यह लेख आधार कार्ड की अनिवार्यता और उससे जुड़ी समस्याओं पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे सरकारी योजनाओं के लिए आधार को अनिवार्य करने से गरीबों को राशन जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित होना पड़ा, जिसके कारण झारखंड में एक बच्ची की भूख से मौत हो गई। सुप्रीम कोर्ट में आधार की संवैधानिक वैधता और निजता के अधिकार के उल्लंघन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर भी चर्चा की गई है, जिसमें सरकार के अड़ियल रवैये और अदालती कार्यवाही का उल्लेख है।
यह लेख भारत में विदेशी राष्ट्रीयता वाले व्यक्तियों, विशेषकर असम में डिटेंशन सेंटरों में फंसे लोगों की दुर्दशा पर केंद्रित है। यह सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों और केंद्र सरकार की प्रतिक्रियाओं की पड़ताल करता है, जिसमें मानवाधिकारों के उल्लंघन और निर्वासन प्रक्रिया में देरी पर प्रकाश डाला गया है। लेख अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय आप्रवासियों के निर्वासन के उदाहरण का उपयोग करते हुए भारत की प्रस्तावित नई आप्रवासी और विदेशी बिल, 2025 पर भी चर्चा करता है।
यह लेख असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NCR) के पहले मसौदे के प्रकाशन और उससे जुड़ी चुनौतियों पर केंद्रित है। इसमें बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण बिगड़े आबादी संतुलन, दशकों से चल रहे हिंसक आंदोलन, और नागरिकता पहचान की जटिल प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों की निष्क्रियता तथा राजनीतिकरण पर भी प्रकाश डाला गया है, खासकर हिंदू और मुस्लिम घुसपैठियों की पहचान को लेकर।
26 नवंबर 2021 को आयोजित संविधान दिवस समारोह राजनीतिक और न्यायिक मतभेद का मंच बन गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी दलों पर परिवारवाद और अवसरवादी राजनीति का आरोप लगाया, जबकि सुप्रीम कोर्ट के आयोजन में कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच टकराव खुलकर सामने आया। लेख में सरकार और न्यायपालिका के बीच बढ़ते तनाव और संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन पर प्रकाश डाला गया है।
सुप्रीम कोर्ट बिहार में निर्वाचन आयोग की विशेष गठन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रहा है, जहाँ लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। कोर्ट ने आयोग से हटाए गए नामों का विवरण और कारण स्पष्ट करने को कहा है, साथ ही मतदाताओं को अपील का उचित अवसर देने का निर्देश दिया है। यह विवाद आधार कार्ड को पहचान पत्र के रूप में मानने और नागरिकता से जुड़े घुसपैठिया अभियान तक फैला हुआ है, जिसके राष्ट्रीय प्रभाव हो सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के केंद्र सरकार के फैसले की संवैधानिकता पर विचार कर रहा है, जिसकी सुनवाई 2 अगस्त 2023 से रोजाना होनी है। यह लेख इस सुनवाई के जम्मू-कश्मीर और राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ने वाले संभावित राजनीतिक प्रभावों का विश्लेषण करता है, खासकर आगामी लोकसभा और स्थानीय चुनावों के संदर्भ में। इसमें कश्मीरी राजनीतिक दलों की बदलती रणनीति और उनकी चुनाव में भागीदारी पर भी चर्चा की गई है।
यह लेख सुप्रीम कोर्ट की 'जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद है' टिप्पणी पर केंद्रित है, जो मनीष सिसोदिया और अरविंद केजरीवाल जैसे राजनीतिक नेताओं को जमानत मिलने के बाद चर्चा में आई। इसमें निचली अदालतों और हाईकोर्ट द्वारा इस सिद्धांत के असंगत अनुप्रयोग, विशेषकर गैर-राजनीतिक अभियुक्तों और UAPA/PMLA मामलों में, की आलोचना की गई है। लेख केंद्रीय एजेंसियों के कथित राजनीतिक दुरुपयोग, न्यायपालिका के भीतर सामंजस्य की कमी और केंद्र सरकार के साथ टकराव जैसे मुद्दों पर भी प्रकाश डालता है।
यह लेख न्यायपालिका की पारदर्शिता और संयम पर केंद्रित है, जिसमें प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने की सिफारिश और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा न्यायपालिका पर संसद की सर्वोच्चता के बयानों का उल्लेख है। इसमें राज्यपालों के बिलों को मंजूरी देने की समय-सीमा और वक्फ एक्ट से जुड़े विवादों पर भी चर्चा की गई है, साथ ही भावी सीजेआई बी.आर. गवई के संविधान की सर्वोच्चता पर विचारों को भी प्रस्तुत किया गया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीफ जस्टिस एन. वी. रमना के बीच एक सम्मेलन में न्यायपालिका और कार्यपालिका के रिश्तों में तनाव उजागर हुआ। दोनों ने एक-दूसरे पर लंबित मुकदमों के लिए जिम्मेदारी डाली, जिसमें प्रधानमंत्री ने अदालतों को और चीफ जस्टिस ने सरकारों को दोषी ठहराया। लेख देशद्रोह कानून और अनुच्छेद 370 जैसे विवादास्पद मामलों में सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच बढ़ते टकराव को भी दर्शाता है।
यह लेख न्यायपालिका और सरकार के बीच बढ़ते टकराव पर केंद्रित है, विशेषकर सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम द्वारा जजों की नियुक्ति, पेगासस जासूसी विवाद, धनबाद के जज की हत्या, और विभिन्न हाईकोर्टों के महत्वपूर्ण फैसलों के संदर्भ में। इसमें केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के साथ न्यायपालिका के मतभेदों को उजागर किया गया है, जिसमें सीबीआई की स्वायत्तता और विधायकों के विशेषाधिकार जैसे मुद्दे शामिल हैं।
यह लेख पटना हाईकोर्ट के जस्टिस राकेश कुमार द्वारा न्यायपालिका में भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ की गई टिप्पणियों और उसके बाद की घटनाओं पर केंद्रित है। जस्टिस कुमार के आदेश को विशेष पीठ द्वारा निलंबित कर दिया गया और उनके न्यायिक कार्य वापस ले लिए गए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उन्हें बहाल कर दिया गया। यह घटना न्यायपालिका की गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आंतरिक भ्रष्टाचार के मुद्दे पर गंभीर सवाल उठाती है।
यह लेख सुप्रीम कोर्ट में लंबित राजनीतिक मामलों और जजों की कमी के मुद्दे पर केंद्रित है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने प्रधानमंत्री को जजों की संख्या बढ़ाने के लिए पत्र लिखा, जिसके जवाब में मंत्रिमंडल ने संविधान संशोधन का फैसला किया। हालांकि, लेख का तर्क है कि विधायिका और कार्यपालिका के राजनीतिक हित वाले मामले कोर्ट का अधिकांश समय बर्बाद करते हैं, जिससे न्याय में देरी होती है और लंबित मुकदमों की संख्या बढ़ती है।
यह लेख पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के राज्यसभा मनोनयन पर केंद्रित है, जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा पर सवाल उठाता है। इसमें गोगोई के विवादास्पद कार्यकाल, उनके पूर्व के विचारों और सरकार के अनुकूल दिए गए फैसलों का उल्लेख है। लेख में यह भी बताया गया है कि कैसे सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अनुच्छेद 142 का उपयोग करके मणिपुर के एक मंत्री को अयोग्य घोषित किया, जबकि गोगोई ने विधायिका में पद स्वीकार किया।
यह लेख सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच कॉलेजियम प्रणाली को लेकर चल रहे विवाद पर केंद्रित है। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) अधिनियम को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने पर संसद में चर्चा न होने को गंभीर बताया, जिससे यह विवाद और गहरा गया। लेख में इस मुद्दे पर विभिन्न हितधारकों, जैसे मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़, कानून मंत्री किरण रिजिजू और अन्य जजों के विचारों को भी शामिल किया गया है।
यह लेख राष्ट्रीय कानून दिवस 2017 के अवसर पर न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका के बीच शक्ति संतुलन के संकट पर प्रकाश डालता है। इसमें न्यायिक नियुक्तियों को लेकर सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच चल रहे टकराव, विशेषकर एनजेएसी और एमओपी के मुद्दों पर चर्चा की गई है। वित्त मंत्री और कानून मंत्री ने सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की, जबकि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने संतुलन बनाए रखने का आह्वान किया।
यह लेख मणिपुर विधानसभा स्पीकर वाई. खेमचंद और सुप्रीम कोर्ट के बीच दलबदल कानून के तहत कांग्रेस विधायकों को अयोग्य ठहराने के मामले में चल रहे गतिरोध पर केंद्रित है। स्पीकर ने सुप्रीम कोर्ट की डेडलाइन के बावजूद सात कांग्रेस विधायकों को अयोग्य घोषित करने का फैसला टाल दिया, जिससे राज्य में भाजपा सरकार की स्थिरता पर सवाल उठ गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही वन मंत्री श्याम कुमार सिंह को अयोग्य घोषित करने का आदेश दिया था और संसद को दलबदल मामलों के लिए एक स्थायी ट्रिब्यूनल बनाने का सुझाव दिया है।
यह लेख महाराष्ट्र के गढ़चिरौली मुठभेड़ और बिहार के गया में नक्सली हत्याओं की हालिया घटनाओं पर प्रकाश डालता है, साथ ही छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में नक्सली हमलों/मुठभेड़ों की न्यायिक जांच रिपोर्टों पर चल रहे विवादों की पड़ताल करता है। इसमें 2013 के एडेसमेट्टा मुठभेड़ (जिसे फर्जी बताया गया) और झीरम घाटी हमले की जांच रिपोर्टों पर राजनीतिक खींचतान का उल्लेख है। लेखक नक्सल दमन नीति की आलोचना करते हुए शांति वार्ता और सुरक्षा बलों के तनाव जैसे मुद्दों पर विचार करने का सुझाव देता है।
पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव में स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान को लेकर ममता बनर्जी सरकार और राज्यपाल के बीच फिर तनातनी हुई। हिंसा के इतिहास को देखते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती का आदेश देना पड़ा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर आरोप है कि वे विपक्षी दलों को चुनाव लड़ने से रोकने और तृणमूल कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करने के लिए हिंसा का सहारा लेती हैं।