संविधान कानून की दुहाई के नाम पर आयोजित 26 नवंबर का संविधान दिवस कुल मिलाकर राजनीतिक और न्यायिक मतभेद का सरकारी समारोह साबित हुआ । संसद भवन के सेंट्रल हॉल में आयोजित इस समारोह के संबोधन भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुहाई तो ‘राष्ट्र और राष्ट्रवाद प्रथम’ की दी, मगर उनका फोकस उस मंच को बायकाट करनेवाले विपक्षी दलों पर था । संविधान और कानून की मर्यादा की जगह प्रधानमंत्री का भाषण मुख्य रूप से उन्हीं विपक्षी पार्टियों पर केंद्रित रहा, जिन्होंने उस समारोह से अलग रहने का फैसला पहले ही कर लिया था । प्रधानमंत्री ने कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और द्रमुक पार्टियों पर परिवारवाद की और तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी तथा वामदलों पर अवसरवादी राजनीति करने का आरोप लगाया । नरेंद्र मोदी ने जोर देकर कहा कि ‘यह समारोह किसी सरकार, किसी राजनीतिक दल या किसी धर्म या समुदाय का नहीं, देश का है, इसलिए इस मंच को राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए ।’ लेकिन प्रधानमंत्री ने स्वयं अपने राजनीतिक मतभेद का माध्यम संविधान दिवस समारोह को बना दिया । नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस और टीएमसी(तृणमूल कांग्रेस) पर विशेष ‘बायकाट’ प्रहार किया । बायकाट के लिए कांग्रेस ने विपक्ष को एकजुट किया था ।

संविधान दिवस का दूसरा आयोजन सुप्रीम कोर्ट की आरे से विज्ञान भवन में था, जहां न्यायपालिका से सरकार का टकराव पर फोकस रहा । सुप्रीम कोर्ट की ओर से संविधान दिवस समारोह का आयोजन हर साल होता है । उसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और केंद्रीय कानून मंत्री तो हमेशा होते हैं । लेकिन इस बार सुप्रीम कोर्ट द्वारा आयोजित दो दिवसीय संविधान दिवस समारोह में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद दोनों ही शामिल हुए । पहले दिन 26 नवंबर को चीफ जस्टिस एन. वी. रमना के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे । और 27 नवंबर को समापन/दीक्षांत समारोह को राष्ट्रपति ने संबोधित किया । दोनों ही दिन सरकार और सुप्रीम कोर्ट का मतभेद खुलकर सामने आया । दोनों ही संवैधानिक संस्थाओं. कार्यपालिका और न्यायपालिका ने एक.दूसरे पर असहयोग के आरोप लगाए । सुप्रीम कोर्ट द्वारा आयोजित संविधान/कानून दिवस समारोह में कार्यपालिका(सरकार) और न्यायपालिका द्वारा एक.दूसरे की आलोचना कोई नयी बात नहीं है । लगभग हर साल यह देखने को मिलता है । लेकिन इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कुछ ज्यादा ही आक्रामक थे । 72वें संविधान दिवस समारोह पर प्रधानमंत्री ने संविधान निर्माताओं की भावना और मर्यादा का पालन न करने के लिए विपक्ष को कोसा तथा अपनी पार्टी की सियासी राजनीति के सारे मुद्दे उठाए । संविधान दिवस समारोह के सरकारी आयोजन का सिलसिला नरेंद्र मोदी का ही शुरू किया हुआ है । 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद 2015 से नरेंद्र मोदी ने संविधान दिवस मनाना शुरू किया है, जहां से भाजपा गठजोड़ का राजनीतिक मंच का संदेश जाता है ।

लोकसभा सचिवालय और स्पीकर ओम बिड़ला की ओर से संसद भवन में आयोजित संविधान दिवस समारोह में बिखरा हुआ विपक्ष साफ नजर आया । इससे सरकार ने संतोष की सांस ली होगी । क्योंकि तीन दिन बाद संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होनेवाला था । स्पीकर ओम बिड़ला ने भी प्रधानमंत्री के लहजे में कहा कि संसद के गैर.दलीय कार्यक्रमों से विपक्ष का अलग रहना लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छा नहीं है । ओम बिड़ला ने कहा. ‘लोकसभा के पीठासीन अधिकारी के रूप में मुझे इस बात से गहरा धक्का लगा कि कई राजनीतिक पार्टियों ने संविधान दिवस समारोह का बायकाट किया ।’

बायकाट करनेवाले विपक्षी दलों ने सरकार पर संवैधानिक मूल्यों के अनादर और संसदीय लोकतंत्र की उपेक्षा का आरोप लगाया ।

संसद भवन वाले समारोह में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठजोड़ के घटक दलों के अलावे बीजू जनता दल, वाईएसआर कांग्रेस, तेलंगाना राष्ट्र समिति और तेलुगू देसम पार्टी के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया । इसमें राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू भी बोले । जनवरी में संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति के संबोधन भाषण का भी विपक्ष ने बायकाट किया ।

29 नवंबर से शुरू संसद के शीतकालीन सत्र में मानसून सत्र से ज्यादा गर्मी संभावित थी । क्योंकि तीनों कृषि कानून वापस नहीं लेने के अड़ियल रवैए से सरकार की पीछे हटने के कारण विपक्ष के तेवर में उफान है । इसका सेमी. फाइनल सत्र शुरू होने से पहले अमूमन संविधान दिवस समारोह में ही हो गया । संसद भवन वाले समारोह का विपक्षी दलों द्वारा बायकाट करना प्रधानमंत्री से ज्यादा लोकसभा स्पीकर को अखरा । संविधान दिवस समारोह को गैर.दलीय आयोजन बताकर विपक्ष पर हमला करनेवाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद सत्र शुरू होने से पहले बुलायी जानेवाली सर्वदलीय बैठक में हिस्सा नहीं लिया । यह तरीका विपक्ष को अखरा । परंपरा के अनुसार संसद के हर सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक बुलायी जाती है । जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं और विपक्ष से सत्र चलाने के लिए सहयोग मांगा जाता है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 28 नवंबर को आयोजित सर्वदलीय बैठक में शामिल नहीं हुए । बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की । 31 दलों ने इस बैठक में हिस्सा लिया, भाजपा सुप्रीमो नरेंद्र मोदी को छोड़कर । तृणमूल कांग्रेस भी शामिल नहीं हुई और कांग्रेस की ओर से संसद में साझा रणनीति तैयार करने के लिए आयोजित विपक्ष की बैठक का भी तृणमूल कांग्रेस ने बायकाट किया ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुप्रीम कोर्ट में आयोजित संविधान दिवस समारोह में जो कुछ कहा, वो सिर्फ कार्यपालिका और न्यायपालिका में टकराव का मामला नहीं था । प्रधानमंत्री ने सीधे सुप्रीम कोर्ट पर हमला करते हुए सरकार के हालिया फैसलों के खिलाफ जनहित याचिकाओं पर शीर्ष कोर्ट में चल रही सुनवाई और कई फैसलों पर रोक को विकास प्रोजेक्टों में अड़ंगा लगानेवाला बताया । उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को आगाह किया कि उपनिवेशवादी मानसिकता को समझे । प्रधानमंत्री ने कहा कि इसकी आड़ में विकास प्रोजेक्टों को लटकानेवाली याचिकाओं को तवज्जो नहीं दें ।

प्रधानमंत्री की रही.सही कमी उनके अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल ने पूरी कर दी । उन्होंने कहा कि संविधान अपनाने के 72वें वर्ष में भी जब सुप्रीम कोर्ट को देखते हैं तो पाते हैं कि शीर्ष कोर्ट हाईकोर्टों के हर फैसले के खिलाफ अपीलों को सुनती हैं । ऐसे में 2008 से लंबित आपराधिक और 2009 से लंबित दीवानी मामलों की अपीलें कब निबटायी जाएंगी । सरकार के अनुसार तो राजनीतिक विरोधियों को ‘देशद्रोह’ के मुकदमे में फंसाने के खिलाफ दायर याचिकाओं की सुनवाई और उस पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रूख भी ‘विपक्ष कार्य’ के बाधक है । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस एन. वी. रमना ने रक्षात्मक जवाब में कहा कि अदालतें जब भी न्यायिक हस्तक्षेप करती हैं तो यह सरकार को जगाने के लिए किया जाता है, न कि उसकी भूमिका को हड़पने यानी शक्तियां लेने के लिए । चीफ जस्टिस ने संविधान के तीनों अंगों के बीच खींची गयी लक्ष्मण रेखा को पवित्र बताया । लक्ष्मण रेखा का सबसे ज्यादा रावणी उल्लंघन करके भाजपा गठजोड़ सरकार ने अपवित्र किया है । सीबीआई निदेशक और सीवीसी प्रमुख के कार्यकाल पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय मानदंड की काट में सरकार ने हाल ही में अध्यादेश जारी किया है । कुछ दिन पहले न्यायिक ट्रिब्यूनलों पर भी सुप्रीम कोर्ट को नोटिस जारी करना पड़ा । सीबीआई वाले अध्यादेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई अभी होनी है । जस्टिस एन. वी. रमना ने जजों पर हमले और खासकर सोसल मीडिया के हमले पर चिंता जतायी ।

विज्ञान भवन में सुप्रीम कोर्ट वाले समारोह के दूसरे दिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जजों से कहा कि वे कोर्ट में क्या बोलते हैं, इसके प्रति सचेत रहे । इसके लिए उन्होंने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट जजों का हवाला दिया ।

चीफ जस्टिस ने सरकार को चेताया कि कानूनों के असर का अध्ययन किए बगैर ही विधायिका कानून पारित कर रही है, जो एक बड़ी समस्या बननेवाली है । उन्होंने चेक बाउंसिंग(धारा 138) का उदाहरण दिया । संसद ने निगोशिएबल इंस्ट्रुमेंट एक्ट को आपराधिक बना दिया, लेकिन यह नहीं देखा कि इससे मजिस्ट्रेट अदालतें बेहद दबाव में आ गयी हैं ।

तीनों कृषि कानूनों के कार्यान्वयन पर किसान आंदोलन के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा रखी थी । सरकार आंदोलन खतम कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट से मदद मांगने गयी । सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विरोध, आंदोलन के अधिकार पर रोक नहीं लगायी जा सकती । अब कृषि कानून वापस लेने के सरकार के फैसले के बाद किसान आंदोलन पर शीर्ष कोर्ट 7 दिसंबर को सुनवाई करेगी ।

धारा.370 खतम करनेवाला जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन कानून, 2019 के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक सुनवाई शुरू नहीं की है । इसका कारण टकराव टालना हो सकता है । 2019 में संविधान दिवस की 70वीं वर्षगांठ पर आयोजित संसद के दोनों सदनों के विशेष संयुक्त अधिवेशन के राष्ट्रपति संबोधन का विपक्षी दलों ने 05/08/2019 को मानसून सत्र में पास उस बिल के कारण बायकाट किया ।