विस्फोट कर उड़ा दिया, जिसमें पांच जवान मारे गए और 13 अन्य घायल हो गए । लेकिन 4 अप्रैल के हमले के समय की राजनीतिक परिस्थितियां कई मायने में पूर्व हमले से अलग थीं । 17 मार्च को माओवादियों की ओर से शांति वार्ता का प्रस्ताव भेजा था । प्रस्ताव में कहा गया था कि सरकार से बातचीत करने के लिए वे तैयार हैं, मगर कुछ शर्तें माननी होंगी । शर्तों में अर्द्धसैनिक बलों को हटाने, जेल में बंद उनके साथियों को रिहा करने और माओवादी संगठनों पर लगे प्रतिबंध हटाने की मांग शामिल थी । कहीं से भी पुष्टि नहीं हो पायी कि सरकार ने इस प्रस्ताव पर विचार किया अथवा नहीं । इसका मतलब नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटने और बातचीत के लिए आगे आने की बात यदा-कदा दुहरानेवाली सरकार ने इस प्रस्ताव को नक्सलियों का कमजोर पड़ना समझा । इसका जवाब 23 मार्च को नारायणपुर बस विस्फोट करके नक्सलियों ने दिया । वे अच्छी तरह जानते थे कि जवाबी कार्रवाई में सुरक्षा बलों को बड़ी संख्या में जुटकर धरपकड़ अभियान चलाने में तैनात किया जाएगा, जैसा हमेशा से होता आया हैं । इसका ‘मुंहतोड़’ जवाब देने के लिए नक्सलियों की मोर्चाबंदी तरकीब का काट सोचने के बजाए सुरक्षा बलों के जवान सरकारी बयानवाजी खानापूरी की तरह अपनी सरकारी ड्यूटी निभाने बड़ी टीम बनाकर निकले । जिस बीजापुर-सुकमा जंगल को सुरक्षा बल ही नक्सलियों का अंतिम गढ़ बताते हैं, उस इलाके में गश्ती अभियान के दौरान झोपड़ियां खाली और गांव निर्जन मिलने का कारण नक्सलियों का कमजोर पड़ना समझ लिया गया । नक्सली पहले भी ऐसा कर चुके हैं, तब भी सुरक्षा बल नहीं चेते ।

जवानों के धरपकड़ अभियान के दौरान गांववालों के साथ मिलकर नक्सलियों ने छोटी-छोटी टुकड़ियों में बंटकर तीन तरफ से घेराबंदी कर ली और घात लगाकर छिप गए । सुरक्षा बलों के जवान हारे-थके वापस अपने कैंप की ओर लौट रहे थे, उसी दौरान तीन तरीके से जवानों की टीम पर टूट पड़े । नक्सलियों ने एक साथ हल्के मशीनगन, नुकीले हथियार और देशी रॉकेट लांचर से हमला किया ।

नक्सलियों की चालाक रणनीति से सीख न लेकर सशस्त्र बलों ने माओवादियों को अपनी योजना को अंजाम देने में सहूलियत दी । अगर वे नक्सलियों की तरह छोटी-छोटी टुकड़ियों में बंटकर आपस में दूरी बनाकर चलते तो एक साथ इतनी जानें नहीं जाती ।

नक्सलियों ने पहले भी ऐसा किया है । जब सुरक्षा बल सघन धरपकड़ अभियान चलाकर सुस्ताने अपने कैंप की ओर लौटते हैं, उसी समय नक्सली हमले करते हैं । 2017 के मार्च में 12 और अप्रैल में 25 सीआरपी जवानों को बड़ी आसानी से नक्सलियों ने उसी समय मार दिया, जब वे कैंप में लौटकर खाना खाने/सुस्ताने बैठे ।

नक्सली ऐसे हमले गांववालों को साथ और विश्वास में लेकर करते है । छत्तीसगढ़ में नक्सल दमन का संचालन सीआरपी के हाथ में है, जिनको न तो गांववालों पर भरोसा है, न गांववाले उन पर भरोसा करते हैं ।

अपनी नाकामी और बौखलाहट छिपाने के लिए वे किसी को भी संदिग्ध नक्सली बताकर मुठभेड़ दिखा देते हैं, जो फर्जी साबित होने के बावजूद दोषी जवानों पर कार्रवाई नहीं होती । सीआरपी का राज्य पुलिस से भी समन्वय नहीं है ।

4 अप्रैल के हमले में मृतकों की संख्या चार साल में हुए हमले में सबसे ज्यादा है । इसमें नक्सलियों के अपने गांव-समाज के साथ समन्वय से सबक लिया जा सकता है । सुरक्षा बलों के धरपकड़ अभियान में जो झोपड़ियां बंद थी, उन्हीं झोपड़ियों में रहनेवाले लोग सैकड़ों की संख्या में उस समय मौजूद थे, जब नक्सलियों ने लापता घोषित कोबरा जवान राकेश्वर सिंह मनहास को पांच दिन बाद मुक्त किया । मध्यस्थता करनेवाले गणमान्य नागरिक सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार थे । नक्सलियों ने सीआरपी जवान को रिहा करने के वक्त वो शर्तें नहीं दुहरायी जो मार्च में शांति वार्ता का प्रस्ताव के साथ रखी थी । अधिकारियों ने मनहास के नक्सली कब्जे में होने की संभावना के बजाय मृत मान लिया ।

महाराष्ट्र से लेकर छत्तीसगढ़ तक नक्सलियों के बीच काम करनेवाले सामाजिक कार्यकर्ता ‘देशद्रोह’ के जुर्म में 2017 से जेल में हैं, जब नक्सलियों ने जवानों पर सुस्ताने के समय हमले का सबूत दिया ।

शुक्र है, नक्सल जन्मस्थली पश्चिम बंगाल चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह समेत किसी भाजपा नेता ने कांग्रेस पर माओवादियों से मिलीभगत होने का आरोप नहीं लगाया । 2018 में छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री, तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह और उस समय भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने हर चुनाव रैली में यही बात दुहरायी । 15 साल से चल रही भाजपा सरकार गिर गयी । अभी भूपेश बघेल के नेतृत्ववाली कांग्रेस सरकार के नक्सल दमन अभियान की समीक्षा नहीं होती । 2013 में भाजपा शासनकाल में छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में नक्सलियों के जबर्दस्त हमले में परिवर्तन रैली में शामिल समूचा कांग्रेस नेतृत्व समेत 30 से ज्यादा लोग और कार्यकर्ता मारे गए ।

ऐसी राजनीति सशस्त्र बलों की रणनीति कमजोर करती है । बस्तर क्षेत्र के लगभग सभी दलों के राजनीतिज्ञों को ठेकेदारी चलाने के लिए नक्सलियों को लेवी देनी होती है ।

पश्चिम बंगाल के नक्सल गढ़ जंगलमहल को दीदी ने उजाड़ दिया । वहां के घांसू नक्सली नेता छत्रधर महतो को 11 वर्ष जेल में रखा गया । फरवरी, 2020 में जेल से छूटने से पहले महतो समर्थक आदिवासियों ने 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा का साथ दिया । जवाब में भाजपा ने उनके समाज में फूट डालने का प्रयास किया । अभी छत्रधर महतो दीदी का समर्थन कर रहे हैं । जंगलमहल क्षेत्र में पश्चिम मिदनापुर, पुरूलिया, बांकुड़ा और झाड़ग्राम शामिल है ।