राष्ट्रीय संविधान / कानून दिवस के सिलसिले में आयोजित समारोहों में जो कुछ देखने सुनने को मिला उससे एक ही संदेश जनता के बीच गया कि कानून के रखवाले आपस में शक्ति संतुलन के संकट से जूझ रहे हैं । संविधान ‘कानून का शासन’ सिद्धांत और आदर्श पर आधारित है, और संविधान दिवस के दिन शासन करनेवाले सरकार के तीनों अंगों के बीच टकराव स्पष्ट रूप में उभरा ।
अलग-अलग समारोहों के मौके के हिसाब से कार्यपालिका चलानेवालों के भाषण बदले हुए थे । लेकिन न्यायपालिका से विवाद चल रहा है, यही मुद्दा सब में छाया रहा । पहला और मुख्य समारोह 25 नवंबर को विज्ञान भवन में आयोजित था, जिसका उद्घाटन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने किया । संविधान और कानून के सर्वोच्च संरक्षक के नाते राष्ट्रपति ने दो दिवसीय राष्ट्रीय कानून दिवस के उद्घाटन भाषण में न्याय निष्पादन व्यवस्था मजबूत करने पर बल दिया, ताकि शीघ्र न्याय मिले और गरीब लोग भी अपनी शिकायतों के निपटारे के लिए पहुंचे । 25 नवंबर को ही राष्ट्रपति ने हरियाणा के कुरूक्षेत्र में राष्ट्रीय गीता महोत्सव के उद्घाटन संबोधन में अंतर्द्वंद से निजात पाने के लिए गीता अध्ययन की सलाह दी । शायद इसलिए भी उन्होंने द्वंद्व से खुद को अलग रखा । विज्ञान भवन वाले समारोह में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्र, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विधायिका प्रमुख लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन भी मौजूद थी । सबसे अजूबा लगा नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी(सीईओ) अमिताभ कांत का न्याय व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सुझाव देना । नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के कुछ दिन बाद एक आयोग का गठन किया, जिसे नेशनल ‘इंस्टीच्यूशंस ऑफ ट्रांसफार्मिंग इंडिया’(छप्न) अर्थात् भारत का कायापलट करनेवाली राष्ट्रीय संस्था,ं, जिसे संक्षिप्त करके नीति आयोग कहा जाता है । पहली बार पता चला कि यह आयोग भारत की शीर्ष न्याय व्यवस्था का भी कायापलट करना चाहता है । अभी तक लोग यही जानते थे कि योजना आयोग की जगह नीति आयोग बनाया गया है ।
गौरतलब है कि राष्ट्रीय नीति आयोग एक्ट(एनजेएसी, 99वां संविधान संशोधन) को अक्टूबर, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया । उसी समय से सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव बढ़े, जो कम नहीं हो रहे हैं । राष्ट्रीय कानून दिवस के दिन यह टकराव खुलकर सामने आया । सुप्रीम कोर्ट द्वारा आयोजित समारोह में राष्ट्रपति ने मुख्य रूप से न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका में शक्ति संतुलन बनाए रखने पर जोर देते हुए कहा कि संविधान में उल्लिखित तीनों अंगों को दी गयी शक्तियां पृथक परंतु समान हैं, इसलिए बिरादरी का आपसी संबंध खराब नहीं होना चाहिए । प्रधानमंत्री नपे-तुले शब्दों में बोले और प्रधान न्यायधीश पर सीधा आक्षेप वाले विंदु उछालने से परहेज किया । लेकिन प्रधानमंत्री की टीम के वित्त मंत्री अरूण जेटली और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद इस तरह चीफ जस्टिस से उलझ गए मानो वे सुप्रीम कोर्ट में टकराव के ही मुद्दे पर बहस के लिए आए हों । दोनों मंत्री वकील रहे हैं । इन दोनों की हां में हां मिलने के लिए सरकार के वकील अटोर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल मौजूद थे ही । अटोर्नी जनरल ने अभी हाल ही में विधायिका से जुड़े किसी भी मामले में दखल न देने पर सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से दलील पेश की है । वेणुगोपल ने भी सुप्रीम कोर्ट में 26 अक्टूबर को संसदीय समिति की रिपोर्टों पर सुनवाई के दौरान शक्ति संतुलन और ‘सपरशन ऑफ पावर्स’ के संवैधानिक प्रावधान की दुहाई देते हुए चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने दलील पेश की । उसके हफ्ते भर बाद हाईकोर्ट जजों के चयन में खुफिया एजेंसी आईबी(इंटेलिजेंस ब्यूरो) की क्लियरेंस को लेकर ठनने की नौबत आयी । जजों की नियुक्ति पर मुहर लगाने के अधिकार वाली सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने कहा कि यह काम खुफिया ब्यूरो का नहीं है । इस कॉलेजियम के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस दीपक मिश्र हैं । शक्ति और अधिकार का टकराव झारखंड हाईकोर्ट के जज के रूप में वकील राजेश कुमार के चयन के मुद्दे पर हुआ । कोलेजियम ने जज के रूप में नियुक्ति के लिए चयनित वकीलों की ‘प्रोफेसनल कंपीटेंस’(सक्षमता) पर खुफिया ब्यूरो की टिप्पणियों को खारिज करते हुए कहा कि यह ‘सुप्रीम कोर्ट जज ज्यादा बेहतर कर सकते हैं ।’ हाईकोर्ट जजों की नियुक्ति अनुशंसा पहले कानून मंत्रालय के पास जाती है, जिसके साथ उम्मीदवारों के रिकार्ड के बारे में खुफिया ब्यूरोों की रिपोर्ट लगी रहती है । उसके बाद ही कानून मंत्रालय अंतिम मुहर के लिए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के पास भेजता है । उसी पर कॉलेजियम की तल्ख टिप्पणी आयी कि न्यायपालिका का हिस्सा किसे बनाया जाना चाहिए, यह तय करना आईबी का काम नहीं, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ज्यादा बेहतर करने में सक्षम है । कानून मंत्रालय के मुताबिक नौ हाईकोर्टों से 40 जजों की अनुशंसा प्राप्त हुई, जिसे सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम के पास भेजा गया । वेसे झारखंड हाईकोर्ट के जज के लिए राजेश कुमार का नाम कॉलेजियम ने क्लियर कर दिया, मगर अन्य हाईकोर्टों के लिए अनुशंसित नाम पर आईबी रिपोर्ट की लेकर कानून मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के बीच खिचखिच रही । ऐसे ही खटास के माहौल में राष्ट्रीय कानून दिवस मनाया गया । कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद पूरे समारोह में चीफ जस्टिस और राष्ट्रपति के सामने सुप्रीम कोर्ट पर हमले करते रहे । कानून मंत्री मानकर चल रहे हैं कि उनकी ओर से भेजी गयी अनुशंसा पर नुक्ताचीनी करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को नहीं है । जबकि सुप्रीम कोर्ट इसे मानने को तैयार नहीं है, क्योंकि अभी चयन प्रक्रिया के लिए सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच एमओपी(चयन प्रक्रिया से संबंधित ज्ञापन- मीनोटेंडम ऑफ प्रोसीजियर) पर भी सहमति नहीं बन पायी है । कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संविधान दिवस के मौके पर ही सुप्रीम कोर्ट पर सीधा हमला करते हुए कहा कि उनकी अनुशंसा प्रधानमंत्री के अनुमोदन से भेजी जाती है और आश्चर्य है कि चीफ जस्टिस उसे नहीं मानते । उन्होंने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग एक्ट असंवैधानिक घोषित किए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की आलोचना की । उसके बाद एमओपी का प्रस्ताव बना, लेकिन उस पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट में मतभेद बरकरार है । रविशंकर प्रसाद ने कहा कि यदि जजों की नियुक्ति करने में पीएम और कानून मंत्री पर विश्वास नहीं किया जा सकता तो यह बड़ा सवाल है । कानून मंत्री ने कहा कि संसद में सर्वसम्मत से पास हुआ एनजेएसी को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया, यह न्यायपालिका द्वारा अपनी सीमा का अतिक्रमण और विधायिका की उपेक्षा है । एक भी वोट इसके खिलाफ नहीं था और पचास फीसदी से ज्यादा विधानसभाओं ने इसकी मंजूरी दी थी । केंद्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली ने सुप्रीम कोर्ट के इस तर्क को मानने से इंकार कर दिया कि कार्यपालिका के नकारेपन और अक्षमता से परेशान होकर लोग जनहित याचिकाएं दायर करते हैं, जिसकी सुनवाई करना न्यायपालिका का कर्त्तव्य है । उन्होंने कहा - ‘जनप्रतिनिधियों की सरकार को पता है कि जनहित में क्या करना है । जब दोनों मंत्री बोल चुके, तब प्रधानमंत्री ने बीच का रास्ता निकाला और कहा कि सरकार के तीनों अंग अपने दायरे में रहते हुए एक-दूसरे की आवश्यकताओं को समक्षकर काम करें । उन्होंने कहा - ‘हम अपनी-अपनी कमजोरियां जानते हैं और अपनी शक्तियों को भी पहचानते हैं। क्या हम अपनी मर्यादा के दायरे में हैं?
सारी स्थितियों को अनुकूल बनाने में राष्ट्रपति ने बड़ी अच्छी भूमिका निभायी । उन्होंने न्याय का खर्च कम करने पर और गरीबों को वकीलों के बगैर भी कोर्ट तक पहुंचने की व्यवस्था पर बल दिया । राष्ट्रपति ने कहा कि कोर्ट के फैसले फरियादियों के समझने लायक बनाये जाय और हाईकोर्टों को कहा कि सिर्फ अंग्रेजी के बजाय अपने राज्य की भाषा में अनुवाद कराकर फैसले की प्रति उपलब्ध करायं । उन्होंने इस संबंध में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का उदाहरण दिया, जहां यह व्यवस्था शुरू की गयी है ।
सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस दीपक मिश्र ने तमाम विसंगतियों को खारिज करते हुए कहा कि मौलिक अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता । अधिकांश जनहित याचिकाएं मौलिक अधिकारों के हनन से संबंधित होती हैं, जिस पर सुनवाई न्यायपालिका कर्त्तव्य है । उन्होंने न्याय में देरी और जजों की नियुक्ति के लिए न्यायपालिका को दोषी मानने से इंकार कर दिया । 27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने एमओपी से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सरकार को चेतावनी दी कि इसको अंतिम रूप देने में देरी पर सरकार को एक निश्चित समय सीमा का अल्टीमेटम दिया जा सकता है । सुप्रीम कोर्ट ने समारोह के बाद टकराव टालनेवाला एक अहम मुद्दा सीबीआई में विशेष निदेशक के रूप में राकेश अस्थाना की नियुक्ति को चुनौती देनेवाली याचिका खारिज कर दी । जबकि इसके पहले 24 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया था ।