आधार कार्ड / नंबर को लेकर जनता के बीच व्याप्त अराजकता के बावजूद जनप्रतिनिधियों की सरकार आधार को सरकारी के बाद घरेलू योजनाओं में भी अनिवार्य करने पर आमादा है । राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू करने के लिए केंद्र ने राज्य सरकारों को सारे राशन कार्ड आधार से जोड़ने के लिए दिसंबर तक की ‘डेडलाईन’ दे दी थी । सरकारी अधिकारियों को सिर्फ इससे मतलब था कि अगर कोई गरीब चाहे वो गरीबी रेखा से नीचे बीपीएल लाल कार्डधारी ही क्यों न हो, उसे राशन न दिया जाए चाहे वो भूख से मर क्यों न जाए । उसके पीछे एकमात्र ठोस आधार यही था कि ‘आधार’ कार्ड के बिना किसी भी हालत में भूखे गरीब को राशन न दिया जाए ।

क्योंकि राशन कार्ड को आधार से जोड़ने का अभियान चलाया जा रहा है और राष्ट्रीय ‘खाद्य सुरक्षा’ अधिनियम के तहत ऐसा निर्देश केंद्र सरकार ने राज्यों को जारी किया है । इसके लिए डेडलाईन पूरी होने से पहले झारखंड में 11 वर्ष की एक लड़की ‘डेड’ हो गयी । मौत का कारण राशन कार्ड के आधार से जुड़े न होने के कारण उस लड़की को जनवितरण प्रणाली के अंतर्गत चलायी जा रही राशन दुकान से अनाज नहीं दिया गया । इस खबर को दबाना संभव नहीं हो सका, वर्ना उस लड़की की मौत किसी ‘बीमारी’ से होती, भूख से नहीं । केंद्रीय खाद्य मंत्रालय को जनता को खाद्य ‘सुरक्षा’ तो देनी है, लेकिन उससे ज्यादा अनिवार्य है, आधार कार्ड, क्योंकि आधार के बिना हर सरकारी योजना निराधार है । लड़की की मौत के बाद केंद्रीय खाद्य मंत्रालय ने राज्यों को फिर निर्देश दिया कि किसी को राशन दुकानों के लाभ से आधार कार्ड न होने के कारण वंचित न किया जाए । अगर झारखंड में एक लड़की की भूख से मौत नहीं हुई होती तो राशनकार्ड धारियों के बीच आधार को लेकर मची त्राहि-त्राहि की सरकार सुध नहीं लेती ।

अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में जिस समय केंद्र को सुप्रीम कोर्ट में आधार के पक्ष में अपना पक्ष प्रस्तुत करना था, उसी समय आधार कार्ड से वंचित राशनकार्ड धारी परिवार की यह दुखद घटना सुर्खियां बनी हुई थी । सुप्रीम कोर्ट को पहले भी आधार कार्ड को जनहित से ज्यादा जनविरोधी अनिवार्यता बनाने के लिए केंद्र के अड़ियल रवैए पर सरकार को निर्देश देने पड़े हैं । 25 अक्टूबर को केंद्र सरकार की पेशी इसी घटना से जुड़ी थी । केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता की डेडलाईन अवधि उनलोगों के लिए बढ़ाकर अगले वर्ष 31 मार्च तक कर दी जाएगी, जिनके पास यह 12 डिजिट बॉयोमीट्रिक पहचान नंबर नहीं है । तबतक रियायती दर पर राशन पानेवाले राशनकार्ड वालों की पहचान कैसे होगी और किन प्रक्रियाओं के दौर से गुजरने के बाद गरीब को भोजन मिलेगा, इस विषय में सारी वैकल्पिक व्यवस्था गोलमटोल है, जो इस नीति की कुव्यवस्था उजागर करती है ।

एक ओर तो केंद्रीय खाद्य मंत्रालय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जारी अपनी अधिसूचना पर कायम है कि हर हाल में राशन कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ने का प्रबंध किया जाए और साथ में चेतावनी भी है कि इस अधिसूचना के प्रावधानों के उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी । दूसरी तरफ इस मौत के बाद नरम रवैया अपनाने से राशन दुकान चलानेवाले द्विविधा में हैं कि आधार कार्ड के अभाव में गरीब की जान बचाएं या अपनी दुकान बचाएं ।

भारत विशिष्ट आधार पहचान प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी(सीईओ) अजय भूषण पांडे इस स्थिति के जवाब में कहते हैं - ‘इरादा यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी आधार कार्ड न होने के बावजूद खाद्य लाभ से वंचित न किया जाए ।’ ऐसे दिग्भ्रमित करनेवाले बयानों से जनता के बीच क्या संदेश जा रहा है, इस संबंध में अगर गंभीरता से सोचा जाता तो सुप्रीम कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखने की नौबत केंद्र सरकार के लिए नहीं आती ।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए. एम. खानविलकर और जस्टिस डी. वाई. चन्द्रचूड़ को कहना पड़ा कि आधार की अनिवार्यता को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर सुनवाई के लिए संविधान पीठ का गठन किया जायेगा । केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल की दलीलों से चीफ जस्टिस समेत दोनों सुप्रीम कोर्ट जज आश्वस्त नहीं हुए । लेकिन सरकार अपनी दलील को सही ठहराने पर अड़ी है, इसलिए के. के. वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वे बहस के लिए तैयार हैं । सुप्रीम कोर्ट जजों ने सरकार के वकील वेणुगोपाल का यह तर्क स्वीकार कर लिया कि उनका पक्ष सुने बगैर किसी अन्य अंतरिम आदेश की आवश्यकता नहीं है । शीर्ष कोर्ट नवंबर के अंतिम सप्ताह से इस पर सुनवाई शुरू करेगी ।

सुप्रीम कोर्ट में आधार कानून की संवैधानिक वैधता को इस आधार पर भी चुनौती दी गयी है कि यह निजता के अधिकार का उल्लंघन है । याचिकाकर्ता के वकील ने इस पर तुरंत सुनवाई का आग्रह किया जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया और इसी हफ्ते से सुनवाई करने को सुप्रीम कोर्ट पीठ तैयार हो गयी । आधार बनवाने में आंखों की पुतली तक की तस्वीर सार्वजनिक हो जाती है। यह विशिष्ट नहीं, विचित्र पहचान पत्र कार्ड है । आधार कार्ड बनानेवाले सरकारी कर्मचारियों ने अपनी निजी आधार एजेंसी खोल रखी है और वे बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए मोटी रकम लेकर काम करते हैं । 65-वर्षीय एक बीपीएल कार्डधारी बताते हैं कि उनकी ऊंगलियां, अंगूठा, पंजा की चमड़ी, मांसपेशी सिकुड़ जाने के कारण स्क्रीन पर छाप नहीं आयी और उनका आधार कार्ड नहीं बना । बस इतने भर से राशन दुकान से अनाज लेने के अधिकार से वे वंचित हैं । रियायती दर पर अनाज लेने के लिए ऐसे परिवारों को निजी आधार कार्ड दुकान मनमाना पैसे लेकर आधार कार्ड बना रहे हैं । किस आधार को सही माना जाएगा?

आधार कार्ड कानून की पहचान का सबसे बड़ा और ठोस आधार ये है कि यह संसद से पारित अधिनियम है, जिस पर जनप्रतिनिधियों की सहमति मुहर लगी हुई है । लेकिन अगर जनता इससे परेशान नहीं होती तो कई जनहित याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर नहीं की जाती । जनता पर थोपी गयी आधार से संबंधित अधिसूचनाओं को चुनौती देनेवाली याचिकाओं में अगर आम लोगों की पीड़ा नहीं होती तो सुप्रीम कोर्ट में विचारार्थ स्वीकार ही नहीं की जाती । जनप्रतिनिधियों को सिर्फ इससे मतलब है कि आधार कार्ड हर हाल में ‘कल्याणकारी’ और ‘लाभकारी’ योजनाओं का लाभ उठाने के लिए होना चाहिए । लेकिन इससे जनता को कहां-कहां नुकसान उठाना पड़ रहा है और अवाम का कितना अहित हो रहा है, इसकी फिक्र किसी को नहीं है । उतना ही नहीं, फिर धीरे-धीरे आधार को आम जनता की निजी और पारिवारिक योजनाओं से जोड़ दिया गया ताकि जनता का कुछ भी प्राइवेट न हो । जिस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है, उसमें मोबाईल नंबरों को आधार से जोड़ने को चुनौती दी गयी है । सरकार से चार हफ्ते में जवाब मांगा गया है ।

सभी बैंक खातों को आधार से जोड़ने की चेतावनी पहले से ही दी जा रही है । दिसंबर तक जिनका खाता नहीं जुड़ा, उनका बैंक खाता सील ।

प्रश्न है कि आधार से जुड़े किस पक्ष को निराधार माना जाए? सरकार के लिए तो कोई पक्ष निराधार है ही नहीं । इसे जनहित में साबित करने पर तुली सरकार ने जनता के बीच जो रट लगा रही है, उसे सुप्रीम कोर्ट में दुहराएगी । सुप्रीम कोर्ट ने भी शौकिया या राजनीतिक कारणों से दायर की गयी याचिकाएं सुनवाई के लिए स्वीकार नहीं की है । पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने यही कहकर खारिज कर दी कि संघीय ढांचे के अंतर्गत कोई राज्य सरकार संसद से पारित कानून को चुनौती कैसे दे सकती है । शीर्ष कोर्ट ने ममता बनर्जी को व्यक्तिगत तौर पर नागरिक के रूप में याचिका दायर करने की इजाजत दी । ममता बनर्जी(दीदी) की याचिका में क्या होगा, यह तो सुनवाई के बाद ही पता चलेगा । वैसे दीदी के वकील कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल हैं और दीदी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ महागठबंधन बनाने के लिए कांग्रेस के करीब आना है ।

लेकिन सीधे नागरिक से जुड़ा पहलू ये है कि आधार कार्ड कानून बन जाने के बावजूद खुलेआम सड़क पर आधार कार्ड बनाने की दुकानें चल रही हैं । राशन दुकान से अनाज लेने के लिए बीपीएल परिवारों को पैसे देकर आधार कार्ड बनवाना पड़ रहा है । अगर आधार कार्ड में कोई त्रुटि रह गयी या काफी समय तक न मिला तो निजी एजेंसी पैसे लेकर सब ठीक कर देती है । उसके बावजूद अगर अंगूठा छाप मिलता हुआ न लगा तो आधार कार्ड को जाली बताकर राशन दुकान से भगा दिया जाता है । इस बात का जिक्र आर्थिक सर्वेक्षण में है । जन-धन योजना का लाभ उठाने के लिए आम जनता को बैंक से यह कहकर भगा दिया जाता है कि आधार कार्ड लाओ । एक बैंक अधिकारी से मैंने पूछा कि ऐसा करने का क्या कोई लिखित आदेश मिला है, तो जवाब मिला, ‘मौखिक निर्देश’ मिला है ।

मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली कांग्रेस गठजोड़ सरकार की बाकी सभी योजनाओं की भाजपा सरकार ने समीक्षा कर डाली, लेकिन आधार योजना को हूबहू अपना लिया, जो शुरू से ही विवादित है । नरेंद्र मोदी सरकार ने उसमें इतना इजाफा कर दिया कि आज सुप्रीम कोर्ट को उसी विवाद पर विचार करना है ।

विवाद के घेरे में ही भाजपा सरकार पाकिस्तानी मूल के हिंदुओं को लंबी अवधि का वीसा देने का इंतजाम लगा रही है ताकि वे आधार और पैन कार्ड के हकदार हो जाएं । गृह मंत्रालय सूत्रों के मुताबिक इनमें हिंदू के अलावे बौद्ध, जैन, सिख, ईसाई सभी अल्पसंख्यक हैं । 431 हिन्दुओं को वीसा दिया जा चुका है।

मतदाता पहचान पत्र सबसे भरोसेमंद और सुलभ है । आज तक ऐसा सुनने को नहीं मिला कि चुनाव कार्यालय के अलावे किसी अन्य वजह से मतदाता कार्ड बना हो । उसे सिर्फ वोट डालने तक सीमित रखना और जनता पर आधार कार्ड थोपने का औचित्य सवाल खड़े करता है ।