पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव पर संदेह का मामला इस बार फिर ममता बनर्जी सरकार तथा राज्यपाल के बीच तनातनी का कारण बना । बात इतनी आगे बढ़ गयी कलकत्ता हाईकोर्ट से भी बनी नहीं और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को शांतिपूर्वक चुनाव संपन्न कराने के लिए भारी तादात में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती पर मुहर लगानी पड़ी । पश्चिम बंगाल में हिंसा कोई नयी बात नहीं है । पंचायत से लेकर विधान सभा और लोक सभा चुनाव समेत नगरपालिका तक कोई भी निर्वाचन प्रक्रिया बिना हिंसा के संपन्न नहीं होती । तृणमूल कांग्रेस के 2011 में सत्ता में आने के बाद से इसमें पहले की अपेक्षा ज्यादा इजाफा हुआ है । हिंसा के अलावे जिस बात को लेकर ज्यादा विवाद खड़ा होता है, वो है हालात बेकाबू होने की स्थिति में राज्यपाल के हस्तक्षेप पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (दीदी) का बिफरना । किसी भी चुनाव में शांति बनाए रखने के लिए केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो और मुख्यमंत्री दीदी को अखर जाती है । उम्मीदवारों और वोटरों की सुरक्षा के लिए राज्यपाल के हस्तक्षेप को दीदी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से जोड़ती है । इसे सियासी राजनीति का रंग देकर दीदी ऐसा चुनाव चाहती हैं, जिसमें उनके कोई विरोधी या तो पर्चे भर नहीं पाएं अथवा भरें भी तो जीत नहीं पाएं । खासकर पंचायत चुनाव में सिर्फ तृणमूल कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करके दीदी यह दिखाना चाहती हैं कि जमीनी स्तर तक किसी भी पार्टी की पहुंच नहीं है और अपने उखड़े पैर रखने की जगह खोजने के लिए हिंसा को सभी दल मुद्दा बनाते हैं ।
इस मामले को लेकर विवाद ने इतना तूल पकड़ा, जैसा पहले देखने को नहीं मिला था । 08 जुलाई को पंचायत चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे । चुनाव कार्यक्रम के एलान से लेकर पर्चे दायर करने और वापस लेने की तारीख के बाद भी हिंसा बदस्तूर जारी रही । इसमें एक साथ राज्य सरकार, राज्यपाल कार्यालय, कलकत्ता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव की नौबत आ गयी ।
अभी भी इस पर संशय बना हुआ है कि मतदान शांतिपूर्वक संपन्न हो पाएगा और वोटर निडर होकर अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर पाएंगे । मामला विवादास्पद बनकर दो कारणों से सुर्खियों में आया । एक, चुनाव अधिसूचना जारी होने के 10 दिन बाद राजभवन में एक कंट्रोल रूम स्थापित किया गया । दो, राज्य चुनाव आयोग ने सरकार के एक कार्यालय की भूमिका निभायी । जबकि स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्वक मतदान राज्य चुनाव उपायुक्त की जिम्मेदारी है । उनसे यह उम्मीद नहीं की जाती कि वे राज्य सरकार का पक्ष रखने के लिए राजभवन, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाएं ।
राजनीतिक माहौल पहले से ही गरम था । क्योंकि पश्चिम बंगाल की सियासी राजनीति कई अन्य राज्यों से भिन्न है । यहां भाजपा, कांग्रेस और वामदल तीनों सत्तारूढ़़ तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ एक साथ विपक्ष में हैं । इसलिए यह पंचायत चुनाव दिलचस्प हो गया है । भाजपा के खिलाफ चल रही विपक्षी एका कवायद पर भी इसका असर पड़ा है और आगे भी इसकी संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता । जद(यू) नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बुलावे पर पटना में 23 जून को हुई पहली विपक्षी एका बैठक में भाग लेने पहुंचे 15 दलों के गैर.भाजपा नेताओं में तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी भी शामिल थी । वहां दीदी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के साथ मंच साझा किया । कोलकाता लौटकर 26 जून को कूच बेहार में एक जनसभा को संबोधित करते हुए ममता बनर्जी वामदल, भाजपा और कांग्रेस पर बरसी । पटना में आयोजित ‘माहज्योत’ गठजोड़ प्रयासों पर तंज कसते हुए दीदी ने इसे ‘महोघात’ का नाम देते हुए कहा कि बंगाल में कांग्रेस, भाजपा और वाम एक हैं । दीदी ने कहा कि ‘दिल्ली और पटना में भाजपा के ‘महाजोत’ गठजोड़ की हमारी कोशिश चल रही है, पश्चिम बंगाल में भाजपा, कांग्रेस और वामदल ने मेरे खिलाफ गठजोड़ बनाया हुआ है ।’ उन्होंने इसे ‘रामए वाम और श्याम’ का तंज नाम दिया । अभी फिर 13.14 जुलाई को कांग्रेस की अगुवाई में बेंगलुरू में विपक्षी एका बैठक हो रही है । अगर कांग्रेस और वामदल को आशा के अनुकूल सीटें बंगाल पंचायत चुनाव में नहीं मिली तो खटास उभर सकती है । 20 जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा है । मणिपुर के साथ.साथ पश्चिम बंगाल हिंसा का मामला भी उठेगा । मई के पहले सप्ताह से मणिपुर जातीय हिंसा लगातार सुर्खियों में है । पश्चिम बंगाल में 08 जून को राज्य चुनाव आयोग द्वारा चुनाव अधिसूचना जारी किए जाने के दिन से हिंसा और तृणमूल कांग्रेस द्वारा गड़बड़ी की संभावना चर्चा में है । 08 जून को ही भाजपा नेता शुभेन्दु अधिकारी और कांग्रेस नेता सांसद अधीर रंजन चौधुरी ने कलकता हाईकोर्ट में अलग.अलग याचिकाएं दायर की । शुभेन्दु अधिकारी राज्य विधान सभा में विपक्ष के नेता हैं, जिन्होंने ममता बनर्जी को 2021 विधान सभा चुनाव में हराया । अधिकारी और अधीर रंजन चौधुरी दोनों ने ही अपनी याचिकाओं में 2018 पंचायत चुनाव में हुई हिंसा के उदाहरण गिनाए । उस पिछले पंचायत चुनाव में कई क्षेत्रों में विपक्षी उम्मीदवार अपने पर्चे दाखिल नहीं कर पाए । 2021 विधान सभा चुनाव पर भी हिंसा हावी रही । कांग्रेस और भाजपा दोनों नेताओं ने हाईकोर्ट को बताया कि आगामी पंचायत चुनाव के पहले से ही राज्य पोषित हिंसा और भय का माहौल बना हुआ है । यह प्रक्रिया कथित रूप से प्रायोजित है, क्योंकि अधिसूचना जारी करने और मतदान की तारीख में मात्र एक महीने का अंतर है । पर्चे दाखिल करने, नाम वापस लेने और 8 जुलाई को मतदान की तारीख निश्चित करने से पहले सीमित समय पर विचार नहीं किया गया । अधीर रंजन चौधरी ने अपनी याचिका में कलकत्ता हाईकोर्ट को ध्यान दिलाते हुए कहा कि राज्य चुनाव आयोग ने बेहद जल्दीबाजी में काम किया । 08.06.2023 को चुनाव तारीख की प्रेस नोट जारी होती है और उसी दिन राज्य सरकार की ओर से अधिसूचना जारी की जाती है, जिसके अनुसार पर्चे सिर्फ 09 जून से 15 जून तक भरे जा सकते हैं । 2013 पंचायत चुनाव में भी हिंसा की संभावना का मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया और शीर्ष कोर्ट के आदेश से केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तैनाती की गयी । 2018 के बाद फिर 2022 नगरपालिका चुनाव में भी हिंसा का तांडव चला । उससे सबक लेना राज्य चुनाव आयोग ने जरूरी नहीं समझा और 2023 पंचायत चुनाव में केंद्रीय सुरक्षा बलों की मांग नहीं की ।
पर्चे दायर करने के दिन से ही हिंसा शुरू हो गयी और राज्यपाल सी. पी. आनंद बोस के राजनीतिक दलों की ओर से मिल रही शिकायतों के निबटारे के लिए राजभवन में ही कंट्रोल रूम बनाया ।
दक्षिण 24 परगना जिले में विभिन्न स्थानों पर हुई हिंसा का जायजा लेने राज्यपाल खुद पहुंच गए, जिसका विपक्षी दलों ने स्वागत किया । लेकिन सत्तारूढ़़ तृणमूल कांग्रेस नेताओं ने अपनी तीखी प्रतिक्रिया में कहा कि राज्यपाल अपने अधिकारों के दायरे से बाहर जा रहे हैं। वापस लौटकर 18 जून को राज्यपाल ने कंट्रोल रूम स्थापित करके उसका नाम ‘शांति रूम’ दिया । राजभवन से जारी वक्तव्य के अनुसार, ‘यहां दर्ज होनेवाले शिकायतें राज्य सरकार और चुनाव आयोग को भेज दी जाएंगी ।’
16 जून की रिपोर्ट थी कि सबसे ज्यादा पर्चे तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवारों ने दाखिल किए । उसके पहले 15 जून को कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य के सभी 22 जिलों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती के लिए राज्य चुनाव आयोग को 48 घंटे का समय दिया । राज्य सरकार की ओर से पेश वकील सांसद कल्याण बनर्जी ने हाईकोर्ट में दलील दी कि राज्य सरकार केंद्रीय बलों के बजाए अन्य राज्यों. ओडिशा, झारखंड, तमिलनाडु, पंजाब से पुलिस बल मंगाने के पक्ष में है । राज्य चुनाव आयोग ने कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश को 48 घंट बीतने से पहले सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी । सुप्रीम कोर्ट जज बी. वी. नागरत्न और मनोज मिश्रा की अवकाश पीठ ने तुरंत सुनवाई करके हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराया । 20 जून के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट जजों ने पश्चिम बंगाल में ‘चुनाव हिंसा के इतिहास’ का जिक्र किया ।
सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि 75ए000 पंचायत सीटों के 61ए636 बूथों पर मतदान के लिए पर्याप्त सुरक्षा बल चाहिए, चुनाव कराने का मतलब हिंसा का लाइसेंस नहीं हो सकता । बंगाल सरकार के वकील के बयान में कहा कि हाईकोर्ट के 15 जून के आदेश से कानून व व्यवस्था बनाए रखने के राज्य सरकार के अधिकार छिन गए । ‘यह राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, जो कोई सुपर पावन नहीं छीन सकती ।’
आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश से 23 जून को केंद्रीय बलों की 315 कंपनियां तैनात की गयी और उसके बाद राज्य चुनाव आयुक्त राजीव सिन्हा राज्यपाल से मिले । पर्चे भरने का नाम 09 जून से शुरू होने के समय से लेकर 02 जुलाई तक 10 लोग मारे जा चुके थे । कांग्रेस और भाजपा के बाद दक्षिण 24 परगना जिले में ही एक तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता जियारूल मुल्ला की हत्या हो गयी । मुल्ला की बेटी कठलबेरिया ग्राम पंचायत से तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार है ।
उसकी प्रतिक्रिया में तृणमूल कांग्रेस नेता सांसद अभिषेक बनर्जी ने अधीर रंजन चौधुरी पर निशाना साधते हुए कहा कि वे राज्य में भाजपा के सबसे बड़े एजेंट’ के रूप में काम कर रहे हैं ।